Saturday, September 9, 2017

तोताबाला उर्फ अम्बर पांडेय की कविताएं 9 Sept 2017

तोता बाला ठाकुर को याद करते हुए, एक बार फिर. उसकी कविताएँ!

 १
आओ

अगली ट्रेन पकड़ के
जितनी जल्दी हो सके चले आओ
कीचड़ में लथपथ
चढ़ी गंगा तैर
मेघों पर पाँव रख रख कर आ जाओ
आ जाओ देवदास की तरह
मैंने खोल रखे है द्वार
मैंने दे रखा है अपने स्वामी को विष
तुम आओ निडर
भूलना मत लाना बेल का फल
और संखिए की पुड़िया।



सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

व्योमकेश बक्शी की भाँति तुम तो
भटकते रहे पूरे ग्लोब पर सत्य की खोज में
प्रिय ऋषभ ब्रह्मो

मैं अज्ञेय से करती थी प्रेम
किंतु मेरे सोलह वर्ष की वय को प्राप्त करने से पूर्व
वह सिधार गए
उस कैशोर में मैं किसी विधवा सी
रोती-कलापती रही हुबली के निर्जन घाट पर

तुम ऊपर हावड़ा ब्रिज पर सोनागाछी की
किसी श्याम स्त्री के संग

बोईपाड़े में सिगरेट फूँकते शांख घोष के
शब्दों से तुम करते रहे कॉलेज की उस गौरबरन बाला के
कैथबरन निपल्ज़ का स्पर्श

तुम्हारे रेखाओं में आया मुक्तिबोध की
बीड़ियों का धूम्र और रतन थियम के नृत्य
मेरे निकट क्या आया -
आशापूर्णा देवी के उपन्यास
दोपहरियों के मेघ और अज्ञेय के प्रति

मेरा अंधप्रेम।


ब्रह्मपुत्र में निर्वसन

स्नानगृह में काई पाँव में
मस्तक पर जाले, ऐसे नहाती थी मैं
घड़े ही घड़े चारों और रखे- ताम्बे, पीतल
भूमि के
ऋषभ ब्रह्मो उम्र १९ वर्ष में थी
उससे ठीक नौ वर्ष बड़ी

झाँकता पुतली बराबर छिद्र से द्वार के

मैं कल्पना करती ब्रह्मपुत्र में निर्वसन
स्नान की, कछार काटता नद
बह चुके वस्त्र और शेष केवल शरीर

देखा करो ऋषभ ब्रह्मो- जैसे यह नद निर्वस्त्र है
इसमें मिलने वाली नदियाँ निर्वस्त्र है, वृक्ष, लताएँ
वनदेवियाँ, पीपल से औंधे लटके ब्रह्मराक्षस
निर्वस्त्र- वैसी तोताबाला भी हो गई है
तुम्हारी प्रीति में

प्रेम हर लेता है समस्त चीर, आवरण उघाड़ देता
है सब

वर्षा के मटमैले जल में
देखते हो जब तुम यह डूबता - उतराता
औंधी नाव के नीचे तब तुम
क्या मार नहीं देना चाहते थे
मेरे पति और अपने खेमू दा को।



चरम रूप से वेध्य

बृहद्धमनी भेदने का अभ्यास मैंने वर्षों किया
कंठ से निकल पाए मेरा नाम
उसे पीछे धकेलते हुए तुम्हारे प्राण निकल जाए
विष देना स्त्री होने की सुंदरता के
सर्वथा अनुकूल था
निद्रा में स्वप्न में गोत्र स्खलन के समय
प्राण भी निकल जाते चुपचाप
किंतु इसमें इतनी शांति और बहुत कम
हिंसा थी
यदि किसी कारण से अपनी ही संतति की
हत्या करनी होती
तो सम्भव है कि लाती कोई अभेद विष
तुम्हें यंत्रणा दिए बिन मारना
अपूर्ण कर देता मेरे हृदय के एक भाग को
बहुत बेला निद्रा से उठ बैठती कामना के
ज्वर से तप्त - किसी ऊँचाई पर ले जाकर
तुम्हें धक्का देना कितना उत्तेजक होता
जैसे ऋषभ ब्रह्मो के कंधे पर
मेरा दंतक्षत
और जो कोलाहल होता पश्चात उसमें
कितना संगीत होता क्षेमेन्द्र ठाकोर
दक्षिणेश्वर ले जाती तुम्हें- भवतारिणी के चरणों में
फिर एक दोने में दीपक, अक्षत, मछली को आटा रख
जाते हुगली के बीचोंबीच
वहाँ से देती तुम्हें धक्का जल में
जैसे मंच के बीचोंबीच भूमिका का
सबसे कोमल सबसे अद्भुत भाग
भक्तगण, नाविक, बाबा और माँ शारदा
देखते
कि प्रेम मेरा कितना तीव्र है
कि इस प्रेम में
मैं कर सकती हूँ भीषणतम पाप ।



कालीघाट पर सेंदूर की दोकान

कालीघाट पर तारकेश्वरी के स्थान के दक्षिण
थी श्री बंकिमबिहारी बनर्जी की सुगंधित
सेंदूर और आलते की दोकान

माँमणि का हाथ पकड़ के
प्रत्येक मास की एकादशी- मछली भात खाने के बाद
हम दोनों यहाँ आती थी नियम से

प्रसाद की मिठाई का दोना पकड़े
और दाँतों में पान दबा
चौथाई सेर सेंदूर और एक शीशी आलता
बँधवाती माँमणि--

बंकिमबिहारी बनर्जी मेरे जीवन के प्रथम पुरुष थे
वय पचपन, दाढ़ी सुदीर्घ और श्वेत-श्याम
बताते है उनके हाथों का छुआ सेंदूर-आलता लगाके
पुरुष को किसी बिन माँ के बछड़े की भाँति
वश में किया जा सकता था-

आठ वर्ष से वय में उनपर मुग्ध थी मैं
निनिर्मेष उन्हें देखती रहती, तब मुझे कहाँ था ज्ञात

सेंदूर, आलता,
कंकन, कलेवर, कर्णिकार से
अधिक भी है संसार
हुगली से आगे भी है बंगाल
केवल शंख का ही नहीं होता रंग श्वेत
केवल रक्त ही नहीं होता लाल

किंतु प्रेम का भी अरूण वर्ण है
और सुगंध केवल प्रेम में ही नहीं होती
सुगंध होती है घृणा में भी

केवल पेड़ा ही मीठा नहीं होता
कभी कभी अपने पति की मृत्यु भी मधुर लगती है ।



क्षेमेन्द्र ठाकुर की हत्या

'रक्त में उतना अनुराग नहीं होता जितना
मन में होता है' किंतु मन कौन सी विधि से
पकड़ती तुम्हारा क्षेमेन्द्र ठाकुर?
भीम जब दुर्योधन के रक्त से स्नात
अंजलि में भरे उसकी जंघा का रक्त
याज्ञसेनी का शीश प्रक्षालन करने आया था
तब उसे भीम दीख पड़ता था दुर्योधन
तुम्हारे रक्त से भीगी, ताँत मेरी जैसे जैसे
छुड़ाकर तुम्हारी मुट्ठी से, जब मैं पहुँची थी
ऋषभ ब्रह्मो के निकट, तब दूर हटा किंचित वह
ढाके की मलमल का श्वेत कुर्ता
कहीं मित्र के रक्त से मैला हो जाता तो-
इसलिए ऋषभ ब्रह्मो मैंने की तुमसे प्रीति
परकीया हुई, रचे षड्यंत्र, अपने स्वामी का
शीश छेद दिया जैसे धागा तोड़ती थी
काँथे का टाँका लगाके
उसी निशा निश्चय कर लिया था मेरे रागमणि
कि जो रक्त के रंग थे मेरी पीली ताँत पर
जो रक्त की गंध थी मेरे केशों में
उसे तुम्हारे कपाल के रक्त से करूँगी स्वच्छ
किसी किसी पुरुष का स्वेद
निष्फल रहता है सदैव
किंतु स्त्री की प्रीति फलती है उसके गर्भ की भाँति।


क्षेमेन्द्र ठाकुर १

उस रात्रि तुम्हारे लिए बनाऊँगी
सरसों के तेल में हिलसा और आलू-पोस्ता
पहनूँगी बालारून सारी कुसुम्भ किनारी की
जवाकुसुम के अलंकार, पारिजात के कंकन
तुम्हें मनुहार के खिलाऊँगी लूचियाँ और मालपुआ
चुम्बन लेने की लीला करूँगी किंतु लूँगी नहीं
दे दूँगी अपनी शंख कंकनों से भरी बाँह तुम्हारे हाथ में
मसक देना तुम
तोड़ देना कंकन लोहे के वलय छोड़कर
शंख सिंदूर के सब कंकन
ऐसे प्रणय कलह में कर दूँगी अर्धरात्रि
फिर फिर, जब तुम सो जाओगे तुष्ट
बाहर केवल रोते होंगे चकवे
बाहर केवल प्यासा होगा चातक
तब क्षेमेन्द्र ठाकुर
निकालूँगी वह चाक़ू जो दिया था मुझे
ऋषभ ब्रह्मो ने
जहाँ से चलती है तुम्हारी नाड़ी
जहाँ बसे है तुम्हारे प्राण
वहाँ कंठ पर प्रहार करूँगी
तुम्हारे रक्त के लथपथ मैं
मुझे पहचान नहीं पाएगा ऋषभ ब्रह्मो
समझेगा उसकी इष्टदेवी छिन्नमस्ता है
ऐसे क्षेमेन्द्र ठाकुर मैं तुम्हारी हत्या करूँगी
क्योंकि मैं करती हूँ तुमसे प्रेम
क्योंकि मेरे हृदय को खा चुका है ऋषभ ब्रह्मो।



क्षेमेन्द्र ठाकुर २

मेरे हृदय की कंदरा में तीन
नदियाँ बहती रही सदैव
तुम्हारी हत्या करने से पहले
तुम्हारी हत्या करते हुए
तुम्हारी हत्या करने के पश्चात्
तुमसे प्रेम करने से पहले
तुमसे प्रेम करते हुए
तुमसे प्रेम करने के पश्चात्
यह नदी सरस्वती की तरह लुप्त है
कई रात्रियाँ मैंने तुम्हें विष देने की योजना
बनाने में व्यर्थ कीं
तुम्हें मार डालने की इच्छा में
भटकती रही बाजार बाजार
ऐसे हथियार की फिराक में
जिसका तुम में प्रवेश
पहले भर दे तुम्हें सुख से, कुछ देर बाद
उठे तुम्हारी अंतिम चीत्कार
प्रेम ही हो सकता था इतना तीक्ष्ण
प्रेम ही मार सकता है बिना रक्तपात किए
तुम्हारा रक्त जो मैंने रखा इतना शुद्ध
व्याधियों से की रक्षा
ऐसे शुद्ध रक्त से ही बन सकते थे मेरे कुंडल
इतने शुद्ध रक्त से ही बन सकता था मेरा चूड़ामणि।



अपूरब गोस्वामी तुम आए घने वन में
यात्री को आता है जैसे अपनी छोड़ी हुई प्रेमिका का स्मरण
तुमने ही कहा था, स्मरण में मरण है
बताओ तो कौमार्य भंग करने में बाद
कोई करता है ऐसी बात अपनी स्त्री से
लेकिन तुमने की

तुम्हारे पसीने से सराबोर मैंने अनुभव किया
मैं वह तारा हूँ जो बादलों के नीचे आ चुका है
फीकी पड़ गई थी मेरे वैभव की चमक
प्रेम की उपमा उसदिन मैंने जाना
कविलोग बरसात से क्यों देते है
ट्राम के नीचे आए तुम या ट्रेन के
अब तो याद तक नहीं

लेकिन अब तक याद है तुम्हारा गुड़हल का तेल
चुपड़कर आना धूपगढ़ के पर्वत पर
और याद है तुम्हारा वह गाढ़ चुम्बन
मृत्यु प्रेम को ऐसे प्रगाढ़ करती है
जैसे अमृत को अग्नि।

१०

चुम्बन

अक्सर तुम्हें क्षेमेन्द्र ठाकुर- पुकार बैठती थी
'खेमूदा खेमूदा' प्रेम की गूढ़तम रात्रियों में
नितम्ब दोनों तुमसे प्रताड़ित, रक्ताभ
कंधे दूसरे दिन दोपहर तक उतरे रहते थे
कितना प्रेम करती थी तुमसे खेमूदा

तुम अनन्य थे तुम्हें अन्य का कैसे हो जाने देती भला
बंकिमबिहारी बनर्जी, अज्ञेय, अपूरब गोस्वामी,
अज्ञात पहलवान, ऋषभ ब्रह्मो,
कवि जिसका नाम नहीं ले सकती
वह बदनाम हो जाएगा -
बादलों के गरजने पर होने वाला
प्रकाश थे केवल यह सब

यहीं तुम्हारे इसी वक्षस्थल पर जहाँ से
चाक़ू घुमाके निकाल लेना चाहती थी तुम्हारा हृदय
जैसे फल से कोई गुठली निकाल लेता है

तुमसे चुम्बन से पूर्व
अपनी इष्ट बगलामुखी के मंत्र जपती रहती थी
कि चुम्बन के समय
कस लूँगी दाँतों से तुम्हारी जिह्वा और फिर

अपनी प्रत्येक एकादशी
मछली खाने के अभ्यास के अनुसार
काट लूँगी तुम्हारी जिह्वा कि पुनः तुम किसी और का
नाम तक न ले सको

तब बताओ भला तुम्हारी जननी कैसे गई थी
उस ज्योतिष के निकट जिसने कहा था कि
स्त्री और शत्रु का कुंडली में स्थान एक है
षष्ठ स्थान शत्रु और उसके प्रतिदिन आगमन का
सप्तम स्थान

उसे क्या ज्ञात था कि तुम्हारे सब स्थानों पर मैं विराजमान हूँ
क्या उसे ज्ञात था कि
तुम्हारी मृत्यु मेरे हाथों होनी थी।

११.

रहस्यमना

चिरईगोड़ा में जो कांस का बन उग आया था
वह मेघों के छाया जैसा प्रेम, क्रोध, अहंकार
सब नष्ट हुआ

यह जो अपूर्व दिनांक आया है जब खेमूदा का शव
बाहर रखा जा चुका है
कंकन उतारके रख दिए है ऋषभ ब्रह्मो की जेब में
अरुन पाटे की धोती ठूँस के बक्स में

अग्नि भी शीतल लगती है क्षेमेन्द्र ठाकुर जो लगी लगी
सोती रहूँ तुम्हारी चिता पर
ऐसा प्रतीत होता है कि मैं सती हूँ
इन उँगलियों के पोर पोर फूट पड़ेगी अग्नि
जिसकी तुम्हारे संग प्रदक्षिणा की थी

जब दौड़ती हूँ तुम्हारे पीछे किसी का
कोई स्पर्श नहीं छूता मुझे
ऋषभ ब्रह्मो कटि से पकड़ रोकता है

नित्य नए प्रवाद चलते है प्रतिदिन कोई
नया पुरुष आता है अधिकार बताने
प्रतिदिन किसी नए पुरुष से नाम जुड़ता है

कविताओं की कॉपी रख दी ऊँचे आले पर
जो मैं ऐसा जानती कि लिखकर ऐसा दुःख मिलता है
तो कहती
स्त्री होकर लिखना मत कभी, मृगलोचना।

१२

ब्रह्मघोर स्वामी के संग भोगवती अनंता में नौका विहार

वैराग्य ग्रहण करने के पश्चात् मुझे तीव्र
अनुराग हुआ ब्रह्मघोर स्वामी से
स्त्री का मोह अंधकार होता है
घेर ही लेता है दिवस भर के प्रकाश के पश्चात्

ब्रह्मघोर की युवावस्था किसी नाग की भाँति
बैठ गई थी कुंडली मार मेरे स्तनों पर
कभी उसे पुत्र जान स्तनपान कराने की इच्छा से व्याकुल
मैं कल्पना किया करती थी
कि उसे सती अनुसुइया सी मैं शिशु बना लूँगी
कभी उसे भर लेना चाहती थी अपने गाढ़ आलिंगन में
जैसे भरा था अपूरब गोस्वामी को
उनकी मृत्यु से ठीक एक रात्रि पूर्व

चिलम पीते उन्हें भोलेनाथ जानती
स्वयं गौरा हो जाती, मैं कल्पना करती थी
कि प्रत्येक शिवरात्रि उनकी जटाएँ खोल
जब मैं केश प्रक्षालन करूँगी उनका
तब ब्रह्मपुत्र में आ जाएगी बाढ़ इतने बरसेंगे मेघ

भोगवती अनंता को जब एक डोंगी में पार करते थे हम
वह मेरी कटि को किसी बैरागी की भाँति
उचटे नयन देखते थे मैं उनकी
शिवलिंग की भाँति स्थितप्रज्ञ इन्द्रिय का ध्यान धरती।

१३

ब्रह्मो के लिए ब्राह्मी घृत

प्रयाग के जल में सोलह रात्रि गलाकर
पूर्णिमा की अर्धरात्रि गाय के घी में
ब्राह्मी सिद्ध की
उसमें मासिक धर्म का पुष्प डाल
मैंने दिया था ऋषभ ब्रह्मो को

ऐसा करने पर पुरुष के ह्रदय पर
अग्नि की भाँति जल की भाँति प्राण वायु की भाँति
स्त्री अंकित हो जाती है
तुम्हारी स्मृति में रहूँगी सदैव जैसे चकोर के मन में
स्वाति नक्षत्र का मेघ रहता है

ऋषभ ब्रह्मो क्या तुम्हें स्मरन है
एक रात्रि संग संग जब हमने देखी थी
ऋत्विक घटक की सिनेमा तिताश एकटी नदीर नाम
और तुमने इस क्षेमेन्द्र ठाकुर की विधवा को
सती होने से रक्षा कर
घनघोर बरसते मेघों के नीचे खड़ा किया

किंतु तंत्र मंत्र सब निष्फल हुए
नारायणपुर की बांग्लादेशी जबा काज़िम के
श्याम स्तनों और क्षीण कटि के पीछे
तुम तोता बाला को ऐसे भूले जैसे
धन पाने में पश्चात पुरुष अपनी निर्धनता को
विस्मृत कर देता है

किंतु यह मेरा अनुराग लता है ऐसी
जिसे मैंने अश्रुओं ने नहीं विष से सींचा है
घृणा से भरकर
प्रेम और अधिक तीव्र अधिक तेजस्वी हो जाता है

वचन देती हूँ तुम्हें
जबा काज़िम के शव के ऊपर
तुम मुझे मथ डालोगे प्रेम में
वचन देती हूँ एक दिन ऐसा शीघ्र आएगा।

१४

तिमिरबरन का क्या हुआ

सब कोई देबदास मुखोपाध्याय की भाँति
नष्ट नहीं हो जाते पार्वती के पीछे
प्रेम में, ऐसी ही रीति है
किंतु तिमिरबरन तो नष्ट हो गया

बताओ भला नष्ट न होता
जिसकी स्त्री उसके क्रोध से बढ़े हाथों का
चुम्बन लेकर कह दे उससे, 'मोशाय महापात्र,
ईर्ष्या के वश अपनी स्त्री की हत्या
प्रेम का सबसे गाढ़ा चुम्बन है'
ऐसा कहकर निर्वस्त्र निरस्त्र खड़ी हो जाए सम्मुख

हत्या से पूर्व गर्भवती कर दे स्वामी
इतना प्रेम करे एक ही रात्रि में और प्रात होते होते
घोंट दे कंठ

ऐसे तिमिरबरन को नष्ट तो होना ही था
जैसे गहरी जड़ों वाला कांस भी शीतकाल में
नष्ट हो जाता है
जैसे एक दिन यह आकाश भी नष्ट हो जाएगा

किंतु प्रेम नष्ट नहीं होता न नष्ट होती है मृत्यु
मृगलोचना के गर्भाशय से ऊपर पंसलियों के मध्य
स्तनों के बीचोंबीच हृदय में
जन्म से ही इन दोनों का वास है

बताओ, कितना संयम कितनी तपस्या साधी होगी
तिमिरबरन ने कि घोंटते गला न काँपे होंगे हाथ
न स्वेद से गीले
उसने मारा होगा मृगलोचना को
संसार के सबसे कुशल प्रेमी की भाँति।

१५

चिता पर सम्भोग

ऋषभ ब्रह्मो नष्ट ही कर दिया था तुमने
शैया पर
उस दिन जब मेरे स्वामी खेमूदा की चिता धू धू करके जलती थी

शोक का नाश करने के लिए
तुमने यह आयोजन किया था

अभी अभी विधवा हुई मैं
किसी नववधू की भाँति भास रही थी उस संध्या
आभूषण नहीं थे तिलक नहीं था मस्तक पर

किंतु स्तन पर तुम्हारे काटे का चिन्ह
सेंदूर की असंख्य डिब्बियों को पराजित करता था
नितम्ब लाल थे।

१६

बंकिमबिहारी बनर्जी के प्रति

झालाकटी से आए थे मेरे प्रथम पति
बंकिमबिहारी बनर्जी
नहीं मुझे समुद्र फेन के अलंकार नहीं मिले
तमालबन का अंधकार मुझे नहीं मिला
जब मैं निर्वस्त्र थी
गीत गोविंद की अष्टपदी तक नहीं मिली
कि अंग छुपा लेती अपना

आठ वर्ष की कन्या को बंकिम बाबू ने
दस मिनट में कर दिया त्रिपुरसुंदरी-- जब लौटी गृह माँ के संग
तो बदल गया था रूप बदल गया था मन
जैसे रसायन के ऊपर नीचे होने पर
प्रेमी का चित्त परिवर्तित होता रहता है छाया सा

जब बोलने लगी तब बंकिम बाबू मेरे प्रथम पति ने
कहा, 'तोता तेरी जिह्वा को रक्त लग गया है'
भयभीत हो गए, कविता लिखने वाली स्त्री से
ब्रह्मा भी डरते है
बालक जनने को जिसे बनाया था वह लिखे कविता
छी छी

फिर एक वर्षाकाल की दोपहरी माँ मणि
बंकिम बाबू के मध्य कुछ संवाद हुआ
लौट कर माँ ने मेरी पीठ पर पीट पीट कर
रच दी कोई अद्भुत अल्पना जिसे दिनों तक मैं
दर्पण में देखने के व्यर्थ यत्न करती रही

वह प्रेम की अल्पना थी वह वियोग की अल्पना थी
बंकिम बाबू मुझे क्षमा करना कि मैं तुम्हें
फिर कभी मिल न सकी
किंतु मन तो दस बीस नहीं होते

समझना मन भी दे गई तुम्हें जब अपनी फ़्रॉक
तुम्हें पकड़ाई थी

बंकिम बाबू मुझे क्षमा करना कि तुम्हारी यह स्त्री
नहीं जानती कि उसका प्रथम पति
इस मनुष्यों से भरे भुवन में जीवित है
या मर गया।

१७

मृगलोचना का शव

शव सुंदर भी लगता है यदि अपनी
संतति का हो, अपने प्रिय का, अपने किसी बंधु का हो
जैसे बोल पड़ेगा ऐसा लगता है

कहो, तिमिरबरन महोपात्र- मृगलोचना का
यह मुख, यह स्पंदहीन स्तन, शीतल जंघायें देख
कामना के ज्वर से तुम्हारा माथा तपता है

उलूक नहीं जीता इतना मृगी नहीं जीती
धान, गेंदा, कांस, कवि सब एक ऋतु के पश्चात
काल हो जाते है किंतु स्त्री
अरे बाबा रे स्त्री जीती जाती है जैसे शंख हो
जैसे पाषाण हो जैसे सर्पिनी

पाँच दिन पश्चात जल के ऊपर कमल की भाँति
आ गया मृगलोचना का शव
खुले के खुले नयन काली विशाल पुतलियाँ
हाथ किसी की और बढ़ा हुआ - जैसे कुछ देने को उठा हुआ
स्वर्ण कंकन चोर ले गया कोई
केवल शेष है कुंकुम का कंकन शंख का कंकन
और एक दबा हुआ लोहे का तार

तिमिरबरन के संग उस रात्रि जब तुम भागकर गई थी
मृगलोचना, मैंने तुम्हारे शुभ के लिए कितने व्रत किए थे
आज लोग हटा रहे है, कहते है शव से बात नहीं करता कोई
जिसकी संतान हो शव, उससे पूछो मुझसे पूछो
शव भी बालक की भाँति बोलता है माँ से

बता मृगलोचना तेरी हत्या किसने की है?
कौन रात गए घोंप गया तेरे ह्रदय पर धार।

१८

ब्रह्मघोर स्वामी का वीणा वादन

ब्रह्मघोर स्वामी ने मुझमें प्रवेश किया है
खड्ग जैसे आनंद से मुझे भरा है ब्रह्मघोर स्वामी ने
उनके चुम्बन भुवन भर में
सबसे कम पार्थिव थे सबसे कम दैहिक थे
उनके चुम्बन में सबसे कम थी कामना की गंध
उनके आलिंगन में सबसे अधिक मुक्त थी मैं
जैसे वायु देवता का आलिंगन हो

बंधुमणि सुनो, उन्होंने प्रवेश किया मुझमें
संगीत बनकर, स्वर-रूप इंद्री धारण कर
सदैव सदैव के लिए
अनन्त काल के लिए, जब तक नहीं बुझ जाता
आत्मा का दीप जब तक लुप्त नहीं हो जाते संस्कार
ब्रह्मघोर को धारण करूँगी मैं
एक भ्रूण की भाँति स्वामी की भाँति
जिसे स्त्री प्रतिदिन रात्रि को धारण करती है

खटराग के परे जो राग संसार पर होता है हमें
उससे परे, प्रवेश किया मुझमें ब्रह्मघोर ने

सब प्रकार की कामकेलियों में वह पारंगत थे
जो दन्तक्षत किया उन्होंने कटि पर वैसा मैं जान गई थी
अब कोई दुबारा नहीं कर पाएगा
जो नखाघात था उनका रक्त की लीक बनाने वाला
उसे झेल मानुषी योनि मेरी
श्रीलंका के नीलकमल की भाँति खिल आई थी

ब्रह्मघोर के संग सर्वप्रथम मैंने
मनुष्य का माँस चखा था
पहली बार खाया और जानी कैसा होता है
प्रेम में पड़े ह्रदय का स्वाद ।

१९

मिठाई की दोकान

प्रतिदिन संध्या तारे दिखने से पूर्व
ब्रह्मपुत्र पार कर आती थी तुम्हारे लिए ब्रह्मघोर प्रिय
मिठाई की दोकान पर

वीणा लिए गोद में दोकान से थोड़ा पीछे तुम
देख धीमे धीमे केवल मुसकाते थे
बात कभी कोई की हो स्मृति नहीं
दृष्टि भर का संभाषण

गाँजे से चढ़े नेत्रों का रक्त मैं पीती थी
अपने नयनों से गटगट जल पीती थी समझो
कई दिनों की पिपासा के पश्चात

तुमने एक दिवस पीछे हलवाइयों के बाड़े में बुलवाया
आधा अँधार था आधा उजेरा
प्रेम पाने की जब सब आशा मैं छोड़ चुकी थी
ब्रह्मपुत्र में जब जल कम था और
रेत अधिक थी पाषाण बहुत थे
ह्रदय की नौका धंसी फँसी थी

तब तुमने चूम लिया जिह्वा को जैसे
सरसों के तेल में पकी मछली खाते हो रस से
जब तुमने श्रीरासबिहारी कृष्ण की भाँति
मेरे सब भगवा बसन उतार अपने गाढ़े गाढ़े
अनुराग से मेरा मन भगवा रंग डाला था

ऋषभ ब्रह्मो पर जो ब्राह्मी घृत निष्फल था
तुमने जैसे मुझे चटा दिया था

लौटती बेला ब्रह्मपुत्र में नदी बीच नौका में
जब मल्लाह ने कुछ देर गाने के पश्चात मेरा नाम पूछा था
तब निधड़क निलज्ज की भाँति मैंने कहा
'मैं ब्रह्मघोर स्वामी की नबवधू हूँ।

२०

ब्रह्मकपाली कुण्ड में जल समाधि और
गणपति बाई का प्रसव

पितृहंता, चोर और कामी और जिसने धन के लिए
अपनी स्त्री की दोकान की हो
वीणा बजा बजाके हो गया मुक्त
क्षमा का विधान सबके लिए जगन्मयी के
संसार में

कभी कभी तब भी सहचरी स्वप्न में आती
रूपिया १२१ में बेच दिया दुर्गापूजा के दौरान
बजार-हाट में सजे देवी-विग्रह के मूल्य पर
पिता नहीं आए शस्त्र से कराया था तीर्थ
न माँ कभी आई जो असमय विधवा होकर
काशी लौट गई

जो बचता है जो जीता रहता है
वह क्षमा नहीं करता ब्रह्मघोर स्वामी वह क्षमा नहीं करता
समाधि लेने से पूर्व मेरे प्रियतम ब्रह्मघोर नयन मींच
त्रिकाल, तीन लोक में केवल सहचरी को ही खोजते थे

फिर अदृष्टपूर्व था जो वह हुआ, बदरीनाथ पर
ब्रह्मकपाल कुण्ड में जहाँ भैरव भी मुक्त हुए थे
वहाँ जल में शिख तक डूब कर वह ऐसे छबिमान हुए
जैसे पृथ्वी को धारण करने वाला
शेषनाग दर्शन देता हो

किंतु मुझे क्षमा करना प्राणप्रिय ब्रह्मघोर कि
उस भीषण कोलाहल में कान पड़ा मेरे
किसी गर्भवती का क्रंदन

वर्षों में घटने वाली यह अदृष्टपूर्व किसी पुरुष की
समाधि छोड़ मैं दौड़ गई
नित्य दैनन्दिन घटने वाले स्त्री के प्रसव की ओर

बचपन में जिन रूसी गुड़ियों से
मृगलोचना को बहलाया करती थी
ऐसी ही एक मानुषी गुड़िया के पद्मरूप भग के
दो भाग कर वह प्रकट हुई बालिका

उधर तुम्हारी अहो अहो होती थी इधर
यह बालिका ज़ोर ज़ोर से रोती थी बेर के वृक्ष के नीचे

ब्रह्मघोर तुम चले गए किंतु मुझे कोई शोक नहीं था
यहाँ आवागमन किसी रेलस्टेशन की भाँति नित्य होता है
तुम्हारी वीणा उठाई तब एक अश्रुमाला तो बंधी थी
किंतु उनके पड़ने पर मीठा स्वर ही उठता था।

२१

क्या मैं चरित्रहीन हूँ ?

नदी नारी की भाँति और पुरुष
नौका की भाँति होता है- नौका सब प्रकार की
नदियों में चलती है किंतु मन कहीं नहीं
समाहित होता कभी

नदियाँ गंगा-सागर में लीन हो जाती है
जैसे स्त्रियाँ कुएँ में डूब प्राण दे देती है कई बार

कितने पुरुषों में कितनी बार मैं समाहित हुई
कितने पुरुषों ने मुझे ग्रहण किया जैसे दुर्गा का
प्रसाद हो कालीघाट पर प्राप्त
बलि पर चढ़े पशु के कोमल ह्रदय से
सुंदर अंग तपाकर खा लिए पंडित ने
यजमान ने यशहीन ने कीर्तिमान ने
भक्तों ने और उनके कामुक भगवान ने

किंतु मन श्वेत कुमुद की भाँति कीचड़ में
रहा शुद्ध का शुद्ध जैसे लिंगराज पर चढ़ने वाला
दही और भात होता है बंधुमणि

यदि में चरित्रहीन हूँ तो है तुम्हारी नदी तीस्ता भी
गंगा त्याग ब्रह्मपुत्र में जाके जो मिलने लगी
यदि मैं चरित्रहीन हूँ तो है तुम्हारी गंगा भी
जो नीचे की और सदैव बहती है

यदि मैं चरित्रहीन हूँ बंधु तो है चंद्रमा की पत्नियाँ भी
चरित्रहीन, नौ के नौ ग्रहों को धारण करती है
बारी बारी से यह नक्षत्र की देवियाँ

अब विचारों, कहो - क्या मैं चरित्रहीन हूँ ?
यदि हूँ तो है तुम्हारी माँमणि भी
जिसके गर्भ में तुम्हारे पिता और तुम्हारों
दोनों का प्रवेश था अबाध।

२२

आत्मा क्या है?

ब्रह्मकपाल कुंड से मैं रूद्र-वीणा ढोती अपने
प्रियतम घोरब्रह्म की, चली मालगाड़ी में
पहुँची नम्बुल में नौका कर बिष्णुपाड़ा, मणिपूर

फूल गई थी रूद्रबीन की सब तंत्रियाँ जैसे प्रथम रात्रि
रोते रोते नबबधू के पोर पोर फूल आते है

गुप्त वृंदावन की रात्रि थी उत्सब का राग गाढ़ा
होता जाता था
वयस चौदह वैष्णवी साध्वी नाच रही
मध्य मंदिर के प्रांगण में, नाम बताया संगवती था

लट का छल ऊँगली से बाँधती दूसरे हाथ
अंग पर साड़ी सम्भालती केन्दुला सासन से आई
निम्बार्क प्रभु की पुत्री राधिका साक्षात दिखती थी

तोड़ डाली वैजयन्ती माला कुसुम कुसुम
यत्रतत्र फेंक दिए थे
गोकुलचंद्र पर चढ़ी गौरांगि के माथे पर
रति ऐसी चढ़ी हुई थी

रतिखेला की बेला में जो अन्तर में बीन सा बजता है
रोम रोम में जो ऐंठन जो अतिसंकुचन होता है
खुलता है कमल की भाँति भ्रमर भीतर भनभन करता है
वहीं ब्रह्म है वही आत्मा

वयस चौदह में ज्ञान दिया ऐसा संगवती ने
स्वामी नित्य पीठ- जंघा पर ताड़न करते थे
त्याग दिया और बैरागिनी हो गई

बाहर भारी बरसात में मिश्र पंडित का अंधा बालक
गीत गोविंद गाकर भात माँगता था
उसकी आँखों पर कलदार फेंककर जब मारा
उसे ज्योति आ गई।

२३

माँ आनंदमयी का दाम्पत्य-जीवन

(माँ आनन्दमयी का बालकावस्था का नाम निर्मला था और अपने स्वामी को अनुरागवश वह भोलेनाथ पुकारती थी।)

लताओं जैसा शरीर नाग-झुण्ड की भाँति
लम्बे लम्बे केश
और इसपर सदामन कामुक स्वामी-ज्वरग्रस्त
सदैव कानों में कहता कोई कामुक गप
आते जाते शरीर नाप डालता दृष्टि से
पी गया था निर्मला की छाया पूरी
किंतु फिर भी अतृप्त और भर लेने को भटका करता

रात्रिकाल- जब भी निकट आता भोलेनाथ निर्मला के
बताओ भला, क्या दोष था अपनी स्त्री के निकट आने में
वस्त्र खींचता मुख चुम्बन को अपनी ओर करता
कटि कस वश में करने का जतन करता

निर्मला प्राण दे देती, शव की भाँति पड़ जाती
भोलेनाथ सब भाँति परखता किंतु जीवन का कोई
चिह्न न मिलता
ह्रदय गति शून्य, श्वास निष्क्रिय, तापहीन

'माँ माँ, निर्मला का देहांत हो गया'
केवल अधोवस्त्र में रोता पूरे अष्टग्राम में हल्ला कर देता

यह प्रतिदिन होता था रात्रि होते ही
निर्मला को माँ पुकारने वाला
प्रथम पुरुष उसका ही स्वामी था

प्रातः काल निर्मला में पुनः जीवन का संचार
जल भरती, नैवेद्य सिद्ध करती, कांथा काढ़ती
और स्वामी को पंखा झलके ऐसे भोजन करवाती
जैसे अन्नपूर्णा भोलेनाथ को करवाती है।

२४

रामकृष्ण परमहंस का स्त्री हो जाना

पुरुष-स्त्री-पशु-पीपल सब बोली की क्रीड़ा है
जानबाजार में माँ शारदा के स्वामी
स्त्री हो गए
ढाके के मलमल की धोती से
ढँक नवोन्मेषी स्तन जैसे वय बारह की कन्या के होते है
लजा रहे, झलमल उज्जवल अंग झाँक रहे थे

'घनघोर रति के कारण सखी मेरी ओ तोताबाला,
चल नहीं पाता पुकुर तक या हुगली तक प्रातःकाल
रोम रोम से रक्त बिंदु प्रकट होती है रह रहकर
दुष्ट है बल से वश में करके
नष्ट कर दिया देख तेरी माँमणि के स्वामी
दक्षिणेश्वर के बलवान पुरुष को
ऐसा घनश्याम, देख मेरी कटि पर देख
उसके हाथ की पकड़ का नील'

ऐसे तो ऋषभ ब्रह्मो ने अपूरब गोस्वामी ने
कभी नहीं गहा मुझे जैसे परमहंस को गहा
राधाबल्लभ ने
जान शरीर की इच्छा से व्याकुल सो न सकी
पुनः पुनः दर्शन देते श्री रामकृष्णदेव
कंकन-डोरे बाँध भेष धर गौड़ीय निर्लज्ज
कामुक गोपी का

पुरुष की है, ऐसी भाषा स्त्री के वश की नहीं
कहकर अपमान करते थे जो
तब मेरी हेलीमणि श्री रामकृष्ण ने उनको समझाया
बोली की क्रीड़ा है सब भाषा का केवल खेला है
यह स्त्री यह पुरुष यह पिशाच यह तक्षक
जीव एक है जो जहाँ पहुँच गया है ।

२५

तोता बाला ठाकुर (Tota Bala Thakur) की दो नई कविताएँ

1. अपूरब गोस्वामी के प्रेत से भेंट

उखरामठ में भगवान के विग्रह से उतार मारी कंठ पर
तुलसी दल की माला महंत ने
जैसे स्वामी स्त्री की ताड़ना करता है लीला लीला में
रात्रिभर तुलसीपत्र की माला पहने जागती रही

अपूरब गोस्वामी ने कमल के फूलों से एक दोपहरी
मेरे अबसन नितम्बों का प्रहर भर ताड़न किया था
पद्म जानो खिल गए थे नितम्बों पर ऐसे रक्ताभ
वह हो गए थे, हाथ फेरने पर भी पीड़ित होते थे
उखरामठ में आकर निम्बार्क प्रभु
यह कैसी ताड़ना की इच्छावती मैं कीच में गिरती हूँ

रात्रि रास की बेला अपूरब गोस्वामी आ बैठ गए मेरे निकट
माँगने लगे कौर का प्रसाद
'कहाँ रही इतने दिन मेरी दुलारी तोता बाला ठाकुर?'
'तुम कहाँ चले गए थे अपूरब गोस्वामी, कोलाहल से भरे भुवन में अपनी तोता को त्याग?'

दोनों ने दिया नहीं कोई उत्तर खिला दिया भोग का
पेड़ा और संदेश
जाने लगे जब- मैं रोई तब बोले अपूरब गोस्वामी
'यह सालिग्राम, यह रासमंडल, यह नक्षत्र, यह सुवर्णरेखा
यह तुम्हारे अब तक पुष्ट नितम्ब और जोगिया से झाँकती
कदली के खम्भ की भाँति जँघायें
यह युगलछबि से उतरे कमलकुसुम और कर्पूरगंध
सब उसकी छाया है
भिन्न भिन्न प्रकट हो रही है क्योंकि
ब्रह्मतत्त्व इनमें अल्प-अधिक है'

अंतर्धान हो गए रह गया छबि का संस्मरन
कर्पूर की गंध की भाँति कथा सुनने के पश्चात
दुख की भाँति जो ह्रदय भरता है किंतु दूर होता है

ढोल सुनकर रोने लगी तब आचार्य बोले
'संस्कार है ये ऐसी ही धुलता है।

२६

ब्रह्मचारी से ब्याह

(रामकृष्ण परमहंस का बालकावस्था का नाम श्रीमान गदाधर चट्टोपाध्याय 'गदाई' तथा माँ शारदा का बालकावस्था का नाम शारदामणि मुखोपाध्याय था।)

कुंकुम का कंकन उतारने लगी माँ
जा चुके शरीर लेकर शिष्यगण और भक्त
पाषाण तब एक मँगवाया बालविधवा से
पुष्प पड़ा था निकट परमहंस के शरीर पर चढ़ा
वहीं प्रकट हुए गदाई, वय तेईस थी
जब इस ब्रह्मचारी से माँ का ब्याह हुआ वहीं स्वरूप
माँ को लगा वह पुनः पाँच वर्ष की कन्या हो गई है

गदाई ने स्वयं मुग्ध होकर माँ से शारदामणि का
हाथ हाथ में लिया था
वहीं गदाई ने कहा कान में,
'माँ कुंकुम का कंकन मत तोड़, एक कक्ष से दूसरे में
जाने पर कैसा शोक कैसा वैधव्य
लाल पाटे की साड़ी पहन ले और सेंदूर से
भर ले भाल'

पाँचवे वर्ष में ब्याह हुआ और नौ वर्ष पश्चात्
मिली गदाई से
ब्रह्मचारी से ब्याह कभी होता है भला
कभी राग नहीं किया माँ ने, ऐसा अनुराग था
गृहस्थी के सब खटराग पर नाची

उन्नीस की वय में आ गई दक्षिणेश्वर
स्वामी के प्रति ऐसा स्नेह बँधा कि
भर आए स्तन दूध से, साड़ी सराबोर हो गई

रसोई में बीत गई आयु
मछली सिद्ध करने के सब भेद में सिद्धि करते
लूची और सरसों के तेल में अरहर
जल खाकर गदाई परमहंस हो गए

माँ माँ ही रही।

२७

ठाकुर बिजोय गोसाईं का विषपान

नुआपारे पर मूमुर्षू भवन में छबिमान बिजोय गोसाईं से
पंडित ने कहा, अविलंब प्रसाद ग्रहण करना सदैव शास्त्र का
वचन है। पालन न करना सर्वथा वेदवाक्य से विपरीत।'

खाजा- मठरी लाया था संखिया मिलाकर
विष उसमें ऐसे दिखता था जैसे दर्पन में छबि
बिजोय रहे देखते कुछ बेला
फिर उठाकर पुरुषोत्तम जगन्नाथ का लक्ष्मी की रसोईघर में
सिद्ध आहार मान मस्तक से छुवा खाने लगे

पण्डित उन्हें अनुराग से देखता था
जननी पुत्री को विष देने के पश्चात देखती है
इस भाँति प्रेम से और वेदना से
विष वेद और वेदांत में बँधकर कितना मोहक
जिह्वा को प्रतीत होता था

'भालोबासा' खाने के पश्चात् पण्डित ने कहा
अप्रत्याशित, कोमल राग से भर आई आँखें
रोने लगा पादपद्मों में
भूमि पर ठोंकने लगा माथा रक्त आ गया

बिजोय गोसाईं ने असंख्य आशीष दिए
कहा जाने को गृह
और सो गए एक ओर जहाँ सूर्य आता था
पुनः न जागने को
धूप प्रचण्ड थी जल खारा था दिन कठिन

इस भाँति निर्धन को जो धर्म की अफीम
वेद-वेदान्त की पुड़िया में बेचा करता था
क्षमा कर दिया निर्धन था अपमानित था

मेरे गुरु कुलानंद ब्रह्मचारी के गुरु बिजोय गोसाईं ने
जैसे प्रेम के कारण विषपान कर लिया
ऐसा गृहस्थ जीवन में मैं चाहती थी
क्षेमेन्द्र ठाकुर मेरे हाथों से पी लेंगे विष
ऋषभ ब्रह्मो मेरे हाथों से पी लेंगे विष
अपूरब गोस्वामी मेरे हाथों से पी लेंगे विष
मैं उनके हाथों से पी लूँगी विष
भिन्न भिन्न भाँति के विष सब प्रकार के
प्रेम की प्रयोगशाला थे।

२८

बुढ़ापे का आगमन

अष्टमी का अपराह्न जोमुना में स्नान को
उतरी जो निर्वस्त्र
बलि के महिषों के रक्त से भर गया मुख

पके बेरफल के रंग की भाँति
दीप्त था उस भिक्खु का रंग, बलिष्ठ वदन
ब्रह्मपुत्र के पाट जितना वक्षस्थल
सांड की भाँति कंधे और अंडकोश
'आनंदभैरव है जा उसके निकट जा जल ही जल में'
एक तांत्रिक ब्राह्मणी रक्त का तर्पण करते बोली

जल के भीतर ही भीतर श्वास साध पहुँची
उसके निकट
शीतल जल में भी उसके शरीर का ताप अनुभव हुआ
बहते जल में भी उसके शरीर की गंध
जो गर्भ की गंध से भरी थी
जो जननी के स्तनों की गंध से भरी थी
जो उसकी स्त्री के रज की गंध से भरी थी
जो चंदन चर्चित थी

कंठ पकड़ पुतुल की भाँति उठा लिया उसने
प्राण का प्रवाह अवरुद्ध हो गया
नाभि भर गई प्राणों के कोलाहल से

पश्चात् पुनः पटक जल में, किसी उतारी
कुसुम माला की भाँति, चलता बना
निर्वस्त्र मैं पीछे गई
'आह्लादस्वरूपिनी है स्त्री जान ले तू'

थूककर मुख पर पलटा, तैरा, लंगोट कसी
अपना अंतिम वस्त्र किसी शव पर डाल
हो गया अंतर्धान

जान गई अब जरा आ गई
दिन जो प्रतिदिन और जर्जर कर के जाता है
फिर भी दूसरा दिन देखने का हम मानुषगण
सदैव लालच करते है
गलितदेह के किसी कामिनी के लिए लालच की भाँति
नाग के किसी दादुर के लिए लालच की भाँति।

२९

दूसरी स्त्री बिष्णुप्रिया का प्रसंग

स्वामी कोई हरि बोलता कहीं तो मूर्च्छित हो जाते
हरिबोल हरिबोल कान में कहने पर ही चेतन होते
पहली स्त्री बासुकिदँस के कारन गई पाताल
तब सनातन मिश्र की पुत्री बिष्णुप्रिया के प्रेम में
पड़ गए महाप्रभु चैतन्य

शांखकांकन, सेंदूर और रजतनोपूर, एक ताँत
केवल यहीं दिया लग्नरात्रि और उसी में काट दी आयु

कंठ से कंठ लगना, दाँत से दाँत बजाकर चुम्बन
रतिकाल मोटी चोटी हाथ से खींच
कपाल करतल से रगड़ना और कुंकुम का
मस्तक पर फैल जाना, नीबि का बंध झटकके तोड़ना
सब कर भगवान ने सप्ताह भर पश्चात
संन्यास ग्रहण किया

बदले में बिष्णुप्रिया को दे दिया सदैव
स्मृति में रखने का वचन
इसबार बिष्णुप्रिया मूर्च्छित, जागी तब पाया
गोद में अपना सिला विग्रह डाल चले गए है प्रभु
श्रीविष्णुप्रिया प्राणधन मान जीवन भर इसीकी की सेवा

कंठ से कंठ केवल लग पाती थी
पुनः कभी केलि कर नष्ट नहीं किया शरीर
पुनः कभी तोड़ न दी कटि काट न दिए कंधे

गुड़हल के रक्त कुसुमों से भरी डाल
लगी की लगी रह गई अस्पर्शित, किसीने
इसे झँझोड़के तोड़ नहीं लिए इसके सब फूल
किसीने प्रेम में आकर कर नहीं दिया इसका नाश।

३०
सनातन मोशाय के संग ट्रामयात्रा

सनातन सान्याल बहुत मधुर बजाते भटियार
फिर बमबम अड्डाघर में फुचका गटक
दो दो कप चाय पीकर ट्राम यात्रा करते थे

कलकत्ते की वर्षा में दोपहर में भी ऐसी
हो जाती थी तिमिरकांति जैसे ग्रहणकाल हो
सनातन मोशाय ने कभी अंगुली का पोर तक
छुवाया नहीं मेरी अंगुली के नख से
कहते थे, 'उनकी घनिष्ठता अफ़लातूनी है'

खिचड़ी केश धूप में भस्म मुख था उनका
दूर किसी ग्राम में मास्टरी करते थे
कभी कभी आते थे कलकत्ता
पत्र पूर्व नहीं भेजा कभी- वर्षा की भाँति
केवल अचानक आते और हिन्दू महाविद्यालय के
बाहर प्रतीक्षा करते रहते
बुशर्ट में खोसे रहते बेनू
चरबाहे वाली बेनू थी उनके निकट
बहुत राग नहीं बजते थे उसपर

एक दिन अख़बार में लगा था उनकी लाश की चित्र
जीप से कुचला गया उनका शव
कभी देखा नहीं था उन्हें निर्वस्त्र
किंतु उनकी ध्वस्त जँघायें देख तुम यह मत मान लेना
मित्रों, कि नपुंसक होने के पश्चात वह मरें थे।

३१

ऋषभ ब्रह्मो का विक्षिप्तावस्था में मिलना

उत्तर कलकत्ते में चोखरागिनी सिनेमाघर था
सात वर्ष पूर्व, उसी के सम्मुख दिखाई पड़े ऋषभ ब्रह्मो
पाँयचला पथ पर पड़े थे अर्धनग्न
दीर्घ दाढ़ी, दाढ़ें मैली, दृष्टि धूमिल
बंकिम कनीनिका से देखने लगे अनिमेष
फिर, कूदें और मेरे भगवे में हाथ डाल झँझोड़ डाला
मेरा कंठ और मेरा ह्रदय

उस वानर की भाँति जो झँझोड़ देता है आम्रतरु
फल की कामना में
ऋषभ ब्रह्मो अब किसी के वश के न थे

कोजागर सेठ की धर्मशाला से अर्धरात्रि के पश्चात
ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व मैं पहुँची उनके निकट
एक कागोज में बासी लूचियाँ और चोरचोरी लेकर

'कितने निर्बल हो गए हो ऋषभ ब्रह्मो,
मार्ग पर विवस्त्र पड़े रहते हो, यह क्या हो गया है तुम्हें घरबार छोड़ दिया नौकरी चली गई
जबा काज़िम भी लौट गई ढाका'

नहलाना चाहती थी उन्हें निर्वस्त्र करके
उनके अंगों पर अस्थियों पर मन पर
जो संसार की धूल जम गई थी धो देना चाहती थी
अपनी कविताओं से अपने स्वेद और रक्त से

किंतु उठे वह और छीन लिया मेरे हाथ से
लूचियों और चोरचोरी का पूड़ा, पाषाण दे मारा मेरे
माथे पर और भाग गए पूर्व की ओर
भागते काल उनकी दृष्टि किसी पशु की भाँति
भयभीत और करुण टिकी रही मुझपर देर तक
पलट पलट के देखते, भागते जाते थे ऋषभ ब्रह्मो

पूर्व की ओर जहाँ बालारून प्रकट होने को था
रक्तचम्पा के फूल की भाँति

हम सब मानुष आलोक के पीछे ही भागते है
चाहे ह्रदय के स्थान पर हो हमारी पंसलियों में
ह्रदय बराबर तिमिर का टुकड़ा।

३२

मनिकर्णिका घाट पर दाहोत्सव

सौ वर्ष की बालविधवा का बांसभर रह गया था
जो कलेवर चटचट जलता है मनिकर्णिका घाट पर
डोम किनारे बैठ चाय पी रहा है
कौन है और, केवल शुष्कचक्षु विधवाएँ

बाल्यावस्था में आई थी काशी, बारह वर्ष की वय
सन१९०० में जन्मी, नाम रखा दादी ने चंद्रघण्टा
सात वयस में ब्याही, नौ में विधवा
पुरातन काल की कथा है किंतु क्या नहीं सुनोगे

सिद्धांत कौमुदी को जो कंठ पर धारण करता था
चंदन की भाँति स्फटिकमणि की भाँति
जो अपने श्लोकों से करता रुद्राभिषेक विश्वनाथ का
उसने एक दोपहर आकर छिन्नभिन्न कर दिया सबकुछ

केवल एक धोती में आए निर्बल बटुक में
क्या इतना सामर्थ्य था कि उसके जाने के पश्चात्
चन्द्रघण्टा रह जाती किसी अरथी के पीछे छूट गए
भग्न कलश की भाँति

बहुत काल तक आश्रम की अट्टालिका पर खड़ी
गंगा में प्राण देने का सोचती थी, उसके गंजे मस्तक में
अपार था क्लेश
जब बटुक चढ़ गया था उसके ऊपर भरी वाराणसी के
बीच, मध्याह्न काल, आश्रम के एकांत में
अपमान नहीं लगा उसे ग्लानि नहीं हुई
केवल रक्त और सुख हुआ था उस काल

निर्बल दिखते बटुक ने जब हाथ उसका पूरा मरोर दिया
तब उसे बटुक की बलिष्ठता से भय और प्रेम दोनों हुए
उसका ह्रदय हुआ बटुक को खिला दें
किशमिश से भरी मावे की कचौरी

उसके पश्चात् जीवन बीत गया एकादशी का व्रत
और प्रदोष की पूजा करते
उसके पश्चात उस बालविधवा की आयु में
कोई कलंक नहीं है रक्त के एक कलंक को छोड़
बटुक को मावे की कचौरी खिलाने का स्वप्न
चटचट जलता है डालडा भरे उसके कपाल के संग।

No comments: