Saturday, July 13, 2013

मिल्खा सिंह -एक जीवित किवदंती की अप्रतिम गाथा







यह एक  त्रासदी की कथा है जो सिर्फ ना मात्र विश्व के एक बड़े भू भाग ने झेली है बल्कि उसके दंश अभी भी यहाँ - वहाँ देखने सुनने को मिल जाते है. एशिया के एक बड़े शक्तिशाली मुल्क का दो हिस्सों में बंटना और फिर उस त्रासदी के होने की पीड़ा को समुदाय विशेष ने भुगतना और इस सबसे ज्यादा इस विस्थापित समुदायों की भावना और हूनर को अपने वजूद के लिए स्थापित करने की कहानी भारत पाकिस्तान जैसे दोनों मुल्कों में भरी पडी है. बिरले होते है जिन्हें यश मिलता है और उनकी कीर्ति पताकाएं दूर - दूर तक पहुँचती है. दर्द सिर्फ यह नहीं है कि विस्थापन या अपनों से बिछड़ने की पीड़ा यहाँ दर्ज है, यहाँ दर्ज है अपनों को अपनी आँखों के सामने मरता देखने की , यह देखने की सब कुछ होने के बावजूद भी कुछ ना कर पाने की बेबसी है और इस सबमे एक पिता का चीत्कार है भाग मिल्खा भाग……… 

हिन्दी फिल्मों  का परिदृश्य इन दिनों बहुत सुलझा हुआ है और अब निर्देशकों को यह अच्छे से समझ आ गया है कि प्रेम मोहब्बत, ह्त्या, सुपारी नायकों का ज़माना चला गया है अब यहाँ हकीकत से जुडी फ़िल्में ही चलेंगी चाहे वो राँझना हो, लूटेरा जैसी फ़िल्में हो या पान सिंह तोमर जैसी या भाग मिल्खा भाग. क्योकि इन सात दशकों में हमारा दर्शक बहुत मैच्योर हुआ है इस बात में कोई शक नहीं है, अब सवाल यह है कि तमाम तरह के पाईरेटेड सीडी के आरोप आदि लगाने के बाद भी महंगे पीवीआर में दर्शक की जेब ढीली करने के लिए आपको बहुत वस्तुनिष्ठ फिल्म बनानी पड़ेगी चाहे वो डर्टी जैसी फिल्म क्यों ना हो . 

मिल्खा की  यह फिल्म जहां पंजाब के परम्परागत वातावरण को बेहद खूबसूरती से उकेरती है, अल्हड प्रेम, कस्बें के प्रेम को भी संजीदगी से व्यक्त करती है जिसे राँझना, लूटेरा या तनु वेड्स मनु में व्यक्त किया गया था. यह फिल्म गाँवों में फ़ैल रही बेरोजगारी और फिर फौज जैसी संस्था के विकल्पों पर भी बात करती है खासकर पंजाब जहां अमूमन हरेक घर से एक सदस्य भारतीय फौज में है। मजेदार यह है कि देश में इतने बड़े - बड़े संस्थान आजादी के बाद से खेलों के विकास के लिए काम कर रहे है, एशियाई खेलों की हम मेजबानी कर चुके है, रेलवे से लेकर सभी बड़ी संस्थाओं में खेल कोटे से खिलाड़ी भर्ती होते है और खेलते है पर भारतीय फौज ही वो जगह है जहां असली समझ, विकास होने की गुंजाईश अभी भी बनी हुई है, चाहे वो पानसिंह की बात हो या मिल्खा की या नए सन्दर्भों में विजेन्द्र की या हमारे शूटर्स की, इस बात के मद्देनजर रखते हुए बनाई गयी यह फिल्म बेहद खूबसूरती से कोच की भूमिका मेहनत संवेदनाएं, प्रोत्साहन और अवसर देने की बात करती है जो सिर्फ भारतीय फौज में ही है, जो कि प्रशंसनीय है. यह बात स्टेट बैंक, रेलवे, या दीगर बड़े कारपोरेट कभी नहीं समझ पायेंगे और वे भी नहीं जो सचिन या धोनी जैसे खिलाड़ियों को मात्र रूपया देकर अपने ब्रांड एम्बेसेडर बना लेते है. 

यह फिल्म  इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योकि विस्थापित परिवार से आये एक सरदार जिसे अपने को स्थापित करने के लिए कोयला चोरी, डकैती, मारा पीटी से लेकर सब कुछ सहना पड़ता है वह प्रेम में असफल होकर कुछ करने की तमन्ना से बाहर निकलता है और फौज में आकर उसे अपना मकाम मिलता है. और अंत में वो दुनियाभर में अपना नाम कमाता है और देश का भी नाम कमाता है. 

मिल्खा सिंह  की तीन असफल प्रेम कहानियां, संघर्ष, पारिवारिक त्रासदी, प्रतियोगिता, सहयोगीयों का घटियापन, और अंत में अपनी मिट्टी में यादों का वह बिखरता हुआ स्वप्न जहां मौत का तांडव उन्होंने देखा है, वह सच में दुखद है निर्देशक ने जिस अंदाज से यह सब एक छोटी सी कहानी में ढाई घंटे में समेटने का प्रयास किया है वह सच में काबिले तारीफ़ है. एक लम्बे समय फलक को पकड़ना और बांधे रखना बहुत ही मुश्किल और चुनौती भरा कार्य है पर सिर्फ इतना कि निर्देशन संगीत और डायलाग डिलेवरी से यह फिल्म सिर्फ एतिहासिक नहीं बल्कि एक जीवंत सन्दर्भ भी बन गयी है. आने वाला समय इस बात का साक्षी होगा कि किसी भारतीय निर्देशक ने एक ऐसी फिल्म बनाई है और यह भी कि कि आने वाली पीढियां विश्वास नहीं करेगी

मेरी नजर  में यह फिल्म आने वाले वर्ष के सभी पुरस्कार अर्जित करेगी बल्कि आस्कर अवार्ड के लिए भी नोमिनेट होगी। जरुर देखिए

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