Wednesday, July 31, 2013

नया राग गाने को तत्पर है ये भीड़ इस 'सीटी ऑफ क्राउड' मे........लखनऊ मे पन्द्रह दिन




यह अवध की गर्मी भरा एक दिन है और मै मुकेश भार्गव के साथ तफरी करने निकला हूँ काम और थोड़ा सा घूमना फिरना बस मजा आ गया छोटा-बड़ा इमामबाड़ा और लखनऊ के मिजाज को देखा परखा, बस भीड़ के अलावा कुछ नजर नहीं आया. लखनऊ एक अजीब शहर है यह मुझे नवाबों के शहर से ज्यादा "सीटी ऑफ क्राउड" लगा. दरअसल मे भोपाल जैसे सुन्दर शहर को देखने और मह्सूसने के बाद भीड़ और अराजकता से घबराहट होने लगती है. पर शहर की शान ये खूबसूरत जगहें बहुत ही शांत और सुन्दर है. इतना वैभव और मुग़ल शासकों की परम्परा वाले ये दोनों बाड़े अपने समय की दास्ताँ कहते नहीं अघाते. नवाब वाजिद अली शाह की तस्वीर देखकर लगा कि समय लौट रहा है अपने वजूद के साथ ...... अच्छा लगता है अपने इतिहास को देखना संवारना और एक धरोहर के रूप मे देखना. सच मे ये मोंयुमेंट्स नहीं होते तो कहाँ से सीखते है हम वास्तुकला और वैभव का यश गान? मजा आ गया अब धीरे धीरे शहर की तासीर समझ आने लगी है......इंशा अल्लाह सब ठीक हो जाएगा इन्ही दुआओं के साथ आप भी लुत्फ़ उठाईये इन खूबसूरत नजारों का साथ ही एक सवाल भी जो कचोटता रहा बारम्बार कि दलित क्या है......विस्थापित कौम, गाँव देहात मे उपेक्षित समुदाय, जाति से मारे गये समुदाय जो सदियों से दंश झेल रहे है, या आर्थिक रूप से पिछड़े हुए वे सब लोग जो लगातार आजादी के इतने सालों बाद भी सरकारों की उपेक्षा के शिकार रहे है, या अल्प संख्यक जो गाहे-बगाहे वोट बैंक और पार्टियों के इशारों पर अपनी अस्मिता और विचारधारा बदलते रहे है. अगर यह सब कुल मिलाकर दलित है तो भी कोई हर्जा नहीं है शायद आप दोस्त या साथी लोग ज्यादा प्रकाश डाल पाए, पर दलित पहचान जिसे identity कह सकते है, जरुर आज अपने पथ से भटकी हुई है. आज लखनऊ मे जब शहर मे भव्य आलीशान डा बाबा साहब अम्डेबकर सामाजिक परिवर्तन स्थल देख रहा था जिसका बाकायदा दस रूपया शुल्क है, को देखकर मुझे कई सवाल दिमाग मे आये. क्या बाबा साहब ने कभी सोचा होगा कि इतनी बड़ी उनकी मूर्ति कभी इसी देश मे लगेगी , शायद महू मे भी ऐसा स्मारक नहीं है. मप्र शासन के इससे प्रेरणा लेनी चाहिए. एक बड़े शहर मे मसलन इस तरह के पार्क जरूरी तो है पर किस पहचान पर, यहाँ स्थानीय लोग नजर नहीं आये मुझे ज्यादा लोग बाहरी राज्यों के, वो भी दलित लोग, जरुर नजर आये जिनके पहनावे से और बाबा साहब और बाकि सभी की मूर्तियों की पूजा और भक्ति भाव देखकर समझ मे आया. मायावती ने रेकॉर्ड समय मे इतना भव्य काम किया है इसकी तारीफ़ दिल से करूँगा और जिस तरह से हाथी की महिमा चहूँओर नजर आती है चाहे इस पार्क मे हो या कांशीराम स्मारक मे वह काबिले तारीफ़ है. अक्सर सरकारें एक स्कूल की बिल्डिंग भी नहीं बना पाती अपने एक कार्यकाल मे. खैर सवाल यह है कि क्या ऐसे पार्क, स्मारक पहचान बन सकते है पर यह भी लगा कि मायावती ने जो किया वह बेगम हजरत से प्रतियोगिता मे किया होगा, वो भी अवध की बेगम थी और जबरजस्त युद्ध लड़ा था, उनकी सांगठनिक क्षमता भी अदभुत थी और मायावती की भी यह क्षमता अदभुत है कि ऐसे निर्माण कार्य सरकारी मशीनरी से करवा पाई है, बड़ा- छोटा इमामबाड़ा के बाद लखनऊ की पहचान दलित पहचान के रूप मे और इन पार्कों के रूप मे तो जरुर है......इस बात की तारीफ़ की जाना चाहिए ये दीगर बात है कि आजकल बहन जी और उनके लोग नेपथ्य मे है और यवनिका झलाते हुए अपनी बारी का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे है. और लोगों का क्या है वो सिर्फ कोसते है चाहे अखिलेश को या मायावती को या कल्याण सिंह को अब नया राग गाने को तत्पर है ये भीड़ इस 'सीटी ऑफ क्राउड' मे........

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