Tuesday, July 23, 2013

क्या है हमारे पास सिर्फ आज.....

जीवन के सबसे निराश दिनों मे क्या किया जाये, जब सारी आस्थाएं खत्म हो जाने लगे, अपने आप पर शक होने लगे और मंथन करने से कुछ भी हासिल ना हो, लगातार मिलती निराशा और अपने लोग भी आपसे दूर होने लगे तो क्या किया जाये. दोस्त भी आपसे कन्नी काटने  लगे और वो लोग जिन्हें आपने पाल-पोसकर बड़ा किया था वो भी मुँह चिढाने लगे तो क्या सब कुछ खत्म कर लें? बड़ा मुश्किल सवाल है पर क्या निराश हुआ जाये? समझ नहीं आ रहा था फ़िर लगा कि इस सबके बावजूद एक शख्स आपके पास हमेशा रहता है जिसे सब कुछ पता है, जिसे सब कुछ सहना है और देखना भुगतना है, यही वो शख्स है जिसे खुश रखने के लिए आपको सबसे ज्यादा मेहनत करना पडती है. इस कठिनतम दौर मे अपने अंदर के उस व्यक्तित्व को ज़िंदा रखना बहुत जरूरी है जो लगातार आपके साथ है उसे लगातार खुश रखने का प्रयास करना होगा. इसका मतलब हमारे अंदर  एक और शख्स है जो हमेशा देखता गुनता और सुनता रहता है. क्या करें कि इस अपने वजूद को खुश रखा जाये. मै इसी दौर से गुजरा हूँ बस अपनी आस्था को मैंने बनाए रखा और अपने इस वजूद को ज़िंदा रखने के लिए मैंने वो सब किया जो मुझे अच्छा लगता है, अपने आपको खुश रखने का प्रयास किया, छोटी चीजों से हमें बहुत बड़ी खुशी मिल जाती है, कभी चाभी का एक छल्ला खरीद्दने से भी मन को बहुत सुकून मिलता है जिसे हम घंटों निहार सकते है. बस यह सोचकर हमें रहना होगा कि आस्था होना बहुत जरूरी है, यहाँ मै ईश्वर की बात नहीं कर रहा सिर्फ एक आस्था जो हमें हर परिस्थिति मे जिलाए रखती है और हम जीते चले जाते है.कही तो मुक्ति मिलेगी...... कभी कुछ पढ़ लिया, कुछ खरीद लिया, कही घूम आये, कही किसी से दो बात कर ली, कही किसी को थोड़ी सी मदद कर दी, कही अपने लिए ही सही अपने आप से दिल खोलकर बात कर ली, कभी एकांत मे रो लिए, कभी दिल खोलकर हंस लिया, सड़क पर चलते हुए किसी से जमकर लड़ लिए, कभी  दवाई का ओवरडोज ले लिया और कभी तीन दिनों तक कोई दवा नहीं ली कि देखें शरीर कैसे रिएक्ट करता है, कभी छत पर रातभर घूमते रहा, कभी अल्लसुबह निकल पड़ा और रास्ते मे बैठकर निहारते  रहें उगते सूरज को, कही उसे याद कर लिया, कभी बच्चों के पास चला गया और खूब जी भरकर फेंटेन्सी सुन ली और फ़िर अपने आपको यकीन दिलाया कि एक बेहतर दुनिया की कल्पना और नया करने की गूंजाईश अभी बाकि है. बिस्मिल्लाह खां साहब की शहनाई  सुन ली या राग सिंधु भैरवी मे सितार सुन लिया कभी लता दी के गाने सुन लिए और कभी रेमो का गाना सुन लिए- 'इक् हो गये हम और तुम......, या कुंदनलाल सहगल को सुन लिया, कुमारजी का 'उड़ जाएगा हंस अकेला' या कबीर को गुन लिया, पिकासो की एक पेंटिंग देखकर लगा कि मकबूल भी तो ऐसा ही कुछ करना चाहते थे, विष्णु चिंचालकर क्यों नहीं मकबूल जैसी ख्याति अर्जित कर पाए, प्रभाष जोशी के किस्से पढकर सोचे कि आज की पत्रकारिता कहाँ आ गई है, या कभी रात भर फेसबुक पर बैठ गये. पढते रहे गिरीश की तरह से और बगुले की भाँती उसमे से श्रेष्ठ को चुनकर परोस दें ताकि दूसरे भी उसका लाभ ले सके. गुड्डी सही कहती थी कि भागना किसी समस्या का हल नहीं. बस यही कुछ है जो हमें ज़िंदा रखेगा, यही से उपजेंगी  हमारी आस्थाएं  और जीवन मे सम्पूर्णता आयेगी. यही से जन्मेगा एक सुनहरा कल...............यही होगा हमारा आज और हमारा कल.........बस अपने इमोशनल एंकर, जो भी हो - चाहे किताब, एक पेड़, एक शख्स या एक मीठी याद, को अपने सीने मे बसाए रखना, अपने आपको एक मजबूत चट्टान, जिसे मोहित 'रॉक फाउन्डेशन' कहता है, से लगाए रखना, जिसे गुड्डी संघर्ष कहती है, जिसे अप्पू सुनहरा कल, जो हमारा होगा, कहता है, के बीच रखना होगा. बस बचाकर रखना होगी हमारी 'कोर वेल्यूज़' बस बाकि तो सब ठीक हो जाएगा............आईये आगाज़ करें एक ऐसे ही आशावादी जीवन का और देखें कि क्या है हमारे पास सिर्फ आज.....

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