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Posts of 17 and 18 Jan 2024

ऐसा रामराज ला रहे है कि अयोध्या के स्थाई लोग ही घर से निकल नही सकते, सबको क़ैद कर दिया - इतना डर क्यों है डबल इंजिनों को जबकि देश भर का प्रशासन और मीडिया को लगा दिया है

रामराज में सब खुला रहता था, पर यहाँ तो इतने डरपोक है ये कि पुलिस और सेना से छोटे से कस्बे को भर दिया और सब धर्म के नाम पर कर रहे है जो धर्म का ध नही जानते ढोंगी
आने - जाने में प्रतिबंध लगा दिया, राम की अयोध्या है या रावण की लंका - जो चारों ओर से घेर दी गई है
रोज नए नए कर्मकांड सुनता हूँ जो मेरे कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में कभी नही सुने और दो कौड़ी के फ़िल्मी गवैयों के गानों से ध्वनि प्रदूषण कर पूरे देश को बर्बाद कर रखा है
मतलब एक जन उत्सव पर सरकारी कब्ज़ा करके अजब-गजब का प्राण प्रतिष्ठा समारोह कर रहें है पाखंडी लोग
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रातें अक्सर लम्बी होती है, सुबह होने में सदियों का फासला होता है - और नींद दुश्मन हो जाये तो फिर इस रात की सुबह नही
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आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

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