विकुशु प्रकरण में बड़े लेखक सब चुप है, प्रगतिशीलता और जनवादिता का ढोल पीटने वाले भी चुप है, बरसो से प्रलेस या जलेस के पदों पर जमे बूढ़े बामण, लाला उर्फ़ कायस्थ और बनिये और खब्ती हो चुके फर्जी कामरेड्स कुछ बोले क्या जी, नही - नही ; दब्बू, डरपोक और कायर कही के विश्व विद्यालयों के जड़ और प्रेमचंद से लेकर निराला पर कूड़ा शोध करवाने वाले माड़साब बोले क्या - नही जी, फ्री में छपवाने का बिजनेस खत्म और कमीशन का क्या होगा फिर, प्रकाशक जो लोटा लेकर इनकी पोटी धुलवाने को विवि के बाहर रोज बैठे रहते है उसका क्या होगा फिर - 40 साल की उम्र में 90 किताबों का कचरा कैसे सँवरेगा , अखबारों पत्रिकाओं के सम्पादक भी नही बोलेंगे क्योकि फिर लौंडे लपाड़ो से होस्टल में दारू कैसे झटकेंगे कम्बख़्त प्रकाशक मुंह नही खोल रहें - सिवाय राजकमल के स्पष्टीकरण के कोई सामने नही आया, यदि बोलें तो हर माह 100 शीर्षकों का कचरा छापने वाले क्या करेंगे चूतिया बनाने का धँधा खत्म हो जाएगा शरद जोशी का व्यंग्य याद आता है - "हू इज अफ्रेड ऑफ वर्जिनिया वुल्फ़" गन्दा है पर धँधा है #दृष्ट_कवि *** ◆ एकदम साफ एजेंडा - 2024 की तैयारी है मणिशं...
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