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"संस्कृति पुरुष के पुरुष के परिचय में कुछ विनम्र कविताएं - विनय सौरभ की कविताएं" - Post of 27 Sept 2026






बात सन 1998 की है जब हमारे Vinay Saurabh की पहली पुस्तिका "बनारसी दास गुप्त भोजपुरी सम्मान योजना" के तहत छपी थी, जबकि पुरस्कार 2023 में मिला, कविता पुस्तिका का नाम था - "विनय सौरभ की कविताएं" , और यह पुस्तिका उसके भैया "संदीप नाईक" को समर्पित थी

हालांकि, ये कविताएं पहल के 1996 वाले अंक - 54 में छप चुकी थी, पर पुस्तिका में छपने पर काफी चर्चा में आई
मैं विनय को दो साल से कह रहा कि कविताएं भिजवा दें, पर हो नहीं पा रहा था, आज किसी पटना के मित्र ने अपनी टिप्पणी के साथ लगाई है - तो बरबस ही ध्यान गया, विनय ने उस समय छह पुस्तिकाएं भेजी थी, सब बंट गई थी, अब शायद एकाध कही हो मेरे खजाने में, पर उसे ढूंढने में सदियाँ लग जाएंगी
ये कविताएं नहीं - बल्कि एक दस्तावेज है - समय का, कविता की यात्रा और विकास का, संस्कृति - सनातन और आयोजन के बरक्स कविता की राजनीति, छपास और आत्ममुग्धता में मुब्तिला कवियों की मानसिकता का द्योतक है, ये कविताएं हिंदी की कविताई राजनीति और पूरे तत्कालीन परिदृश्य पर भी नज़र डालती है, साथ ही एक युवा कवि जो उस समय के "अ- ग्लोबल हुए फ़ोन, मोबाइल और इंटरनेट से दूर नोनीहाट जैसे दूरस्थ कस्बे" की बेचैनी को भी व्यक्त करती है - जहां साहित्य की धूप या कोई राजनीति नहीं पहुंचती थी, पर कवि की दृष्टि जरूर दुष्ट तो नहीं, पर पैनी और वैश्विक थी जो आज बख्तियारपुर से होते हुए चर्चित और सदी के कवि के रूप में ख्यात है
अभी पक्षधर के अंक-40 में विनय सौरभ की कविताएँ , जो देश के प्रधानमंत्री को संबोधित हैं, उसी साहस के साथ लिखी गयी हैं, उसे पढ़ते हुए तीस साल पहले लिखी इन कविताओं की याद ताजा हो आयी
"संस्कृति पुरुष के पुरुष के परिचय में
कुछ विनम्र कविताएं"
________
विनय सौरभ
1
सभागार में सन्नाटा था खूब
जब संस्कृति पुरुष ने कहा
विडंबना है यह कि युवा कवि
प्रेम और नदी पर कविताएं लिख रहे हैं
और नदियां लगातार सूख रही हैं
जीवन में समाप्त होता जा रहा है प्रेम।
बुद्धिजीवियों के बीच कविता पर
यह मार्मिक बयान देते हुए
संस्कृति पुरुष के पलकों के भीतर
पृथ्वी का दुख अत्यंत गाढ़ा हो रहा था।
युवा कवियों में
इस बयान को लेकर एक सनसनाहट थी।
वे सभा के बाद नुक्कड़ पर चाय पीते हुए
संस्कृति पुरुष के कथन पर गौर कर रहे थे।
जैसा कि स्वाभाविक है
संस्कृति पुरुष की दिनचर्या बहुत व्यस्त रहती थी
और यह इसी बीच अपनी नयी मॉडल की गाड़ी में बैठकर राजधानी की ओर निकल गया था।
2
हमारा ही समय था यह
जब आदमी की अनिवार्यता बदल रही थी
जब लोग भविष्य के बारे में कह रहे थे-
देखना, यह दुनिया रहने लायक नहीं रह जाए‌गी
साधारण लोगों के लिए एक दिन।
हमारा ही समय था
जब हमने नोट किया, हमारी दुनिया में
चुपके से प्रवेश कर गया है बाजार।
यह हमारा ही समय था
जब बलात्कार की घटनाएं
बच्चियों के साथ सबसे ज्यादा दर्ज की गयीं।
यह हमारा ही समय था दोस्तों
जब हमारे देश की सुंदरियां
देह के बूते समाज सेवा में आने की
जिद पर अड़ी थीं।
हमारा ही समय था यह
जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के
महान रहनुमाओं की एक जेब में औरत थी
और दूसरी जेब में घोटाले के रुपए।
यह वही समय था जब दुनिया भर की स्त्रियां
अपनी बात कहने के लिए एक मंच तलाश रही थीं
गृह मंत्रालय का एक अधिकारी
अपनी आठ वर्षीय बच्ची के साथ
अप्राकृतिक मैथुन में जुटा था।
यह वह समय था
जब संस्कृति पुरुष को कुछ करना चाहिए था
और यह देश के नक्शे पर एक बड़े सांस्कृतिक भवन के निर्माण की योजना में सक्रिय था
जहां स्त्रियों को एक बड़ी जिम्मेवारी से गुजरना था।
3
यह संस्कृति पुरुष इन दिनों
लगातार प्रसन्न अवस्था में था।
कहना नहीं चाहिए
संस्कृति पुरुष हमेशा प्रसन्न अवस्था में ही रहते हैं।
उस विश्व पुस्तक मेले में
संस्कृति पुरुष ने परिवार के साथ पुस्तकों को देखने आए
उस छोटे-से बच्चे का माथा चूमते हुए कहा-
जब तक ये बच्चे हैं पुस्तकों की दुनिया के
बारे में संदेह नहीं किया जाना चाहिए।
संस्कृति पुरुष के शब्द भारी थे
भाषा हद दर्जे मुलायम थी
युवा, अधेड़ और सत्तर पार लेखकों की बिरादरी का
वह मुखिया था।
उसकी उम्र साठ के पीछे ही रही होगी।
वैचारिक असहमतियों के समय वह मंद-मंद मुस्कराता था।
छोटे कद के लोगों की वैचारिक असहमतियां व्यर्थ हो जाती हैं, वह जानता था।
एक पूरी जमात उसके पीछे चलती थी
संस्कृति पुरुष अचानक कुछ महत्त्वपूर्ण कह देने की स्थिति में होता था।
उसकी भाषा का व्याकरण
साधारण लोगों की समझ से बाहर था।
उसकी यह जमात ऐसी भाषा के पक्ष में थी जो फिलहाल कलाकारों, रंगकर्मियों, आलोचकों
समीक्षकों के पास नहीं है।
यह सांस्कृतिक हलचलों से देश को भर देना चाहता था। ऐसे समय में जब संस्कृति पुरुष से हमें बड़ी अपेक्षाएं थीं
एक ऐसी भाषा और समझ विकसित करने की फिराक में उसने अबूझ किस्म की कविताओं पर गद्‌गद् टिप्पणियां की।
4
व्यस्तता उसे महामारी की तरह घेरे रहती थी
फिर भी लेखन में वह सक्रिय था
उसने कहा भी था लेखन में एक बड़ा गैप लेखकों-कवियों को मार देने के लिए काफी है।
मूलतः कविताएं लिखता था
वह उसने सुंदर गद्य भी लिखे
इस देश में महान कविता और गद्य लिखने की जो परंपरा है, संस्कृति पुरुष उसे और समृद्ध कर रहा था।
उसकी कविताओं को पढ़कर
स्त्री देह के प्रति अपने नजरिए को आप हम
समृद्ध कर सकते हैं।
हमारे समय के कुछ युवा कवि
जो कस्बों और छोटे शहरों में थे
अपनी छिटपुट प्रकाशित हो रही कविताओं की फोटो कॉपी
संस्कृति पुरुष के पते पर पोस्ट किया करते थे।
इन छोटे शहरों और कस्बों के कवियों ने
संस्कृति पुरुष को प्रत्यक्ष नहीं देखा था।
पर हर रविवार की अपनी साप्ताहिक गोष्ठी में
इसका जिक्र वे जरूर किया करते थे।
5
जिस समय बुजुर्ग कवि त्रिलोचन ने अफसोस से कहा थाः यह व्यवस्था लेखकों / संस्कृतिकर्मियों के प्रति उदासीन है
उस समय संस्कृति पुरुष लगातार
राष्ट्रीय पुरस्कारों की वजह से चर्चा में था।
जब साहित्य में पठनीयता के संकट पर चर्चा अनिवार्य मानी गई
बेखबर और निर्लिप्त उस संस्कृति पुरुष ने
वैराग्य भाव से अंतरिक्ष, ग्रह, पृथ्वी, नक्षत्र पर लगातार कविताएं लिखीं।
उसकी बिरादरी में से किसी एक युवा आलोचक ने कहा आश्चर्य है, इस कठिन हो गए समय में भी वे लिख रहे हैं कविताएं!
हुलसते हुए उसने लिखा-
दर्ज किया जाना चाहिए
यह समय कितना रचनात्मक है।।
6
वह संस्कृति पुरुष अपने कपड़ों से बेहद साधारण था हुसैन की तरह कभी उसने हमें औचक नहीं किया
उसने हमें विस्मित करने का नाटक नहीं किया
खाली पैर रहकर या साधारण रेस्तरांओं में
अचानक उपस्थित होकर।
अलबत्ता कविता पाठ के बाद
मंच के नीचे भव्य किस्म की महिलाएं सिर हिलाकर पठित कविताओं की सार्थकता का संकेत देती थीं सफेद दाढ़ी वाला विख्यात चित्रकार पत्र लिखकर
उसके काव्य पाठ में उपस्थित न हो पाने का
अफसोस करता था।
यह सब देखकर हम प्रभावित होते रहे!
लेकिन
हम समय नहीं पाए कि आखिरकार
वह कैसे साहित्य का हिमायती था!
जैसे उसने उस युवा कवयित्री की कविता को
अप्रतिम बताया जिसकी एक पंक्ति थीः
उस घड़ियाल के दिमाग में पानी नहीं
आकाश भर गया है।
7
कह सकते हैं
विस्मय उसके पूरे व्यक्तित्व में था।
अंतरिक्ष, समुद्र, संस्कृति, कुमारगंधर्व पर
कविताओं की पूरी सीरिज लिखते हुए अचानक बैलगाड़ियों और बैलों के गले में बंधने वाली
घंटियों पर कविताएं लिखकर
वह हमें चमत्कृत कर देता था।
जब मेरी मुलाकात उससे हुई
अपने समय के रंगमंच को लेकर वह चिंतित था।
8
उसके जीवन में सौंदर्य के लिए काफी जगह थी
लिहाजा उसकी सुरुचिपूर्ण जीवन-शैली के
हम सभी कायल थे।
जब हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के सामने
बिकने और छपने के कई संकट थे
हिन्दी की सबसे महँगी पत्रिका का वह संपादक था। उस महँगी पत्रिका के कवर पर
पेरिस में रह रहे भारतीय मूल के एक चित्रकार का
काम दिखता था ।
निश्चित रूप से एक राय बनती है कि
उसका समूचा व्यक्तित्व सुरुचिपूर्ण कलात्मक
और समृद्ध चीजों के पक्ष में था ।
दिल्ली के बाहर का अच्छे से अच्छा लेखक
बहुत सालों तक रचनात्मक लिखने के बाद भी
एक किताब का सपना लिये मर रहा था जब....
जब छियालीस की उम्र पार करने के बाद भी
विलक्षण काव्य-संवेदना के हिन्दी कवि
आलोकधन्वा के पास
उनकी अपनी कोई पुस्तक न थी....
उस समय देश के समृद्ध और
प्रतिष्ठित प्रकाशकों में
उसकी किताबों को छापने की होड़ थी।
प्रकाशक रोते थे कि
हिन्दी की किताबें कोई नहीं पढ़ता
खरीदने का संस्कार तो उनमें है ही नहीं
इस दारुण और शर्मनाक स्थितियों में फिर भी
प्रकाशकों में संस्कृति पुरुष को लेकर
गहरे संतोष का भाव था ।
उसकी किताबों का फ्लैप भो हमें मुग्ध करता था
वहाँ हमें यह पढ़कर मुग्ध होना ही चाहिये था कि
इस हिन्दी कवि ने अपने लेखन और प्रयासों से
हिन्दी और भारतीय कविता को
विश्व के साहित्य में जायज जगह दिलाई।
यह स्वाभाविक भी था मित्रों
क्योंकि बतौर कवि की हैसियत
उसने कई महत्वपूर्ण देशों की यात्राएँ की थीं
उत्कृष्टता की उसके पास पहचान थी
और एक विरल काव्य-दृष्टि भी
जो असाधारण थी और असामान्य !
मित्रो !
आपसे विनम्र प्रार्थना है आप यहाँ
मुक्तिबोध की चर्चा न करें
आप कह सकते हैं कि उस महान कवि के पास भी अपने समय को देखने की
असाधारण और विरल दृष्टि थी
और उसकी एक भी कविता पुस्तक
उसके अपने जीवन-काल में नहीं आ पायी....!!
मुक्तिबोध नौकरशाह नहीं थे !!
9
पहाड़ के नीचे बने उस सुंदर बंग्ले से बाहर देखते हुए उस संस्कृति पुरुष ने कहाः
जीवन तो यहीं है
दिल्ली तो डरा देती है
वह रहने लायक नहीं रही!
फिर देश भर में
चर्चित हो रही उस युवा कवियत्री के स्तन पर
दांत गंड़ाते हुए उसने बिहारी की एक प्रसिद्ध कविता की कुछेक पंक्तियां सुनाई।
स्खलित होने के बाद
जब कुछ भी अच्छा नहीं लगता,
संस्कृति पुरुष ने कहा-
यह समय अवसाद और रचना के विरोध का है
युवा कवियों में इससे जूझने के लिए अपेक्षित
चेतना का अभाव दिखता है।
• स्रोत : पहल-54
• संपादक - ज्ञानरंजन
• प्रकाशन वर्ष : जुलाई ,1996

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