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EC a Corrupt System, Khari Khari and Man Ko Chiththi - Posts from 21 to 24 Sept 2026

भाई Aman Namra की महत्वपूर्ण पोस्ट जिस पर मेरे कुछ प्रश्न है, संविधान, कानून विशेषज्ञ साथी जानकारी दें, बकवास करने वाले और फेसबुकिया ज्ञानी यहां बकलोली नहीं करें


मेरे तीन - चार छोटे सवाल
1- TOI ने इस दावे को खारिज क्यों किया
2 - सीजेआई सूर्यकांत SIR पर निर्णय लेने के बजाय क्यों टालमटोल कर रहें है
3 - राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु की क्या भूमिका है संविधानिक, नाम हटा भी दें तो राष्ट्रपति क्या इसे एक अवैधानिक और आपातकाल की तरह से नहीं देख सकते और संविधानिक अधिकारों के दुरूपयोग के आरोप में मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत प्रभाव से हटाए और स्वतंत्र जांच एक हफ्ते में करवाएं, इसमें सूर्यकांत जैसे ढुलमुल और सत्ता से जुड़े सीजेआई को भी विशेषाधिकार के तहत हटाया जाए ताकि चुनावों की शुचिता, भरोसा और लोकतंत्र में आस्था बची रह सकें, SIR पर सुप्रीम कोर्ट सिर्फ टालमटोल कर रहा है और अभी तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जबकि दो राज्यों के चुनाव हो चुके है और अब उत्तर प्रदेश के चुनाव है - इस तरह से तारीख पे तारीख का कोई अर्थ नहीं है माननीय
4 - संसद के दोनों सदन तुरंत बैठे और विचार करके तीनों आयुक्तों को लोकसभा में बुलाकर स्पष्टीकरण लें और तत्काल कार्यवाही करें
5 - यह सब आज या कल ही होना जरूरी है ताकि बगैर देरी के निर्णय लिए जा सकें, अमित शाह और मोदी के किसी भी मंत्री पर अब देश को भरोसा नहीं है
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अमन की पोस्ट
चुनाव आयोग के भीतर 14 बार टकराव: दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों ने SIR, वोटर लिस्ट और ECINet पर खड़े किए गंभीर सवाल
आइए विस्तार से जानते हैं कि इस रिपोर्ट में क्या है...
Indian Express Investigation का पूरा खुलासा: नए वोटर जोड़ने से लेकर नाम हटाने तक पर असहमति; वोटर डेटा के केंद्रीकरण पर कैबिनेट सचिव तक पहुंचे दो चुनाव आयुक्त
Page 1 की सबसे बड़ी खबर क्या कहती है?
Indian Express की मुख्य जांच का सबसे महत्वपूर्ण खुलासा यह है कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर आयोग के फैसलों/आदेशों पर आपत्ति दर्ज की।
इनमें एक दिन ऐसा भी था जब चार अलग-अलग आपत्तियां दर्ज हुईं।
दोनों चुनाव आयुक्तों की शिकायतों का मूल आरोप यह था कि महत्वपूर्ण फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए गए। ये आपत्तियां किसी मामूली प्रशासनिक विषय पर नहीं थीं, बल्कि—
नए मतदाताओं का पंजीकरण
मतदाता सूची से नाम हटाना
हटाए गए नामों की बहाली
SIR से जुड़े अपील
वोटर डेटाबेस की सुरक्षा और नियंत्रण
चुनावी IT सिस्टम और उसके अधिकार
जैसे चुनाव प्रक्रिया के मूल हिस्सों से संबंधित थीं।
यानी विवाद का केंद्र केवल SIR नहीं है।
विवाद यह भी है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में खुद तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर किसकी कितनी भूमिका रह गई है।
SIR का पैमाना कितना बड़ा है?
Indian Express के मुताबिक बिहार से जून 2025 में शुरू हुई Special Intensive Revision यानी SIR अब 30 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंच चुकी है और ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं।
ऐसे में मतदाता सूची को अपडेट करने वाली प्रक्रिया में आयोग के दो सदस्यों की लगातार आपत्तियां बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
पहला बड़ा विवाद: नए वोटर के Form-6 में अचानक SIR क्यों आया?
यह शायद पूरी जांच का सबसे संवेदनशील हिस्सा है।
नया वोटर बनने के लिए भरे जाने वाले Form-6 में इस साल एक नया सवाल जोड़ा गया।
नए आवेदक से पूछा जाने लगा कि—
उसका नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं?
उसके माता-पिता का नाम था या नहीं?
उसके दादा-दादी का नाम था या नहीं?
यानी आज का युवा वोटर जिस प्रक्रिया के जरिए पहली बार मतदाता बन रहा है, उसमें उसके माता-पिता और दादा-दादी की पुरानी मतदाता सूची का रिकॉर्ड भी प्रासंगिक बना दिया गया।
लेकिन असली सवाल था—क्या यह कानूनी तरीके से किया गया?
16 मई को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने फाइल पर आपत्ति दर्ज की।
उनका तर्क था कि Form-6 एक statutory form है और इसे केवल SIR के आदेश या गाइडलाइन से नहीं बदला जा सकता। इसके लिए Registration of Electors Rules, 1960 में बदलाव करना होगा।
19 मई को दूसरे चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने जोशी की आपत्ति से सहमति जताई।
इसके बावजूद Form-6 में बदलाव कर दिया गया।
13 अगस्त को संधू ने फिर लिखा कि दो चुनाव आयुक्तों की स्पष्ट राय के बावजूद Form-6 में किए गए बदलाव हटाए नहीं गए हैं। उन्होंने इन्हें “unauthorized/illegal” बताते हुए तुरंत हटाने की मांग की।
दूसरा बड़ा सवाल: वोटर लिस्ट पर असली नियंत्रण किसका है?
यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है।
कानून के तहत मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी Electoral Registration Officer यानी ERO की होती है।
आमतौर पर यह जिम्मेदारी SDM या समकक्ष अधिकारी के पास होती है।
ERO—
नाम जोड़ता है,
नाम हटाता है,
दावों और आपत्तियों की सुनवाई करता है,
और अंतिम मतदाता सूची तैयार करता है।
इस व्यवस्था का मूल सिद्धांत decentralization है।
अर्थात किसी एक व्यक्ति या दिल्ली स्थित किसी एक टीम के हाथ में पूरी मतदाता सूची का नियंत्रण नहीं होना चाहिए।
लेकिन ECINet ने यह व्यवस्था बदल दी?
22 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग ने ECINet लॉन्च किया।
यह लगभग एक अरब मतदाताओं से जुड़े 40 से अधिक ऐप्स और पोर्टल को एक प्लेटफॉर्म पर लाने वाला IT सिस्टम है।
CEC ज्ञानेश कुमार ने इसे कानून के अनुरूप बताया था और आयोग की DG-IT ने इसे पारदर्शिता और भरोसा बढ़ाने वाला सिस्टम बताया था।
लेकिन कुछ ही महीनों बाद आयोग के भीतर ही सवाल उठने लगे कि—
क्या इस डिजिटल सिस्टम के जरिए मतदाता सूची का नियंत्रण धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकृत हो रहा है?
विवेक जोशी ने क्या आपत्ति की?
29 मई को जोशी ने “gradual centralisation of the electoral roll database” पर चिंता जताई।
उन्होंने सुझाव दिया कि किसी बाहरी विशेषज्ञ, यहां तक कि IIT विशेषज्ञों की मदद से सिस्टम का ऑडिट कराया जाए।
उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि—
केवल वही statutory authorities वोटर डेटाबेस में बदलाव कर सकें जिन्हें कानून ने यह अधिकार दिया है।
उन्होंने एक internal auditing mechanism बनाने का प्रस्ताव भी रखा।
संधू ने 13 जुलाई को इस प्रस्ताव का समर्थन किया।
लेकिन 14 अगस्त को उन्होंने फाइल पर लिखा कि इन दोनों चुनाव आयुक्तों के नोट पर क्या कार्रवाई हुई, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है।
फिर मामला कैबिनेट सचिव तक क्यों पहुंचा?
28 जुलाई को ECI में IT विभाग की जिम्मेदारियों में बदलाव किया गया।
एक वरिष्ठ अधिकारी को प्रशासन का अतिरिक्त प्रभार दिया गया और कुछ ही घंटों में उन्होंने IT विभाग की निगरानी वाली व्यवस्था में बदलाव कर दिया।
संधू और जोशी के अनुसार इससे वह oversight layer हट गई, जिसके जरिए IT विभाग के काम पर तीनों चुनाव आयुक्तों की निगरानी होनी थी।
29 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग चिट्ठियां लिखकर कैबिनेट सचिव TV Somanathan को मामला बताया।
यह असाधारण कदम था।
उन्होंने इस प्रशासनिक बदलाव को कानून का उल्लंघन बताते हुए कार्रवाई की मांग की।
अगले दिन दोनों ने उस आदेश को अलग रखते हुए पुरानी व्यवस्था जारी रखने को कहा, जब तक आयोग इस पर सहमति से फैसला न कर ले।
तीसरा बड़ा मामला: West Bengal में 38 लाख अपील
यह मामला सीधे मतदाता नाम हटाने और वापस जोड़ने की प्रक्रिया से जुड़ा है।
West Bengal में SIR को लेकर विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने करीब 60 लाख ऐसे मतदाताओं के मामलों की जांच की व्यवस्था न्यायिक अधिकारियों के माध्यम से कराई, जिनके रिकॉर्ड में “logical discrepancies” बताई गई थीं।
इसके बाद करीब 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए।
फिर सुप्रीम कोर्ट ने इन फैसलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों की ट्रिब्यूनल व्यवस्था बनाई।
पिछले सप्ताह आयोग ने कोर्ट को बताया कि करीब 38 लाख अपील लंबित हैं।
इनमें—
22.21 लाख अपील उन लोगों की थीं जिनके नाम हटाए गए थे और वे बहाली चाहते थे।
16.10 लाख अपील ऐसे मतदाताओं के खिलाफ थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने सूची में शामिल किया था और कोई उनके नाम हटाने की मांग कर रहा था।
सवाल यहां उठा—ये 16.10 लाख अपील आखिर किसने दायर कीं?
संधू ने आयोग के अधिकारियों से पूछा—
“ECI की ओर से ये अपील दाखिल करने का अधिकार किसे दिया गया और किसने दिया?”
उन्होंने यह भी पूछा कि वास्तव में ये अपील किसने दाखिल कीं।
उनके अनुसार न तो उन्हें, न विवेक जोशी को और न ही West Bengal के वर्तमान Chief Electoral Officer को इसकी प्रक्रिया और आधार की जानकारी दी गई थी।
चौथा मामला: Goa के 97 वोटर
यह पूरा विवाद सबसे साफ तरीके से दिखाने वाला उदाहरण है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि SIR में “logical discrepancy” वाले मतदाताओं को दस्तावेज देने और सुनवाई का मौका मिले।
Goa में ERO ने दस्तावेज देखने के बाद 97 लोगों को पात्र माना।
लेकिन समस्या यह थी कि—
सॉफ्टवेयर में ERO के उस फैसले को दर्ज करने का विकल्प ही उपलब्ध नहीं था।
Goa के Chief Electoral Officer के कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच आठ बार IT अधिकारियों से उस सुविधा को सक्रिय करने की मांग की, ताकि ERO पहले हटाए गए नामों को वापस जोड़ सके।
लेकिन वह सुविधा समय पर सक्रिय नहीं हुई।
नतीजा—
ERO द्वारा पात्र पाए गए 97 लोग अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके।
यहां मुद्दा 97 लोगों की संख्या भर नहीं है।
मुद्दा यह है कि—
अगर कानून ने किसी अधिकारी को निर्णय लेने का अधिकार दिया है, लेकिन कंप्यूटर सिस्टम उसे अपने निर्णय को दर्ज करने ही नहीं देता, तो वास्तविक अधिकार कानून के पास है या सॉफ्टवेयर के पास?
यही सवाल Indian Express की पूरी जांच के केंद्र में है।
Page 2 का सबसे बड़ा सवाल: क्या चुनाव आयोग में checks and balances कमजोर हो रहे हैं?
अंदर के पेज की दूसरी बड़ी रिपोर्ट इस पूरे विवाद को एक व्यापक संस्थागत संदर्भ में देखती है।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग में मतभेद पहले भी हुए हैं।
मसलन—
2009: N Gopalaswami बनाम Navin Chawla
तत्कालीन CEC N Gopalaswami ने चुनाव आयुक्त Navin Chawla को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी। तत्कालीन सरकार ने सिफारिश स्वीकार नहीं की और बाद में Chawla CEC बने।
2019: Ashok Lavasa का dissent
लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त Ashok Lavasa ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन BJP अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े Model Code of Conduct मामलों में बहुमत से अलग राय दर्ज की थी।
बाद में उन्होंने कहा था कि जब तक उनकी minority decisions अंतिम आदेशों में दर्ज नहीं किए जाते, वे ऐसी बैठकों में शामिल नहीं होंगे।
लेकिन Indian Express के मुताबिक इस बार अंतर यह है कि दो चुनाव आयुक्तों ने लगातार और कई अलग-अलग मुद्दों पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज की है।
सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल: CEC अकेले फैसला कर सकते हैं या नहीं?
यहां 2023 का कानून महत्वपूर्ण हो जाता है।
संविधान के Article 324 के तहत चुनाव आयोग में—
एक CEC + दो Election Commissioners होते हैं।
तीनों समान रैंक के सदस्य हैं।
2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act की Section 18 के अनुसार आयोग का काम, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए।
और अगर सदस्यों की राय अलग हो तो फैसला बहुमत से होना चाहिए।
आयोग अपनी कार्यप्रणाली और काम के बंटवारे को भी सर्वसम्मत निर्णय से तय करता है।
इसी प्रावधान को दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपने नोट्स में बार-बार याद दिलाया।
16 अप्रैल को संधू ने कहा कि आयोग के नाम से कई communications ऐसे जा रहे हैं जिन्हें आयोग की मंजूरी नहीं मिली।
आठ दिन बाद जोशी ने भी इसी तरह की आपत्ति दर्ज की।
एक और असामान्य तथ्य: चार महीने तक पूरी Commission meeting नहीं हुई
Indian Express के अनुसार, 9 सितंबर को CEC और दोनों ECs की पूरी बैठक हुई।
रिपोर्ट इसे चार महीने बाद हुई पहली full meeting बताती है।
यानी जिस अवधि में SIR और मतदाता सूची से जुड़े बेहद बड़े फैसले हो रहे थे, उसी अवधि में तीनों सदस्यों की पूर्ण बैठक को लेकर भी सवाल उठता है।
Indian Express ने ECI से क्या पूछा?
अखबार ने 21 सितंबर को चुनाव आयोग को विस्तृत questionnaire भेजा।
पूछा गया कि—
दोनों ECs की आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई?
क्या उनकी चिंताओं का समाधान हुआ?
क्या 9 सितंबर की बैठक में इन मुद्दों पर चर्चा हुई?
आयोग ने जवाब नहीं दिया।
दोनों चुनाव आयुक्तों को भी ईमेल किए गए और फोन से follow-up किया गया। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला।
तो पूरी जांच से निकलने वाले 6 बड़े सवाल
1. अगर तीन सदस्यीय आयोग है तो महत्वपूर्ण फैसलों में दो सदस्यों को जानकारी क्यों नहीं थी?
यह सबसे बुनियादी संस्थागत प्रश्न है।
2. Form-6 में बदलाव किस कानूनी अधिकार के तहत किया गया?
क्योंकि दो चुनाव आयुक्तों ने पहले ही कहा था कि इसके लिए नियमों में बदलाव जरूरी है।
3. मतदाता डेटाबेस का अंतिम नियंत्रण किसके पास है?
ERO कानूनन जिम्मेदार है, लेकिन अगर software उसकी कार्रवाई रोक सकता है तो वास्तविक नियंत्रण का सवाल उठता है।
4. 16.10 लाख West Bengal appeals किसने और किस अधिकार से दाखिल कीं?
और अगर दो चुनाव आयुक्तों को भी इसकी जानकारी नहीं थी तो प्रक्रिया क्या थी?
5. Goa में ERO द्वारा पात्र माने गए 97 लोगों के नाम software के कारण क्यों नहीं जुड़ सके?
यह digital governance से आगे बढ़कर मताधिकार के क्रियान्वयन का सवाल बन जाता है।
6. अगर दो EC लगातार आपत्ति कर रहे थे तो इन आपत्तियों का अंतिम institutional resolution क्या हुआ?
यही वह सवाल है जिसका जवाब अब सार्वजनिक होना महत्वपूर्ण है।
और अब उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा अगला टेस्ट क्यों है?
SIR पहले ही कई राज्यों तक फैल चुकी है और 13 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट रोल से हटाए जाने की रिपोर्ट है। ऐसे में आगे जिन राज्यों की मतदाता सूचियों पर यह प्रक्रिया लागू होगी, वहां पारदर्शिता, अपील, नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया और IT सिस्टम की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
इसलिए UP के संदर्भ में अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि चुनाव प्रक्रिया “compromised” है।
लेकिन यह पूछना बिल्कुल जायज है—
जिस चुनाव आयोग के दो सदस्य खुद मतदाता सूची, Form-6 और IT नियंत्रण पर लिखित आपत्तियां दर्ज कर चुके हैं, क्या उन आपत्तियों का पूरा रिकॉर्ड और उनका निपटारा सार्वजनिक किया जाएगा?
यही इस पूरी जांच का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक सवाल है।
एक लाइन में पूरी कहानी
यह कहानी केवल ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की नहीं है। असली सवाल यह है कि भारत में मतदाता सूची तैयार करने की शक्ति—कानून द्वारा निर्धारित हजारों स्थानीय अधिकारियों के हाथ में है या धीरे-धीरे दिल्ली के एक केंद्रीकृत डिजिटल सिस्टम में सिमट रही है?
और जब दो चुनाव आयुक्त इस बदलाव पर 10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कर चुके हों, तो उन आपत्तियों के जवाब सार्वजनिक होना लोकतांत्रिक पारदर्शिता का स्वाभाविक हिस्सा है।
नोट: Indian Express की रिपोर्टों में लगाए गए संस्थागत आरोप/आपत्तियां संबंधित चुनाव आयुक्तों के रिकॉर्डेड नोट्स और अखबार की जांच पर आधारित हैं। आयोग ने अखबार के सवालों का जवाब नहीं दिया; इसलिए इन्हें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि दस्तावेजों पर आधारित गंभीर पत्रकारिता संबंधी खुलासे और उठे हुए प्रश्नों के रूप में प्रस्तुत करना अधिक सटीक होगा। आयोग की ओर से आज उपलब्ध एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि SIR समेत आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
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लोकतंत्र का जनाज़ा
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पुलिस, ब्यूरोक्रेसी और राज्य प्रशासनिक सेवाओं का जो चरित्र इन दिनों सामने आया है - वह सिर्फ कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं जिनकी डोर भाजपा, संघ और स्थानीय गुंडे मवाली लोगों के हाथों में है, और उन्हें संविधान के तहत इनके निज कामों को करने के लिए अकूत धन, पद का दुरुपयोग करने और ताकत प्रदर्शित करने के लिए तनख्वाह अलग से मिल रही है बोनस के रूप में
अपवाद के रूप में कुछ अधिकारी है - जो मुस्तैदी से सामने डटकर खड़े रहते है, पर इन्हें लूप लाइन में डालकर व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया से दूर कर दिया जाता है
पिछले 2014 से यह पूरी तरह से एक पारदर्शी व्यवस्था हो गई है और हमारी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा "कार्यपालिका" का इस रूप में पतन हो जाना दुखद है और अब न्यायपालिका भी इस ओर ही उन्मुख है, रहा सवाल मीडिया का तो - वहां दलाल है ही जो सड़क बनने से लेकर चोरी - चकारी आदि से ब्लेकमेल करके रूपया कमा रहे है, जिला ब्यूरो प्रमुखों और पत्रकारों का संविधानिक व्यवस्था जैसे आरक्षण, महिला समानता, मूल कर्तव्यों, राष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्रिमंडल, आदि के खिलाफ पोस्ट करना या संघ का गणवेश पहनकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करना, पत्रकारों का दल विशेष का सलाहकार हो जाना, एनजीओ बनाकर चल - अचल संपत्ति बनाना, अनुदान बटोरकर अपना घर भरना, विधायक या सांसदों या पार्षदों के साथ शराब के जाम छलकाना - इतना सामान्य हो गया है कि अब यह सब मजाक भी नहीं लगता, मुझे लगता है कि अब मीडिया जैसी चीज को चौथी आवश्यक व्यवस्था घोषित कर देना चाहिए ताकि इसे हम एक्रीडेट कर सकें और राशि का निर्धारण कर सकें
और जनता .... निरीह भोली नहीं, वह भी इन कठपुतलियों को नाचते देखना चाहती है और भयानक रूप से स्वार्थी है
***
मॉरल पुलिसिंग,नियम कायदे, नैतिकता और अनुशासन के नाम पर जजमेंटल होना और फतवे जारी करना बंद कब होगा, हम खुद पाप में घिरे है, अनैतिक, दुराचारी और व्याभिचारी है - पर दूसरों की बात आते ही एकदम मठाधीश बनकर विक्रमादित्य बन जाते है, अरे आप होते कौन है - दूसरे के मामले में टांग अड़ाने वाले, पूछताछ करने वाले या निर्णय लेने वाले
यहां सब समझदार है और सभी रोटी खाते है, गोबर कोई नहीं खाता, आपको हक़ किसने दिया कि आप सवाल पूछें, न्याय दें और निर्णय करें, बंद कीजिए बात करना और निर्णय देना
अपने काम से काम रखिये और ज़्यादा ही दिक्कत है तो निकलिए यहां से, समाज जिस तरह से हिंसक होते जा रहा है और मॉरल पुलिसिंग के नाम पर सबको प्रताड़ित कर रहा है - वह बेहद गंभीर है, सबको अपना भला - बुरा समझता है और अपने निर्णय क्या, क्यों, कैसे, कब, कहां लेने है - यह तय करने का अधिकार भी है और छूट भी है
आपको समाज, प्रशासन, कानून, नैतिकता या संस्थागत होने के नाते कोई हक़ नहीं मिल जाता कि आप दूसरों के फटे में रंग अड़ाये, जमुई की घटना हो या दिल्ली की - समाज के ठेकदारों को समझना चाहिए़ कि बगैर किसी परिस्थिति या हालत को जाने कोई निर्णय ना लें, सबको कही भी आने - जाने और अपने मित्र या जीवनसाथी बनाने का अधिकार है, आजकल एक नया ट्रेंड है "हैरासमेंट" के नाम पर , मतलब साला सारे पाप तुम करो देश, समाज, परम्परा, सनातन, धर्म या संस्कृति के नाम पर और दूसरों को बदनाम करो, हिंसा करो, बलात्कार करो, हत्या करो यह सब जायज - शर्मनाक
और अंत में प्रार्थना -
बिहार को एक अलग देश घोषित कर देना ही उचित है - क्योंकि वहां चंद्रशेखर, लालू, पासवान, जीतनराम, राबड़ी, नीतीश, सम्राट जैसे लोग ही उग सकते है और पनप सकते है - जो किसी काम के नहीं, बार - बार ट्रेन से लेकर बिहारी सदव्यवहार पर की गई मेरी टिप्पणियों से मित्र नाराज रहते है, पर पूरा देश परेशान रहता है इस राज्य से, क्या मतलब है, बेहतर है एक अलग राष्ट्र बनाकर दे दो और मामला खत्म, बस
***
मन लागो यार फकीरी में


"मत कर काया को अहंकार
मत कर माया को घमंड
काया ग़ार से काची"
आज देवास में "लाल गेट का राजा" में श्रीगणेश जी के दर्शन करने गया था, बहुत भीड़, आरती, प्रसाद, मित्रों से मिलना - जुलना , देर लग गई उसके बाद हमारे प्रिय मित्र, सखा और पद्मश्री कालूराम बामनिया जी का कबीर भजन का कार्यक्रम था, सो देर तक उन्हें सुनता रहा, मेरे अनुरोध पर उन्होंने उपरोक्त भजन और "तेरा मेरा मनवा कैसे एक होवे रे", "मन लागो यार फकीरी में" सुनाया
मन प्रसन्न हो गया और "मन लागो यार फकीरी" सुनकर अचानक नश्वरता का ख्याल आया, सो पांडाल में ही सक्षम संस्था का एक स्टॉल लगा था जिसके कार्यकर्ता अंगदान के लिए लोगों को प्रेरित कर रहें थे
मुझे याद है एक बार बहन Arti Pandey ने देहदान की बात की थी, तो ऑनलाइन फॉर्म भर दिया था - पर उसका क्या हुआ मालूम नहीं, आज पूरी तरह से पक्का काम करके आया हूँ, अपनी देह को "इंदौर के शासकीय महात्मा गांधी चिकित्सा महाविद्यालय" के छात्रों के लिए दान कर दिया है, आंखें, किडनी, लीवर, हृदय यदि काम लायक बचे तो उन्हें पहले निकालने का और सही आदमी को फिट करने का, बाद में सम्पूर्ण शरीर को ले जाने का, मल्लब बात यह है कि दान कर दिया, वहां किसी ने पूछा कि "आपकी ओर से कोई हस्ताक्षर करेगा" मैंने कहा कि "भाई साहब, अज्ञेय ने कहा है कि - मैं मरूंगा सुखी मैंने जीवन की धज्जियां उड़ाई है - तो अपने हिसाब से जीवन जीया है तो निर्णय मेरे ही ना होंगे" बस, और आंख मूंदकर फॉर्म भर दिया, एक रसीद ले आया हूँ ताकि सनद रहे और घर वालों को याद की प्रपंच में रखने का नहीं अगले को, ले जाने दो
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