हाल ही में श्री गणेशोत्सव समाप्त हुए, पवित्र त्यौहार था पर जाते जाते गणेश जी कह गए कि -"मैं तो ध्वनि प्रदूषण से बहुत घबरा गया पर आने वाले दिनों में माँ दुर्गा को तकलीफ न हो ऐसा प्रबंध करना, डीजे की वजह से आपके मप्र में एक बिटिया की मृत्यु हो गई, यह कितना दुखद है"
कुछ बातें अभी ख्याल में आई तो विचार के लिए लिख रहा हूँ, उद्देश्य यह है कि हम ठंडे दिमाग से विचार करें कि इस व्यस्ततम जिंदगी में त्योहार और उत्सव इसलिए मनाते है कि हम सभी तनाव छोड़कर थोड़े समय के लिए खुश हो सकें, सबसे मिल सकें और जीवन जीने के लिए ऊर्जा प्राप्त कर सकें परंतु हो क्या रहा है, इस प्रदूषण में सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि साल भर के वो सब इवेंट्स भी शामिल हैं जिनसे हम मानसिक संतुलन खोते जा रहे है
कोतवाली में फोन करो तो कहते है - "भगवान का भजन सुन लो साहब, थोड़े दिन की बात है" और फिर वे आयोजन समिति को बता देते है या मंदिर प्रबंधन को कि फलाने ने शिकायत की है आपकी, जबकि यह जानकारी गुप्त रखने का प्रावधान है, इसके बाद उसी पुलिस के जवान के साथ सारे भक्तजन आपके घर आ जाते है धमकाने और मां - बहन करने और आपको ठीक करके जाते है, ज्यादा बोला तो आपके हाथ - पांव की रक्षा भगवान करें, इनके मुंह से जो शब्द निकलते हैं उन्हें सुनकर शरीफ आदमी जमीन में धंसकर ही मर जायेगा
शहर, कस्बों और गांवों की कॉलोनी, मोहल्लों और गलियों में बारहों माह देर रात तक लाउड स्पीकर्स तेज आवाज में बजते रहते है, कभी दिन में भागवत होती है, कभी कथा पाठ, कभी शादी ब्याह, कभी जन्मदिन, और कभी कोई निजी पारिवारिक उत्सव, कभी भाषण, रैली, धरने और प्रदर्शन - मतलब आपका जीना ही मुश्किल है, अगर आपके घर के सामने से यदि किसी की बारात निकल रही है और अपने घर में कोई वृद्ध या मरीज हो तो बारात के गुजर जाने के पहले ही आप शव वाहन बुलवा कर रख लें, अब नातेदारों को बुला लें - क्योंकि डीजे की आवाज से पूरा घर आजकल थर्रा जाता है, शायद गिर भी जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश है कि रात 10:30 के बाद कोई शोर नहीं होना चाहिए, क्या इसके लिए कलेक्टर और एसपी को जवाबदेह नहीं बनाया जाना चाहिए - कोर्ट के आदेश की स्पष्ट अवहेलना करने के लिए
सुझाव यह है कि -
1 - सभी डीजे वालों और बैंड वालों के उपकरण जप्त कर लिए जाए और उन्हें नब्बे डेसिबल पर सेट कर दिया जाए, किसी भी परिस्थिति में रात को दस के बाद डीजे की अनुमति ना हो, शादी घर और गार्डन का लाइसेंस निरस्त कर दिया जाए स्थाई रूप से, होटल भी बंद कर दिए जाए - उल्लंघन होने पर
2 - ढोल - ताशे वालों को भी रात दस बजे तक की समय सीमा दी जाए
3 - बारातों को निकलते समय प्रोसेशन के लिए एक समय निर्धारित कर दिया जाए - एक से डेढ़ घंटा - बस, ताकि वे देर तक ना शोर करें और ना ट्रैफिक जाम करें
4 - भागवत, कथा, भाषण आदि के लिए लाउड स्पीकर्स पर पूर्ण प्रतिबंध हो
5 - नमाज के लिए मस्जिदों पर लगने वाले भौंगो पर भी प्रतिबंध हो, यह गुरुद्वारों, चर्च और सभी पूजा स्थानों पर हो, धर्म नितांत निजी और आस्था का मामला है, साथ ही हर धर्म में मौन की प्रैक्टिस को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, ना कि हल्ले - गुल्ले को
6 - दिन भर सब्जी - भाजी से लेकर विभिन्न प्रकार की सूचना जबरन देने वाले ई-रिक्शा, ऑटो और ठेले वालों को लाउड स्पीकर्स की अनुमति नहीं होना चाहिए
आप चाहे तो इसमें जोड़ सकते है और बता सकते है कि क्या किया जा सकता है
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सिर्फ प्रधानमंत्री के पद की ही गरिमा नहीं गिराई भाजपा ने बल्कि दो - तीन सच के रबर स्टाम्प राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई, ईडी , सीबीआई, CAG, आदि से लेकर सभी संविधानिक पदों की गरिमा, डर, इज्जत और जमीर भी खत्म कर दिया
जंतर - मंतर के जो वीडियो आ रहे है, और युवा खासकरके लड़के और लड़कियां जिस तरह से गालियां देकर नारे लगा रही है - वह बेहद शर्मनाक है
क्या यह अमित शाह, मोदी, योगी से लेकर पूरी सरकार, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के लिए शर्म की बात नहीं, सुप्रीम कोर्ट के वकील जिस अंदाज में इसका उसका और तू तुकारे से मोदी या सूर्यकांत को दुत्कार रहें है वह भी क्या आदर्श पेश करेगा आने वाले समय में
पुलिस वाले भी मजबूरी में डिटेन कर रहें है पर टिप्पणी भी कर रहें है कि "बेटा सही कर रहें हो, निपटाओ इस सरकार को"
इन सब हालातों को देखते हुए लगता है कि दिल्ली विवि के चुनावों में अभाविप जो जीती है उसमें में भी स्पष्ट रूप से अमित शाह और ज्ञानेश कुमार का साफ - साफ हाथ है
मजेदार होगा यूपी, पंजाब के चुनावों पर अभी से नजर रखना और इन बेबस और गुस्सैल आवाजों का वोटों में तब्दील होना 2029 में अब इन्हें सिर्फ और सिर्फ ईवीएम मशीन, ज्ञानेश जैसा कोई सूअर या भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट ही जीता सकेगा बाकी तो भाजपा या संघ में दम नहीं, क्योंकि अब व्यवस्थाओं से लेकर बाकी सारी जगहों पर, छोटे जिलों, कस्बों गांवों में आक्रोश फूट पड़ा है और यह इनसे सम्हल नहीं रहा है, इसलिए ये हरामखोर धर्म की आड़ में अपने पाप धोकर समय व्यतीत कर रहें है, चंदा चोरी करके चंपत होने की तैयारी में है
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श्राद्ध पक्ष में भेंट
देवास को मुख्यमंत्री सुगम परिवहन योजना में पुराने ठीकरों से जुड़ी और कच्चे पक्के रंग की हुई घटिया बसें मिली, पता नहीं भोपाल BRTS की टूटी फूटी बसें कितनों का खून पीकर यहां आई है, जाना तो कबाड़ी के यहां था और चल गई प्रदेश भर में
विधायक को मना कर देना था इन ठीकरों को लेने से
जनता छाती कूट रही है और पटाखे फोड़ेगी, नगर निगम ने करोड़ो रुपए चार्टड , सूत्र सेवा और सीटी बसों में बर्बाद कर दिए अब ये दस ठीकरों को ठिकाने लगा देंगे और फिर वही छर्रे दौड़ाएंगे यम के दूत
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अकर्मण्य और निकम्मे जन प्रतिनिधि देवास के
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देवास शहर में पिछले एक हफ्ते से नर्मदा का पानी इतना गंदा आ रहा है कि पीना तो दूर हाथ धोने लायक भी नहीं है, पर कोई जवाब और ना कार्यवाही
बेशर्मी की हालत यह है कि महापौर, विधायक और सांसद तमाम पोस्ट्स और पानी को लेकर पोस्ट किए गए वीडियो, पार्षदों के विरोध के बाद भी कुछ नहीं कर रहें है, पूरी नगर निगम भ्रष्ट और नाकारा लोगों से भरी पड़ी है देवास शहर में
पूरा शहर खुदा पड़ा है और पानी के साथ सेनिटेशन की लाइन मिल गई है, कालोनियां वैसे ही तथाकथित चुप रहने वाले संभ्रांत लोगों की वजह से परेशान है और मजबूरी में पानी पी रही है, सबसे ज्यादा टैक्स हम दें और ये हरामखोर उसके बदले हमें मौत दें और हमारा रूपया अपनी ऐयाशियो में उजाड़ दें उदयपुर या कही और जाकर
भाजपा की निगम परिषद् बुरी तरह से भ्रष्ट और निकम्मी है, यहां के दलाल पत्रकार सिर्फ और सिर्फ सांसद और विधायक की चापलूसी करते हुए उनकी प्रशंसा में गुणगान करते रहते है और अपना धंधा चला रहे है, कैमरा उठाकर शूट कर लेते है फिर वार्ड के पार्षद, अधिकारी के पास जाकर दिखाते है, वीडियो रिलीज ना करने के लिए धन ऐंठते है और चुप हो जाते है
माह में पूरा शुल्क लेने के बाद दो या तीन दिन में पानी देते है - बावजूद इसके पानी का ट्रीटमेंट नहीं कर पा रहे है, पूरे शहर को नर्क बना रखा है, शहर भर में सड़के खुदी हुई है और वाहन तो दूर - पैदल चलना भी दूभर हो गया है, पर जिम्मेदार लोगों के कान पर जूँ नहीं रेंग रही
लोगों ने मजबूरी में महिला महापौर बना दी आरक्षण की वजह से, पर मजाल कि वो कभी जनता में नजर आई हो, या कोई समझ हो विकास की, या कभी कोई निर्णय जनहित में लिया हो, उनके पति महापौर की कुर्सी पर बैठकर सारी डील करते है, मजेदार यह है कि भाजपा के जिला अध्यक्ष, विधायक, सांसद और सभी पार्षद शहर में रहते है, साथ ही इनके चापलूस और छर्रे भी - पर सब चुप है और सह रहें है - क्योंकि मानसिक रूप से गुलाम और सामंतशाही के शिकार है, इन्हें यह भी नहीं मालूम कि देश आजाद हो चुका था 1947 में, पर यहां अभी भी राजशाही चल रही है
एक IAS को राज्य सरकार ने कठपुतली बनाकर कमिश्नर बना रखा है - जो लोगों से ना बात पसंद करता है और ना समस्या सुलझाने में उसकी रूचि है, उसके लिए स्थानीय सुशासन और 74 वें संविधान संशोधन का कोई मतलब नहीं, एकदम अकर्मण्य और निकम्मा है, जिला कलेक्टर को फुर्सत नहीं, प्रशासन तो मर चुका है जिसका हगा - मुता पानी के रूप में परोसा जा रहा है
लगता है नरेंद्र मोदी, शाह या मोहन यादव को आकर यहां की व्यवस्थाएं ठीक करना होगी
और आखिर में जनता - तो इतना कहूंगा कि गुलामों सुधर जाओ, आठ बार से एक ही परिवार को जीता रहे हो, ना मेट्रो मिल रही - ना विकास हो रहा और अब टट्टी - पेशाब का पानी पिला रहे है प्रतिनिधि, तो मजे करो, मरो और चुप रहकर गुलामी करते रहो you all desrve only this
बोलो - जय जय सियाराम
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कभी-कभी मनुष्य को वही मिलता है, जिसका वह अधिकारी होता है, और मुझे नहीं लगता कि इसमें हमेशा कुछ बुरा ही होता है
पिछले कुछ दिनों में बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ जिसने भीतर तक विचलित किया - आईआईटी, मुंबई में साहिल की दुखद मृत्यु, दिल्ली के सत्यनिकेतन की घटना, बिहार और दिल्ली में सामने आए बलात्कार के मामले और महाधूर्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े हालिया घटनाक्रम, सीजेआई सूर्यकांत के कारनामें, इन सबने मुझे धीरे-धीरे इस विश्वास की ओर धकेला है कि शायद नियति सचमुच कोई अदृश्य पटकथा लिखती है और समय हमें धीरे-धीरे उन चौराहों तक ले आता है, जहाँ कुछ घटनाएँ हमारा इंतज़ार कर रही होती हैं
इसलिए अब लगता है - समय का इंतज़ार करना ही बेहतर है, हमें न अतीत की ओर बार-बार लौटना है, न भविष्य में झाँककर अपनी बेचैनी बढ़ानी है - बस शांत रहना है, सहज रहना है और एक उम्र या समय के बाद स्वयं को समय के हवाले कर देना है, विश्वास रखिए जो होना है, वह अपने समय पर होगा
शायद जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि हम सब समय की एक ऐसी यात्रा में हैं, जिसका अगला पड़ाव हमें मालूम नहीं, हम रास्ते चुनते हैं, फैसले लेते हैं, योजनाएँ बनाते हैं - लेकिन अंततः समय ही तय करता है कि हमें किस मोड़ पर किससे मिलना है और कौन-सी घटना हमारे जीवन की दिशा बदल देगी
इसलिए अब कोई जल्दबाज़ी नहीं, मुझे अब न किसी उत्तर की तलाश है और न ही किसी परिणाम की प्रतीक्षा है, बस समय को गुजरते हुए देखना है - क्योंकि कुछ फैसले हम नहीं करते - समय उन्हें हमारे लिए लिखता है, और फिर एक दिन, हम उसी लिखी हुई कहानी के किसी अनजान मोड़ पर खड़े होते हैं
Sometimes, people get what they deserve, and I don’t always feel that it is a bad thing
Over the past few days, so many unsettling things have happened - the tragic death of Sahil at IIT Bombay, the Satyaniketan incident in Delhi, rape cases reported in Bihar and Delhi, and the disturbing developments involving Mr Gyanesh Kumar, All of this has made me slowly begin to believe in destiny - that perhaps some things are predetermined, and that TIME eventually brings us to the crossroads where certain events are meant to unfold
So, let us wait for our time,
There is little wisdom in constantly looking back at the past or peeping anxiously into the future, so stay calm and stay detached, Let things unfold in their own time
Some incidents come looking for us, Perhaps, all we can do is wait and see what time brings our way
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"This is my letter to the World" by Emily Dickinson
This is my letter to the World
That never wrote to Me
The simple News that Nature told
With tender Majesty
Her Message is committed
To Hands I cannot see
For love of Her Sweet countrymen
Judge tenderly of Me
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यह छोटी सी कविता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील आत्म-संवाद है, 1986 - 88 का दौर साहित्य वो भी अंग्रेजी में पढ़ने का भूत सवार हुआ - कारण था 'एमएससी प्राणिकी' को छोड़कर अंग्रेजी एमए में प्रवेश लिया, अंग्रेजी की समझ शून्य थी, पर सीखने के नाम पर कुछ किताबें और कुछ कविताएं, एक एंथोलॉजी "गोल्डन ट्रेजरी" [संपादक पालग्रेव] हाथ लगी थी, सो कुछ भारतीय, कुछ यूरोप और कुछ अमेरिकन साहित्य पर नजर पड़ी, एमिली भा गई और खासककरके यह कविता, आज याद आई तो फिर पढ़ी और बार - बार पढ़ी
एमिली डिकिन्सन की कविता “This is my letter to the World” आकार में छोटी, लेकिन अर्थ और संवेदना में अत्यंत व्यापक कविता है, यह कविता एक ऐसे अकेले और संवेदनशील मनुष्य की आवाज़ है, जो अपने समय और संसार से संवाद करना चाहता है, जबकि उसे महसूस होता है कि संसार ने कभी उसकी ओर कोई पत्र नहीं लिखा,
कविता की आरंभिक पंक्तियाँ—“This is my letter to the World / That never wrote to Me” अपने भीतर गहरी विडंबना और अकेलेपन को समेटे हुए हैं, कवयित्री संसार से शिकायत नहीं करतीं, बल्कि अपनी ओर से संवाद का एक पुल बनाती हैं, यह अकेलापन व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक है, हर वह व्यक्ति, जिसे कभी लगा हो कि उसकी बात सुनी या समझी नहीं गई, इन पंक्तियों में स्वयं को पहचान सकता है
डिकिन्सन के यहाँ प्रकृति केवल दृश्य नहीं, बल्कि एक मौन संदेशवाहक है, “The simple News that Nature told / With tender Majesty” में प्रकृति जीवन का कोई सरल, सहज और गरिमापूर्ण सत्य कवयित्री तक पहुँचाती है, प्रकृति की यह उपस्थिति कविता को निजी अनुभव से उठाकर एक व्यापक मानवीय और आध्यात्मिक धरातल देती है
“Her Message is committed / To Hands I cannot see” कविता का रहस्यमय और सुंदर हिस्सा है, ये अदृश्य हाथ पाठक, भविष्य, समय या किसी आध्यात्मिक सत्ता के प्रतीक हो सकते हैं, कवयित्री जानती हैं कि उनकी बात उनके नियंत्रण से बाहर जाकर उन लोगों तक पहुँचेगी जिन्हें वे जानती तक नहीं
कविता की अंतिम पंक्तियाँ - “For love of Her—Sweet—countrymen / Judge tenderly—of Me” पूरी कविता को एक अत्यंत मानवीय स्पर्श देती हैं, कवयित्री अपने पाठकों से कठोर निर्णय नहीं, बल्कि संवेदनशील समझ की अपेक्षा करती हैं, यह केवल साहित्यिक मूल्यांकन का आग्रह नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मनुष्य की स्वीकृति पाने की इच्छा है
कविता की सबसे बड़ी खूबी इसकी संक्षिप्तता, सरल भाषा और गहरी अर्थ-व्यंजना है, डिकिन्सन कुछ ही पंक्तियों में अकेलापन, प्रकृति, स्मृति, पाठक और भविष्य के साथ संवाद जैसे अनेक विषयों को छू लेती हैं - उनके विशिष्ट डैश और विराम कविता में ठहराव और मौन पैदा करते हैं, जिससे यह किसी औपचारिक कविता से अधिक एक निजी पत्र जैसी लगती है,हालाँकि, इसकी एक सीमा भी है, अत्यधिक संक्षिप्तता और प्रतीकात्मकता के कारण कविता कई अर्थों को अनिश्चित छोड़ देती है
“Nature” का संदेश क्या है और “अदृश्य हाथ” किसके हैं - इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं मिलता, कुछ पाठकों के लिए यह अस्पष्टता आकर्षक होगी, जबकि कुछ को कविता अधूरी या अत्यधिक निजी लग सकती है, अंतिम आग्रह “Judge tenderly of Me” कविता को कुछ हद तक आत्मकेंद्रित भी बनाता है, फिर भी यही अस्पष्टता डिकिन्सन की काव्य-शक्ति है, वह पाठक को कोई अंतिम अर्थ नहीं देतीं, बल्कि अर्थ खोजने की स्वतंत्रता देती हैं
अंततः यह कविता केवल एमिली डिकिन्सन का संसार को लिखा हुआ पत्र नहीं है - यह हर उस संवेदनशील मनुष्य की आवाज़ है जो अपने समय में पूरी तरह समझा नहीं गया, लेकिन फिर भी अपनी बात आने वाले समय के नाम छोड़ जाना चाहता है, - “Judge tenderly” इस कविता का भावनात्मक केंद्र है, और शायद साहित्य के लिए भी एक सुंदर आग्रह: समझने से पहले कठोर निर्णय मत दीजिए
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