लाख शिकस्त खाएं मगर आबिदा नहीं हुआ
मैं कई बरस का होकर भी संजीदा नहीं हुआ,
मुझको रहा मलाल और मलाल भी उम्र भर का
मैं क्यों किसी शख्स का पसंदीदा नहीं हुआ
• अज्ञात
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फिल्मी नचनिया और अव्वल दर्जे की मूर्ख महिला सांसद लायक नहीं, एक चरित्रहीन और अभद्रता से ऊलजुलूल बकने वाली इस मूर्ख को Right To Call Back के तहत बुलाने की व्यवस्था होना थी, दरअसल कोई राजनैतिक दल इस राईट टू कॉल बैक को नहीं चाहता, बहरहाल इस गंवार और नीच औरत पर काबू लगाने की जरूरत है
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माँ पहली गुरू, फिर पिता, फिर कुटुंब एवं परिजन और बाकी फिर स्कूल-कालेज के शिक्षक
जीवन जीने की कला और व्यवहारगत शिक्षा, मूल्यों की समझ, कौशल और दक्षता, जीवन कौशल के दस हुनर तो आप सबने, इस व्यापक संसार ने सिखायें है और रोज हर कदम पर सीखने को मिलते है
इसलिए आज सिर्फ एक व्यक्ति या संस्था को बधाई या धन्यवाद ज्ञापित करने से कुछ नहीं होगा, कृतज्ञ हूँ सबका और उन लोगों का भी जिन्हें मैं बता भी नहीं सकता कि उनसे कितना सीखा और आभार भी नहीं कह पाया
गुरूपूर्णिमा या शिक्षक दिवस सिर्फ दिन नहीं वरन कृतज्ञता ज्ञापित करने, आत्मावलोकन करने और अपने-आप को सीखने, गलती करने और लगातार मानवतावादी दृष्टिकोण बनाएं रखने के पथ पर अग्रसर होने का भी दिन है
छात्र और शिक्षक में सामंतवादिता ना होकर समान भाव की प्रबल इच्छाशक्ति हो तो सीखना आसान हो जाता है और जब भी शिक्षक की भूमिका में था या रहता हूँ तो कोशिश होती है कि यह हाव-भाव बना रहें, व्यवहार में ही नहीं - बल्कि जीवन में भी परिलक्षित हो
आप सबका आभार, मतभेदों के बावजूद भी आप सब प्रिय है और आप सबसे जो सीखता हूँ - उसके लिए धन्यवाद, आभार और सीखते रहने की कामना
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26 जुलाई 2008 की आधी रात और देवास के संस्कार अस्पताल में पोस्ट केयर के लिए इंदौर के सुयश अस्पताल से लाकर रखा था इस भरोसे कि "दो-चार दिन में सोडियम - पोटेशियम का बैलेंस ठीक हो जायेगा तो आप लोग घर ले जाना" श्रीकांत रेगे ने यही कहा था जो प्रसिद्ध न्यूरो सर्जन थे मालवा के
डॉक्टर सुनील शर्मा का अस्पताल था जो कॉलोनी में ही था और सुनील मेरे साथ पढ़ा है बचपन से तो उस पर भरोसा भी था, अस्पताल में देर रात तक मैं और माँ बातें किया करते थे इंदौर में और फिर देवास में भी, उस काली रात को भी दो बजे तक हम दोनों बातें कर रहे थे छोटे भाई के बारे में जिसकी दोनों किडनियां खत्म हो चुकी थी, पिता की मृत्यु के बाद अस्पताल का खेल जीवन का खेल हो गया था, सन 1992 में मैं माँ को अपोलो अस्पताल, मद्रास ले गया था बायपास करवाने - क्योंकि तब मप्र में कही भी यह सर्जरी होती नहीं थी, डॉक्टर सत्यमूर्ति और एक और दक्षिण भारतीय डॉक्टर ने मिलकर सर्जरी की थी, फिर 2003 में छोटे भाई की पहले एक और फिर दोनों किडनी फेल हो गई, इंदौर में डॉक्टर नरेश पाहवा और ज्योति चौधरी (अब पाहवा) की देख रेख में डायलेसिस शुरू हुआ - जो हफ्ते में दो बार होता था, माँ को भाई की चिंता रहती थी, वो बस उसी के बारे में बातें करती थी, बच्चे छोटे थे घर के
माँ की ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी बहुत पीड़ादायी थी, सर के बाल काटने से लेकर होश में आने तक और फिर पोस्ट केयर में बार - बार जीभ का लथड़ जाना, पुराने दिनों में जाकर पिता, भाई, बहनों को याद करना और अपने स्कूल की संगी - साथियों, साथी शिक्षिकाओं को बदस्तूर याद करना, सब लोग बारी - बारी से अस्पताल आते और देखकर लौट जाते, मैं सबके चेहरे देखता था, पर कभी किसी चेहरे पर यह नहीं पढ़ पाया कि ये आने वाले लोग माँ को मानो आखिरी बार देखने आये है, हरेक व्यक्ति जाते समय मेरे हाथ अपने हाथ में दबाकर कहता - "हिम्मत रखना, सब ठीक होगा, माँ जल्दी ही ठीक होगी और घर जायेगी" पर इस वाक्य का गूढ़ार्थ समझ नहीं आता, लोगों ने दुनिया देखी थी और मैने सिर्फ माँ के आसपास की दुनिया, उसका घर, उसके लोग, उसकी नौकरी, उसका संघर्ष, उसके रिश्ते और निभाने की कला, हमको मुश्किलों में बड़ा करना, हमारी जिद पूरी करना, नब्बे ढाई सौ के वेतनमान से घर चलाना - तभी आज तक लोग कहते है कि उसके जैसा आग्रह खाने का और कपड़े लत्ते, बर्तन - भाण्डे शादी ब्याह में देने का हुनर किसी में नहीं है, बहुत व्यवहारी थी, कभी घर से कोई भूखा या खाली हाथ नहीं गया था
माँ का होना जीवन की आश्वस्ति था, मेरे अकेलेपन की वो साथी थी, पिताजी की 1989 में मृत्यु के बाद टूट गई थी, पर नौकरी कर घर चलाती रही, हम तीनों भाइयों को पढ़ाया, पाला पोसा, दोनों भाइयों की शादी की, तीनों पोतों के जन्म की साक्षी बनी और खूब हंसी - खुशी से भरा घर था, पर सब बिखरता गया, माँ के बाद छोटा भाई भी 2014 में गुजर गया, पर बच्चे बड़े हो रहे थे सो बहुत कमी नहीं खली - खाली घर की, अब सब पढ़ाई करके बाहर चले गए, व्यस्त हो गए है, समय की कमी सबके पास है, रिश्ते जो भी जैसे भी बचे है - माँ या पिता की ओर से - वे भी समय के साथ औपचारिक होते जा रहे है
सबको अपनी सलीब खुद ही ढोना पड़ती है, साल आते है - जाते है, पर स्मृति की गठरी जब खुलती है तो हम बहुत दूर बह जाते है बहाव में और काश कभी यह हो कि यह सब लिखना ही ना पड़े और हम बहाव के संग किसी ऐसी दुनिया में पहुंच जाए, किसी अभेद्य अपराजेय किले में जहां से कोई हमें लौटाकर ना ला सकें, उद्दाम वेग से बहते पानी में कोई झोंका हमें किसी कड़ी चट्टान से भिड़ा दें और हम बस वही ठहर कर रह जाए और सब खत्म हो जाएं
मै अब सिर्फ माँ - पिता और छोटे भाई के संग उस दुनिया में रहना चाहता हूँ - जहां स्मृतियां दंश की तरह ना चुभती हो और सिर्फ हंसी के ठहाके गूंजते हो, माँ ये तारीख गुजरती क्यों नहीं जल्दी से और the appointed day क्यों नहीं आता जीवन में ....
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इस देश की सबसे बड़ी समस्या यह हो गई है कि जब तक दस - बीस से लेकर सौ - दो सौ मौतें नहीं हो जाती, तब तक सरकारें कुछ नहीं करती - व्यापमं में छप्पन, मणिपुर में हजारों या अभी पेपर लीक में पच्चीस से ज्यादा या किसी टनल में या रेल दुर्घटना में या किसी और जगह - मौत अब इस देश का स्थाई भाव है और बेहद सस्ता विकल्प
स्वस्फूर्त भावना से यदि जन प्रतिनिधि, सरकार या मंत्रीगण कार्यवाही करें तो बहुत कुछ टाला जा सकता है, पर ना इस्तीफे की संस्कृति है - ना काम करने की प्रतिबद्धता, मतलब शर्मनाक यह है कि स्थानीय सुशासन या कुशासन की इकाइयों की लापरवाही से सैकड़ों बच्चे ट्यूबवेल के गड्ढों में गिरकर मर गए, सड़क दुर्घटनाओं में लाखों लोग मर गए, बिल्डिंग के गिरने से ठेकेदारों को भी फर्क नहीं पड़ता और लोग मरते रहते है, लापरवाही से सैनिक और रक्षा अधिकारी मर जाते है - क्या ही किया जाएं
शर्मनाक यह है कि कांग्रेस के या बाकी प्रधानों ने तो कभी इस सबको समस्या माना ही नहीं, पर इन नालायकों को जब जीताकर लाएं थे तो लगा था कि ये ठीक करेंगे, पर नोटबंदी से लेकर मणिपुर या पेपर लीक और पर्यावरण के नुकसान में ये सबसे आगे रहें है इतिहास में और मन की बात के बेशर्मी भरे 136 एपिसोड पेल दिए अगले ने
जब तक यह सरकार नहीं जाएगी तब तक आप सिर्फ Death toll पर नजर बनाए रखिए और गिनते रहिए कि अब किसकी बारी है
ये मत पूछिएगा कि इसके बदले विकल्प कौन है, वो ज्ञान अपने पास रखिए - जनता समझदार है - वह चुन लेगी, पर मोदी और भाजपा से घटिया कोई नहीं यह तय है, सवाल पूछने से पहले अपनी भावी पीढ़ी के बारे में सोच लीजियेगा और दिमाग से सोचिएगा, अपने कुपढ़ और अधकचरे ज्ञान या अंधभक्त बनकर नहीं
समझे
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अभिषेक दिपके ने बढ़िया काम किया, बस इस पर कड़ी नजर रखिए - यह प्रफुल्ल कुमार महंतो, लालू यादव, रामविलास पासवान या कन्हैया कुमार ना बन जाए - वरना सब गुड गोबर हो जाएगा
राजनीति महत्वकांक्षाएं बहुत जल्दी बढ़ा देती है और ऊंची कर देती है, मेरा गट फीलिंग कहता है यह बहुत जल्दी भाजपा में शामिल होगा
लिखकर कही रख लीजिए ताकि सनद रहें
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After the resignation of the corrupt minister Mr Dharmendra Pradhan our goal should be on the following agenda
Government schools, colleges, and hospitals are the foundation of an equitable and inclusive society. It is time to restore their dignity, strengthen their capacity, and make them more efficient, transparent, and accountable
Education and healthcare are fundamental public services—not privileges, Let us oppose the unchecked privatization of these essential sectors and advocate for a robust public system that serves every citizen with quality, equity, and compassion
Our goal should be to rebuild public trust, confidence, and pride in government schools, colleges, and hospitals, ensuring that every person has access to quality education and healthcare, regardless of their economic status
मोदी सरकार के भ्रष्ट मंत्री प्रधान के इस्तीफे के बाद अब सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों का गौरव वापस लौटाएँ, इन संस्थानों को अधिक सक्षम, जवाबदेह, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है
आइए, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों के अंधाधुंध निजीकरण का विरोध करें और मजबूत, विश्वसनीय तथा सुलभ सरकारी व्यवस्था के लिए आवाज़ उठाएँ
हमारा लक्ष्य ऐसा भारत होना चाहिए जहाँ हर नागरिक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निजी संस्थानों पर निर्भर न रहना पड़े, सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों में लोगों का विश्वास, सम्मान और गौरव पुनः स्थापित करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है
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आदिल, इंदिरा, प्रफुल्ल, विद्या, प्रभा, शबनम, दिनेश, शुभम, ज्योति, विनोद, रिंकी, प्रवीण, विमल, विष्णु, वसीम, विभु, कार्तिक, कमलेश, मनोज, सचिन, नितेश, निधि, राकेश, आँचल, दीपक, अंबिका, देवेंद्र, रीना गौतम, अमनदीप, आकाश, सुरजीत, शुभेंदु, सचिन, अविनाश दास, हितेश, अमन नम्र, मृत्युंजय, शर्मिला भगत, ऋतु मिश्र, रोहित रूसिया, विश्वम्भर त्रिपाठी जी से लेकर ढेरों मित्रों से यहां मुलाकात हुई जो यवतमाल, अजमेर, दिल्ली, भुवनेश्वर, कोलकाता, रायपुर, बिलासपुर, गंजाम, जयपुर, इंदौर, छिंदवाड़ा, भोपाल, महासमुंद, ग्वालियर, बालौदा बाजार, पटना, मुंगेर, देवघर, गुमला, रांची, पुणे, मुंबई आदि जगहों से आए है और इन्हीं सबसे लंबे समय से सच्ची दोस्ती का रिश्ता रहा है
किसी भी कार्यक्रम में जाओ तो सबसे मिलना तो होता ही है पर एक लंबे समय के लिए जीवन ऊर्जा भी मिल जाती है
Delhi 23/24 July, IHC, Vikas Samvad
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यात्राएं जीवन का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए ताकि हम सब वो सीख सकें जो हम किताबों, घर - परिवार या समाज से नहीं सीख सकते, व्यवहार ज्ञान और जीवन कौशल की असली पाठशाला यात्राएं ही होती है जिससे दक्षता आती है और हम लगातार परिपक्व होते जाते हैं
एक लंबे सफर की ओर - जयपुर, दिल्ली और फिर अंत में शिवपुरी, कोलकाता होते हुए वापसी रहेगी, ट्रेन, बस और पुष्पक विमान से यात्राएं इतनी आसान हो गई है कि कभी लगता है पहिये का आविष्कार न हुआ होता तो हम एक गुफा में ही क़ैद रह जाते
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