"अंधेरे से उजाले की तलाश : डॉ. सुनील चतुर्वेदी का उपन्यास ‘टनल’ "
हिंदी साहित्य में ऐसे रचनाकार कम हैं जो अपने व्यावसायिक अनुभवों को केवल जानकारी के स्तर पर नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन और सामाजिक यथार्थ के रूप में साहित्य में रूपांतरित कर सकें. डॉ. सुनील चतुर्वेदी ऐसे ही विरल लेखकों में हैं. भूविज्ञान जैसे तकनीकी विषय में सागर विश्वविद्यालय से पीएच.डी. प्राप्त करने वाले डॉ. चतुर्वेदी ने अपने पेशेगत अनुभवों को समाज और मनुष्य के गहरे अंतर्द्वंद्व से जोड़कर देखने की दृष्टि विकसित की है. व्यंग्य लेखन से अपनी साहित्यिक यात्रा आरंभ करने वाले इस लेखक ने समकालीन समाज, प्रशासन और व्यवस्था पर तीखी टिप्पणियाँ की हैं. उनके पूर्व प्रकाशित उपन्यास—‘महामाया’, ‘कालीचाट’, ‘लपका’ और ‘गाफिल’—पहले ही उन्हें हिंदी कथा-साहित्य में एक विशिष्ट पहचान दिला चुके हैं. वर्तमान में मध्यप्रदेश राज्य जल बोर्ड के सदस्य के रूप में जल संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में सक्रिय डॉ. चतुर्वेदी का नवीन उपन्यास ‘टनल’ उनके अनुभव, संवेदना और चिंतन का परिपक्व प्रतिफल है.
‘टनल’ केवल एक सुरंग की कहानी नहीं है. यह मनुष्य, समाज और व्यवस्था के भीतर निर्मित उन अंधेरी सुरंगों की कथा है जिनसे होकर गुजरना हमारी नियति बन चुका है. उपन्यास का शीर्षक ही अपने भीतर एक गहरा रूपक समेटे हुए है. सुरंग का अर्थ केवल पहाड़ को चीरकर बनाया गया रास्ता नहीं, बल्कि वह मानसिक, सामाजिक और नैतिक अंधेरा भी है जिसमें आधुनिक मनुष्य स्वयं को फंसा हुआ पाता है. इस दृष्टि से ‘टनल’ का कथानक बहुस्तरीय है और पाठक को अनेक स्तरों पर सोचने के लिए बाध्य करता है.
डॉ. चतुर्वेदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जिस दुनिया को लिखते हैं, उसे केवल बाहर से नहीं देखते, बल्कि उसके भीतर उतरते हैं. एक भूवैज्ञानिक होने के कारण धरती की भीतरी संरचनाओं से उनका परिचय है; शायद यही कारण है कि वे मनुष्य और समाज की भी भीतरी परतों को बड़ी सहजता से उद्घाटित करते हैं. ‘टनल’ में यह गुण पूरे प्रभाव के साथ उपस्थित है. उपन्यास में घटनाएँ जितनी महत्त्वपूर्ण हैं, उससे अधिक महत्त्वपूर्ण उन घटनाओं के पीछे छिपी मानसिक और सामाजिक प्रक्रियाएँ हैं.
उपन्यास का शिल्प अत्यंत रोचक है. लेखक पाठक को आरंभ से ही अपने साथ बाँध लेता है. कथानक में कहीं भी अनावश्यक विस्तार या कृत्रिम नाटकीयता नहीं दिखाई देती. भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और संप्रेषणीय है. डॉ. चतुर्वेदी की भाषा का एक विशिष्ट गुण यह है कि वह विद्वता का प्रदर्शन नहीं करती, बल्कि अनुभव का ताप लिए हुए चलती है. पाठक को कहीं भी यह महसूस नहीं होता कि वह किसी जटिल वैचारिक बहस में उलझ गया है; बल्कि विचार कथा के भीतर स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होते हैं.
‘टनल’ का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका सामाजिक सरोकार है. लेखक व्यवस्था के अंतर्विरोधों को पहचानता है और उन्हें बिना किसी लाग-लपेट के सामने रखता है. उपन्यास में सत्ता, नौकरशाही, विकास, संसाधनों के दोहन और आम आदमी की आकांक्षाओं के बीच चल रहे संघर्ष की झलक मिलती है. यह संघर्ष प्रत्यक्ष भी है और प्रतीकात्मक भी. लेखक किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह बात नहीं करता, बल्कि पात्रों और परिस्थितियों के माध्यम से पाठक को स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचने देता है.
डॉ. चतुर्वेदी के व्यंग्यकार व्यक्तित्व की छाप भी इस उपन्यास में दिखाई देती है. कई प्रसंगों में व्यवस्था की विसंगतियों पर उनकी दृष्टि तीखी और पैनी हो जाती है. किंतु यह व्यंग्य कटुता से नहीं, बल्कि एक सजग नागरिक की चिंता से उत्पन्न होता है. यही कारण है कि उपन्यास कहीं भी उपदेशात्मक नहीं बनता. लेखक की आलोचना के पीछे परिवर्तन की आकांक्षा दिखाई देती है.
उपन्यास के पात्र जीवंत और विश्वसनीय हैं. वे किसी विचारधारा के प्रतिनिधि मात्र नहीं हैं, बल्कि अपने गुण-दोषों के साथ वास्तविक मनुष्य हैं. उनके भीतर संघर्ष है, द्वंद्व है, महत्वाकांक्षाएँ हैं और कमजोरियाँ भी हैं. यही मानवीयता उन्हें पाठक के निकट ले आती है. लेखक पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने में सफल रहा है. विशेष रूप से वे क्षण उल्लेखनीय हैं जहाँ पात्र स्वयं से संवाद करते दिखाई देते हैं. इन प्रसंगों में लेखक की संवेदनशीलता और मनुष्य के अंतर्मन की समझ स्पष्ट रूप से सामने आती है.
‘टनल’ का एक और उल्लेखनीय पक्ष उसका प्रतीकात्मक आयाम है. पूरी कथा में सुरंग एक बहुआयामी प्रतीक के रूप में उपस्थित रहती है. कभी वह विकास की कीमत पर प्रकृति के क्षरण का संकेत देती है, कभी मनुष्य के भीतर बढ़ते अकेलेपन और असुरक्षा का, तो कभी उस आशा का जो अंधेरे के अंत में दिखाई देने वाले प्रकाश से जुड़ी होती है. यही प्रतीकात्मकता उपन्यास को साधारण यथार्थवाद से ऊपर उठाकर साहित्यिक ऊँचाई प्रदान करती है.
डॉ. चतुर्वेदी की जल, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी गहरी समझ भी उपन्यास में परोक्ष रूप से दिखाई देती है. वे उन लेखकों में नहीं हैं जो प्रकृति को केवल दृश्य-सौंदर्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं. उनके यहाँ प्रकृति जीवन और अस्तित्व का प्रश्न बनकर सामने आती है. संभवतः जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके वर्तमान कार्य और लंबे अनुभव ने इस संवेदना को और अधिक गहरा बनाया है. इसलिए ‘टनल’ पढ़ते हुए पाठक केवल मनुष्य की कहानी नहीं पढ़ता, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते पर भी विचार करने लगता है.
उपन्यास का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि वह समकालीन भारत की अनेक जटिलताओं को बिना शोर-शराबे के सामने रखता है. विकास और विनाश, प्रगति और विस्थापन, उम्मीद और निराशा, व्यवस्था और व्यक्ति—इन सभी द्वंद्वों की प्रतिध्वनि इसमें सुनाई देती है. लेखक किसी एक पक्ष का अंध-समर्थन नहीं करता. उसकी दृष्टि संतुलित है और इसी संतुलन के कारण उपन्यास विश्वसनीय बनता है.
यदि आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो कुछ स्थानों पर लेखक का वैचारिक आग्रह कथा पर थोड़ा अधिक प्रभाव डालता प्रतीत होता है. कुछ प्रसंगों में पाठक को यह महसूस हो सकता है कि लेखक अपने विचारों को अधिक स्पष्टता से व्यक्त करना चाहता है. किंतु यह कमी नहीं, बल्कि एक सजग और प्रतिबद्ध लेखक की बेचैनी का परिणाम है. कुल मिलाकर यह बात उपन्यास की प्रभावशीलता को कम नहीं करती.
‘टनल’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि उसे सोचने के लिए विवश करता है. पुस्तक समाप्त होने के बाद भी इसके प्रश्न पाठक के भीतर बने रहते हैं. यही किसी गंभीर साहित्यिक कृति की पहचान है. आज जब बाजारवाद और तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव में साहित्य का एक बड़ा हिस्सा सतही होता जा रहा है, तब ‘टनल’ जैसी कृतियाँ हिंदी उपन्यास की गंभीर परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करती हैं.
डॉ. सुनील चतुर्वेदी का यह उपन्यास उनकी पूर्ववर्ती कृतियों की परंपरा का स्वाभाविक विस्तार भी है और उससे आगे का विकास भी. ‘महामाया’, ‘कालीचाट’, ‘लपका’ और ‘गाफिल’ में जिस सामाजिक चेतना, व्यंग्यात्मक दृष्टि और मानवीय संवेदना के संकेत मिलते हैं, वे ‘टनल’ में अधिक परिपक्व और व्यापक रूप में सामने आते हैं. यह कहा जा सकता है कि ‘टनल’ उनके रचनात्मक जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
अंततः, ‘टनल’ एक ऐसी कृति है जो अंधेरे के बीच प्रकाश की तलाश का साहित्यिक दस्तावेज बन जाती है. यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि हर सुरंग का एक छोर अंधेरे में होता है, लेकिन दूसरा छोर प्रकाश की संभावना से जुड़ा रहता है. डॉ. सुनील चतुर्वेदी ने इस संभावना को अपनी संवेदनशील दृष्टि, अनुभवजन्य प्रामाणिकता और सशक्त कथाशिल्प के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है.
‘टनल’ को पढ़ते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि डॉ. सुनील चतुर्वेदी केवल कथाकार नहीं, बल्कि एक सजग चिंतक भी हैं. उनकी भाषा में सहजता, अनुभवजन्य प्रामाणिकता और वैचारिक स्पष्टता है. फिर भी एक पाठक और समीक्षक के रूप में यह अपेक्षा की जा सकती है कि भविष्य की कृतियों में वे भाषा के और अधिक बहुरंगी प्रयोगों की ओर अग्रसर हों. स्थानीय बोलियों, जनपदीय मुहावरों तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों की भाषिक अभिव्यक्तियों को यदि अधिक व्यापक रूप से स्थान मिले तो उनके पात्र और भी अधिक जीवंत तथा स्मरणीय बन सकते हैं.
संरचना की दृष्टि से ‘टनल’ एक सुसंगठित उपन्यास है, किंतु लेखक की वैचारिक क्षमता और अनुभव-संपन्नता को देखते हुए भविष्य में उनसे बहुस्तरीय तथा बहुध्रुवीय कथानकों की अपेक्षा की जा सकती है. विभिन्न समय-खंडों, समानांतर कथाओं अथवा अनेक दृष्टिकोणों के माध्यम से कथा को विकसित करने के प्रयोग उनके उपन्यासों को और अधिक समृद्ध बना सकते हैं. विशेष रूप से उनकी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि और सामाजिक अवलोकन की शक्ति ऐसे प्रयोगों को सफल बनाने की क्षमता रखती है.
विषय-वस्तु के स्तर पर डॉ. चतुर्वेदी ने समाज, प्रशासन, मानवीय संबंधों और व्यवस्था की जटिलताओं को लगातार अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया है. वर्तमान समय में जल, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव, ग्रामीण भारत का बदलता सामाजिक ताना-बाना तथा तकनीकी युग में मनुष्य का अकेलापन जैसे विषय साहित्य के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गए हैं. जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में उनके व्यापक अनुभव को देखते हुए यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे भविष्य में इन विषयों पर भी उपन्यासात्मक हस्तक्षेप करें. हिंदी साहित्य में ऐसे लेखकों की संख्या सीमित है जो वैज्ञानिक समझ और मानवीय संवेदना का संतुलित समन्वय कर सकें; डॉ. चतुर्वेदी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता रखते हैं.
एक अन्य उल्लेखनीय संभावना उनके व्यंग्यकार व्यक्तित्व से जुड़ी है. उनके भीतर का व्यंग्यकार समाज और व्यवस्था की विसंगतियों को तीक्ष्ण दृष्टि से पहचानता है. यदि यह व्यंग्यात्मक ऊर्जा भविष्य के उपन्यासों में और अधिक कलात्मक रूप से कथा-संरचना के साथ संयोजित हो, तो उनकी रचनाएँ सामाजिक आलोचना और साहित्यिक सौंदर्य—दोनों स्तरों पर नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कर सकती हैं.
‘टनल’ इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि यह लेखक की अब तक की रचनात्मक यात्रा का एक परिपक्व पड़ाव प्रतीत होता है. ‘महामाया’, ‘कालीचाट’, ‘लपका’ और ‘गाफिल’ से होकर विकसित हुई उनकी दृष्टि यहाँ अधिक संतुलित, व्यापक और चिंतनशील रूप में दिखाई देती है. इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि आने वाले वर्षों में वे ऐसे उपन्यासों की रचना करेंगे जो केवल सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज न होकर, बदलते भारत के वैचारिक और नैतिक प्रश्नों पर भी गंभीर विमर्श प्रस्तुत करें.
‘टनल’ समकालीन हिंदी उपन्यासों में एक उल्लेखनीय कृति है, जिसे केवल पढ़ा ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि उस पर गंभीर चर्चा भी होनी चाहिए. यह उपन्यास अपने समय, समाज और मनुष्य की जटिलताओं को समझने की दिशा में एक सार्थक साहित्यिक हस्तक्षेप है.
सारांशतः कहा जा सकता है कि ‘टनल’ केवल एक सफल उपन्यास नहीं, बल्कि एक ऐसे लेखक की रचनात्मक क्षमता का प्रमाण है जिसके पास अनुभव की गहराई, समाज की समझ, वैज्ञानिक दृष्टि और साहित्यिक संवेदना—चारों का दुर्लभ संगम मौजूद है. यह कृति पाठकों को प्रभावित करती है, सोचने पर विवश करती है और साथ ही लेखक की आगामी रचनाओं के प्रति उत्सुकता भी जगाती है. यही किसी महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि है.
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