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Khari Khari, Man Ko Chithti and other Posts from 11 to 19 July 2026

होने लगी जिस्म में जुंबिश तो देखिए
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बुझदिल, कायर और निकम्मी सरकार है मोदी सरकार
हाईकोर्ट दिल्ली ने तब स्वत संज्ञान नहीं लिया जब पेपर लीक में बीस से ज्यादा युवाओं ने आत्महत्या कर ली, आज इन जज साहेबान का जमीर जाग रहा और संविधान याद आ रहा है, अरे देश में लोग जब तुम्हारी माँ बहन कर पर्चे उछाल रहे है, जूते फेंक कर मार रहे है - तब जमीर नहीं जाग रहा आप लोगों का, किस मिट्टी के बने हो आप लोग
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा देने का आदेश सीजेआई नहीं दे सकते क्या और मोदी सरकार को इस पेपर लीक की जांच करने को नहीं कह सकते, नैतिकता तो बनती है , यह सही है कि न्यायपालिका विधायिका को आदेशित नहीं कर सकती, पर चापलूसी, गुलामी और सेटिंगबाजी भी तो मना है संविधान में
देशभर में मुल्ला, मौलाना या पंडित और मोदी सरकार के पाले हुए बागेश्वर से लेकर राम - रहीम तमाम कुकर्म करते है या बकवास करते है तब अदालतों का जमीर नहीं जागता, संविधान में लिखित - "वैज्ञानिक मानसिकता को प्रचारित और प्रसारित करने का कर्तव्य" याद नहीं आता, ऐसी न्यायपालिका जो सेटिंग और खौफ से चलती हो उस पर सिर्फ अफसोस ही किया जा सकता है, इसी समाज से न्यायाधीश बने ये लोग पता नहीं क्यों लोकतंत्र में राजा बन गए और अपने आपको तुर्रम ख़ाँ समझते है जबकि है तो सरकारी नौकर ही
मोदी सरकार महा निकम्मी, डरपोक और कायर है , कल से संसद का सत्र आरंभ होने वाला है और देशभर से बड़ी संख्या में लोग संसद की ओर कूच करने वाले थे तो बेशर्मों ने बगैर सूचना के
शर्म करो नरेंद्र मोदी, अमित शाह और दिल्ली की रेखा गुप्ता, तुम लोगों के पाप का घड़ा भर चुका है, और सीजेआई को भी याद रखना चाहिए कि इनके बोले हुए प्रवचन से जन्मा यह पूरा आंदोलन और प्रदर्शन अब नहीं रुकेगा
घोटालेबाज, षडयंत्रकारी, कारपोरेट की गुलाम, अक्षम, अयोग्य और बेहद घटिया सरकार के अंतिम दिन चल रहे है, यह पूरा आंदोलन जैसा भी था पर एक जान युवाओं, विपक्ष और तथाकथित बुद्धिजीवियों में भर दी है और सबको एक मंच पर संगठित किया है इसलिए यह एक अंगड़ाई है और देशभर में सोनम के साथ वो तीन युवा साथी भी बधाई के पात्र है , अभिजीत दिपके को भी सलाम है जिसने विदेश में रहकर मुद्दे को पकड़ा और यहां तक इस गाड़ी को खींचकर लाए, जबकि देश के ABVP, NSUI, AISA आदि जैसे छात्र संगठनों को डूबकर मरना चाहिए जो मंदिर मस्जिद, हिंदू मुस्लिम या इन दो कौड़ी के नेताओं के इशारों पर नाचते रहते है, उन युवाओं को सलाम जो देश के कोने कोने से वहां गए है और झंडा बुलंद कर रहे है , उन लोगों को सलाम जो सेवा कर रहें है जातीय बिरादरी का ध्यान रखे बगैर
याद आते है दुष्यंत जिन्होंने मोदी अमित शाह के लिए ही शायद लिखा था -
"तुम्हारे कदमों के नीचे ज़मी तक नहीं
और कमाल यह है कि तुम्हे यकीन भी नहीं"
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"कब जा रहे है बाहर आप" - वकील साहब
"रविवार को भुवनेश्वर और फिर दिल्ली होते हुए लौटूंगा 26 को" - मेरा जवाब
"आजकल भुवनेश्वर गुजरात में चला गया है ना, अच्छी जगह है हो आईए, वहां से सोमनाथ का मंदिर और कामख्या देवी का मंदिर भी पास ही है - देख आईये" - वकील साहब
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हमारे यहां भारत में एक रिवाज़ बड़ा जबरदस्त है - जो लोग जिस विषय के जानकार नहीं - वो उस विषय के ख्याति प्राप्त जानकार बन जाते है, मसलन जो जीवन भर पूंजी और अचल संपत्ति समेटने में लगे रहे और बेहद क्रूर व्यवहार, झगड़ालू रहे अपने घर में भी - वो गांधीवादी, जिसने समाज कार्य नहीं किया या पढ़ा कभी - वो सामाजिक कार्यकर्ता या एनजीओ के मालिक, जिसने मेडिकल साइंस नहीं पढ़ा - वो प्राईवेट अस्पतालों के मालिक, जिसने कभी संविधान की विधिवत पढ़ाई नहीं की - वो संविधानविद, हद यह है कि नाच गाना करके और हर जगह घुसकर आत्म मुग्धता से अपने थोबड़े को प्रदर्शित करते हुए रीलटे संविधान का मर्म समझा रहें है, अरे बैंड बाजे की दुकान खोल लेते यारा, क्यों कचरा कर रहे हो, जिसने कभी शिक्षा शास्त्र या बाल मनोविज्ञान नहीं पढ़ा - वो शिक्षाविद और टैक्स्ट बुक के लेखक, जिसने कभी प्रशिक्षण तकनीक या प्रशिक्षण नहीं किए किसी के - वो राष्ट्रीय स्तर का ट्रेनर, जिसने जिंदगी भर सुबह चार बजे उठकर बसों से अखबार के बंडल उतारकर हॉकर के रूप में शहर भर में साइकिल पर अखबार बाँटें - वो पत्रकार, जो अपनी जात बिरादरी के विधायक या सांसद को सेट करके कुछ भी ऊलजुलूल बकने लगे - वो चैनल का दल्ला - भले चेहरा गधे या सुअर के समान हो, जिसने कभी आंदोलन न किए हो - पर ज्ञान बांटने में सबसे अव्वल, जिसने कभी अपने घर एक पौधा ना लगाया हो - वो क्लाइमेट चेंज का फेलोशिपजीवी पत्रकार, जिसके नाम एक सेमी की जमीन नहीं इतनी बड़ी धरा पर वो कृषि का ज्ञाता, जिसको कही कोई काम ना मिला या विशुद्ध ठुल्ला हो - वह मेंटोर, जिसको हर जगह दुत्कार के सिवा कुछ ना मिला - वो ख्यात बुद्धिजीवी, जो सत्तर - पचहत्तर पार की उम्र में खजुआए कुत्ते की तरह हो गया हो - वह किशोरों और युवाओं की नीतियों का विशेषज्ञ, जिसके दांत श्मशान में और हाथ पांव लकवा ग्रस्त वो सफर का बादशाह हो रहा, मतलब विचित्र दुनिया है यह और सब चलता है, धकता है
वो गाना था ना - "सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है"
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वो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, उच्च शिक्षा और विदेश जाकर कौशल एवं दक्षता बढ़ाने की बात करेंगे, परिवार और समाज के लिए काम करने की बात करेंगे
पर तुम
तुम सिर्फ कांवड़ यात्रा पर अड़े रहना और निकल जाना घर से लोटा, मटका, बांस और भगवे कपड़े पहनकर और सड़क पर वो उधम मचाना कि साक्षात शिव हवाई जहाज से फूल बरसाएं और एकदम धुत्त होकर तुम दो माह बाद घर जाओ दो - तीन ऍफआईआर के साथ
और याद रहे मोहल्ले, गांव, कस्बों के छोटे - बड़े लौंडों को ले जाना मत भूलना अपने साथ और धिक्कार रहेगा तुम्हारी जवानी और विवि तक की फर्जी डिग्रियों पर - यदि तुमने पचास - साठ वाहन नहीं फूंके और चार - पांच सौ लोगों से झगड़ा नहीं किया तो
अरे धर्म रहेगा तो बाकी सब होता रहेगा
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कुटिल राजनीति और देश के सत्यानाशी
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शिवराज, वसुंधरा, रमणसिंह, जैसे खतरों को चिट से हटाकर बाद में खेला हो रहा है, अब चंदा चोरी के बहाने से योगी, फिर जमीन घोटालों में मोहन यादव, इथेनॉल के बहाने से संघ के उम्मीदवार नितिन गडकरी को बदनाम करके भाजपा अगले प्रधानमंत्री की दौड़ में अमित शाह को ही एकमेव उम्मीदवार रखना चाहती है
समझिए कैसे और क्यों
वैसे तो 2029 में भाजपा का आना असंभव है क्योंकि जनता इन धूर्त, कुटिल, देश बेचूं और महानालायकों को समझ चुकी है, मोदी जैसे अनपढ़ और विशुद्ध आत्ममुग्ध अयोग्य व्यक्ति ने तीन कार्यकाल में देश को बिल्कुल बर्बाद कर दिया है - शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी से लेकर एक भी ऐसा क्षेत्र हो - जहां इसमें कोई काम ढंग का किया हो तो बताइए, हिंदू मुस्लिम, नोटबंदी से लेकर मंदिर - मस्जिद विवादों से लेकर विदेशों तक सारी व्यवस्थाओं को चोटिल किया और नीतियों से लेकर क्रियान्वयन तक, यहां तक कि न्यायपालिका को भी ध्वस्त करके सड़क पर ला दिया, तभी जूते - चप्पल से लेकर माँ - बहन की गालियां ऑन कैमरे पर चल रही है सुप्रीम कोर्ट में और देश देख रहा है, एक सीजेआई की गलत टिप्पणी के कारण एक बड़ी पार्टी बन गई और युवा संगठित हो गए भले ही दस पर इन्होंने सीजेआई को भी आईना दिखा दिया
अंबानी, अदाणी से लेकर लारेंस विश्नोई जैसे गुंडे या माल्या से लेकर नीरव मोदी और तमाम भगौड़े लोगों को सरकारी सहायता से देश के बाहर भेजा और ताकतवर लोगों पर गुंडई से कब्जा कर उनकी आवाज़ें बंद की, लॉरेंस विश्नोई के गुण्डे आज किसी के भी गले पर बंदूक चलाकर भाग जाते है और कोई कुछ नहीं करता - क्यों, क्योंकि उसे सत्ता का पूर्ण संरक्षण प्राप्त है, आज सोनम हड़ताल पर है - पर इस सरकार को फर्क पड़ा, मणिपुर में हिंसा नहीं थम रही, नोटबंदी में इतने लोग मरे, CAA, SIR, से लेकर नागरिकता रजिस्टर में लोग मरे, व्यापमं से लेकर एक हजार दिन चलने वाले किसान आंदोलन में कितने लोग मरे - पर इन नालायकों को कोई फर्क नहीं पड़ा, सोचिए इतनी निर्लज्ज और बेशर्म सरकार किसी भी देश में कभी रही नहीं है, एक नैतिकता, शुचिता होती है - राजकाज चलाने की, वह भी बेच खाई इन लोगों ने
मोदी गत तेरह वर्षों से देश के बाहर भांड की तरह से नौटंकी कर घूम रहा है अजीब मूर्खतापूर्ण बातें करता है 2+6, 7+1 a2+b2 = ab2, आदि -आदि और एक महत्वपूर्ण पद की गरिमा गिराने का काम करता है और किसी को फर्क नहीं पड़ता, देश के भीतर करोड़ो - अरबों के घपले होते है, पुल टूट जाते है, सडके बह जाती है, चंदे चोरी हो जाते है और हत्या - दंगे आम बात हो जाती है, पर हममें से किसी को फर्क नहीं पड़ता
कारण क्या है कभी सोचा है, इन्हें इसलिए फर्क नहीं पड़ता कि इन्होंने पंद्रह - बीस वर्षों में यह प्रक्रिया सुनिश्चित कर ली है कि ईवीएम में वोट कैसे आयेगा, वरना क्या बात है कि पंजाब और उत्तर प्रदेश में अब चुनाव होने वाले है और ये चंदा चोर चंपत राय या सोनम की भूख हड़ताल, या प्रधान के इस्तीफे या मणिपुर पर कुछ कार्यवाही नहीं कर रहे है, इन्हें मालूम है कि मशीन में वोट भाजपा को ही जायेगा - चाहे कुछ भी हो जाए
इस सबके पीछे अमित शाह की कुटिल बुद्धि है जो सबको एक - एक कर ठिकाने लगा रही है, वरना क्या बात है कि नितिन गडकरी का बेटा तो प्रोडक्ट बना रहा है, पर सवाल हरदीप पुरी के बजाय गडकरी से पूछे जा रहें है, क्योंकि वे संघ, मोहन भागवत की छबि को धूमिल करके जनता को दिखाना चाहते है कि देखो यह गडकरी प्रधान बनने लायक नहीं है, गडकरी के फायदे नुकसान को अलग छोड़ दीजिए अभी, राजनेता के लिए छबि ज्यादा जरूरी है - बजाय रूपए के
सबको ठिकाने लगाकर अमित शाह खुद प्रधान बनने के मूड में है - ऐसा लगता है, मोदी जैसे कम अक्ल को अब जनता नहीं सहेगी - यह सबको समझ आ गया है और यह भी तय है कि आप कुछ भी कर लो - वोट मशीन में भाजपा को ही जायेगा, सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई की जो साख या जनता में न्याय के प्रति जो इज्जत थी - वह तो कचरा हो ही है, अब बस इंतजार है तो एक बड़े नाटक का और मेरे मन में एक शंका और है - जिसके बारे में जल्दी ही लिखूंगा - शायद एकाध माह में वह घटित हो जाए तो इस पोस्ट की सनद रहें सबको याद में
बाकी कांग्रेस, और अन्य दल तो उनके बारे में फिर कभी, पर कांग्रेस ने एकदम मूर्ख लोगों को आईटी सेल का इंचार्ज बनाकर जो गलतियां ये कर रहे है वह भुगतना पड़ेगा, पढ़े - लिखें डाक्टर, वकील या बुद्धिजीवी - इतने गंवार और अक्ल से टटपूंजीये होंगे - सोचा नहीं था
सम्हलकर रहिए और इस अनपढ़ मोदी पर निगाह रखिए, इसकी हरकतें और बढ़ेंगी अभी और फिर आप तय करिए कि आप किस तरफ है, हिंदू - मुस्लिम करना है तो आप से बड़ा जाहिल और गंवार भी कोई नहीं, हिंदू राष्ट्र में आपकी वजह से ऐसे लोग आ गये है सत्ता में जो सिवाय कुटिलता के और कुछ नहीं करते
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सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर है, हिंदी के कितने साहित्यकारों को सोनम के बारे में या उसकी हड़ताल के बारे में जानकारी है, या कितनों का सरोकार है इस पूरे आंदोलन से, हिंदी के सभी मूर्ख अपनी आत्मप्रशंसा और किताबों के प्रमोशन, कविताओं और कहानियों से लेकर पुरस्कार बटोरने में लगे है दो - चार घड़ियाली आंसू बहाकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर रहे है - जिनकी ना आंदोलन को लेकर समझ है और ना कोई निष्ठा है, इनका इतिहास उठाकर देख लें सिवाय भोग विलास और अपने प्रचार, अपने कुत्ते - बिल्ली के प्रचार और परिवार को लेकर बकवास करने के अलावा क्या किया इन्होंने
"साहित्य समाज का दर्पण है" - जैसी घटिया परिभाषा सीखकर आए और लगातार यही पढ़ने और पढ़ाने वाले इन मूर्खों से जरा पूछे कोई कि क्या आप ने कभी नर्मदा, चुटका, चिपको या किसी और आंदोलन को देखा परखा या हिस्सेदारी भी की है, सिवाय अपने इलिट गुणों और फर्जी आयोजनों में जाकर बकवास करने के क्या किया जीवन भर, हिंदी के उजबक और अखंड मूर्ख प्राध्यापकों से पूछे कि किसी भी विभाग ने इस तरह के आंदोलनों पर शोध करवाया या किया कि इन आंदोलन से लोक, लोककथाएं, लोकगीत, या जनमानस की समझ बनाने में क्या मदद मिलती है, प्रतिपक्ष क्या होता है, जनश्रुति क्या और कैसे बनती है - जवाब होगा नहीं, क्योंकि इन नालायकों को प्रेमचंद, कुंवर नारायण से लेकर मुक्तिबोध विरासत में मिल जाता है और ये कमबख्त एसी रूम में बैठकर छात्रों को प्रताड़ित करते रहते है
यह सब बेहद पीड़ादाई है - इसलिए हिंदी से विरक्त हो गया हूँ और हिंदी के लोगों को जितनी गाली दी जा सकती है - देना चाहिए क्योंकि ये "सौ मारो और एक भी मत गिनो" - लायक ही बचे है, सारे प्रकाशन गृहों के हरामखोर मालिकों और मालकिनों को देख ले - उनके प्रकाशन से कोई किताब है क्या - जो भारत में ग्रामीण विस्थापन, या लोगों के पुनर्वास की पीड़ा को व्यक्त करती हो, डूब या दो - चार उपन्यास अपवाद हो सकते है, पर बड़े फ़लक पर सिवाय मूर्खता के और है क्या, पत्रिकाओं के संपादकों को विभाग में अपने लौंडो या विज्ञापन सेट करके रूपया कमाने के अलावा कुछ और आता है क्या, इन सबका बहिष्कार करो और जो ज्यादा बोले या पाखण्ड करें सहानुभूति देकर - उसको सड़क पर खींचकर दो - चार जूते लगाओ और दौड़ाओ - तभी ये साहित्य समाज का असली दर्पण चरितार्थ होगा क्योंकि यही हो रहा है चौतरफा
मतलब हालत ये है इन मानसिक रोगियों की कि श्रीराम मंदिर चोरी से लेकर आंदोलन या किसी ज्वलंत मुद्दे पर ना सोचते है - ना बोलते है, शातिर अपनी नौकरी बचा रहे है और पुरस्कार बटोरते हुए देशभर के आयोजनों में या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बकवास कर रहे है और निहायत बेशर्मों की तरह से अपना ही प्रचार खुद कर रहे है
डूब मरो कमबख्तों - यही तुम्हारा हश्र होना चाहिए, भाड़ में जाओ
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बहुत कुछ उथल पुथल मन में मची रहती है, अक्सर हम बहुत कुछ बोलना चाहते है - अपने आप से, परिजनों से, मित्रों से, समाज से, एक बड़ी वृहद दुनिया से और उस सबसे जिसे प्रकृति कहते है पर बोल नहीं पाते सारे शब्द भीतर घुटते रह जाते हैं, मन में दबे रह जाते है - लिहाज़ से, शर्म से, डर या खौफ से, संकोच या अतिरेक से हम बहुधा चुप रह जाते है और फिर वो शब्द और बातें या विचार घुमड़ते रहते हैं व्योम में कही, और कभी - कभी अनायास उन सबकी मृत्यु हो जाती है, वे अबोले और अभिव्यक्त न हो सकें शब्द, बातें या विचार हमें ताउम्र दुख देते है
इससे पहले कि हम चुप हो जाए सदा के लिए एक बार हिम्मत करके, बगैर लिहाज़ या संकोच के बोल दें - ताकि मन में दबे रहने के बजाय वे पृथ्वी के कही किसी कोने में उग सकें और बरगद बन सकें, शब्दों का खत्म हो जाना संसार का खत्म हो जाना है, लिखकर भले ना सही पर बोलकर इस भरे पूरे व्योम में शब्दों को टांग भर दें - मेरा यकीन है कि शब्द लम्बा सफ़र करते हुए अपनी मंज़िल पा लेंगे
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जैसे भीमटे है वैसे ही "रीलटे" यानी रील बनाने वाले
गजब की भाषा और भाषा की उन्नति, पर कुल मिलाकर रीलटियों के लिए बहुत ही बढ़िया शब्द है
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अवसरवादी होना और इसे हर परिस्थिति में निभा ले जाना - एक बहुत ही महत्वपूर्ण गुण है, बल्कि व्यवसायिक स्तर पर तो यह एक मूल्य है - जिसे नए लिखे जाने वाले संविधान में अति आवश्यक मूल अधिकार में शामिल किया जाना चाहिए - क्योंकि इसके बिना अब काम नहीं चल सकता, यह सब करके, सीखकर ही आप मठाधीश बन सकते हैं और अपने कागज़ी गढ़ में उन सबको शामिल कर सकते है या शामिल हो सकते है - जो अमूमन अजेय दुर्ग रहते है संसार की टुच्ची लड़ाइयों में और भौतिक सुखों के हितार्थ लड़ी जाने वाली मूक लड़ाईयों में
आपकी योग्यता, दक्षता, कौशल और संप्रेषणीयता के कोई मायने नहीं - यदि आपमें अवसरवादी होने का गुण विकसित नहीं हुआ तो, मैं इसे बहुत सकारात्मक स्वरूप में देखता हूँ, खासकरके पिछले चालीस वर्षों में अपने जैसे छोटे कस्बों, गांवों, शहरों और अल्प संख्यक, दलित और वंचित समुदाय के लोगों एवं स्त्रियों को इस सीढ़ी पर चढ़कर यश और कीर्ति के शिखरों पर गुंबद लहराते हुए लोगों को देखा है - जो निहायत ही लिजलिजे, चतुर, कुटिल और भद्दे हो जाते है - मनसा, वाचा और कर्म से
अब इस पड़ाव पर लगता है कि अपन भले निकले, कीचड़ में रहकर कभी विष्ठा नहीं खाई - किसी तरक्की के लिए और ना चापलूसी का हुनर सीखा - जो काम किया अपनी शर्तों और डंके की चोट पर किया, काम नहीं जमा तो निकल गए, पर किसी की लल्लो - चप्पो करके जी हुजूरी का गुण नहीं सीखा, इसलिए अब हर जगह नजर आने वालों की भीड़ से बहुत परे हूँ और अपने बनाए निविड़ के एकांत में सुखी हूँ
अफसोस उन साथियों के लिए होता है - जो हर जगह, हर समय, हर शर्त और हर बात के लिए सहज सुलभ उपलब्ध है और उन्हें इतना भी भान नहीं है कि एक दिन वे जब यह सब आत्मसात करेंगे, उनके उपयोग किए जाने की कथा - व्यथा समझेंगे तो बहुत देर हो चुकी होगी और वे दूध से निकली मक्खी की तरह से तड़फते हुए मौत का इंतजार करेंगे पर मौत भी नहीं आएगी
अवसरवादी होने से बेहतर है तटस्थ हो जाना, एकल हो जाना, अपनी सीमायें पहचानकर सबके बीच उपेक्षित रह जाना और सबसे कटकर अपने निर्जन में अपने शेष बचे दिनों को गुजरते हुए देखना
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नरोत्तम, कैलाश, नरेंद्र युग की मप्र में समाप्ति
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नरोत्तम मिश्रा प्रकरण यह दर्शाता है कि एक दिन भाजपा के लोग आपस में ही लड़ भिड़कर अपना सर्वनाश कर लेंगे और यह पार्टी खत्म हो जाएगी, इंतजार कीजिए
धर्म, यज्ञ, अनुष्ठान, मंदिर, कालीचरण जैसे बलात्कारी साधुओं के साथ मिलकर करोड़ों रूपये खर्च करके दतिया में जो ढांचे मिश्रा जी ने खड़े किए गए - उन्होंने भी कोई मदद नहीं की,याद रखिए मंदिर - मस्जिद और धर्म अलग है और राजनीति अलग,भाजपा का आलाकमान यह अच्छे से समझता है
असल में खतरा भाजपा को कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, नरेन्द्र तोमर जैसे लोगों से है - जो येन केन प्रकार से मप्र की सत्ता हासिल कर शीर्ष पर बैठना चाहते है, अठारह वर्ष शिवराज सिंह चौहान ने किसी को आगे नहीं आने दिया - उमा भारती, बाबूलाल गौर, राघव जी, लक्ष्मीकांत शर्मा, नरोत्तम मिश्रा, नरेंद्र तोमर, कैलाश गौड, स्व लक्ष्मण गौड से लेकर कितने ही लोगों ने कोशिश कर ली कि वे मप्र के सिरमौर बने पर कुटिलता में माहिर शिवराज ने व्यापमं जैसा कांड करने के बाद और अवैध खनिज से लेकर नर्मदा से रेत खनन, नर्मदा किनारे फर्जी वृक्षारोपण और लगातार कई वर्षों तक इन्वेस्टर्स मीट जैसे बड़े घोटालों के बाद भी अपनी सीट सुरक्षित रखी और अंत में मलाई खाने दिल्ली चले गए पर इनमें से किसी को कुछ नहीं मिला
इस समय सत्तर पार ये तीन - चार लोग कुर्सी पर बैठने को तरस रहे है - क्योंकि मोहन यादव इनके सामने एकदम जूनियर है और ये बिल्कुल सहन नहीं कर पा रहें है कि प्रदेश के विकास से लेकर सिंहस्थ 28 की मलाई वे अकेले खायें - इसलिए सारे कौरव एकसाथ इकठ्ठे हो गए है इस उज्जैनी कान्हा के सामने - "अभी नहीं तो कभी नहीं" की तर्ज पर लड़ाई जारी है
हालांकि इससे दतिया ही नहीं प्रदेश की, खासकरके चम्बल और बुंदेलखंड की ब्राह्मण लॉबी नाराज है, पर अब समय आ गया है कि इन सत्तर पार लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जाए, दतिया मैं कई बार गया हूँ और वहां के लोग अपेक्षाकृत सीधे है और नरोत्तम के खौफ़, भय और बदले की भावना के शिकार है, ये जो भीड़ टिकिट मांगने का स्वांग कर रही है - वो बाहरी है, इनमें स्थानीय मुश्किल से दस - बीस प्रतिशत होंगे, अमित शाह और भाजपा के इस निर्णय से मैं ही नहीं, प्रदेश के समझदार लोग सहमत है कि नरोत्तम को टिकिट नहीं मिलना चाहिए
इस फैसले से अब घबराहट उन विधायकों और सांसदों में है - जो हर सीट को अपनी बपौती समझकर गत तीस - चालीस वर्षों से निठल्ले हो गए है और सामंतवाद, गुंडागर्दी और तानाशाही करके अपने - अपने क्षेत्रों में कुछ नहीं करके सिर्फ और सिर्फ रूपया कमा रहे है और तमाम अवैध काम कर रहे है - फिर वो बीफ निर्यात का हो या जमीन खरीदने का या शराब सप्लाई करने का, अब समय आ गया हैं कि देवास से लेकर उन तमाम जगहों के विधायक और सांसद बदले जाएं जो बेकाबू और निकम्मे हो गए है, यदि भाजपा यह कर पाई तो ही मप्र में अगली सरकार बनने की संभावना है - अन्यथा ये लोग आपस में लड़कर मर जायेंगे
माँ पीताम्बरा सबका भला करें और नरोत्तम मिश्रा को सदबुद्धि दें

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