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मनोरोगी 30 Nov 2019

मनोरोगी 


सम्भवतः विक्षप्त ही रहा होगा जो मिलने आया था , उसने आते ही डिमांड की थी कि 100 पाईपर्स व्हिस्की चाहिये , एक मार्लबोरो का पैकेट पर इस जंगल मे मुश्किल था यह ब्रांड शराब अलबत्ता मैं लेकर ही गया था, टीम में कभी जरूरत पड़ ही जाती है 

नई कार में आया था, पार्क करके जंगल के उस गेस्ट हाउस में आते ही पीना शुरू कर दी उसने जो सुबह तक पीता रहा,  डेढ़ बजे रात उसका लाइटर खराब हो गया था सो माचिस की मांग की - हम मित्रों में से कोई पीता नही सो सवाल ही नही उठता था , हम लोग काफी खुले थे और उसे परख रहे थे 

उसे असल में एक नए प्रोजेक्ट में बड़ी जिम्मेदारी देने के लिए बुलाया था, सुबह से आने वाला था जो रात दस बजे पहुँचा यहां और फिर अजीब डिमांड्स , खाना भी हम लोग खाते रहे थे, पूरी टीम उसे निहार ही रही थी - 24 वर्ष का युवा था और अंग्रेजी, हिंदी , फ्रेंच पर कमांड था 

अचानक रोने लगा किसी प्रेमिका के साथ हुआ ब्रेक अप बताने लगा फिर जयन्थि नामक लड़की को मलयालम एवं अंग्रेज़ी में खूब गालियां दी और दो पेग गटागट पी गया - रोते हुए कहने लगा "मेरे पिताजी साले 75 के हो गए है , माँ भी 70 की है - दोनो रिटायर्ड है और मैं साला भंगी हूँ, मेहतर, सफाई वाला "

डॉक्टर किशोर को समझ नही आया जो यह प्रोजेक्ट हैंडल करने वाला था , उससे पूछा कि ये क्या तुम तो नम्बूदरी ब्राह्मण परिवार से हो- वो बोला - नही जनाब, मेरे इन माँ बाप ने रिटायर्डमेन्ट के बाद गोद लिया जब मुझे कोई फेंक गया था उस शहर में , मैं बड़ा हुआ और एक दिन खोजते हुए उस शहर में पहुंच गया था और सब पता किया - मेरे माँ बाप निचली जाति के थे और वह मैं बर्दाश्त नही कर पा रहा हूँ ...

रोते हुए उसने कहा और यह भी कि यह कार मैंने कल ली है इन दोनों माँ बाप के लिए , लोन है ईएमआई है सोलह हजार महीने की इसलिए नौकरी मांगने आया हूँ - एक एहसान इनका है , वह उतार दूं फिर अपनी दुनिया में लौट जाऊंगा मेरे लोगों के पास 

ज़्यादा ही बहक गया था वह, खाने का एक ही टेबल था उस कमरे में - वही खाना रखा था और वही शराब जो खत्म हो गई थी, टीम के चार - पांच लोगों ने कम उसने बेतकल्लुफी से पी थी, बाद में  हमसे और शराब मांगने लगा था - पक गए थे हम उसकी बड़बड़ सुनकर,  फिर हमने मुश्किल से उसे उसकी कार में बैठाया और रवाना किया पर वह जाते हुए बहुत सवाल छोड़ गया था, पता नही, केरल के घने जंगलों को पारकर और  नब्बे किलोमीटर गाड़ी चलाकर वह घर पहुँचा या नही पर वह जहाँ पहुंच गया था उससे हम सब चिंतित थे - समाज, देश, शिक्षा,भविष्य, युवा और तमाम ऐसे मुद्दे थे जो हवा में तैर रहे थे 

आज ज़ेहन में ना जाने क्यों चार बरस पुरानी उसकी कहानी याद आ गई - सोचता हूँ जीवन कितनी विविधताओं से भरा पड़ा है और एक छोटी सी उम्र में हम कितना सहते है, देखते और भुगतते है पर कब, कहाँ , कौन दर्ज कर पाता है यह सब 

जीवन मरने का नही पत्थरों में लम्बी लकीर खींचकर कहानी लिखने का नाम हैै शायद

[ तटस्थ ]

【 सत्य घटना है 2015 की 】

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