Monday, December 8, 2014

‪#‎आलोचकीयज्ञान‬


(12/4/15)
फिर आलोचक ने एक लम्बी डकार ली और कहा कि एनजीओ कल्चर ने देश का सत्यानाश किया है और जिस तरह से तलुए चाटकर ये देश में संपत्ति के पूरक बन गए है वह आने वाले समय के लिए, साहित्य के लिए घातक है. देश में अम्बानी - अडानी और गाँव की तस्वीर देखते हुए मुझे लगता है कि हमें आने वाले समय के लिए कुछ ठोस करना होगा, यदि मेरी किताबें बड़ी तादाद में छपे और यहाँ की माटी में रचे बसे और प्रेम में पगे किस्से कोई छापे तो एक खूबसूरत पुस्तकालय बनाया जा सकता है  ऐसे सदप्रयास ही जमीन बचायेंगे क्योकि देश में अराजक माहौल होता जा रहा है और इस समय देश को मेरे जैसे लोगों की नितांत आवश्यकता है. देखो चहूंओर मेरे ही यशगान से देश अटा पडा है, पत्रिकाएं प्रशस्ति गा रही है, रुदालियाँ विरह गीतों में मेरे किस्से सुनाते हुए ऐसी विहल हो जाती है कि जन समुदाय मृतक के बजाय मेरे किस्से में डूब जाता है और फिर क्रान्ति के कदमों से श्मशान के बाहर निकलता है उसमे कोई वैराग्य भाव नहीं वरन एक बदलाव की आशा और तमन्ना होती है,  दूरदर्शन और रेडियो मेरे ही गुणगान में व्यस्त है, तमाम एंकर मेरे साहित्य को आधार बनाकर परिवार पाल रहे है, स्कूल, कॉलेज और विश्व विद्यालय यानि देश से लेकर विदेश तक मेरे बनाए तिलिस्मों से भरे पड़े है और विदेशी छात्रों और छात्राओं के आने वाले फोन यह बताते है कि मेरी किस्सा गोई का अंदाज निराला और जुदा है. कहते कहते आलोचक ने धीमे से आँखें बंद की और फिर एक उदघोषणा  की और कहा कि वो जो जमीन पडी है उसर में गाँव के भीतर और कमबख्त एक आदमी उस पर कब्जा जमाये बैठा है और फसलें उगा हड़प जाता है हर साल, क्योंना उस जमीन पर एक प्रकल्प आरम्भ किया जाये - एक संस्था खडी की जाए उसे संपूर्णतः आधुनिक बनाकर वहाँ साहित्य का काम आरम्भ किया जाए, यह आवश्यक ही नहीं बल्कि समय की पुरजोर मांग है, उस अवनी को इतना भव्य बना दो कि वहाँ तमाम तरह की विलासिता की चीजें हो और देश में इसका नाम हो,  मेरे नाम के साथ, सब लोग देश विदेश से आये जाए और वहाँ रौनक हो, हंसी हो खुशी हो और किताबें बिकें, भाषा का सृजन हो, और धन की बरसात हो - ताकि वहाँ कुबेर स्थाई निवास कर सके और फिर लक्ष्मी चंचला के बहाने सरस्वती का स्थाई वास हो. आलोचक ने फिर यकायक अपनी पटरी पर गाडी रखी और बोला कि एनजीओ कल्चर ने जो  संपत्तियां बनाई है और इसमे काम करने वाले भ्रष्ट लोगों की फौज देश में खडी की है, उसने धन्ना सेठ संस्कृति को बढ़ावा दिया है. आलोचक ने एक दिव्य दृष्टि डाली सब पर फिर कहा कि उस जमीन पर भव्य भवन बनाने को चन्दा इकठ्ठा करो और फिर वह हाजत करने निकल गया.


(27/1/2015)

आलोचक ने एक उंघती दोपहरी में जमा दो चार लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि लेखक संघों के झगड़े अनंतिम से है और इन पर बात करने के पहले इनकी प्रवृत्ति समझना बेहद जरुरी है, जो लोग भी झंडा उठाकर लेखक बन जाते है या संघों का निर्माण करते है, वे वास्तव में लेखक नहीं किसी के काँधे खोज रहे होते है, जो सिर्फ चरवाहे का काम करके लोगों का हुजूम इकठ्ठा कर लें और गाहे-बगाहे हमारे सामने पेश कर दें,क्योकि हम अपनी लेखकीय क्षुधा तभी तो शांत कर पायेंगे जब हमारी भड़ास को एक जन मानस सुनेगा, गुन्थेगा, या फिर हमारे लिए ताली बजाएगा. ये सारे संघर्ष, ये सारे मोर्चे और सारे झंडे किसी विचार धारा मसलन सीटू, मीतू , माकपा, भाकपा, या माले, भाले के लिए नहीं वरन उसकी किताब मेरी किताब से ज्यादा कैसे बिके, या उससे ज्यादा मेरी भड़ास दीगर शहरों में कौन ज्यादा सुने या अन्य शहरों में मेरे सत्संग कैसे ज्यादा हो, इस पर है. यह सुनकर एक बुजुर्ग से होते सज्जन ने पुरी दुर्जनता से पूछा कि एक मोहल्ले में चार संघ या एक कस्बे में दस संघ या एक शहर में पचास संघ का क्या अर्थ है, तो आलोचक तनिक रुका - खैनी खाई , पीक थूका और बोला कि यदि बहुत ई दिक्कत है तो एक ठो ससुरा फेडरेसन काहे ना बनवा कर एनजीओ इस्टाईल में पंजीकृत करवा दें ताकि कही से ग्रांट मिल जाये, उ कलवा, और ई रामदीन का भाणेज राजधानी में काहे यूनिसेफ में घिस रहा है और काहे वो रशीद्वा की छोरी महिला पंचायत के साथ लुगाईयों की टोली में एनजीओ-एनजीओ खेलत है , फेडरेसन बनेगा तो ससुर ग्रांट आयेगी और फिर मस्ती से यही छानेंगे और यही धुनी रमाकर बैठेंगे, माँ सुरसती की आराधना करेंगे, जाओ, हर मोहल्ले में संघ बनाओ और सुरुआत करो अपने बंटी, पप्पू, कलावती और उ बहुत पटर पटर करत रही ना, का नाम उको- हाँ वो शर्मीली - इन सबको घेर-घारकर एक ठो संघ बनाओ फिर दूसरों और फिर तीसरो बनाओ, क्या है कि सरकारी नौकरी होने से रही अब हमसे,  इन लोगों को ज्ञान की दडिया और जडिया पिलाए तो कुछ अपना बुढापा सुधरे, मोहल्ले के तीन लोग उब गए थे, खड़े हुए अनमने से और फिर उन्होंने पुट्ठे झाड़े, काले कलूटे पायजामे का नाड़ा बांधा और मुंह में उंगली घुमाकर फिर आलोचक को एक प्रश्न दागा कि चन्दा कहाँ से आयेगा, तो आलोचक ने बोला यही दिक्कत है कि तुम लोग रुपया पैसा में बर्बाद हो गए हो, नाम की और यश की नहीं सोचते, सब हो जाएगा, बस संघ बनाओ, मै हूँ ना सब पर कहानी लिखूंगा, साली ऐसी चीज होगी कि दुनिया देखती रह जायेगी. मुझे एक - दो नहीं, मोहल्ला वार और घरवार संघ चाहिए, यदि पति - पत्नी हो तो वे दोनों भी प्यार-मुहब्बत के अलावा दो संघों के पदाधिकारी होना चाहिए. चलो अब खिसको और भागो संघ बनाओ........आलोचक ने खैनी थूकी और फिर एक भांग का लोटा हाथ में लेकर गटागट पी गया. 


(16/01/15)

कहानी, कविता और उपन्यास से लगभग ख़त्म हो चुके और साहित्य से हकाले गए आलोचक ने अपने आप को इधर झोंक दिया और फिर उसे लगा कि अब संसार में कुछ नहीं बाकी है तो उसे लगा कि फिल्म ही वह माध्यम है जो उसे फिर से एक बार धन्ना सेठ बनाने के रास्ते में आने वाली सभी अड़चनों से दूर कर सकता है. बस एक मोटे बनिए टाईप आदमी को पकड़कर आलोचक ने अपनी सारी घटिया कहानियां उसे पेल दी परन्तु वह टस से मस नहीं हुआ, इस तरह शहर के सभी बनियों, जायसवालों और ओसवालों, अग्रवालों और साहूओ के भरोसे भी एक बार में शहर के  सभी बियर बार में बैठ आया, परन्तु मामला जमा नहीं कही, फिर लगा कि उसमे ही दिक्कत है, सो, अबकी बार उसने फिर एक बड़े से होटल में बैठकर फिर छः से आठ लाख का दांव फेंका कि काश लग जाए और फिर सर्वहारा, किसान, महिला, दलित और शोषकों के पांसे फेंककर उसने इस मोटे मुर्गे को साधने की कोशिश की, पुरजोर ताकत लगाकर - पर दांव फिर एक बार फेल हो गया, सुट्टा मारते हुए जब वह अपने घुंघराले बालों में मुर्गे को कांच के गिलास में ढले जाम के पार से झाँक रहा था तो उसकी निगाहें किसी कातिल की तरह से उस मुर्गे को चबाकर पुरी तरह से चांप जाना चाहती थी, क्योकि आख़िरी उम्मीद पर बैठा यह मुर्गा यदि हाथ से फिसल गया तो उसका बना - बनाया तिलिस्म भरभराकर गिर जाएगा और जो छर्रे उसने इन दिनों पाल रखे थे उनके सामने उसकी थू थू हो जायेगी या जिन वजीरों और बादशाहों को गलियाते हुए अपने अपराध बोध में वह जी रहा था या जिन धन्ना सेठों, जागीरदारों, मास्टरों और मीडिया की लोंडीयों के साथ नई - नई गाड़ियों में सर्वहारा की दुहाई देते हुए दारु के पैग खींचता रहा था या एक अदद मकान की जुगाड़ में फूटपाथ से वह राजमहल में पहुँचना चाहता था, शोहरत और दौलत के इस मुर्गे को पटाये बिना संभव नहीं था और आखिर हार कर उसने अपना अंतिम पत्ता बड़े धैर्य से फेंटा और कहा कि यदि आप कहें तो मै अपनी विचारधारा और सारे लिखे को एक सिरे से निरस्त करने को तैयार हूँ, यह उसके साहित्यीक जीवन का समाहार था और वह लगभग हताश हो चुका था, और इसके अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था, अकादमिक रूप से दरिद्र और विचारों से खाली चुका हुआ आदमी और क्या करता ? बस यही सुनना था कि मोटे मुर्गे ने कहा कि अपना लिखा मेरे नाम कर दो ....एक बार आलोचक ने सोचा और फिर कहा कि मेरे कंप्यूटर की हार्ड डिस्क आपको दे देता हूँ और फिर वह लगभग चरण वन्दना की मुद्रा में आया और झोले से डिस्क निकालकर दे दी और एक फिल्म के मीठे सपनों में चार पैग में चढी मुफ्त की दारु, जो अक्सर उसे यूँही मिल जाया करती थी, को गटक कर अपने खोली में चलता बना, आज आलोचक फुल टू मस्ती में था और साहित्य की माँ भैन करते हुए सोच रहा था कि अब दोस्तों को क्या कहे कि कहानी , कविता और उपन्यास कहाँ गए....?


(16/01/15)


हिन्दी का यह दुर्भाग्य है कि इसमे वह तहजीब नहीं है जो उर्दू या फ्रेंच में होती है, कितने भाषाओं के शब्दों को लेकर नाजायज बनी यह जाहिलों, गंवारों की भाषा कुछ शिक्षाविदों, राजनैतिक रूप से कमजोर लोगों की महत्वकांक्षा और ऊँचे एम्बीशन की शिकार हो गयी, हिन्दी में लेखन की परंपरा में जो भी विश्व विद्यालयों में लिखाया पढ़ाया जा रहा है वह कालातीत हो गया है, वीर गाथाकाल से लेकर आज तक बंटे हुए समय में और दोहा सोरठा से लेकर श्रृंगार रस और वीभत्स रस में डूबा हिन्दी का कुंठित संसार कभी विश्व फलक पर छा नहीं सकता, हाँ यह दीगर बात है कि इधर मेरी दो तीन किताबे आने के बाद अब हिन्दी में बुकर, मेगसेसे और नोबल के लिए विश्व विचारवान हो रहा है, परन्तु अभी भी यह प्रश्न विचारणीय है कि रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद से लेकर नामवर सिंह या विश्वनाथ त्रिपाठी या कि पत्रिकाओं में देखे तो आलोचना, बहुमत या गंगा में क्या लिखा गया और अब जो इन दिनों मैंने जो पत्रिकाएं संपादित की, वहाँ आन्दोलन से लेकर जमीनी हकीकतों का फसाना है जो शायद हिन्दी के इतिहास में कही परिलक्षित नहीं होता. इसलिए जब मै कहता हूँ केदारनाथ जी को ज्ञानपीठ या किसी ढपोल शंखी को भारत भूषण मिलता है तो दर्द होता है मुझे कि हिन्दी का क्या स्तर बनाकर रख दिया है इन लोगों ने, प्रशासन और विश्व विद्यालयों के काडर, पूंजीपतियों और धन्ना सेठों की अमर होने की हवस ने हिन्दी को विश्व की लुप्त होती भाषा में लाकर पटक दिया है, प्रो. गनेश देवी से यही बात हो रही थी तो उन्होंने कहा कि अब लोक भाषाएँ छोड़कर वे अब हिन्दी के लिए काम करेंगे, मेरी किताबें उन्होंने मंगवाई है और कहा है कि इन पर कम से कम पंद्रह पी एच डी तो वे करवा ही देंगे और इस बहाने क्षरित होती भाषा को एक निस्संगता के साथ देखा जाएगा. इतना एक सांस में कहकर आलोचक के कंधे दुखने लगे थे और फिर उसकी देह यष्टि को सरसों के तेल से मालिश करने को नवयौवना ने धुप में खटिया को घूमा दिया और मोहल्ले से गुजरने वाले लोग ओटले पर पड़े इस हिन्दी के नंग धडंग आलोचक को देखकर बरबस ही मुस्कुराते हुए निकलने लगे, सरसों की तेल में गंधाता आलोचक बडबडाता हुआ हिन्दी में बुकर ना मिलने की लगातार शिकायत कर रहा था और अपने कम ज्ञान और लोक भाषा में सशक्त होने की दलील भी दे रहा था, नव यौवना नाक पर हाथ रखकर उस मस्त सांड के शरीर पर नाजुक हाथों से सरसों का तेल मल रही थी...........


(14/01/15)



सिर्फ कविताओं और कहानियों से क्रान्ति हो पाती तो पाश की ह्त्या कैसे हुई और गोरख और दुष्यंत ने आत्महत्या ही क्यों की थी ? साहित्यकार कविता , कहानी और साहित्य में बातें कर सकते है क्रान्ति की, लोक जीवन भाषा और बोलियों के मिथकों का दोहन और शोषण करके , खूब पुरस्कार , यश, नाम और कीर्ति भी छीन - छानकर अपने खाते में बटोर ही लेते है- जुगाड़ करके, चापलूसी करके पर वास्तविक जीवन में व्यवस्था के गुलाम और अघाये होते है. अपने बनाये फ्रेम और कम्फर्ट ज़ोन से निकले तो जीवन की हकीकत मालूम पड़े. वस्तुतः ये सब पूंजी को पाने के घटिया और शॉर्टकट वाले तरीके है जोआजकल ज्यादा प्रचलन में है. सरकार की रोटी खाकर सरकार को कोसना और जनता के हमदर्द बनकर जनता का शोषण करना, पूंजी का मोह मन में लिए चाटुकारिता की दुनिया में छदम रहना या बुद्धि की बात को नकारकर मूर्खों की दुनिया में फ्रेमबद्ध लोगों को सलाम ठोकना कहाँ की कविता या साहित्य है और फिर यह सब मोह माया है. असली साहित्य ग़दर का है जिसमे व्यवस्था को लात मारकर घर - परिवार छोड़कर, संसार में रहकर संसार के विरुद्ध क्रान्ति करने का माद्दा है, असली साहित्य वह है जो छत्तीसगढ़ के जंगलों में अनुराधा कोबार्ड गांधी रचती है, या कि पी साईनाथ जो अकेला एक आदमी दुनियाभर में घूमकर असली हाशिये पर पड़े लोगों का दर्द कोरे पन्नों पर उकेरता है और समूचा जीवन एक मिशन की शक्ल में इत्ता काम कर देता है कि वह समाज के लिए आईकॉन बन जाता है, या महाश्वेता देवी या कि कोई युवा नक्सलवादी. महानगरों और प्रशासनिक सेवाओं के अफसरों की घटिया कविता - कहानी या थोथे ललित निबंधों में से साहित्य की नश्वरता बघारने वाले दो टकिया स्वयं भू  लेखकों की चिरौरी करके एक अददे या एक विदेशी पर बिक जाने वाले लोग क्या मर्म समझेंगे, काश कि टीवी चैनल्स, रेडियो और खाली बहसों से, जो आये दिन बजट ख़त्म करने के लिए विश्व विद्यालयों के आडीटोरियमों में आयोजित की जाती है, क्रान्ति की धुल किसी रास्ते आ सकती तो संसार का भला होता पर ये पूंजी, नाम और यश के भूखे, रजत मंजूषाओं के लिए तरसते लोग क्या जाने साहित्य का मर्म ? पुरानों से ज्यादा नए लोंढे ज्यादा इस सबमे यानी इस योजनाबद्ध खेल में शामिल है जो भाट - चारण तो है व्यवस्था के और बात करते है क्रान्ति की !!!

यह कहकर आलोचक ने दो घूँट भांग पी ली. 


(02/01/15)



फिर आलोचक ने नए साल की बेला पर मिलने आये सभी टुच्चे साहित्यकारों और मोहल्ले के लौंढे लपाड़ियों की भीड़ को समझाते हुए कहा कि पिछला साल जो बीत गया उसे भूल जाओ और एक नए सन्दर्भ में नए साल को देखो, इस समय साहित्य भयानक अँधेरे में है और पुरी दुनिया टी एस इलियट की द वेस्ट लैंड बनती जा रही है , इस तरह से तो विस्लोवा और मार्खेज की परम्परा, हजारी प्रसाद और रामचंद्र शुक्ल की परम्परा भी ख़त्म हो जायेगी, मेरा सार्थक लिखना इस समय बेहद जरुरी है क्योकि बात कहानी कविता की नहीं वरन इधर कुकुरमुत्तों से उग आये फेस बुकिया कहानीकारों और कवियों का  नीची जाति में विलीन हो जाने का है, जिसमे हिन्दी का बड़ा प्राध्यापक वर्ग अपनी अस्मिता विलोपित करके साहित्य को नष्ट करने के संधान में जुटा है, कुछ लोग साहित्यकारों को भव्य आयोजन करके अपनी गाड़ियां बेचने के लिए इस्तेमाल कर रहे है रणभूमि से लेकर थार के जंगलों में विन्ध्याचल के अस्तगामी पहाडो से मालवा के धन्ना सेठों तक, और कुछ सरकारें भी इसी प्रयोजन में प्रेमचंद की परम्परा को मद्धम सुर में परोसकर राग भैरवी बजा रही है, अब जबकि संसार की समस्त कलाएं और अनुशासन, संगीत और चित्रकलाएं, फ़िल्में और थियेटर, आदिवासी और जन संस्कृति, धर्म और अंतरानुशासनिक विषय भी दुरूह होकर एक अनहद की तरह से ख़त्म हो गए है तो ऐसे में बड़े बालों में लोगों को उलझाते और ज्ञान की दुदूम्भी बजाते मल्टी परपज कलाकार, रेडियो और दूरदर्शनों से रिटायर्ड अनाउंसरों के भरोसे साहित्य को सौंपना बेहद आत्मघाती कदम होगा, यह जो जेहाद है, साहित्य का जेहाद - इसमे मरना होगा छोटी पत्रिकाओं के लिए, विश्व विद्यालयों से जंग, अब तांगेवाले की लड़ाई के सामान है और इरफान हबीब जैसे लोग जब भू-मंडल से विलुप्त हो गए है तो मुझे सामने आना होगा, सफ़दर की हत्या से जो साहित्य ने सीखा था वो एनएसडी और पुणे फिल्म संस्थान में खप गया, परन्तु अब यह सब नहीं होगा, मोर्चा उठाना होगा...कहते कहते आलोचक पर रात पी हुई सुराही में रखी थाने से मिली मुफ्त की कच्ची का ऐसा असर हुआ कि उसकी घरवाली ने सभी को मालवी में गाली बकते हुए घर से हकाल दिया.......लाकड़ा का लिया हूण, कजेन कां-कां से अई जाए, अग्गा आग लगे तमारी किताबों में और इना मुस्टंडा के भी जख नी है ज़रा सी भी, भेलो कर लें ....


(30/12/14)

फिर आलोचक ने समाप्त होते बरस पर एक दृष्टि डाली और बोला मेरी तो सैकड़ों समीक्षाएं छपी है इस बरस सुंदर स्त्रियों से लेकर बूढ़े खूसट आलोचकों ने भी मेरी किताब को पढ़ने में अपनी आँखें गंवा दी और यहाँ वहाँ लिखकर मेरी कीर्ति और यश की पताकाएं फहराई है, पर मेरा क्या, मेरी गरीबी दूर नहीं हुई , एक अदना सा टेबलेट नहीं खरीद पाया दारु की एक बोतल भी ले नहीं पाया जो नाशिक में सुला के नाम से बिकती थी, ना घूमने जा पाया निर्मल वर्मा की तरह, ना अपनी घिसी पिटी डिग्रियों के चलते कोई और योग्यता बढ़ पाई, जिन विश्व विद्यालयों में गया ज्ञान की पोटली उठाकर या संगोष्ठियों में - वहाँ बगैर भाषण पेले लोग पांच से दस हजार की संपदा बटोर कर कर चलते बने, पर मेरा क्या ? मेरे अधकचरे ज्ञान को सुना तक नहीं किसी ने और द्वितीय श्रेणी का टिकिट हाथ में थमाकर मेरी वाट लगा दी, यह साहित्य का अपमान नहीं - बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर का घोर अपमान है और इस तरह से तो हिन्दी में सम्मान की परम्परा ख़त्म हो जायेगी और फिर मेरे बनाए तार्किकता के अभेद किले ढह जायेंगे, इस तरह से तो मै ही ख़त्म हो जाउंगा और साहित्य में जो आलोचना की अक्षुण्ण परम्परा शुरू की थी वह क्षत- विक्षत हो जायेगी, यह सनातनी परम्परा अब आईटी के उपयोग में ही निहित है, पर दिक्कत यह है कि वहाँ भी पढ़े लिखे, ऊँचे पदों पर काम करने वाले और कुर्सियों पर बैठकर अपनी टांगों को उंचा करके गैस पास करने वाले लोगों का कब्जा है और इन पर और इनकी मूर्खता पर घाव करने का एक ही तरीका है कि इन्हें एक जड़मति प्राणी मानकर एक सिरे से अस्वीकृत कर दिया जाए और इनके घटिया अवदान पर इन्हें बेहिचक इनकी ही रचनाओं से प्रहार किया जाए, यह शातिर विचार और कुत्सित मानसिकता लिए आलोचक ने एक ठर्रा खरीदा और अपने कड़े जूतों से साहित्य की माँ-भैन को लात मारकर अपना आईडिया लगाने की ठानी - जो कम से कम उसकी तो दुनिया बदलने ही वाला था, फिर उसने इन्द्रप्रस्थ में आयोजित होने वाले रास रंग समारोह में आने वाले प्रकाशक को फोन करके प्रदेश के गेस्ट हाउस का एक आलीशान कमरा बुक करने को कहा और ठर्रे को सुड़कते हुए सबकी, हिन्दी की माँ भैन से उपासना की, क्योकि अंग्रेज़ी में तो उसका हाथ बेहद ही तंग क्या, था ही नहीं.........


(26/12/14)



आलोचक इन दिनों सर्दी में अक्सर बाहर बैठ जाता और फिर आसपास एक विहंगम दृष्टि डालकर खैनी खाते हुए सोचता कि आज के साहित्य में उसके सिवा और कौन है जो प्रेमचंद की परम्परा का निर्वाह करेगा और निराला के समकक्ष होकर मीमांसा के तत्व कविता में खोज पायेगा, इस दौरान आलोचक को जब भूख सताने लगती तो वह किसी कवि को या कहानीकार को पछाड़ते हुए किसी सीरियल के बारे में सोचता और फिर एक अदभुत सी टेढ़ी मुस्कान के साथ पत्रिकाओं के पन्ने उलटता - जो भी रचना उसकी नजर के सामने से गुजरता, वह उन्हें चबाते जाता और यदि इस बीच कोई हिन्दी का मास्टर, एनजीओकर्मी, धन्ना सेठ या प्राध्यापक आ जाता तो अपने प्रकाशक को फोन करके कहता कि एक खम्बा देसी दारु और उसके बिल में जोड़ लें क्योकि वह इस दौरान वह आलोचक उन सबकी प्रतिबद्धता और योग्यता पर सवाल ही नहीं खडे कर चुका होता - वरन उनकी माँ-बहनों, समकालीनों और तमाम तरह की अकादमियों से जुड़े उनके नाजायज रिश्तों की बखिया उधेड़कर एक लम्बी डकार लेता और फिर मोबाईल हाथ में फिरकी की तरह से घुमाकर किसी अपने खास लंगोटिए या खाप सदस्य को फोन लगाता और पूछता कि क्या खबर है इन दिनों बाजार में, कौनसी सरकार रसरंग या रास लीला आयोजित कर रही है, महिला कहानीकारों और कवियित्रियों को अपनी चिकनी मुस्कराहट और लजीली मूंछों से धराशायी करने में माहिर आलोचक इन दिनों सचिन तेंदुलकर की किताब पढ़ रहा था जो बारह लाख की रिकॉर्ड बिक्री पर थी और उसकी घटिया सी कविता पर लिखी 'सौन्दर्य और सहानुभूति के तत्व' पर कोई बहस नहीं थी सूबे में .


(23/12/14)
फिर आलोचक ने सोचा कि हिंदी में कहानी कविता उपन्यास ललित निबंध आदि विधाएँ पुरानी पड़ गयी है, इससे बेहतर है कि एक नई निंदा विधा को ईजाद किया जाए और यह एक ऐसी विधा - जो अत्याधुनिक शास्त्रों और शस्त्रों से सुसज्जित हो ताकि अपने हथियारों को छुपाकर ऐसे वार किये जाए जिससे सभी ढोल गंवारों और शूद्र साहित्यिक पशुओं को निपटाया जा सकें सो आलोचक ने युवा होते छर्रों को अपना शिकार बनाया उन्हें जंगल राज की पोथी में से बांचने को अध्याय दिए, कुरूक्षेत्र से छपने वाली पत्रिका में कूड़ा छापा इस तरह से अपना मार्केटिंग करके आलोचक ने वृहद् दायरा बनाया फिर धीरे धीरे बाजार को गाली देते बाजार से रिश्ते कमाए , रुपया बनाया और संपत्ति इकठ्ठी की, इस तरह से देश में गरीबी को भुनाते ओर सम्पत्ति को गलियाते हुए उसने साहित्य को वाम, दक्षिण और मध्यममार्गीय लोगों को भेला किया और प्रवचन शुरू किये - इस तरह से हिंदी में निंदा विधा का प्रादुर्भाव हुआ और वागीश को स्मरण करते हुए वागर्थ धर्म का पालन कर आलोचक ने साहित्यानुरागियों को एक अनूठा संधान दिया और पूंजी को आसरा !!!

(20/12/14)
फिर आलोचक ने एनजीओ में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये युवा और बेमेल शादी करने वालों से लेकर कॉलेज के प्राध्यापकों, मीडिया के भांड और साहित्य में पनप रहे भाई भतीजावाद को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ये जो समाज परिवर्तन की अंगडाईयाँ ली जा रही है वह ऐसे ही बेमेल है जैसे कोई शादी कर लें किसी शहर में और दिल्ली में जाकर बस जाए लिव इन का बहाना बनाकर, या कोई श्रीगौड़ ब्राह्मण किसी विजातीय युवा से ब्याह कर पूंजी के बल पर मार्क्स को चुनोती देते हुए दिशा बदले अपने विध्वंसकारी संस्कारों के बल पर या फिर मीडिया का कोई चारण किसी संघी या कट्टर मुस्लिम को गाली देते हुए वेब पेज पर अपनी टी आर पी बढ़ाते हुए नोकरी सुरक्षित करें, ठीक इसी प्रकार की सृजनात्मकता इन दिनों साहित्य में देखी जा सकती है, आलोचक ने अपनी गरीबी का एक चिथड़ा उघाड़ते हुए कहा कि ये जो हिंदी के नाम पर पुलिस और भारतीय प्रशासनिक सेवा से अघाये अफसरों को विश्व विद्यालयों के नाम कुत्ते सी रोटी परोसी जाती है वह भी हिंदी का नुकसान ही कर रहा है, आलोचक बेहद कटु हो आया था यह कहते हुए, अपने पेट की मरोड़ को दरकिनार करके उसने फिर दोस्तों की आयातित व्हिस्की का एक भयानक बड़ा पेग बनाया और बोला कि डाक्टरों ने भी हिंदी में आकर जो सत्यानाश किया है वह कम नहीं है इस तरह से उपन्यास की विधा और ललित निबंधों की परम्परा बोध पर नामवर सिंह और काशीनाथ क्या और कैसे लिखेंगे। फिर अपने सारे कहे का सार समेटते हुए आलोचक ने बड़ी डकार के साथ प्रकाशक के आये चेक को जेब में रखते हुए कहा कि कविता का कोई इतिहास नहीं और भविष्य भी नहीं और टुच्चे तरीके से फेसबुक पर कहानी लिखने वालों को और परखा जाए



(19/12/14)
फिर आलोचक ने दूर कही देखा और बोला ये बच्चों की ह्त्या नहीं, एक कहानी और वाङ्गमय की आत्महत्या है, एक ऐसे समय में जब कविता पूंजीपति के द्वार पर वेश्या बनकर नाच रही हो और उपन्यास की व्यास पीठ पर मुजरें हो रहे हो, राज्य प्रायोजित हिंसा अपने कलरव और साम्प्रदायिकता के शोर में सारे कलाकारों को एक कूची से हाँक कर किसी गौशाला में दूहने ले जा रही हो और मूर्तिकार एक ऐसा म्यूरल बना रहे हो जिस पर समय की विभीषिका या गैस त्रासदी में मरे लोगों के पिंजर नहीं , एक नग्न राजा के कुकृत्यों का नख-शिख दन्त वर्णन हो रहा हो, वहाँ क्या साहित्य की भूमिका है? यह कहकर आलोचक ने सुराही से मिट्टी के कुल्हड़ में पानी की चन्द बूँदें भरी , मुंह पर छींटा और फिर अपने शुष्क हो आये होठों को भयानक प्यासी हो आई जीभ से दुलारते हुए सर पर हाथ फेरा और बोला कि यह कहते झिझक होती है कि मेरे जैसे ख्यात , दुर्लभ और ऐतिहासिक साहित्य के व्यसनी से भी दो कौड़ी का टुच्चा प्रकाशक किताब छापने का बीज धन भीख की तरह से माँगता हैं... दुखद है...इतिहास बदला लेगा इन सबसे , जो पुस्तक प्रदर्शनियों में किताबें बेचकर लेखक को घर में बना बीबी के हाथ का परांठा भी नही खिला सकते एक दोपहरी में .....कलयुग में यही सब होना था...इससे तो बेहतर है कि फिल्मों में कुछ श्रेष्ठ गढ़ा जाये, गुना और बुना जाए !!! आलोचक ने फिर एक सनन मनुक्का निकाली और दूध में घोलकर पीने लगा। शोधार्थी हतप्रद थे वे भी ज्ञान की टोंटी खोलकर साहित्य में क्रान्ति गटकने लगे !!!



(18/12/14)

उस समय जब दुनिया बच्चों के गम से सरोबार थी और एक कवि अपने जन्मदिन पर क्षोभ मना रहा था तब आलोचक कहानी उपन्यास में कविता को खारिज करते आत्ममुग्ध होकर आसमान के किसी कोने में एक पेंटिंग तैयार कर रहा था कि अब वॉन गॉग के बाद उसे ही महिमा मंडित होना है।


(9/12/14)
फिर साहित्यिक आदमी ने कहा कि कहानी और कविता के बिना हम सब जन्मजात रूप से पंगु है और सिर्फ एक जानवर के मानिंद सांस लेने का उपक्रम भर करते है, साहित्य सृजन के लिए एक भूख होना जरुरी है, फिर महामानव ने कहा कि वर्ग चेतना और विचारधारा के बिना कोई सृजन कर्म हो नहीं सकता और यह अपने अन्दर पैदा करने के लिए आपको पचासों सन्दर्भ, प्रसंग, लोगों की निजी जिन्दगी, झगड़े, रोना-धोना, उनके पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिकाओं के किस्से, थोड़ा बहुत अकादमिक ज्ञान, कुछ किताबों के नाम (भले ना पढी हो) और पुरस्कार समितियों के नामांकित सदस्यों के आवासीय पते मय चालू मोबाईल नंबर के कंठस्थ होना अति आवश्यक है, इसके बिना ना तो विचारधारा पनपती है, ना ही कोई वर्ग चेतना और फिर इसी के कारण आप धन, पूंजी और कार के नए मॉडल की चकाचौंध में अपना आपा हो देते है और कस्बाई किस्म का साहित्य रचते है, जो अन्तोगत्वा सिर्फ घटिया बनता है और मेरी तरह विश्व कहानी या कविता नहीं रच पाते  और फिर चर्चा के एकदम बीचोबीच भी नहीं रहोगे तो कौन व्याख्यान के लिए बुलाएगा और दूर - दराज के इलाकों में पुरस्कारों की बरसात कौन करेगा, और छोटी-मोटी पत्रिकाओं के सम्पादन का दायित्व...........बड़ा मुश्किल है सज्जनों, इस सबके बीच समय निकालना और कुछ कह पाना, मै तो छोटा सा अपढ़ और कर्मचारी किस्म का व्यक्ति और माँ सरस्वती का सेवक हूँ.....बस...ही ही ही.....


फिर साहित्य की मंडी में छपास की भूख वालों की तमन्ना पूरी हुई और सज गयी किताबें चुपचाप अपने जिस्म रुपी पन्नों को लहराते बिखराते और इंतज़ार करने लगी उन ग्राहकों का जो आये और नाजुक हाथों से सहला दें और ले जाएँ चंद रुपये प्रकाशको के मत्थे मारकर अपने घर, ताकि वे उन भव्य और मुर्दाघरों के मानिंद पुस्तकालयों में जाने से बच सकें जहां सारा जीवन वैधव्य की भाँती ना बिताना पड़े। इस बीच सुनती रहीं वे उन स्टालों पर प्रकाशक और लेखक के दुःख दर्द, लेखकों की आपसी होड़, जलन, ईर्ष्या, और अपने ही साथ के लेखकों को गड्ढे में धकेले जाते भयानक षड्यंत्र और वे रणनीतियाँ जो एक आदमी को मारने के लिए इतिहास में सबसे काईयाँ तरीके हो सकते थे, किताबों ने यह भी सुना कि प्रकाशक कैसे रो-बिसूर रहे थे कि लेखकों ने उन्हें बर्बाद कर दिया। इस सब के बीच मुस्कुराता रहा सपनों सा सजीला साहित्य का राजकुमार और बुनता रहा नए जाल यहां-वहाँ बैठकर और उसकी हर मुस्कुराहट में एक किताब और एक लेखक की मौत हो रही थी उस मंडी में!!!


(8/12/14)
मसलन आप बात करें अन्तरानुशासन की, साहित्य में विभेद और सौंदर्य की अनुभूति में शमशेर और अज्ञेय की, आप कहें कि निराला, पंत और सुभद्रा कुमारी के काव्य में श्रृंगार और शौर्य के तत्व कीट्स, टेनीसन या मार्खेज के बिम्बों से भिन्न होते हुए भी जुदा नहीं है या आप कहे कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले कहानी के चरित्र अब वामपंथ के कांधों पर चढ़कर भगवा होने के बखान करने लगे है या हिंदी आलोचना नामवर सिंह के बाद अब मुझसे ही शुरू होती है और विश्वविद्यालयों में हिंदी का नुकसान मगा हिंदी विवि के प्राध्यापकों ने जितना किया उससे ज्यादा हिंदी के युवा अबौद्धिक कहानीकारों और फेसबुकिया कवियों ने किया है, ये सब कहकर सोचकर वो गजब का मुस्कुरा उठता और रात पाली वाली नोकरी में मक्कारी करते हुए अपने मोबाईल पर वाट्स एप समूह में विचार ठेल देता और घायल उंगली के साथ सात आसमान पार दुनिया में विचरण करने के लिए सो जाता कि कल उसे नोकरी में शुचिता और ईमानदारी के तत्वों पर कुछ बोलना है।


मसलन आप बात करें अन्तरानुशासन की, साहित्य में विभेद और सौंदर्य की अनुभूति में शमशेर और अज्ञेय की, आप कहें कि निराला, पंत और सुभद्रा कुमारी के काव्य में श्रृंगार और शौर्य के तत्व कीट्स, टेनीसन या मार्खेज के बिम्बों से भिन्न होते हुए भी जुदा नहीं है या आप कहे कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले कहानी के चरित्र अब वामपंथ के कांधों पर चढ़कर भगवा होने के बखान करने लगे है या हिंदी आलोचना नामवर सिंह के बाद अब मुझसे ही शुरू होती है और विश्वविद्यालयों में हिंदी का नुकसान मगा हिंदी विवि के प्राध्यापकों ने जितना किया उससे ज्यादा हिंदी के युवा अबौद्धिक कहानीकारों और फेसबुकिया कवियों ने किया है, ये सब कहकर सोचकर वो गजब का मुस्कुरा उठता और रात पाली वाली नोकरी में मक्कारी करते हुए अपने मोबाईल पर वाट्स एप समूह में विचार ठेल देता और घायल उंगली के साथ सात आसमान पार दुनिया में विचरण करने के लिए सो जाता कि कल उसे नोकरी में शुचिता और ईमानदारी के तत्वों पर कुछ बोलना है।


(7/12/14)
दरअसल पीड़ा वहाँ से शुरू होती है जब आपके अंदर बरसों का जमा मवाद साहित्य बनकर कुंठा के रूप में फूटता है और आप प्रतिबद्ध, पंक्तिबद्ध और छंदयुक्त बनकर सबको एक सिरे से नकारने के लिए किसी एक विधा पर सवार होकर विश्व पुरुस्कारों को फतह करने की आस में निकलते है और ये भी भूल जाते है कि जिस सरजमीं से आपने रेंगना सीखा था, उसे दलदल बनाकर वही एक वटवृक्ष बनने का स्वप्न संजो लेते है जिसके नीचे पौधे तो दूर , दूर्वा का एक हरित तिनका भी सांस ना ले सकें!


दुःख एक शाश्वत भाव है और साहित्यकार ही वह जंतु है जो इसे अतिशयोक्तिपूर्ण तरीके से उत्पादित करके पुरी दुनिया में दर्शनीय बनाता है और इसे बेचकर दुनिया के सुख बड़ी बेशर्मी से बटोरता है जिसमे नाम, यश, कीर्ति की पताकाएं और दूसरों को हद दर्जे तक जलील करना भी शामिल है।



(4/12/14)

अगर आप दोमुंहा और दोगला जीवन जी सकते है यानी वामपंथी बनकर आपके मन में पूंजी के लिए अदम्य लालसाएं जोर मारती हो,अगर आप सबसे सौहार्द्र की बात करते हुए भयानक तानाशाह है तो आप अच्छे लोकप्रिय और चर्चित साहित्यकार हो सकते है। 


जुगाड़ और चापलूसी से सब संभव है। ज्ञानपीठ, ऑस्कर, बुकर और नोबल भी- बाकी छोटे मोटे पुरस्कार ,प्रमाणपत्र, प्रशस्तियाँ और अमीक्षा - समीक्षा तो यूँही मिल जाती है। बस अपनी रीढ़ की मजबूती को मरोड़ना और बिछने की कला में पारंगत होना होगा। 









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