Monday, June 3, 2013

ये गर्मी की एक उंघती हुई लंबी दोपहर है



गर्मी की लंबी उंघती दोपहर कही से कोई हवा का झोंका नहीं, कोई सरसराहट नहीं, कोई हलचल नहीं, कोई आवाज नहीं, एक लंबी चुप्पी, एक खामोश जिस्म, मिट्टी के ढेलो से कुछ गिनने की नाकाम कोशिश और फ़िर दूर कही आसमान में प्रचंड वेग से आती किरणों को लगातार घूरते हुई टक्कर देने की जिद्द और एक लाचारी..........यह दोपहर क्या लेकर जायेगी........? क्या छोड़ जायेगी...? क्या कुछ कह कर जायेगी या यूँही बस गुजर जायेगी...........जैसे बीत गई एक पूरी सांझ और रात कल बिना किसी कोलाहल के और छूट गया इन्ही साँसों का सफर तनहा तनहा .............

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