Tuesday, December 28, 2010

आग खत्म हो जायेगी एक दिन

सब कुछ खत्म हो जाएगा एक दिन

ये आग ये पानी और ये हवा भी

सिर्फ रह जायेंगे कुछ अवशेष

और हमारे भीतर सुलगते हुए चीत्कार

खत्म होता है जैसे धीरे धीरे

जीवन

खत्म होता है जैसे धीरे धीरे

भरोसा

खत्म होता है धीरे धीरे

विश्वास

अपने आप से

सब खत्म हो जायेगा एक दिन

रहने को शेष क्या है अब हमारे पास

कहने को शेष क्या है हमारे पास

सुनाने को क्या है शेष हमारे पपस

सुनने को क्या है शेष हमारे पास

सब कुछ नष्ट हो रहा है धीरे धीरे

समय सब कुछ लीलता जा रहा है अपने आगोश में

हम ख़तम हो रहे है

जैसे ख़तम होता है एक एक पल

जैसे ख़तम होता है एक एक ख्वाब

जैसे ख़तम होता है एक एक गीत

एक एक शब्द और व्याकरण

मुझे लगता है की

सब ख़तम होने के बाद ही रची जाएगी यह दुनिया

सब ख़तम होने के बाद ही बचेगा भरोसा और विश्वास

सब ख़तम होने के बाद ही उपजेगा कुछ नया

सब खत्म होने के बाद ही शेष होंगे मूल्य और

फिर एक नयी दुनिया में नए सिरे से जन्म लेगी

आग

और यही आग

लगाएगी आग, इस दुनिया में की

फिर न कोई चीत्कार सके

कोई न कह सके की

खत्म होगी आग इस दुनिया से.....


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