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मेरे वजूद को एक सिरे से स्वीकारता हुआ चला आता है

जानता हूँ कि ये क्षणिक है तनाव, संताप और अवसाद - पर कैसे दिन बीत रहे है यह तुम जान समझ नहीं सकते और लग रहा है कि इन्ही सबके बीच से गुजर तो जाउंगा पर जब तक सब कुछ पा लेने की स्थिति में आउंगा, क्या वो पा सकूंगा मै ...........तुम कहते थे ना कि सबको सब नहीं मिलता और किसी-किसी को तो ज्यादा इंतज़ार करना पडता ,है पर कहाँ सीमा खत्म होती है, कितना समय लगेगा अब और,  इस खोने-पाने की और गर्मजोशी से भरे समय में हम कह तो जाते है, जो दिलासा सा प्रतीत होता है पर जो उथल-पुथल मन में मची रहती है उसे कैसे बताऊँ. यह समय, जो मै बार-बार इंगित कर रहा हूँ कि बिदाई की बेला का है, समय हो रहा है और फ़िर से एक बार इतना लंबा इंतज़ार करने की आदत नहीं रही है. यह बेचैनी है या इंतज़ार, पर जो है वो है !!! बस यही कह सकता हूँ...........तुमने किसी पेड़ पर नन्ही पत्तियों को बरसात की बूंदों का इंतज़ार करते देखा है, या कही गहरी अंधेरी रात में जुगनू की चमक को यहाँ-वहाँ भटकते हुए देखा है, या किसी उजाड किले पर चमगादड़ों के झुण्ड को एकदम से उड़ते हुए देखा है, या किसी गहरे कुएं में सिसकते हुए मेंढकों को बाहर ना निकल पाने की त्रासदी ...

मनोज पवार की रांगोली प्रदर्शनी देवास में.......

मनोज ने कहा कि देवास से जब रंगोली की परम्परा खत्म हो रही है, तो यह हम जैसे कलाकारों की ड्यूटी है कि इस महान कला को ज़िंदा रखे............बस रंगोली एक शगुन है जो सुबह हर मराठी घर में बनाई जाती है, दूसरा यह मेरे लिए पेंटिंग के समां है पर जब रंगों को हाथ से पकड़ता हूँ तो सुखद अनुभूति होती है वह ब्रश से रंगों के साथ खेलने में मजा नहीं है.......अफजल साहब ने इसे शुरू किया राजकुमार चन्दन ने इसमे काम किया मै सिर्फ रान्गोलीबाज नहीं बनाना चाहता पर चाहता हूँ कि यह कला जो देवास की पहचान है ज़िंदा रहे........हालांकि इसमे असाध्य श्रम है आर्थिक दिक्कतें है पर ठीक है यही तो एक कलाकार का सरोकार होना चाहिए..........बहरहाल मनोज की बातें हमें आश्वस्त करती है कि कैसे हम अपनी परम्पराओं को बचा सकते है कैसे अपना काम करते हुए और ज्यादा बेहतर काम कर सकते है. जबरदस्त है भाई मनोज का काम इतना बारीक और महीन है कि यकी ही नहीं होता कि ये सब रंगोली से बने चित्र है.............देवास में अफजल साहब की परम्परा को जारी रखते हुए मनोज के ये चित्र आश्वस्त करते है कि अभी कला का संसार बहुत बड़ा वृहद और संभावना भ रा ...
पाँवों में टायर की चप्पल, कंधे पर झोला, बदन पर खादी, होठो पर सिगरेट, हाथों में लाल किताब, जुबान पर अंग्रेजी, दिमाग में वासना और दिल में बदलाव का स्वप्न लिए ये लोग क्रान्ति की तलाश में आये थे यहाँ बनखेड़ी होशंगाबाद के पिछड़े इलाके में, एंट्री पॉइंट था 'शिक्षा', जी हाँ वही शिक्षा - जिसे स्वीकृती देते समय उस समय के तत्कालीन शिक्षा सचिव ने कहा था कि जितना कबाडा शिक्षा का अभी है उससे ज्यादा ये पढ़े-लिखे विदेश पलट और जेएनयु दक्ष लोग क्या करेंगे ? बस झमाझम काम शुरू हुआ था, संस्था में आने वालीयों को स्थानीय लोंढे भी जब निपटाने लगे तो मामला गडबड होने लगा. (मेरी एक कहानी का अंश)

अभी यह मुकुल के कंठ में हो रहा..."

सीहोर मे, भोपाल में मुकुल दा के साथ रहा हूँ कमोबेश रोज ही मिलना होता था, और खूब लंबी लंबी बातचीत, फ़िर उनका एक कार्यक्रम भी आयोजित किया था जहां उन्होंने बड़ी तल्लीनता से गया था. जहां वे रहते थे वहाँ शाम की आरती में वो दो तीन निर्गुणी भजन जरुर गाते थे और यह सब सुनना बहुत भाता था. सुना तो उन्हें नेमावर में भी है ठीक हण्डिया के पुल पर या नीचे और हरदा में भी और देवास में दो एक बार............ Anirudh Umat जी ने यह जो लिखा है वो बहुत ही सारगर्भित और सामयिक है. बहुत ही सुन्दर और सहज है मुकुल दादा के बारे में यह विवरण............... :इस आवाज को सुनना कला के गूढ़ को तरल में ग्रहण करना है....इधर जितने नए कंठ सुने उनमे मुकुल जी केवल अपने में एक है. उनके गायन के बारे में कुछ भाषा में सहज...सम्भव नही. शब्द जहां मौन की सीपी में मोती सी नीद सो जाएं तब मुकुल जी का गान अखिल में पसरता है . नीले आकाश में नीली कामना सा...आत्मा में घुलता ...घोलता...प्रकृति के सारे रहस्य यहाँ अपनी देह खोल देते है....नर्तन करने लगते है....इसे शिव और शव दोनों सुनते गाते काल को थाम पल भर को शून्य कर देते ...

शव एक उठेगा मेरी देह में कलपेगा

रात को अन्धेरा भोग रहा है.शव एक उठेगा मेरी देह में कलपेगा...ओह मेरे प्राण कब से तुम मुझे सिगड़ी पर सेक रहे हो. तरस मत खाना .एक एक पसली की तरह तोड़ना.मुझे चूमना जैसे दीमक पुरानी किताब को चूमे.खाना जैसे सपने भक्षण करते है. मेरे मित्र....जालिम मेरे नाखून जरा बेरहमी से उखाड़ना .लो मुझे निर्वसन कर स्नान करो मेरे साथ.मेरी अर्थी को कंधा नही चुम्बन करो.काली नागिन सी सड़क पर मेरी केंचुल से संवाद करना .जागना कि मेरे परखच्चे तुम्हारे गर्भ पर न पड़ जाए.जागना कि तुम्हे भोगता मै अशुभ देख न लूं.जागना कि मै जाग न जाऊं , देखो हम निर्वसन निश्चल बर्फ पर पड़े दो मृत शब्द है, आओ कि अंधरे में कोई हमारा गुल्लक खाली कर रहा है .जागो कि तिड़कती अस्थियों में हमारा विलाप तुम से आलिंगनबद्ध हो रहा. देखो निर्वसन मुझ में स्वप्न वसन धारण कर रहे. देखो अंतिम साँसों में एक राग किस तरह उतप्त दहला रहा.देखो तुम किस तरह मुझे विलगाती अलगाती संयुक्त हो रही.आओ कि मै जा सकूं.तुम्हारी देह में बेघर हो सकूं.देह मै तुम मुझे खोना ताकि प्राप्त कर अपनी उफनती साँसों में तुम पिघल सको.लो...मेरे शव को . दो अपनी राख.चन्दन सा ब...

सब सिमट आओ हम यहाँ से ही अपना नया सफर शुरू करेंगे

ये सड़क कभी खत्म नहीं होती ना ही कोई खम्बा अपनी जगह से हिलता है बस सरकता है तो दर्द, पिघलता है तो दर्प, बुझता है तो एक दिया जो सुबह होने तक ही बमुश्किल जल पा रहा है आज, इन सडकों पर चलते चलते थकने का एहसास जोर पकडते जा रहा है सामने से तेज रोशनी के थपेड़े चले आ रहे है जिसमे कुछ नजर नहीं आ रहा, एक शव इस सडक पर से गुजरता है, शव के पीछे हुजूम में शोर नहीं है, शांति भी नहीं, एक खौफ है सबके चेहरों पर मौत का नंगा नाच देखने को अभिशप्त ये लोग चले जा रहे है सड़क पर और तेज रोशनी में धूल के गुबार उड़ते जा रहे है, एक बवंडर भी इधर से निकला है अभी-अभी सारी यादों को अपने साथ उड़ा ले गया है कह के गया है कि अब सब साफ़ हो जाएगा क्योकि जब स्मृतियाँ नहीं होंगी तो दुःख नहीं सालेगा किसी को और कोई किसी की मौत के सामने खौफजदा नहीं होगा. यह तेज धूप और तेज रोशनी के बीच का समय है, यह साँसों के बीच आरोह-अवरोह को पछाडते हुए एक भभकते हुए सूर्ख गोले में समां जाने का समय है, यह अपनी टींस और दर्द को भूलकर मोह से बिछडने का समय है, यह अपने से अपने को छोड़कर अपने में मिल जाने का समय है, यह वह समय है जो काल से परे होकर काल से भे...

जूते - हेमंत देवलेकर

सर्दी की रातों में जूता निर्जन में कोई डाक बंगला है सुबह हमारे पैरों का फ़र्ज़ होना चाहिए किसी के दरवाजे पर दस्तक की तरह अपने जुते को हम हौले-हौले खटखटाएं कड़ी सर्दी से बचने के लिए रात भर झींगुर इसमें सोते हैं और वे कितने बेफिक्र. एक घर में होते हैं हज़ारों घर उन्हें यकीन है कि ये दुनिया साझेदारी से चलती है झींगुर इसमें सोते हैं और उन्हें यकीन है -हेमंत देवलेकर