मजेदार दुनिया बना ली है ज्ञानियों, बुद्धिजीवियों और दुनिया के कर्ताधर्ताओं ने - इन मूर्खों को लगता है हम ही इस पूरी पृथ्वी का भार अपने काँधे पर सम्हालकर चल रहे है - इसलिए अमीबा से लेकर डायनोसोर जिंदा रहें और अब मनुष्य भी इन्हीं के रहमो - करम पर सांस ले रहा है
मतलब एक ज्ञानी ने "सूचना के अधिकार" पर लम्बा - चौड़ा व्याख्यान दिया दो घंटे में, जिसमें दो बार ब्रेक लिया दस - दस मिनिट का कि बोलते - बोलते हांफनी चलने लगी थी, फिर प्रश्नोत्तर का सत्र या समय आया तो हम लोगों ने पूछा कि - "बॉस, हमारी ये व्यवहारिक दिक्कतें है - जिलों में या राजधानी के विभागों में" तो अगले को पसीना आ गया और जवाब दिया - "असल में मैंने आजतक सूचना के अधिकार का कभी जीवन में प्रयोग नहीं किया और ना ही कोई आवेदन ड्राफ्ट किया है"
फिर क्या था, अपुन ने सारी श्रद्धा - भक्ति छोड़कर ताजी - ताजी हुई बरसात में कीचड़ से लथपथ और भीगा हुआ जूता उठा लिया और बोला
"हरामखोर, निकल, साले PPT Reader ....कही के, अगली बार दिख ना जाना नहीं तो सारी की सारी 67 स्लाइड्स की पोंगली बना देंगे"
ये तो हाल है इन मगरमच्छों के , आता ना जाता - सिर्फ भारत माता
फ्यूज उड़ा बै, देखें कितना दम है विषय को लेकर और क्या पढ़ाएगा - आजकल यही कहता हूँ हर जगह
आजकल बाजार इन "Copy + Paste PPT Readers" से भरा पड़ा है - जो एक - डेढ़ हजार रूपयों रोज में मिल जाते है
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पंजीकरण की मीठी पंजीरी
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अंग्रेजी ने बहुत महत्वपूर्ण काम किए है - शिक्षा नीति से लेकर भारतीय दंड संहिता, CrPC, आदि से लेकर सोसाइटी एक्ट आदि सब मेहनत मशक्कत से बनायें, IPC (भारतीय दंड संहिता) का प्रारूप तैयार करने का श्रेय मुख्य रूप से Thomas Babington Macaulay को दिया जाता है, 1834 में गठित प्रथम विधि आयोग (Law Commission) के अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले थे, IPC का मसौदा 1837 में तैयार हुआ और अंततः 1860 में Indian Penal Code Act के रूप में पारित किया गया, यह 1 जनवरी 1862 से लागू हुआ, इसी तरह से CrPC अपराधों की जांच, गिरफ्तारी, जमानत, मुकदमे और न्यायिक प्रक्रिया को नियंत्रित करता है, पहली व्यापक Criminal Procedure Code 1861 में बनी, बाद में इसमें कई संशोधन हुए और 2024 तक प्रचलित CrPC, 1973 भारतीय संसद द्वारा पारित की गई, जो 1 अप्रैल 1974 से लागू हुई
1860 (Societies Registration Act, 1860) कानून ब्रिटिश भारत में 21 मई 1860 को तत्कालीन Governor General in Council द्वारा पारित किया गया था, इसका उद्देश्य साहित्यिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक और परोपकारी संस्थाओं को कानूनी पहचान देना था
यानी हम एनजीओ वाले भी जानते है कि सोसाइटी एक्ट 1860 में बना था - अर्थात इस एक्ट के आने के बाद कई संस्थाओं का पंजीकरण हुआ, भारत में, मप्र में कई एनजीओ आज भी इसी एक्ट में पंजीकृत है - तो मोहन भागवत जी का जो कहना है कि "संघ 1925 में बना और तब पंजीयन नहीं होता था या प्रावधान नहीं था", वे गलत जानकारी देकर देश को भरमा रहें है, यह बात सर्वथा गलत है, यह अलग बात है कि संघ में गाहे - बगाहे चंदा देने वाले को, या गुरू पूर्णिमा पर दान देने वाले को कोई भी कच्ची पक्की रसीद नहीं दी जाती है, और लोग चूंकि भक्ति भाव से सरोबार है, भगवे झंडे को प्रणाम कर और गुरू मानकर गुप्त दान देते है इसलिए खर्चों का हिसाब और आय - व्यय भी गुप्त रखा जाता है, बाकी देश के लोग साले सल्फास भी खरीदेंगे तो जीएसटी से लेकर तमाम बातें है
असल में यह सवाल वणिक वर्ग या सिंधी समुदाय से आना चाहिए कि ऑडिट, पंजीयन आदि क्यों नहीं है - क्योंकि ब्राह्मण वर्ग तो इसमें बौद्धिक प्रमुख ही होते है, और ज्ञान दान करने वे ही संघ के मुख्य पदों पर आसीन है, वे बापड़े क्या ही चंदा देंगे, जिस देश में हर कहानी की शुरूवात ही "प्राचीन काल में एक गरीब ब्राह्मण था, जो भिक्षा मांगकर अपना घर चलाता था" - से हो, उस देश में क्या ही कोई उम्मीद करेगा, इसलिए ज्यादा जिनके पास है - वे ही दे रहे दान, इसलिए उन्हें ही पूछना चाहिए पर चक्कर यह है कि वे सब मानसिक रूप से दबे लोग है, इधर हमारी अंबेडकर और जोती बा एंड पार्टी को यह समझ नहीं आता उन्हें लगता है देश का रूपया बामन दबाकर बैठे है - इसलिए ये कमजोर दबे - कुचले आरक्षित दामादगण चौबीसों घंटे पिले पड़े रहते है ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण मुर्दाबाद, गांजा पीकर लंबे लंबे आलेख लिखकर इनके नेता रोज हवाई जहाज या विदेशों में, शादियों में घूम - घूमकर फोटू हिंचाते है और मजे लेते है
बहरहाल, सोसाइटी पंजीकरण एक्ट 1860 में अंग्रेजों ने बना डाला था, अब कोई पंजीयन ना ही करवाए तो कोई क्या कर लेगा, अगला सवाल यह भी है कि फिर भागवत जी को करोड़ों का चुना हमपर लगाने वाली जेड श्रेणी की सुरक्षा या हर जगह राजकीय अतिथि का दर्जा भी क्यों चाहिए, अरे भाई आओ, शिशु मंदिर में सभा करो, दीदी - आचार्यों के घर का बना भोजन उनके घर जाकर करो और संघ कार्यालय में रहो रात को, फाइव स्टार सुविधाएं क्यों और हर जगह कलेक्टर या एसपी को प्रोटोकॉल मानने की बाध्यता क्यों
सोचिये, बहुत झोल है बाबू अपंजीकृत होने में
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अपनी सारी स्मृतियां, उमस, लंबी दोपहरें, उदास शामें, ठंडी रातें और भुनसार में उगते सूरज को छोड़कर तुम चले जाओगे, हर बार एक पेंडोरा बॉक्स की तरह से तुम आते हो और अपने साथ चिलचिलाती धूप, शुष्कता, सड़कों का सूनापन, तप रहें एकल लंबे मौन में खड़े पेड़ों की रिक्तता, चातक और चकोर के मिलन के स्वप्न, जाते हुए रोहिणी नक्षत्रों की तपन, सूखती हुई नदियों का ठहराव, ढूह से बन गए रिक्त पहाड़, समुद्र किनारे आग बन गए रेत के स्वर्णिम कण, सूखे मैदान बन गए तालाब की मेढ़ से लेकर गहराते हुए सूखे कुएँ, पानी के अभाव में पपड़ी की तरह जमती जा रही जमीन, आस्मान में ताकती असंख्य आंखें, प्यास से झुलसते कंठ - जिनमें कितनी ही प्रार्थनाएं अवरुद्ध हो गई है, और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम की छूटी हुई वो जगह जिसे भरना मतलब अपने बेगुनाह होने के बावजूद भी सब कुछ चुपचाप सहना शामिल है, भी इसी सारे अफ़साने का हिस्सा है
इस सबके बावजूद भी तुम्हारी विषाक्त उपस्थिति, स्मृति गंध, मिठास और फिर से जीवन के अगले बरस में सावन, वसंत, शिशिर और हेमंत के बाद बनी रहेगी - इसलिए कि तुम बौराएं हुई आम्र मंजरियों में फलों का गुलदस्ता ले आते हो - जामुन, लीची या गंधाते हुए महुआ के फल और अपना सर्वस्व न्योछावर करने को बेताब जंगल जो इस समय अमर बेल की खुशबू से महक रहा है
जून - तुम फिर आओगे ना, सिर्फ एक बार और महसूसना है तुम्हे भीतर से, ताकि सारे थपेड़े सहने के बाद भी जीने की जिजीविषा का भ्रम बना रहें
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