AIBE-21 की परीक्षा और हमारी कानूनी शिक्षा
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AIBE (ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन) की परीक्षा प्रत्येक वर्ष बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित की जाती है, जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशन में संपन्न होती है, इस परीक्षा में देशभर के लाखों विधि स्नातक भाग लेते हैं और सफल होने पर उन्हें अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस करने का प्रमाणपत्र प्राप्त होता है
यह परीक्षा वर्ष 2010 से आयोजित की जा रही है, ताकि देश में गुणवत्तापूर्ण विधिक सेवाएँ प्रदान करने वाले योग्य अधिवक्ता न्यायालयों तक पहुँच सकें, आज स्थिति यह है कि अनेक लोगों को कानून की बुनियादी समझ तो दूर, ठीक से हिंदी या अंग्रेज़ी पढ़ना-लिखना भी नहीं आता, वे केवल नकल अथवा औपचारिक डिग्री के सहारे आगे बढ़े हैं, इसलिए यह आवश्यक था कि विधि के क्षेत्र में योग्य, अध्ययनशील और सक्षम लोग आएँ
आज एक और चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, कुछ लोग केवल लॉ की डिग्री लेकर समाज में रौब जमाने, लोगों को डराने-धमकाने अथवा विभिन्न प्रकार के निजी लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से अधिवक्ता बनना चाहते हैं, ऐसे लोगों के लिए कानून एक पेशा नहीं, बल्कि अपने काले-पीले धंधों को सफेद करने का माध्यम बन गया है, इस दृष्टि से AIBE जैसी परीक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसका सकारात्मक परिणाम यह भी है कि नए और युवा अधिवक्ता अपेक्षाकृत अधिक पढ़े-लिखे और जागरूक होकर आ रहे हैं, जिससे पेशे की गुणवत्ता में सुधार की संभावना बढ़ती है
परंतु दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि लगभग हर AIBE परीक्षा में सात से दस प्रश्नों तक पर विवाद खड़ा हो जाता है, कभी प्रश्न पाठ्यक्रम से बाहर होते हैं, कभी सही विकल्प नहीं दिए जाते, तो कभी ऐसे प्रश्न पूछ लिए जाते हैं जिनका व्यावहारिक महत्व ही समझ नहीं आता, कई प्रश्न इतने जटिल और अप्रासंगिक होते हैं कि यदि किसी न्यायाधीश को भी केवल बेयर एक्ट देकर, बिना किसी सुविधा के, एक कमरे में बैठा दिया जाए तो संभव है कि वे भी निर्धारित समय में उन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर न दे सकें
इस बार की परीक्षा में दहेज निषेध अधिनियम से लेकर ईसाई एवं पारसी विवाह की प्रक्रियाओं और समय-सीमा, उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता तथा अनेक ऐसे विषयों से प्रश्न पूछे गए जिनका न तो स्पष्ट संदर्भ था और न ही वे निर्धारित पाठ्यक्रम का हिस्सा थे, यह देखकर आश्चर्य होता है कि क्या हमारे पास, अर्थात् माननीय सर्वोच्च न्यायालय और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास, पर्याप्त योग्य प्रश्न-निर्माता भी नहीं हैं - जबकि देश में सैकड़ों विधि विश्वविद्यालय हैं, अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (National Law Universities) हैं, फिर भी यदि प्रश्नपत्रों में बार-बार गंभीर त्रुटियाँ होती हैं और बाद में प्रश्न निरस्त करके कट-ऑफ निर्धारित करनी पड़ती है, तो यह पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है
माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश से विनम्र निवेदन है कि युवाओं या अन्य संस्थाओं पर टिप्पणी करने के बजाय अपने अधीन कार्यरत तंत्र की कमियों पर भी ध्यान दिया जाए, यदि परीक्षा प्रणाली में गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए तो लाखों विद्यार्थियों को अनावश्यक परेशानी से बचाया जा सकता है
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब 1 जुलाई 2024 से देश में भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू हो चुके हैं, तब भी पुराने औपनिवेशिक कानूनों को पाठ्यक्रम में प्रमुखता देकर विद्यार्थियों पर अनावश्यक बोझ क्यों डाला जा रहा है - नई विधिक व्यवस्था के अनुरूप पाठ्यक्रम और परीक्षा प्रणाली को अद्यतन करना समय की मांग है
यह स्थिति वास्तव में शर्मनाक है, यदि यही हाल रहा तो कानून को समझने और न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने की इच्छा रखने वाले प्रतिभाशाली लोग इस क्षेत्र से विमुख हो जाएँगे, परिणामस्वरूप वही दलाल मानसिकता और आपराधिक प्रवृत्ति के लोग व्यवस्था पर हावी रहेंगे, जो लोगों को न्याय दिलाने के बजाय केवल तारीख़ पर तारीख़ दिलाकर न्याय का गला घोंटते रहते है
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AIBE-21 and the State of Legal Education
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The All India Bar Examination (AIBE), conducted annually by the Bar Council of India under the supervision of the Supreme Court, is intended to ensure that only competent law graduates enter the legal profession. Introduced in 2010, the examination was meant to improve professional standards and encourage serious legal study.
Unfortunately, every year the examination is marred by errors. Questions are often outside the prescribed syllabus, some contain incorrect options, and several are so obscure that even experienced legal professionals would struggle to answer them without extensive reference materials. As a result, questions frequently have to be withdrawn after the examination.
The recent AIBE included questions on highly specialized topics, including provisions relating to Christian marriage procedures and the Uniform Civil Code of Uttarakhand, many of which appeared disconnected from the core syllabus. This raises an important question: with India's numerous law universities and National Law Universities, why is the quality of question-setting still so inconsistent?
Another concern is that, despite the implementation of the Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS), and Bharatiya Sakshya Adhiniyam (BSA) from July 2024, outdated colonial-era laws continue to occupy significant space in legal education and examinations. Legal curricula must evolve with the law itself.
If reforms are not undertaken, talented and committed legal professionals may become disillusioned, while mediocrity continues to flourish. The legal profession deserves an examination system that is fair, relevant, and capable of identifying genuine legal competence.
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एक तनाव जो पिछले तीन वर्षों से था, आज खत्म हुआ है संभवतः और शायद अब एक बेहतरीन सुबह की उम्मीद की जा सकती है, जीवन में धैर्य बहुत बड़ा मूल्य है और यह समझने में लम्बा समय जरूर लगा- जब तक समझ कर आत्मसात किया यह भी समझ आया कि देर तो हुई, पर ठीक है लंबे चौड़े जीवन में सब चलता है, थोड़े दिन का सुकून पर फिर कोई ना कोई रोग फिर पाल लूंगा और शांति भंग कर दूंगा अपने ही जीवन की, मनुष्य ही हूँ आखिर - उत्पात मचाना ही जीवन का दूसरा नाम है - कम से कम मेरे लिए तो यही शाश्वत सत्य है
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फेसबुक पर लोग कल के जंतर मंतर के प्रदर्शन को लेकर ज्ञान बांट रहे है, राजनीति , LGBTQ , प्रेम, निराशा और आदि को लेकर किस्से गढ़कर बकवास कर रहे है , ये इतने ज्ञानी हो गए कि सौ सालों से देश चलाने वाली पार्टियों की समझ पर सवाल कर रहे है, जगह जगह से हकाले गए पत्रकार, दो कौड़ी के गंजड़ी और नशेबाज लोगों की भीड़ पर सवाल उठा रहे है, लोगों की निजी च्वाइस या राजनैतिक पसंद पर प्रश्न कर रहे , इनको ये हक दिया किसने
मतलब ये ठुल्ले कमरे में बैठकर या घटिया माइक उठाकर देश बनाएंगे, सुधर जाओ रे और औकात में रहो, पहले एक कप चाय का रूपया कमाना सीख लो फिर बकलोली करना
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तुम भले भाजपा का मुखौटा हो,अपना ब्रांडिंग करने आए हो, या सिर्फ स्वार्थवश ही सही भले, कांग्रेस या सपा का सपोर्ट करो या ना करो, धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा ही तुम्हारी परीक्षा है और इस भ्रष्ट सरकार की नींव उखड़ने की शुरूवात, अब शाखा या काडर से नहीं सड़कों पर युवा आए और सवाल करें रोजगार, शिक्षा और नीतिगत
भारत में स्वागत है अभिजीत, पहली बार किसी ने सीजेआई के एक वाक्यांश को पकड़कर एक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की है, और पूरी मुर्दा पड़ी युवा शक्ति को एकत्रित किया है और एक साथ अनपढ़ से लेकर अति शिक्षित को सूचना तंत्र या सोशल मीडिया से जोड़ने की बड़ी कोशिश की है
आज तुम्हारे साथ क्या व्यवहार होता है, तुम्हारे तीसरी बार जय भीम कहने से क्या होगा या मीडिया से लेकर बाकी सब का क्या कहना, सुनना है - इससे फर्क नहीं पड़ता, फर्क यह पड़ता है कि अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे, या प्रशांत किशोर और सबसे ज्यादा चायवाले फर्जी कारपोरेट के गुलाम से धोखा खाने के बाद या कांग्रेस के बाद भाजपा से भयानक धोखा खाने के बाद देश फिर एक बार नया रिस्क लेकर तुम्हे या इस तरह के विचारों को आजमाने को तैयार है और यही लोकतंत्र की ताकत और खूबसूरती है
आज जबकि तुम यहां आ रहे हो, भारत के सीजेआई सूर्यकांत जी को यूके में छात्रों ने घेर लिया है और वे जवाब नहीं दे पा रहें है जायज प्रश्नों के और देश का नाम अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आकर्षण बन रहा है, इस तरह के लेक्चर देने जाना, विदेशों का मोह, और ज्ञानदान करने की जल्दी में कुछ भी बोल जाना हमारे सभी हुक्मरानों के लिए सबक है कि अगली बार सोच समझकर बोले क्योंकि अब हम सब मूर्ख या गरीब वंचित जरूर हो पर आपकी भाषा के गूढ़ार्थ समझते है और निहितार्थ भी
बहरहाल, आओ तो इस सूखी और कड़क हो चुकी मिट्टी में बयार आएं और कोई पौधा पनपे जो सुकून बने, जो बरगद बने, जो यहां कुछ नया करें
काकरोच एकता जिंदाबाद
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