मेरे भीतर वो सब शेष है - जो मैं भूल जाना चाहता हूँ, मैं जो भी बाहर निकाल कर फेंकना चाहता हूँ मन मस्तिष्क से - वह गर्द की तरह ढूह के रूप में जमा हो रहा है, मैं अपने सबसे अच्छे पलों को यादों की शिधोरी बनाकर रखना चाहता हूँ और बाकी वह जो तकलीफदेह है - उसे त्यागना चाहता हूँ, पर हो उल्टा रहा है, जो बीत गया है उस पर पर्दा डालने को हर सिद्ध पुरुष कहता है, आँखें भी सामने है - यदि हर पिछला अतीत सच में स्मरण में रखकर काम आता जीवन के पथ पर तो कम से कम एक आँख तो गर्दन के पीछे होती ही होती, इस समझ के बाद भी हम अतीत को याद रखने में ही सबसे ज्यादा ऊर्जा खत्म कर रहें है - इतने कि लगभग एक नास्टेल्जिया हर वक्त हम पर हावी रहता है और उम्र गुज़र जाती है रेशा - रेशा
जो बीत गया है - अभी वही मुझमे सबसे ज्यादा बाकी है और मैं इसे छोड़ना चाहता हूँ, इसी पसोपेश में जीवन गुजर रहा है, वह सब भूलना चाहता हूँ जो चेहरे, मोहरे, दाग, व्यवहार, भाषा और चरित्र से सामने आता है और मैं हर बार अचकचा जाता हूँ, इसका कोई तो इलाज होगा यह खोजते हुए इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि मिलते समय सामने वाले को नकारने से शुरू करूँ और पूछूँ कि - "माफ कीजिए आप कौन" और हर जगह और हर चीज़ को कौतुक से देखकर सराहना शुरू करूँ जैसे मानव सभ्यता में यह अभी विकसित हुई है
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अनुज शिवोम तोमर ने ग्वालियर के संदर्भ में एक बढ़िया और विचारोत्तेजक पोस्ट लिखी है
शिवोम की बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ, और अच्छी बात लिखी है , पर व्यापक पैमाने पर पढ़ने वाली प्रजाति अब rarest among rare हो चली है, मैं खुद सफर में दो - तीन किताबें निपटा देता था, होटल में सुबह - शाम अपने अकेलेपन में भी कम से कम एक उपन्यास, पर अब आंखों की वजह से, लगातार फोकस ना कर पाने से, और कम से कम सामान सफर में रखने के सिद्धांत की वजह से सबसे पहले किताबें हटाई है, पत्रिकाएं जरूर रख लेता हूँ, पर अब पढ़कर उस पर टिप्पणी करना मुश्किल हो गया है, इतनी किताबें हर माह मंगवाता हूँ कि कमरे में मेरे लिए जगह नहीं बची, एक बात है बेवजह टिप्पणी करने या किताब की समीक्षा से बचता हूँ
दूसरा, हमारे अपने शहर में लिखने - पढ़ने वालों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया है - जिन्हें पारस पत्थर की तलाश रहती है जो उन्हें छुये और उनकी रचना, किताब छप भर जाएं कही से, ग्यारह रुपए से लेकर एक - दो लाख का पुरस्कार मिल जाए और पिछले पांच सालों में यह फलीभूत भी हुआ है, युवा छर्रों से लेकर बुजुर्गवार भी इसमें पारंगत होना चाहते है, हर अक्षर या वर्ण को पढ़ने - लिखने या छपने का रिवार्ड जब मूल अपेक्षा बन जाए तो यह सब जायज ही लगता है और खुद को पिछड़ा मान लेता हूँ
Pawan Karan भाई की तरह देवास में हमने मतलब मैने, दो चार मित्रों और विशेष रूप से Bahadur Patel ने लंबे समय तक यह जमीनी काम किया पर अब हम "पारसमणी" नहीं है और ठेके नहीं लेते तो जाहिर है हम abondoned and discarded कौम है
बहरहाल आप शिवोम की टिप्पणी पढ़िए
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किताबें / एक नोट
1. ऐसा शायद ही कोई दिन गुज़रता हो जब आईसीएच (ICH) की टेबल नंबर 10 पर कोई किताब न होती हो। रोज़ की इस बैठक में जो अब दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है, लगभग हर व्यक्ति अपने साथ एक किताब लेकर चलता है। इसका सबसे व्यावहारिक पक्ष यह है कि यदि आप बैठक की उस जगह पर पहुँच कर अपने आप को अकेला भी पाएँ तब भी आपको अन्य मित्रों की उपलब्धता जाँचने या उन्हें फ़ोन करने की कोई व्याकुलता नहीं होती।
2. किताबें जीवन में इस कदर व्यावहारिक जगह बना चुकी हैं कि एक आध झोले में और कुछ स्कूटी की डिक्की में हमेशा बनी रहती हैं।
3. मेरे एकांत पर मेरे फ़ोन की स्क्रॉलातुर नज़र चौबीसों घंटे टिकी रहती है और मैं न चाहते हुए भी उसके सम्मोहन के सामने घुटने टेक देता हूँ। ऐसे में मुझे पुस्तक मेले का वह अटेंडेंट याद आता है जिसके कंधों पर पूरे स्टॉल की ज़िम्मेदारी थी मगर वह एक स्टूल पर बैठा अपनी किताब पढ़े जा रहा था। ग्राहक आते, ज़रूरत पड़ने पर वह उनकी मदद करता और फिर वापस अपनी किताब पढ़ने लग जाता। ऐसी भयंकर आपाधापी के बीच पढ़ना एक असाधारण मानसिक श्रम की माँग करता है। मैं उस व्यक्ति को देखकर बहुत प्रभावित हुआ।
4. जीवन में कुछ ऐसे मित्र जुड़े जो जेठ की दोपहर में चौराहे पर स्वाफ़ी से मुँह लपेटे मेरा इंतज़ार करते हुए भी किताबों के पन्ने पलटते पाए जाते हैं। जब भी मैं खुद को समय गंवाते हुए पाता हूँ, मुझे वह अटेंडेंट और मुनि भाई याद आते हैं।
5. पुरानी किताबों को अक्सर मैंने नई साज-सज्जा में पढ़ा है। लेकिन जब मैं उनके उस मूल रूप से रूबरू होता हूँ जिसमें वे पहली बार दुनिया के सामने आई थीं तो एक कौतूहल होता है। ऐसा कौतूहल जिसे मैं इतिहास के प्रति अपनी बुनियादी जिज्ञासा से जोड़कर देखता हूँ। पवन जी के माध्यम से ऐसी कई किताबों से मिलना हुआ। कुछ पढ़ी हुई और बहुत सारी सिर्फ़ सुनी हुईं मगर उनकी पुरानी ज़िल्द और मुद्रण की साज़-सज्जा को देखना अपने आप में एक नैनसुख होता है।
6. असली मजा तब आता है जब पढ़ी हुई किताबों पर चर्चा होती है। जब अलग-अलग लोगों का एक ही किताब को पढ़ना आपस में टकराता है। ऐसे में हीगल का 'वाद-प्रतिवाद', सिद्धांतों से मुक्त होकर साक्षात घटता हुआ दिखाई देता है।
समाप्त।
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आखिरी में जो रह जायेगा, आपके बाद जो जिंदा रहेगा - आपका व्यवहार, दुनिया याद करेगी आपको आपके व्यवहार से और बाकी सब धन, दौलत, पद, संस्था, दफ्तर, या आपके गाड़ी - घोड़े, संपत्ति, हवाई यात्राएं, आपके उदगार या लिखा - पढ़ा हुआ विपुल साहित्य, आपके आभूषण सब दफनाने या जलाने के पहले उतार लिए जायेंगे - यह कहने की आवश्यकता नहीं है, और जब तक आपकी अंतिम क्रियाएँ सम्पन्न होगी श्मशान में - तब तक ही लोग बातें करेंगे और जो केंद्रीय बिंदु होगा वो आपका व्यवहार होगा, बाहर निकलते ही आप "थे" हो जायेंगे, इसलिए सम्हल जाइये, सतर्क हो जाइए और थोड़ा सा कॉन्शस रहिए - क्योंकि आपको संसार का सब कुछ मिल चुका है, सफलता के शीर्ष पर है और स्वर्ग की दूरी में सिर्फ एक उंगली की ही दूरी है, पर आपका व्यवहार अभी भी बेहद टुच्चा और दो कौड़ी का आपने बना लिया है
बस यही आपको खलेगा, और शायद आप देखेंगे कि पिछले कई दिनों में आपके पुराने संगी - साथी आपको छोड़ चुके है और आपका दर्प आप पर बेतहाशा हावी है और इतना कि आप यह छोटी सी सहज बात भी समझ नहीं पा रहें है
खैर, समय किसी को छोड़ता नहीं - यह भी गुजर ही जायेगा, बहरहाल, आपका व्यवहार आपको मुबारक, अपन तो औघड़ है ही और औचक घाट के यायावर - मोह माया और सबसे दूर, अमर होने या झंडे गाड़ने के कोई स्वप्न नहीं ना ही कोई मुगालते
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78 वर्ष कांग्रेस को कोसने में चले गए, तेरे से बड़ा दुर्भाग्यशाली कौन होगा जो नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया, प्रियंका और राहुल को चौबीस घंटे कोसते हुए कुंठा में ज़िन्दा रहा और जब मजे करने का समय आया तो सारी सुविधाओं और भोग के बाद भी कुंठा छोड़ नहीं पाया और तेरी कुंठा को उकसाने से लेकर फलने - फुलने में तेरे ही सहयोगियों ने तेरे को भ्रष्ट और कायर बना दिया इतना कि देश के तीन युवा मर गए और तू कायरों की तरह भागकर फ्रांस जाकर नाच देख रहा, बाईस लाख बच्चों का पेपर लीक हो गया और तू जाकर किसी अधेड़ महिला को टॉफ़ी खिला रहा है
ऐसी जिंदगी भगवान किसी दिव्यांग या कीड़े मकोड़े को भी ना दें - तेरे से गहरी सहानुभूति है ठरकी ट्रम्पवा , सब कुछ होकर भी तू विपन्न ही रहा और दिमाग से कमअक्ल, ढपोर शंख
एक ही जीवन पुण्यों के बाद मिलता है और पूरी दुनिया से लेकर अपनी पत्नी तक को दुश्मन बना लिया, क्या लगता है सनातन के हिसाब से मोक्ष भी मिलेगा या त्रिशंकु बनेगा रे ट्रम्पवा
ट्रम्पवा, तू जालिम ही नहीं कायर है , अगले जन्म तुझे आनंद भवन में जन्म दें
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ट्रेन में रील और महिलाओं की बकलोली से परेशान है देश, पूरा एसी कोच रील की तबाही झेल रहा है, इतनी तेज आवाज में अंधे गूंगे साधुओं की बातों से लेकर अश्लीलता के वीडियो क्लिप्स चल रहे है, दो महिलाएं उज्जैन से कोई 84 महादेव की परिक्रमा पथ की यात्रा कर लौट रही है तो जमाने भर के लोगों को सुबह पांच बजे से यात्रा वृतांत सुना रही है और एक ही बात बताते कही मर ना जायें फोन भी दो बार चार्ज कर चुकी, किसी को चार्जिंग नहीं करने दे रही है शातिर, हर स्टेशन से कुछ न कुछ खरीद कर भैंसों के समान चर अलग रही है और बदबू फैला रही है कमबख्त एसी कोच में
सत्यानाश हो इन दोनों औरतों का, आप लाख समता समानता या जेंडर की बात कर लो पर कुछ महिलाएं इतनी जघन्य मानसिक क्लेश की जनक और समय की हत्यारिनें और कलाकार होती है कि इतनी बेसिक अक्ल नहीं कि बेटे, बहु, पति से लेकर पूरे खानदान के रिश्ते पूरे डिब्बे में उघाड़ते हुए नंगे कर दिए है, और सामने वाली मतलब बात करने वाली भी इसकी अम्माएं है जो इससे हर राज उगलवा रही है, दिमाग सड़ा दिया इन दोनों अधेड़ भक्तिनों ने, भगवान इनको जितनी हो सकें स्वर्ग में जगह दें, नर्क तो ये यही बना दिया इन्होंने
दुर्भाग्य यह है कि दोनों घटिया औरतों के पास गीता सार और प्रेमचंद की कर्मभूमि और गोदान पड़ी है जो सीट पर रखी है, जब टीटीई को शिकायत की तो बोला औरतों का मामला है - "मै कुछ नहीं कर सकता, आप ही झेले", अगले जन्म में भोंपू बनकर जन्म लें या डीजे बनें
Samiksha होती तो व्यंग्य की एक किताब यही खींच देती और मप्र साहित्य परिषद से एक लाख का पुरस्कार ले लेती अगले बरस
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ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे
हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे
कोहकन हो कि कैस हो कि 'फ़राज़'
सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे
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कभी - कभी जीवन को उन्मुक्त छोड़ देना चाहिए, हर बात को सम्हालने, हर प्रश्न का उत्तर देने में, अपने को श्रेष्ठ बताने में, स्वयं को हरदम सही करने के चक्कर में और मानव सभ्यता के इतिहास में अमर और अनूठे बनने की दौड़ में हम अक्सर जिंदगी खोते चले जाते है, और जो जीवन का सत्व या रस है - उससे महरूम रह जाते है, इसलिए बेफिक्र हो जाइए, उन्मुक्त हो जाईए, सारे बंधन - लोक लाज और तथाकथित नैतिकता और आदर्शों से दूर होकर जी लीजिए, इसलिए नहीं कि आपको सब कुछ जीत कर सिकन्दर बनना है - बल्कि इसलिए कि जीवन की यात्रा में यदि हम ठहरकर यही सब सोचने - विचारने लगे तो फिर यात्राओं के दौरान टकराने वाले अनुभव, पड़ने वाले नदी, पहाड़, समुद्र, पथरीली पगडंडियां, खूबसूरत जंगल और सरपट सड़कें हमारी नजरों से दूर रह जाएगी
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मोती ने नेहरू से ज्यादा राज कर लिया और मोती आजादी के बाद की पैदाइश है जबकि नेहरू पहले की , वो आजादी में लड़े, बैरिस्टर थे, डिग्रियां असली थी, पर ये तो चाय बेचकर और दूसरों के घर रोटी खाकर बढ़े है, और उसी बचत से दिल्ली गए पढ़ने, अमेरिका गये फोटो खिंचाने
सही बात ये महान है अभी तक धरा पर, पर मोती को हर बार फिर नेहरू - नेहरू नहीं करना चाहिए, बापड़ा नेहरू के औरा में रहकर अपराध बोध से ग्रस्त हो गया है, कभी यह नहीं बताया कि एक भी आईआईटी, एम्स या भाखड़ा नंगल जैसा बांध बनवा पाया, कोई नासा नहीं बनवा पाया, बल्कि सरकारी प्राथमिक स्कूल बंद करवा दिए समझदार ने, डिस्कवरी ऑफ इंडिया या प्यारी इंदु जैसी किताब लिखना तो दूर - दूसरे के लिखे भाषण भी नहीं पढ़ पाता टेलीप्रॉम्प्टर के बिना
इसका क्या ?
ज्ञानी लोग ज्ञानदान ना करे
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हर धर्म का अर्थ है मौन हो जाना, सुकून, शांति, दूसरों के जीवन में खलल ना डालना, अपने भीतर की ओर यात्रा करना, सद्कर्म करना और नेकी की राह पर चलना , पर हो क्या रहा है - मै, आप और हम सब जानते है, देख रहे है - पर कर कुछ नहीं रहें
पहले होगी सुबह की आरती, फिर दिन भर कर्कश आवाज में भागवत और उसके बाद शाम होते होते दो घंटे की बेसुरों की आवाज में आरती, उसके बाद युवाओं के धींगा मस्ती वाले गाने और आखिर में पंडित पागल हो जाता है और भारत माता से लेकर जय सियाराम के नारे लगाते हुए उन्मत्त हो जाता है
ऐसे ही सुबह से दिन में पांच बार नमाज़, गुरबाणी और बाकी प्रकार के रस रिवाज, शादी के जुलूस, मैयत, गंगा पूजन, मिलादुन्नबी के जुलूस, या सड़कों पर अवांगार्द भीड़ जो झंडे उठाये ट्रैफिक जाम करते चलती रहती है बारहों मास
आसपास रहने वाले मतलब मर जाए मंदिर मस्जिद के, हमारे बचपन में इतना भौंडापन और धर्म के नाम पर हिंसक व्यवहार नहीं था, गणेशोत्सव से लेकर तमाम त्योहार मनाये जाते थे, ईद हो, मुहर्रम, क्रिसमस हो या कोई गुरू पर्व
इस सबमें सारे बेरोजगार से लेकर कॉलोनी या मल्टी के रिटायर्ड अंकल और मुंह में गुटखा फंसाए धार्मिकता के नाम पर कलंक होते जा रहे युवा नेता, छर्रे और दो कौड़ी के गुंडे मवाली टट पूंजीया लोगों के चरण धोकर पीने वाले अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहें है, इनसे जाकर बोलो तो कि आदेश है हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का तो बेहद अश्लीलता से गाली निकालकर बात करते है जो यहां लिख भी नहीं सकते
क्या ही किया जाए, पुलिस और जिला प्रशासन में एसपी, कलेक्टर करोड़ो रूपया देकर आते है और उन्हें विधायक से लेकर सांसद तक का संरक्षण होता है तो वे भी क्या करेंगे, आधा समय तो पार्षद, महापौर या इन जन प्रतिनिधियों को पपोलने में चला जाता है बाकी समय भ्रष्टाचार के नित नूतन साधनों को खोजने में
इस देश में अब रहना मुश्किल हो गया है और शर्मनाक भी पर किससे कहें कि पांव के छाले निकाल दें
मतलब विवाद के बिना अब कोई मुद्दा नहीं, धर्म नहीं, मजहब नहीं, आचरण नहीं और व्यवहार नहीं
बुद्धिजीवी यानी हमारे इंजीनियर, डाक्टर, वकील, न्यायाधीश, मीडिया, ब्यूरोक्रेट, साहित्यकार सब इन पर बोलने या लिखने से बचते है क्योंकि सबको चरण वंदना करनी है, गुड बुक में रहना है और आयोजनों में शूरवीर बनना है कमबख्तों को
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इस समय हालत यह है कि किसी देशी - विदेशी या ऑनलाइन ट्रेनिंग या ज्ञानदान अर्थात लेक्चर में किसी बुद्धिजीवी वक्ता या महाज्ञानी की एक स्लाईड पीपीटी के आगे-पीछे हो जाए तो उसे दस्त लग जाते है और वह बदतमीजी पर उतर आता है और लैपटॉप चलाने वाले की माँ-भैन करते हुए उसकी सुपारी अमित शाह को देने को उतारू हो जाता है
मैं भगवान से रोज प्रार्थना करता हूँ कि - "हे भगवाना सिर्फ चौबीस घंटे के लिए गुगल, ए आई, चैट जीपीटी और जेमिनी में हड़ताल करवा दें, ( मतलब फ्री वाले एप्स - क्योंकि चवन्नी भी खर्च करने की इनकी औकात और नीयत दोनों नहीं है ) सबकी औकात जमीन पर आ जाएगी और सारा लिखा-पढ़ा ज्ञान और कॉपी-पेस्ट डाटा सड़क पर उघाड़ा हो जायेगा"
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