अपनी सारी स्मृतियां, उमस, लंबी दोपहरें, उदास शामें, ठंडी रातें और भुनसार में उगते सूरज को छोड़कर तुम चले जाओगे, हर बार एक पेंडोरा बॉक्स की तरह से तुम आते हो और अपने साथ चिलचिलाती धूप, शुष्कता, सड़कों का सूनापन, तप रहें एकल लंबे मौन में खड़े पेड़ों की रिक्तता, चातक और चकोर के मिलन के स्वप्न, जाते हुए रोहिणी नक्षत्रों की तपन, सूखती हुई नदियों का ठहराव, ढूह से बन गए रिक्त पहाड़, समुद्र किनारे आग बन गए रेत के स्वर्णिम कण, सूखे मैदान बन गए तालाब की मेढ़ से लेकर गहराते हुए सूखे कुएँ, पानी के अभाव में पपड़ी की तरह जमती जा रही जमीन, आस्मान में ताकती असंख्य आंखें, प्यास से झुलसते कंठ - जिनमें कितनी ही प्रार्थनाएं अवरुद्ध हो गई है, और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम की छूटी हुई वो जगह जिसे भरना मतलब अपने बेगुनाह होने के बावजूद भी सब कुछ चुपचाप सहना शामिल है, भी इसी सारे अफ़साने का हिस्सा है
इस सबके बावजूद भी तुम्हारी विषाक्त उपस्थिति, स्मृति गंध, मिठास और फिर से जीवन के अगले बरस में सावन, वसंत, शिशिर और हेमंत के बाद बनी रहेगी - इसलिए कि तुम बौराएं हुई आम्र मंजरियों में फलों का गुलदस्ता ले आते हो - जामुन, लीची या गंधाते हुए महुआ के फल और अपना सर्वस्व न्योछावर करने को बेताब जंगल जो इस समय अमर बेल की खुशबू से महक रहा है
जून - तुम फिर आओगे ना, सिर्फ एक बार और महसूसना है तुम्हे भीतर से, ताकि सारे थपेड़े सहने के बाद भी जीने की जिजीविषा का भ्रम बना रहें
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मप्र में मोहन यादव सरकार से ना शिक्षा सम्हल रही ना स्वास्थ्य व्यवस्था, बाकी तो पूरा तंत्र बर्बाद करके सारा धन उज्जैन में होने वाले 2028 के सिंहस्थ पर लगा दिया है अब, लाड़ली लक्ष्मी और बहना ने प्रदेश को कंगाल बना ही दिया था
देवास का कबाड़ा वैसे ही पिछले पांच दशकों से हो रहा है क्योंकि सामंतवाद और गुलामी में डूबे लोग महल को आज भी सजदा करते है
अब रहा सवाल अस्पताल को निजीकरण और PPP मोड़ में चलाने का तो एक बार पहले भी इंदौर के डॉक्टर विनोद भंडारी यानी आज के अरविंदो अस्पताल को देकर प्रयोग किया जा चुका है, पूरे जिला अस्पताल को लूट और डकैती का घोषित और राज्य प्रायोजित अड्डा बना दिया था, ये वही विनोद भंडारी थे जो व्यापमं कांड में जेल में रहें , आज की स्थिति नहीं पता - वो कहां है
इंदौर में कई ऐसे ऐसे एनजीओ को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सौंपे गए थे जिनका अस्तित्व ही नहीं था और जन स्वास्थ्य रक्षक के सहारे वर्षों तक चलते रहें, असल में सरकार ना मात्र वित्तीय रूप से बल्कि दिमागी तौर पर भी कंगाल हो गई है
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने जैसे आशा कार्यक्रमों की तकनीकी ट्रेनिंग या HIV / AID का ठेका एनजीओ को देकर अरबों रुपया कमाया अब भी वही होगा, मैंने खुद ने आशा प्रशिक्षण में भ्रष्टाचार और HIV / AID के TI प्रोजेक्ट्स में करोड़ो का गबन देखा और फर्जी रिपोर्टिंग भी देखी, तमाम तरह की चलने वाली बसों के रख रखाव और संचालन का काम भी देखा, रीवा, सतना, इंदौर, झाबुआ, धार, बड़वानी से लेकर तमाम जिलों में एनजीओ को देखा जिनके कंप्यूटर तक आखिर में सीबीआई जप्त करके लखनऊ या दिल्ली ले गई थी
पर जब सरकार को पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी से कमाना है और जनता की मौत की सुपारी देना है तो कोई क्या कर सकता है, जो सरकार एक नीट की परीक्षा नहीं करवा सकती, उससे आप क्या जन स्वास्थ्य की उम्मीद करेंगे
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घोर फ्रस्ट्रेशन का युग है हिंदी में और यह बेहद मानीखेज है इस समय
दो अक्षर पढ़कर, एक पंक्ति लिखकर और हजार लोगों से संपर्क करके साहित्य की जुगाली और प्रबंधन करके इतने कुंठा से लोग भर गए है कि बगैर पुरस्कार और सेटिंग के उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा, अपने कुत्ते, बिल्ली, ड्राइवर, बीबी को आगे करके और रुपए देकर, बैजेस खरीदकर लोग मशहूर हो जाना चाहते है, अपनी घटिया लेखनी, कविता, कहानी, संस्मरण आदि से लेकर टाईम मशीन को चुनौती देकर लोग रातों - रात प्रसिद्धि की ऊंचाई पर पहुंचकर सब कुछ पा लेना चाहते है,मतलब हद यह कि क्लासिक के साथ भाषण और अपनी किताबों की बात का इश्तहार देने में गुरेज नहीं कर रहें ये बेशर्म
और इस सबमें राज्य स्तर के साहित्य मंचों ने सबसे ज्यादा गंद मचाया है, खासकरके सरकारी परिषदों और संस्थाओं ने - जैसे मप्र में सत्ता पोषित "मप्र साहित्य परिषद" ने पिछले दस वर्षों में ऐसे - ऐसे नाकारा, निकम्मों और चापलूसों को पचास हजार के अनुदान से किताब छपवाने के काम, पुरस्कार और एक लाख तक के पुरस्कार बांटने में जो बंदर - बांट की है, वह सिर्फ और सिर्फ नीचतम कार्य ही नहीं , साहित्य का सत्यानाश ही नहीं - बल्कि साहित्य को एक ऐसे घटिया स्तर पर लाकर नजीर पेश कर दी है कि हर छोटे - मोटे कस्बे से लेकर जिले और राजधानी का टुच्चा दो कौड़ी का लेखक अब लाख रूपये के अलावा बात ही नहीं करना चाहता है
हर शहर में इनके दल्ले बैठें है जो घटिया ना चलने और बिकने वाले अखबारों के साहित्यिक पृष्ठ सम्हालते है , महिलाओं से लेकर चापलूसों की रचनाएं छपवाते है, अनुदान दिलवाकर किताब छपवाते है, फिर पुरस्कार भी दिलवाते है और इन दलालों की ना कोई विचारधारा है और ना समझ, दलितों पर लिखेंगे पर मजाल कि कोई दलित इनकी गाड़ी को छू दें, किसी दलित के घर का दरवाजा ये छू लें, यज्ञ, अभिषेक से लेकर अधिकारियों और नेताओं के घर में हजार रुपए प्रतिमाह पर पूजा पाठ करने वाले प्रकाशन गृह खोलकर बैठे है और हर साल कागभगोड़ों का सम्मेलन कर खुद को गौरान्वित महसूस करते है
हिंदी पढ़ने - पढ़ाने वाली पेज तीन की तितलियाँ, रिटायर्ड होकर औरतें भी भगवा साड़ी पहनकर राम कथा करती नजर आ रही, जीवन भर जो हिन्दी की मास्टरणियां सरकारी नौकरी में हरामखोरी करके तनख्वाह लेती रही, अर्च - चर्च के स्कूलों में प्राथमिक कक्षाएं पढ़ाती रही, तीसरी श्रेणी से एमए हिंदी पास औरते और बाबू लोग अचानक डाक्टर लिखने लगे नाम के आगे, ये नैतिकता है इनकी क्योंकि इनके दलाल ने यही सीखाया इनको कि बिक जाओ, चरण पकड़ लो, जीभ का जितना उपयोग कर सकते हो करो और सब हासिल करो भले तेल लगाना पड़े मुझे या किसी को भी
हिंदी का माहौल इतना घटिया मप्र में कभी नहीं था, हमारे शहर को बहुत सम्मान से जाना जाता था, अभी बाहर जाता हूँ तो लोग मेरे मुंह पर कहते है - "आप तो सेटिंगबाज लोगों के शहर से हो, हर गली - मुहल्ले के आदमी की किताब है, जो औसत दर्जे की घरेलू औरतें है या रिटायर्ड जिसे "पिता और पीता" में अंतर नहीं मालूम, वह अपने नाम से किताबें छापकर और लखटकिया पुरस्कार लेकर बैठा है, कैसे कर लेते है इतना जुगाड़ आप लोग" , और मैं शर्म से मुंह झुका लेता हूँ
मुझे बैग पाइपर की कहानी याद आती है जो मंद बुद्धि चूहों को लेकर जाता है और अंत में सभी को एक नदी में डूबो देता है, हमारे यहां के मंद बुद्धि चूहे गांजा खाते है, कहना यह है कि एक आदमी यदि अति उत्साही या महत्वकांक्षी हो जाए तो वह अपने साथ पीढ़ियों को ही नहीं वरन् किसी शहर के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति को बर्बाद कर देता है और ऐसे लोगों को राजधानी के लूटियन जोन में बैठे और पल रहे सत्ता के गुलाम और नीच लोग बर्बाद कर अपना उल्लू साध लेते है, इन लोगों में इतनी आत्म मुग्धता आ गई होती है कि हर प्लेटफॉर्म पर रील, अपने कचरे और अपनी विष्ठा को दिनभर परोसना ही जीवन का प्रारब्ध लगता है, पता नहीं कौन देखता है इनके थोबड़े और कौन पढ़ता है यह सब मानीखेज बातें
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मेरे भीतर वो सब शेष है - जो मैं भूल जाना चाहता हूँ, मैं जो भी बाहर निकाल कर फेंकना चाहता हूँ मन मस्तिष्क से - वह गर्द की तरह ढूह के रूप में जमा हो रहा है, मैं अपने सबसे अच्छे पलों को यादों की शिधोरी बनाकर रखना चाहता हूँ और बाकी वह जो तकलीफदेह है - उसे त्यागना चाहता हूँ, पर हो उल्टा रहा है, जो बीत गया है उस पर पर्दा डालने को हर सिद्ध पुरुष कहता है, आँखें भी सामने है - यदि हर पिछला अतीत सच में स्मरण में रखकर काम आता जीवन के पथ पर तो कम से कम एक आँख तो गर्दन के पीछे होती ही होती, इस समझ के बाद भी हम अतीत को याद रखने में ही सबसे ज्यादा ऊर्जा खत्म कर रहें है - इतने कि लगभग एक नास्टेल्जिया हर वक्त हम पर हावी रहता है और उम्र गुज़र जाती है रेशा - रेशा
जो बीत गया है - अभी वही मुझमे सबसे ज्यादा बाकी है और मैं इसे छोड़ना चाहता हूँ, इसी पसोपेश में जीवन गुजर रहा है, वह सब भूलना चाहता हूँ जो चेहरे, मोहरे, दाग, व्यवहार, भाषा और चरित्र से सामने आता है और मैं हर बार अचकचा जाता हूँ, इसका कोई तो इलाज होगा यह खोजते हुए इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि मिलते समय सामने वाले को नकारने से शुरू करूँ और पूछूँ कि - "माफ कीजिए आप कौन" और हर जगह और हर चीज़ को कौतुक से देखकर सराहना शुरू करूँ जैसे मानव सभ्यता में यह अभी विकसित हुई है
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