भारतीय शादियों में क्या बदला - एक विहंगावलोकन
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1 - शादी के नाम कर संस्कार नहीं - बस दिखावा और इवेंट हो रहे हैं, सेलिब्रिटी और नेता के आने पर जो गदर हो रहा है वह शोचनीय है, उनके साथ सेल्फी का अजब तमाशा चलता है
2 - मेहमानों को आने के पहले सोचना पड़ता है कि मेहंदी, हल्दी, महिला संगीत, वर या वधू निकासी के समय के कपड़े, शादी के समय कपड़े, पार्टी के कपड़े, फेरों के समय के कपड़े, आवागमन के लिए महंगी गाड़ियां, परफ्यूम से लेकर जेवर आदि की आवश्यकता - क्या सारे रिश्तेदार इतने सक्षम है
3 - परिवार के बड़े और बूढ़े लोगों की उपेक्षा कर यार - दोस्त और कार्यालयीन स्टाफ की ओर ज्यादा ध्यान दिया जाता है
4 - बारात में कान फ़ोड़ू डीजे से लेकर भयानक कर्कश ढोल और ताशे से लेकर बाकी सबका भौंडा प्रदर्शन
5 - सड़क पर देर तक नाच - गाना और आसपास के लोगों को, राहगीरों को त्रस्त कर देने की हद तक का जाम लगवाना और यह भूल जाना कि आसपास अस्पताल, मरीज, बूढ़े, बच्चे, परीक्षाएं या कोई अन्य संकट हो सकते है, एंबुलेंस भी निकल नहीं पाती, पूरी पूरी रात अश्लील गानों पर नाचना - क्या सभ्यता हो गई है हमारी
6 - भोज में न्यूनतम सौं प्रकार के आईटम रखना - जिनकी सिर्फ और सिर्फ बर्बादी होती है, लोग बेहद बदतमीजी से खाने के बजाय बर्बाद करते है, फिर वो भारतीय चाट के स्टाल हो या चाईनीज के नाम पर घातक सॉसेज और मसाले डालकर बनें व्यंजन, माॅकटल्स, आईसक्रीम या कॉफी, पान के स्टाल्स
7 - मिठाइयों के नाम पर कम से कम दस प्रकार की मिठाइयां और आईसक्रीम अलग से, कभी सोचिए इतना दूध देने के लिए क्या हमारे परिवेश में मवेशी बचें भी है जिनके दूध की अतिरिक्त आपूर्ति हो रही है, गांव कस्बों या शहरों में दैनंदिन पूर्ति के अतिरिक्त जरूरत कैसे पूरी हो रही है - जिससे पनीर से लेकर बाकी सब गरिष्ठ व्यंजन बनाएं जा रहे है, एक ही दिन में एक छोटे शहर में पचास जगह शादियां हो रही है तो क्या इतना दूध सच में है भी हमारे पास, पानी की बर्बादी का तो पूछो मत
8 - संगीत, डीजे और मनोरंजन के नाम पर सिवाय शोर, प्रदूषण के अतिरिक्त क्या है और
9 - लेनदेन के नाम पर जो कपड़ा, बर्तन या उपहार हम दे रहे हैं - उससे किसका फायदा हो रहा है, छोटे व्यापारी, बड़े घराने, या व्यवसायियों का, और ये उपहार कपड़े दो - तीन साल में घूमफिरकर क्या हमारे घर में ही लौटकर नहीं आ रहें है किसी कार्यक्रम में, लोग पर्ची भी नहीं निकालते और बगैर सोचे गिफ्ट कर देते हैं
10 - क्या नव विवाहित संपत्ति को मालूम भी है कि शादी जैसे पवित्र बंधन में आशीर्वाद देने कौन आ रहा है या कौन - कैसे समय निकालकर, कष्ट में यात्राएं करके या अपनी जेब का बजट बिगाड़कर आ रहा है - इन्हें तो देखने और मिलने का समय ही नहीं है - रात दस - ग्यारह बजे मंच पर भारी मेकअप के साथ बैठना है और फोटोग्राफर या वीडियोग्राफर के इशारों पर नाचना है - ताकि एल्बम या वीडियो अदभुत और अप्रतिम बन सकें और सोशल मीडिया पर वर्षों तक शेयर किए जा सकें
फिर आखिर में क्या करें -
1 - शादी को परम्परागत ढंग से करना है तो संस्कारों पर ध्यान दें, बेहतर है पंजीकृत विवाह करें और एक छोटी सी पार्टी दे दें
2 - भीड़ न बुलाएं, शादी आपकी प्रतिष्ठा, समाज में स्थान, या व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का प्लेटफॉर्म नहीं है
3 - बैंड - ढोल और ताशे बुलाए, पर शोर ना हो, प्रशासन भी सभी डीजे के डेसिबल का स्तर चेक करें और जो मानकों के हिसाब से ज्यादा हो - उसको जप्त कर लें, ढोल और ताशे वालों को हिंदी में समझा दें नहीं तो जेल में दो - चार दिन रख दें, सब सुधर जायेंगे
4 - मैरिज गार्डन वालों को ग्यारह बजे के बाद कोई भी छूट ना दें अन्यथा उनका लायसेंस रद्द कर दें
5 - आतिशबाजी वालों को लिमिट बांध दें कि बीस या तीस हजार से ज्यादा के पटाखें नहीं बेचे और प्रदूषण अधिनियम का इस्तेमाल कर सकते है इसको रोकने के लिए
6 - भोजन में दस या बीस से ज्यादा व्यंजन ना बनाएं किसी भी हालत में, क्या हम अपने घर रोज या कभी भी दस मिठाई खाते है या पचास प्रकार के स्टार्टर खाते है, केटरिंग वाले हलवाई को भी रडार पर रखें
7 - भोजन छोड़ने वालों को वही सार्वजनिक रूप से कहें, अपमानित करें और अगली बार किसी आयोजन में ना बुलाएं समाज जन - इसकी घोषणा करें माइक से
8 - दुल्हा - दुल्हन शिष्टता से रहें और बजाय इवेंट के इस पवित्र बंधन में बंधने वाले रिश्ते का महत्व समझकर आने वालों का सम्मान करें, सभी रीति रिवाजों को माने, बजाय कैमरे, ड्रोन और वीडियो कैमरे की निगाह में आने के अपने लोगों की निगाह में प्यार और सम्मान के साथ रहें
9 - लेनदेन में ना पड़े, लोग आएं, प्रेम से रहें, मिलें - जुले खाए और सुकून से मधुर स्मृतियों के साथ एक ये दो दिन में ही अपने घर लौटे, भंडारे समझकर पड़े ना रहें हफ्ते भर तक
10 - जितना रुपया आप झोंक रहे है उसका नतीजा सिर्फ यह है कि लोग अंत में आपका ही खाकर "गुलाब जामुन कड़क थे, पूरी कच्ची थी, रोटी गर्म नहीं थी, पानी बहुत ज्यादा ठंडा था या हमको तो स्टेज पर फोटो खींचने को नहीं मिला" कहकर निकलते है
मेरी ओर से ये चंद सुझाव है, बाकी आप जोड़ सकते है, दिनों - दिन शादियां इस सबसे भी टूट रही है और उसके बाद अदालतों में जो मासिक निर्वहन भत्ता, एक मुश्त राशि के लिए नंगा नाच दोनों पक्षों से होता है - वह बेहद दारुण और भयावह है - इससे बचिए
और अंत में समाहार -
दिखावे, भौंडेपन, और बाजार के ट्रैप में फंसने के बजाय अपने बच्चों के लिए कोई फ्लैट, जमीन या कोई अचल संपत्ति आप खरीद कर देंगे - तो वह उनके काम आएगी, लेनदेन में भी यदि आवश्यक हो तो नगदी दें - पर वह भी हजार - पांच सौं से ज्यादा ना हो, ताकि किसी और को अपराध बोध ना हो
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अमेय कान्त की पुस्तक “किसी छूटे हुए दिन में” और उसमें शामिल कविता दो कविताओं के "आवाज" और “न होना” के माध्यम से इस संग्रह पर अपनी बात रख रहा हूँ, समकालीन संवेदनशीलता की गहरी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता हैं यह संग्रह जो कविता में खोए हुए संबंधों और उनकी अनुपस्थिति के स्थायी प्रभाव को बहुत सरल, पर मार्मिक भाषा में व्यक्त करके अपनी बात को कहता है कवि
कविता का केंद्रीय भाव ‘अनुपस्थिति की उपस्थिति’ है— कुछ लोग अचानक जीवन से चले जाते हैं, पर उनका न होना एक अधूरा हिसाब बनकर हमारे भीतर रह जाता है, कवि ने इस ‘अधूरेपन’ को रोजमर्रा की प्रक्रिया से जोड़ा है, जहाँ हम हर दिन थोड़ा-थोड़ा उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह कभी पूरा नहीं होता, यह जीवन की अनिवार्य विडंबना को दर्शाता है, यह कविता उनके संवेदनशील होने की एक बानगी है और समृद्ध भाषा के साथ शक्तिशाली बिंब और प्रतीकों की बात करती है
“बंद बक्सों” और “चाबियों” का बिंब अत्यंत प्रभावी है, यह स्मृतियों, इच्छाओं और अनुभवों के उस संग्रह को प्रतीकित करता है, जो अब हमारे लिए सुलभ नहीं रहा, यहाँ कवि ने प्रतीकात्मकता के माध्यम से गहरी मनोवैज्ञानिक स्थिति को उकेरा है—यादें मौजूद हैं, पर उन तक पहुँचने का रास्ता खो गया है
भाषा की सादगी इस कविता की सबसे बड़ी शक्ति है बिना किसी जटिल अलंकरण के, यह सीधे पाठक के अनुभवों से जुड़ती है। यही कारण है कि कविता व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक बन जाती है,अंततः, “न होना” केवल किसी के चले जाने की बात नहीं करती, बल्कि उस खालीपन की भी बात करती है, जो समय के साथ और गहरा होता जाता है। यह कविता जीवन के उस सत्य को उजागर करती है कि अनुपस्थिति भी एक सशक्त उपस्थिति बन सकती है
दूसरी कविता "आवाज" बिछड़ते संबंधों की अंतिम अनुभूति को मार्मिक रूप से व्यक्त करती है, “काँच की दीवारें” असमर्थ संवाद का प्रतीक हैं, जहाँ आवाज़ें पहुँच नहीं पातीं, पुकार के बावजूद दूरी बनी रहती है और अंततः सिर्फ दरवाज़ा बंद होने की ध्वनि शेष रह जाती है—स्थायी विछोह का संकेत
अमेय का यह दूसरा संग्रह है जो "समुद्र से लौटेंगे रेत के घर" का अगला प्रभावी संकलन है , अमेय ने इधर पिछले दस वर्षों में बहुत धैर्य के साथ कविताएं लिखीं है और देश की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में उन्हें स्थान प्राप्त हुआ है, लंबे समय तक तकनीकी महाविद्यालय में पढ़ाने का अनुभव उन्हें समय, बिंब और भाषा की परिपक्वता ही नहीं देता बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि वे समय के पार जाकर कविता की ताकत को पहचानते है और बगैर शोर गुल के अच्छा बुनते है
हम सबके लिए अच्छी बात है कि वे देवास में रहते है, उन्हें बचपन से देखा है और आज जब वे एक बड़े मकाम की ओर जा रहे है - तो उनकी यह यात्रा सुखद लगती है, पुस्तक पर रेखांकन संजीवनी ताई कांत का है और पुस्तक का बेहतरीन प्रकाशन भाई Banwari Vera Prakashan ने किया है - जहां गलती की गुंजाइश न्यून भी नहीं है, युवा पीढ़ी के इस तरह के संग्रह को पढ़ना और अपने पास की संपदा में होना एक उपलब्धि है और यह कहना जरूरी है कि कविता को कविता की तरह से देखना, समझना, वापरना और किसी खेमे में बंटे बगैर अपनी बात धीमे से और सशक्त तरीके से कहना सीखना हो - तो अमेय कांत को पढ़ना ही चाहिए
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सारे सवालों के जवाब होते भी नहीं और ना ही पूछना भी नहीं चाहिए - क्योंकि असल में सवाल का अर्थ उत्तर नहीं, बल्कि उत्तरों पर संतुलित प्रश्न उठाना है, एक जीवन में एक सवाल से जूझ कर ही हम कोई ऐसा जवाब पा लें कि जीवन में कुछ संतुलन आ सकें और हम निश्चित हो जाएं कि इस जीवन के सारे अनुत्तरित सवाल इस अर्जित उत्तर में निहित है तो शायद हम अपने ध्येय और प्रारब्ध की ओर बढ़ सकेंगे ; मैंने अब से सवाल पूछना बंद कर दिया है और सिर्फ सवाल सोचकर ही काल्पनिक उत्तर खोज लेता हूँ और उनमें अपने - आपको गूंथ देता हूँ, समझने की कोशिश करता हूँ उस वागीश की तरह कि यही सवाल क्यों जन्मा दिमाग में और क्या सच में उत्तर पाना था किसी से या कही से या मैं अपने साथ किसी और को हैदस में डालकर परेशान करना चाहता हूँ, शायद अब उबाऊ और गर्म रेत के टीलों पर लंबे रीतते जा रहे दिनों की यही साधना है और दर्शन भी है
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