आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा था, चलो देर आए दुरुस्त आए, असल में दुनिया के सारे ट्रंप बेहद लीचड़, कमजोर, और धूर्त है - जिनमें दो कौड़ी की अक्ल नहीं है, वे सिर्फ बकलोल है और शेखीबाज है
जो लोग अपने लोगों और अपने देश को साथ नहीं रख सकते, या अपने लोगों के विकास की बात नहीं कर सकते - वे इसके अलावा कुछ और नहीं कर सकते, विशुद्ध रूप से ये सब कायर और डरपोक है और अमेरिकी ट्रंप ने यह कल रात सिद्ध कर दिया और यह भी कि वो पूरा मानसिक रोगी है - बोले तो गंभीर mental, neurotic, depression and anxiety का शिकार है
हमारी मीडिया और मीडिया के दलालों को अब मसाला मिलना बंद होगा, पर कोई ना - अब चुनावों की घटिया रिपोर्टिंग चालू होगी - ताकि इन असुरों के नाखून पैने होते रहें और ये बर्बादी के कगार पर हम सबको ले जाएं
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अदनान कफील की यह कविता इन दिनों सोशल मीडिया पर घूम रही है, बगैर किसी पूर्वाग्रह के एक पाठकीय टिप्पणी कर रहा हूँ, इस कविता को कई बार पढ़ा और आज जब इसे दोबारा पढ़ा तो भयानक बारीकी से बुनी हुई लगी
ईश्वर अगर तू है तो (संशय)
और खुदा के होने पर यकीन है
थोड़ी ज्यादा बारीकी से बुनी है, यह इसलिए सहसा मालूम नहीं पड़ता - पर यह साम्प्रदायिकता की बारीक चासनी से बुनी कविता का बेहतर नमूना है
यह सच है कि समय बहुत अजीब चल रहा है, कविता की शुरुआत ही बेहद खराब ढंग से हुई
हे ईश्वर , यदि कहीं तू है, यानी ईश्वर की सत्ता पर संदेह है, हालांकि दूसरी पंक्ति में ए मेरे खुदा आता है - जिसमें कवि मन्नत मांग रहा
बहुत बारीक ढंग के क्राफ्टिंग की कविता है, इस जन्म में कवि मुसलमान है तो ईश्वर पर प्रश्न चिन्ह लगाने के बजाय खुदा से ही मन्नत सीधे मांगे कि उसे अगले जन्म में हिंदू बनाया जाये, क्या उसने खुदा के अस्तित्व पर प्रश्न उठाया ? कवि यह कैसे उठाता अन्यथा उसे ईश निंदा में फंस जाने का डर था
यह एक पक्ष है जिस पर विचार किया जाना चाहिए, अदनान पर वैसे भी साम्प्रदायिक होने का आरोप लगता रहता है, ऐसी कविताएं लिखने से बचना चाहिए, कल ही कृष्ण कल्पित जी ने भी यही बात एक पोस्ट में कही थी
हालांकि मैं हिंदू मुस्लिम की बहस से दूर हूँ पर इस तरह की कविताएं बहुत दूर तक साथ नहीं चलती और कोई भी लिखें यह इस घातक समय में ठीक नहीं है, हमें सौहार्द्र की जरूरत है, कवि और साहित्यकारों पर जिम्मेदारी ज्यादा है इसलिए यह कैजुअल अटेम्प्ट ठीक नहीं
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"तो ट्रंप सभ्यता खत्म कर रहा है आज रात, और दुनिया खत्म हो जाएगी, तेरा क्या प्लान है यदि निपट गया तो फिर" लाईवा मिल गया था अभी बाजार में, मैने छेड़ दिया ससुर को
"भाई साहब मेरी आत्मा भटकेगी, प्लीज - प्लीज, युद्ध पर लिखी मेरी तेरह हजार पांच सौ बाईस कविताएं पड़ी है, किसी से छपवा दो, आश्वासन ही दे दो और भगवान के लिए कम से कम इक्कावन कविताएं सुन लो, आप घर चलो मैं आया" - लाईवा ने अपनी एक्टिवा को धकेलते हुए कहा
मैंने अपनी गाड़ी बढ़ाई और कहा - "बाबू मैं हरिद्वार निकल रहा हूँ बस अभी, तू घर आ मत जाना, पूरा घर हॉर्मुज की तरह से पैक कर दिया है और सैंतालीस कवि रक्षा कर रहें है घर की, आपस में एक दूसरे को कविताएं सुनाते हुए, समझा" और घर निकल आया, टीवी चालू कर रहा हूँ, अमेरिका के ट्रंप को वादा निभाते देखना चाहता हूँ
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