हिंदी में कवियों का एक गैंग है - जो हर शहर और हर जगह पर सक्रिय रहता है, फिर वो पुरस्कार समारोह हो, दलित आयोजन हो, बुद्ध पूर्णिमा हो, दीवाली हो, होली या राम नवमी, और ये सब ससुरे इतने सुसंगठित है कि एक - दूसरे के बिना मंच पर इनकी ना कविता उतरती है - ना रात को दारू और ना अगले दिन की सुबह वाली
इनमें सत्तर पार से लेकर गेहूँ की बाली या कच्चे चने के जैसे ताजे कमसिन और अमीबा जैसे परजीवी से लेकर लोमड़ी - सियार जैसे धूर्त एवं घाघ एक साथ मौजूद रहते है, और हिंदी का कमजोर अंग्रेजी वाला पीएचडी शोधार्थी ना हो तो चखने के समय ककड़ी कौन छिलेगा या गुरुजी के पोतडे और टट्टी पेशाब के लंगोट कौन धोएगा
साले रोना रोयेंगे दलित, एलीट और सवर्ण का - पर यात्रा हवाई ही होना ही चाहिए, एयरपोर्ट पर अंग्रेजी पढ़ना ना आएं भले और इनकी महफिलें और साजो - सामान, लगेज ही देख लो, चमक - दमक देख लो, दूर दराज तक के कार्यक्रमों के स्थान देख लो - तो समझ आता है कि देश के किसी भी कोने में ये मुंह मारने को शुकर देव की तरह तैयार रहते है और मजेदार यह है कि संचालक एक ही रिपीट होता रहता है जो जुगाड़ से किसी सरकारी कालेज में माड़साब बन गया
भगवान करें ये सब होर्मुज में जाकर कविता पढ़े और दुनिया का फर्जी बाप ट्रंपवा इनको एक सिरे से निपटाता चले और ईरान के तट रक्षकों के हवाले कर दें
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Three Sugar Cubes in the Black Coffee on a Cloudy Day
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मैं जहां तक देख सकता हूँ - वहीं तक संसार है, जहां तक की आवाज़ें मुझे सुनाई देती है - आवाज की दुनिया वही तलक है, जिन फूलों की खुशबू मेरे नथुनों तक आती है - खुशबू वही तक है, जिन रिश्तों की गर्माहट में मैं पकता और संवरता हूँ - रिश्तों की आँच उतनी ही हो सकती है, जहाँ तक मेरी आवाज पहुंचती है और कोई उसे शिद्दत से महसूस कर रूकता है दो घड़ी जवाब देने - उतना ही मैं वाबस्ता रखता हूँ उससे, जिन स्वादों की पहचान से मैं रिक्त रह गया - उनका मेरे लिए कोई अर्थ नहीं, जिस सुख से मैं वंचित रहा - वह सुख की परिभाषा में था ही नहीं और जिन दुखों के दानावल से अनेक लाक्षागृह भेद कर आया - वे ही असली इंद्रिय सुख थे इस नश्वर संसार के
अब हर जगह गुस्सा करने, बोलने, सोचने, और टोकने से बचता हूँ , बहुत कम समय बचा है और जितना भी शेष - नि:शेष है मैं सुकून से और अपने आपके साथ बीताना चाहता हूँ, अपने उन लोगों के साथ जिनसे मैं प्यार करता हूँ, जिनसे मैं सीखता हूँ और खुले मन से बगैर जजमेंटल हुए या अपने को आरोपी या विक्टिम माने बगैर सहज हो सकता हूँ, जो इस रास्ते में आते है विध्वंस की तरह, या किसी भी बाधा की तरह या तो मैं उन्हें हटा देता हूँ या उनसे दूर चले जाता हूँ
जीवन में सबसे बड़ी चीज अपने भीतर की यात्रा है जिसे Mutiny से ही पाया जा सकता है और यह जब तक नहीं सुलगेगी जीवन का अर्थ और रहस्य नहीं उभरेगा
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आज वास्तव में शर्म महसूस हो रही है कि हमारा प्रधान ना मात्र विशुद्ध झूठा और कमजोर है बल्कि महिलाओं को हथियार बनाकर अपने पद पर बने रहना चाहता है
असल में भाजपा और संघ से लेकर तमाम कट्टर पंथियों की यही रणनीति रहती है कि महिलाओं को ही आगे करो, उनके ही कंधे पर रखकर बंदूक चलाओ दंगों में बलात्कार की शिकार महिलाएं ही होती है, क्या हिंदू और क्या मुस्लिम
बहरहाल, सफर में था, अभी प्रधान का भाषण सुना, इतना गैर जिम्मेदार, कमजोर और झूठा प्रधान इतिहास में किसी भी देश में नहीं हुआ होगा और तो और पूरी बेशर्मी से देश के सामने आकर अपनी ही कमजोरी गिना रहा है, रो रहा है
जनता को यह समझना चाहिए़ कि इसका जादू खत्म हो गया है और एक ममता जैसी सशक्त महिला को दबाकर वोट हासिल करने के लिए इसने SIR से लेकर परिसीमन बिल तक को गलत तरीके से संसद जैसी पवित्र जगह पर पेश किया और आखिर हार गया
संसद पर ही शक है अब तो, इन चार पांच राज्यों के चुनावों में कुटिलता कर भले ही यह जुगाड़ करें, अमित शाह जब तक गृह मंत्री है इस देश में चुनाव कभी निष्पक्ष नहीं हो सकते लिखकर रख लो, और यह देश के लिए बहुत नुकसानदायक तथ्य है, बंगाल, केरल, आसाम में इतना आसान नहीं होगा - यह केरल, कोलकाता, आसाम आदि जगहों के दोस्तों से बैंगलोर में लंबी बात कर समझ आया है
पर आज का दिन कलंकित दिन है - जब पूरी दुनिया ने एक थके हुए झूठे और कमजोर प्रधान को सार्वजनिक रूप से अपनी गलती स्वीकारते हुए और पछताते हुए देखा - जिसने अपनी हार का ठीकरा महिलाओं के बहाने विपक्ष पर डाला
जियो, खुश रहो प्रधान, और अब घर जाओ, बुढ़ापा सुधारो - वरना क्या कहते है "स्वर्ग में भी जगह नहीं मिलेगी"
अच्छा समय आयेगा, ये सब भी गुजर जायेगा
छी !!!
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आदमी जितना अंदर से दुखी होते जाता है - उतना ही वो बाहर से हर्षिल, दोस्ताना, व्यवहारिक, संयमी, नैतिक, ईमानदार, एक्स्ट्रोवर्ड नजर आने लगता है, इसलिए जब भी कोई बहुत मुस्कुराता हुआ शख्स नजर आता है तो मैं बहुत धीरे से कंधे पर हाथ रख देता हूँ और पूछ लेता हूँ कि भाई क्या हाल, और यकीन मानिए एक ही क्षण में वह फफक कर रोने लगता है
पहचाहिये अपने आसपास के ऐसे दुखों में डूबे लोगों को, उन्हें आपकी हंसी और प्रशंसा नहीं बल्कि साथ चाहिए, सुनने वाला चाहिए़ और समझने वाला भी
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डॉक्टर भीमराव अंबेडकर से ज्यादा संविधान, जाति, और छुआछूत पर लिखने वालों और उनकी बातों का अर्थ का अनर्थ करने वालों और अपच की हद तक इंटरप्रेटेशन करने वालों और उनके जन्म की लीलाओं और मूर्तियों को पूजा-पाठ कर भयानक ब्राह्मणी रीति-रिवाज अपनाने वालों को, पांचवीं-छठी पीढी में शिक्षा, नौकरी, सुविधाएं एवं प्रमोशन में आरक्षण का लाभ लेकर जाति प्रथा को कोसने वालों को भी अम्बेडकर जयंती की बधाई
अगले जन्म में बाबा साहब के बराबर एक डिग्री भी ले लें और समाज की बेहतर समझ विकसित कर लें तो मान जाऊं मैं
विद्वान, कानून के ज्ञाता और वैश्विक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर भारत का उदार संविधान बनाने वाले डाक्टर अंबेडकर को नमन
जय भीम
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