Khari Khari, Drisht Kavi, Kuchh Rang Pyar ke, Man Ko Chiththi and other posts from 23 to 30 Sept 2024 [Dr Asharam Chaudhary]
***
"एक लेखक किसे कहेंगें"
◆●◆
मुद्दा क्या है
मेरा एक आलेख एक पत्रिका में छपा और मैंने अपने शहर के कुछ लोगों के नाम लिखें जो प्रतिनिधि लेखक है, एक मित्र ने कहा कि A, B, C, D, X, Y, Z जैसे लोग घटिया लेखक है, ये क्या लिखते है, इनकी क्या समझ है और आप ने यह सब क्या लिखा है, एक लेखक को सच बोलना चाहिये, दुःख की बात यह है कि इन घटिया लोगों के साथ आपने मेरा नाम जोड़ा हुआ है
______
मेरा जवाब था "और मैंने जो लिखा - पूरे होशो हवास में लिखा और सच ही लिखा भी है, इन लोगों की जब कविताएँ, कहानियां छप रही, किताबें आ रही तो फिर क्या किया जाए - लेखक होने के मान्य पैमाने तो छपना, किताब, लगातार साहित्यिक कार्यक्रमों में भागीदारी करना है फिर वो कार्यक्रम भले मुहल्ले, गाँव, समुदाय, जिले या राज्य स्तर के हो, यदि इन्हें बुलाया जा रहा है तो हम किसी की पहचान को कैसे नकार सकते हैं, और ये लोग उपस्थित है - हर जगह इसे नकार नही सकते
आपके खेमे या गैंग के एक लेखक या लेखिका का नाम नही लिखना और बाकी सबको नकारना तो कोई बात नही है, और इसमे सम्माननीय या धन्य हो कहने की क्या बात है , लेखन के लिए नियमित, विविधतापरक और लगातार सक्रिय रहने का है और सृजन का है और भले फिर किसी भी विषय पर हो - साहित्य, राजनीति, अर्थ शास्त्र या ज्योतिष भी, क्योंकि लिखने में जो श्रम, मेहनत, शोधपरक दृष्टि और एक व्यापक समझ की जरूरत होती है, एक दिन में 50 कविताएँ लिखना और हजार पेज की कविताओं वाली किताब एक बार लिखकर चुप हो जाना या लगातार सेटिंग करते रहना, यारी दोस्ती वाले आयोजन करना लेखन कर्म तो कतई नही है, दिल्ली, लखनऊ, पटना, भोपाल, बनारस, प्रयागराज, शहडोल, अनूपपुर, गांधीनगर, कोची, हैदराबाद, चैन्नई, विजयवाड़ा से लेकर रतलाम उज्जैन, इंदौर तक के ऐसे लोगों को जानता हूँ जिन्होंने बरसों से कुछ नही लिखा पर हर माह मजमा जमाकर लेखक का बैच टाँगकर आयोजन कर लेते है जैसे हर पूनम - अमावस की रात को सत्यनारायण की कथा करो, दाल बाटी खाओ और पखवाड़े के लिए सो जाओ [ हमारे मालवे में यह रिवाज़ है ]
हो सकता है ये लोग उर्फ लेखक उस स्तर के ना हो, आपके कॉमरेड ना हो, किसी जोशी, तिवारी, शर्मा, वर्मा, लाला, या इप्टा, अलेस , प्रलेस, जसम या किसी और के झाँसे में ना हो, पर सबके अपने फालोवर्स तो है, वे छप तो रहें है, किताबें आ रही है, उनकी समीक्षाएँ आ रही है, छोटे ही सही - पुरस्कार मिल तो रहें है, इसलिये मुझे तो लगता है कि वे लेखक है और शहर, समुदाय या गाँव की नुमाइंदगी तो करते है, हो सकता है मैं गलत हूँ और मैंने पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर किसी का नाम छोड़ा हो, या बहुत कांशियस होकर लिखा हो, पर एक लेखक को इतनी तो छूट है कि वह अपनी पसंद और नापसन्द को जाहिर कर सकें, मुझे नही मानना किसी चरणदास और चपलेश को लेखक जो इष्ट इष्ट कर चापलूसी के रिकॉर्ड तोड़ दें, किसी ब्यूरोक्रेट के चम्मच बनकर प्रदेश प्रदेश घूमता रहें और अपने इलाके में प्रतिबद्धता का ढिंढोरा पीटे, कांग्रेस सरकार में नर्मदा आंदोलन के समर्थन में दिग्विजय सिंह को लम्बी चिठ्ठी लिखें और 2014 के बाद बकवास लिखने लगे, एक भी कविता इस क्रूर शासन या सत्ता के खिलाफ लिखने के बजाय किवाड़ बन्द करके घर में बैठ जायें, बड़े मुद्दों पर बात करने के बजाय बच्चों के बीच बैठकर भजन गाने लगें और सस्ती नौटँकी में उलझ कर ज्ञान बाँटते हुए बीस हजार के लिफाफे में घुस कर बैठ जाये या सेटिंग कर अपनी निकम्मी औलादों के लिए देशभर में पुरस्कार बटोरता फिरें, या लेखन के बरक्स धन्धे तलाश कर माल खपाने के उपक्रम खोजता रहें
मेरे लिए विधाओं के बजाय विविध विषयों पर मौलिक लिखने वाले ही लेखक नज़र आते है, पता नही सच क्या है, सच की कितनी परतें है, सच और सापेक्षता क्या है पर लेखन एक सतत प्रक्रिया है, प्रेम - मुहब्बत, जलन, कुंठा, बदला, अपराध बोध, भावुकता, लगाव, पद - पैसे - प्रतिष्ठा और सेटिंग करके लेखन कर्म नही किया जा सकता और ना ही ये सब धत्त करम करने वाले लेखक है
***
कृषि मंत्रालय, और Agriculture Skill Council of India, भारत सरकार के तहत प्रधानमंत्री कुसुम योजना के अंतर्गत मप्र के 6 कृषि विज्ञान केंद्रों का चयन किया गया है जहां किसानों को प्रशिक्षण दिया जायेगा, देश भर के विभिन्न राज्यों के 100 कृषि विज्ञान केंद्रों को पाइलेट के तौर पर लिया गया है
इस योजना का मुख्य उद्देश्य 2026 तक खेती किसानी में डीज़ल का उपयोग कम करके सौर ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाना है , साथ ही ज़मीन की गुणवत्ता बढ़ाने, सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन बढ़ाने और खेती को लाभ का व्यवसाय बनाना इसका उद्देश्य है, एक बड़ी राशि सरकार ने इसके लिए रखी है, किसान उत्साहित है और इसमें बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी करना चाहते है, इसी क्रम में कल रतलाम जिले के कालूखेड़ा ग्राम स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में भारत सरकार के प्रशिक्षक के रूप में उपस्थित होकर दिन भर किसानों से बात की, अच्छी बात यह थी कि आने के बाद देर तक किसान भाइयों के फोन आते रहें और आज भी सुबह 5 बजे से ही फोन आ रहें है कि हम यह संयंत्र अपने खेत, गाँव मे लगाना चाहते है आप बताएं कि आगे क्या
जितेंद्र पाटीदार से और सोनू धाकड़ से मिलना उपलब्धि रही, जितेंद्र ने अंगुर की खेती करके यहां अम्बी वाईन का विशालकाय व्यवसाय स्थापित कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है और वही सोनू ने रियावन लहसून उगाकर जियो टैग हासिल किया है , दोनो युवा है और अतिशिक्षित हे जितेंद्र ने पीएचडी किया है और लंबे समय अमेरिका में रहें है वही सोनू ने NIT रायपुर से एमसीए किया है और उनके भाई ने भी सूरत से उच्च शिक्षा हासिलकर दुबई की नौकरी छोड़कर दोनो भाईयों ने खेती का विकल्प अपनाया है , कई युवा किसान चिया बीज से लेकर कीनू, सन्तरा, अमरूद, आयुर्वेदिक दवाएं, मसाले और कीवी जैसी नई फसलें, फल, फूल लगाकर नए प्रयोग और नवाचार करके खेती में उन्नत तरीके अपनाए रहें है पर सरकारों की उपेक्षा, लागत कीमत का ना मिल पाना, सोयाबीन का न्यूनतम भाव 6000 ₹ कर देना चाहिये जैसे मुद्दे भी प्रशिक्षण में उठे, मालवा क्षेत्र में किसानों ने इस सबके बावजूद खेती में मेहनत करके उत्कृष्ट परिणाम दिए है और अभी भी रोज नए रेकॉर्ड कायम कर रहें हैं, कृषि कर्मण का पुरस्कार चार - पाँच बार लगातार मिलना राजनैतिक नही बल्कि किसानों की मेहनत का फ़ल है यह एहसास कल पुख्ता हुआ, अभी प्रदेश के दूरस्थ इलाकों में और जाना है और सीखना है
खेती आजकल जहाँ घाटे का सौदा माना जाकर लोग धंधों और नौकरी पर आ गए है वही कुछ युवाओं ने खेती में नवाचार करके अदभुत काम किया है और वे चलते - फिरते कृषि विवि बन गए है
सवाल हिम्मत, रिस्क और आत्मविश्वास का है - मेरे लिये भी यह सब सीखना कौतुक भरा है और बेहद शैक्षिक भी , देशी लोग, सहज लोग, मीठी जुबान और अपनी बात बिल्कुल साफगोई से करते और धैर्य बनाकर सुनते लोग कितने अच्छे होते है
***
कोई कितना भी सभ्य बनने की कोशिश कर लें, कितना भी सहज बनने की कोशिश कर लें, कोई कितना भी मनुष्य होने का भेष धर लें, कोई कितना भी स्वतंत्र,जागरूक, लिबरल, खुली मानसकिता का होने का दिखावा कर लें - पर उसके भीतर की पाशविक प्रवृत्तियाँ कभी नही जाती और सिर्फ़ एक बात से समझा जा सकता है - जैसे बदला यानी Revenge
हम सब लोग ओछे, धूर्त, मक्कार, लोभी, धन पिपासु और अकर्मण्य है और हमारे पास बदले के अलावा कोई और हथियार नही है, इसलिये इस हथियार को हम नित्य घिसते रहते है और हर दिन, हर क्षण इस्तेमाल करते है और इसके लिये ये कही भी, किसी की भी चापलूसी कर "चपलेश" बन सकते है, हम सब मूल रूप से कमजोरियों और कबीलाई पैशाचिक और लड़ने भिड़ने वाले मनुष्यगत अमानवीय मूल्यों की उपज है - ऐसे में किसी से भी "आदर्शवाद में जीने और जीने दो" का कुविचार ही मूर्खता है
पहचानिये और सतर्क रहिये
***
कवि - एक व्यवस्थित संगठित कौम या गैंग या साहित्यिक साम्प्रदायिक समूह का अनिवार्य हिस्सा है और कविता इस गैंग की भुक्तभोगी है इसलिये जब कोई कवि कहता है अपने आपको तो उसके इंसान होने पर शक होता है और सहज होने पर भी, इस गैंग से जितना बच सको - बचो क्योंकि आत्म मुग्धता, यात्राओं, आयोजनों, प्रकाशन के नीच कर्मों में, छपने के उपक्रम, अपने आपको क़िताब के साथ बेचने के दिखावे वाले उत्सवों में डूबे ये लोग पतित हो गए है और जानलेवा भी - ये किसी भी समय आपका खून या चरित्र हनन से लेकर अपहरण तक कर सकते है
यदि फेसबुक बन्द हो गया तो इनकी आधी आबादी आत्महत्या कर अपराध बोध से डूब मरेगी उसी क्षण और शेष मेंटल हो जायेगी , वैसे भी अभी Extreme पर पहुँचे लोग Psychic है इसमें कोई शक नही - ठोस सबूत के साथ नामजद बता सकता हूँ हर खेमे और गैंग के कवियों को
***
डॉक्टर Asharam Choudhary मात्र 23 वर्ष के है, वे हमारे जिले के है, बारहवीं में कड़ी मेहनत की और फिर NEET की परीक्षा उत्तीर्ण की देश भर में अग्रणी रैंक लाकर, जोधपुर एम्स में उनका चयन हुआ, एमबीबीएस करने के बाद प्रीपीजी की परीक्षा उत्तीर्ण की, इस बीच उन्होंने राजस्थान के सिरोही जिले के आबू रोड में एम्स जोधपुर के "आदिवासी स्वास्थ्य एवं शोध संस्थान" में प्रमुख रिसर्चर की चुनौती भरी भूमिका स्वीकार की और देश के पहले टेली - मेडिसिन केंद्र का आरम्भ किया, यह इलाका आदिवासी बहुल है और ऊँची पहाड़ियों और घने जंगल के कारण आदिवासी समुदाय बहुधा अस्पताल नही आ सकते, अस्तु ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल से दूरस्थ इलाको में आशा और एएनएम के सहयोग से वे खून पहुँचाने से लेकर विभिन्न प्रकार के सेम्पल एकत्रित करने का कार्य ड्रोन तकनीक से कर रहें है, कम्युनिटी मेडिसिन हेतु वे कई प्रकार के प्रयोग और नवाचार कर रहें है जिसकी यहाँ काफी ज़रूरत है
उनका चयन पीजीआई चंडीगढ़ में हो गया है और मेडिसिन में मास्टर्स करने के बाद न्यूरोलॉजी में सुपर स्पेशलाइजेशन करेंगे
मैं माउन्ट आबू आया हूँ तो आशाराम बहुत उत्साह से मिलने आये, असल में सुबह कुछ गड़बड़ हो गई - अन्यथा मुझे उनका केंद्र देखने जाना था जिसे देश की महामहिम द्रोपदी मुर्मू जी 4 अक्टूबर को देखने आ रही है, अच्छा लगा कि बेहद होशियार, प्रतिभावान आशाराम आज एक बेहतर डॉक्टर होने के साथ कुशल स्वास्थ्य प्रशासक भी है जो 18 लोगों के स्टाफ को इस छोटी सी उम्र में मैनेज कर रह रहे है, जिला कलेक्टर से लेकर ब्लॉक के अधिकारियों के साथ समन्वय और भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ भी बड़ा काम कर रहे है
उन्ही के साथ यहां के एसडीएम गौरव सालुंखे से भी मिला जो आयएएस है और यहाँ उनकी पहली पोस्टिंग है, महाराष्ट्र के जलगांव जिले के ग्राम चोपड़ा के रहने वाले गौरव मात्र 26 वर्ष के है, 2021 बैच के अधिकारी है, पेशे से मेकेनिकल इंजीनयर है और बेहद ऊर्जावान है, देर तक हम मराठी में बात करते रहें, गौरव को यहाँ मराठी भाषी शायद ही कोई मिलते होंगे, उनकी आँखों में बहुत कुछ करने के सपने देखें और विज़न भी साफ था, ज़मीनी मुद्दों पर पकड़ है और फंडे भी साफ़ है
मुद्दे की बात सिर्फ इतनी है कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दीजिये और सही मार्गदर्शन भी - ताकि वे अपना जीवन तो सँवार ही सकें और परिवार, समाज, और देश के लिये भी श्रेष्ठ काम करके कुछ सार्थक कर सकें और इसके लिए मेहनत करनी होगी - अपने बच्चों से ज़्यादा हमें - ताकि हम उनका भविष्य बना सकें
ये दोनों मेरे लिए जीवन में प्यारे दोस्त और ताक़त है अब, दोनो ने अपने काम देखने और कुछ मिलकर करने के लिये आमंत्रित किया है, अब यहाँ एक नही दो दो घर है, जल्दी ही फिर आऊँगा ताकि मैं भी कुछ सीख सकूँ इन युवा मित्रों से
***
भारतीय संविधान में
Right to...
दुर्भाग्य से ये सब होने या संविधान में होने के बाद ...
◆ सरकारी स्कूल बंद हो गए है और गरीब बच्चों के लिये शिक्षा नही है
◆ भुखमरी से लोग मर रहे है या खानपान की सामग्री महंगी हो गई
◆ जो लोग लिख रहे है या बोल रहे है उनका क्या हश्र हो रहा है
◆ जीवन में सुरक्षा बची ही नही है कोई भी आकर आपको निपटा सकता है
◆ सूचनाओं को दबाने की बड़ी साजिश रची जा चुकी है
ऐसे में संविधानिक मूल्य या संविधान में वर्णित प्रस्तावना का क्या महत्व है ?
बहस लम्बी है पर संविधान पर बहस तो बहुत हो रही है, खूब लिखा पढ़ा और समझा जा रहा है, पर सब कुछ विपरीत होते जा रहा है ऐसे में ये सारे सवाल मौजूं है
एक बहस यह भी है कि संविधान में अधिकार और कर्तव्य ही है मूल्य है ही नही
बहरहाल, मज़ेदार है यह सब पर देश को, युवाओं और मीडिया से लेकर बाकी बुद्धिजीवियों, संविधान लागू करने वालों पर कोई कही असर है क्या
आपको क्या लगता है
***
जीवन में अपेक्षाओं को पूरा करने, कर्तव्य निभाने, अति अनुशासन, समय की पाबंदी, सिद्धांत, मूल्य और नियमितता का एक कालावधि तक ही महत्व रहता है, जब जीवन में सुबह, दोपहर, शाम और रात होती है और हम सब कुछ समय चक्र या इसके सापेक्ष करते है - काम, विचार या कृत्य, परन्तु बहुत जल्दी ही यह अवधि भी बीत जाती है
असल में बदलते समय में अनुभव, उम्र और कालावधि जैसे दिन, महीने या साल, साल नही रह जाते, हम एक दिन में बहुधा 48 घण्टे या 72 जीते है और काम करते है, अपने - आपको मशीन बनाकर निचोड़ देते है कि स्वेद का मीठा फ़ल हमारे अकर्मण्य जीवन के अंतिम अरण्य में बीतने वाले शुष्क और जरावस्था के चरम दिनों में काम आयें, और यह श्रम साध्य काम करते हुए बहुत जल्दी हम अपना जीवन उस मकाम पर ले आते है - जहां दिन - रात या सुबह-शाम का फ़र्क़ मिट जाता है
अगर आपको लगता है कि आपके जीवन से दिन - रात का या भूखे रहने और खाये - पीये का फ़र्क़ मिटने लगा है, तो आपने पर्याप्त ज़िंदगी जी ली है और अब समय है कि आप सबसे मुँह मोड़ लें और बस ज़िंदादिल होकर ज़िन्दगी बेफ़िक्री से जियें - यही एक मात्र पैमाना है - जब आप एक पूरे दिन को खाँचो में ना बाँटकर समग्र रूप से हर दिन को एक पूरा दिन इकाई के रूप में देखना शुरू करें और इस एक - एक दिन की धरोहर को अपनी जीवन्तता और उत्साह से अमर एवं अजर बना दें
फिर देखिए कैसे आपको हर क्षण ख़ुशी और तसल्ली महसूस होगी, दिन - रात और समय चक्र के अनुसार काम करने की दिनचर्या प्रकृति ने नही, बल्कि इंसान ने अपनी सुविधा के लिए बनाई है - इसलिये बगैर किसी दबाव में आयें अपने हिसाब से अपनी दिनचर्या और काम के घण्टे तय करें, यह तो हम सहज रूप से जानते है कि पूरब की सुबह पश्चिम की रात है या इसके विपरीत
जीवन किसी की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए नही - सिर्फ़ एक उत्सव की तरह से जीने के लिए है - जो शेष है आपकी शिधोरी में उसे उन्मुक्तता और निर्भय होकर जियें - यही मूल मंत्र है ख़ुशी और संतुष्टि का
Comments