Friday, June 30, 2017

नर्मदा यात्रा , पौधारोपण और राज्य के मूल कर्तव्य - नागरिकों के संदर्भ में



नर्मदा यात्रा , पौधारोपण और राज्य के मूल कर्तव्य - नागरिकों के संदर्भ में 

मप्र में पिछले 15 वर्षों में नाटक, लुभावने नारे, घोषणाओं और मूर्खताओं के अलावा कुछ नही हुआ।
व्यापमं, रेत खनन से लेकर फर्जी एनकाउंटर, किसान आत्महत्या के कारण हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके है। राज्य क्या कर रहा है - सिंहस्थ में 3000 करोड़ रूपये बर्बाद, घर पर पंचायतें बुलाकर घोषणाएँ, सिर्फ और सिर्फ नाटक।


पिछले साल से एक बड़ा मेलोड्रामा नर्मदा के नाम पर चल रहा है जिसमे राज्य का खजाना खाली कर दिया गया है। पहले पांच माह नर्मदा यात्रा चली और प्रशासन ठप्प रहा, और अब 2 जुलाई को पौधारोपण के नाम पर एक माह से राज्य में सारे काम ठप्प पड़े है। कई अधिकारियों से बात की तो वे कह रहे है कि कुछ काम नही कर पा रहें , सारा समय इस नौटँकी में जा रहा है। मतलब मूर्खता यह है कि विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए महिला कर्मचारियों को जो चपरासी, लिपिक, शिक्षक, डाक्टर या प्राध्यापक है का पौधें कैसे लगाएं इसकी ट्रेनिंग पर खर्च, फिर इन्हें दूरदराज के गांव में 1जुलाई की रात पहुंचना है और रात वही रुककर अगले दिन सुबह से अनुश्रवण का काम करना है वो भी ऑन लाईन । इसके सारे प्रपत्र अंग्रेजी में है। एक प्रशिक्षण में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने जब हिंदी में प्रपत्र की मांग की तो उन्हें डाँट दिया गया। महिला डॉक्टर्स, लिपिको और प्राध्यापकों ने पूछा कि रात कहां रुकेंगे तो जवाब मिला हमे नही मालूम, फालतू सवाल मत पूछो।

सभी को जानकारी ऑन लाईन भरना है एक मोबाइल एप में जानकारी देना है , क्या सबके पास स्मार्ट फोन है ?  ये मूर्खतापूर्ण सलाह कौन देता है इस ज्ञानी को जनता के चौराहे पर सामने लाकर पूजा की जाना चाहिए।

एक आदमी की कुर्सी प्रदेश में जब भी खतरे में पड़ी है प्रदेश ने करोड़ों रुपयों की नौटँकी देखी और देखते देखते खजाना खाली हो गया। ठीक इसके विपरीत प्रदेश में महिला हिंसा के ग्राफ से कुपोषण, मातृ मृत्यु दर, सरकारी अस्पतालों में लापरवाही से मौतें, स्कूलों में अव्यवस्था बढ़ी है। पर हम शर्म, लाज या हया बेच चुके है। केंद्रीय नेतृत्व को यहाँ बुलाकर विचारमंथन,शहीद स्मारक या नर्मदा के गुणगान करने बुला लिया जाता है । इतने बड़े फंड से किसानों का कर्ज माफ हो सकता था, बेरोजगारों को नौकरी दी जा सकती थी, संविदा कर्मचारियों को नियमित किया जा सकता था।

प्रदेश का मीडिया , कुछ को छोड़कर, बिका हुआ है जो एक डील में सब कुछ बेच देता है, जमीर तो बचा नही है इनमे , अब जाकर देखना होगा कि बीबी बच्चे सलामत है या वो भी देहरी पर सजे - धजे तैयार है बिकने को।और बात जनता की, आखिर में वो तो हिन्दू राष्ट्र के कृषि कर्मण प्रदेश की नागरिक होने पर गर्व महसूस करती है। धन्य है ये लोग और इनकी बुद्धि जो नर्मदा पर रेत खत्म हो जाने पर पौधों के झुनझुनों को अपना जीवन मानती है। कर्मचारी यूनियन निष्क्रिय है जो कल सत्ता के गाय भैंस और बकरी भी चराने चले जायेंगे। काहे के प्राध्यापक और डॉक्टर इंजीनियर जो "ना" कहने की औकात नही रखते और भेड़चाल में कुचले जाते है। तुम लोग ऐसे ही तानाशाह को डिजर्व करते हो। और ब्यूरोक्रेट्स - वे तो गिरगिट है ही और अब इस सरकार की नींव में ऐसे उलजुलूल सुझाव देकर मठ्ठा डाल रहे हों।

मैं भी सोच रहा हूँ भगवा चोला पहन लूँ और मित्रों और बच्चों के लिए कमा लूँ । क्या रखा है सच्चाई बयान करने से, अभी यहां ज्ञानी आकर भड़केंगे जो भूख नही राज्य या राष्ट्रभक्ति का तराजू लेकर चलते है आंखें बंद करके। धिक्कार है इस प्रदेश के बुद्धिजीवियों पर।

एम पी अजब है, सबसे गजब है

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