Wednesday, August 31, 2016

NH-12 & other one Poem, Umber and Tarun Sagar in Assembly Posts of Aug 16 last week.


कविता की जमीन पर एक नया विमर्श, भाषा, विन्यास और कल्पना के साथ बेहद संजीदा किस्म की कविता लेकर आते है Umber R. Pande. इधर कविता को लेकर थोड़ी सी समझ विकसित करने की कोशिश कर रहा हूँ, सफर में नामवर जी की किताब नई कविता के प्रतिमान रख ली थी जिससे दृष्टि साफ़ हो सके क्योकि उस दिन देवताले जी और मदन कश्यप जी से बात करते बदलते शिल्प और समझ को लेकर काफ़ी बात हुई थी।
अगर उन्ही प्रतिमानों और खत्म होती जा रही कविता की बात करें तो यह अनुष्ठान अब नए सिरे से सृजित करना होगा और सब पुराने को लाल दफ़्ती में बांधकर मैले कुचैले कोनों में रखकर किसी शोधार्थी को कभी काम आ सके , उस भर लायक रखकर कवियों के साथ ही विलोपित कर देना होगा। क्योकि बात शमशेर, मुक्तिबोध से शुरू होकर अम्बुज, राजेश जोशी से होते हुए एकदम विचारधारा में जकड़े और पैठे हुओं के बीच खत्म हो जाती है पर अब समय है Anuj Lugun से लेकर Jacinta Kerketta Aditya Shukla और अम्बर का और हमें यह स्वीकारना ही होगा और अब अगर "सबसे नई कविता के प्रतिमान" या पैमाने खोजने या बनाने है तो इनकी भाषा में रचा जा रहा सब कुछ समझना होगा फिर वो गद्य हो कविता या एक सांझी समझ, हिंदी और दीगर भाषाओं के पुरानी समझ वाले जड़ बुद्धि प्राध्यापकी के नकली ठसकों से कविता को निकालने की जरूरत है।

अब ना कवियों को कविता की परख और समझ है (कुछ को छोड़ दें तो) और आलोचक को तो आप सिर्फ नाम भर बता दीजिए, वह आपका खेमा जानकार ध्वस्त करने में कोई कसर नही रखेगा। इसलिए अब नए लोग, नए कवियों और नई भाषा-तेवर पर बात कीजिये अगर समझ हो तो, वरना वाट्स पर से लेकर तमाम ब्लॉग खुले पड़े है 100 से 200 लोग झेल ही लेंगे आपको, रोज सुबह से देर रात तक चिल्लपों करने वाले और चरण रज चूमने वाले मौजूद है वहाँ ।
बहरहाल परसों खत्म हुए सावन मास और अगस्त के आख़िरी दिन जब बरसात ने मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है और इधर दूर खेतों में कांस भी नजर आने लग गई है तो धूजते तलुए और अधगीले चौके में प्रेम और भूख के बीच एक छंद सुनने की आहट गुनिये और इसे अंदर तक महसूस करिये।
'अधगीले चौके में वह'
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अधगीले चौके में वह
छौंकती है खिचड़ी आधी रात
उजाले को बस ढिबरी है 
सब और सघन अंधकारा है

मावठा पड़ा है पूस की काली रात
शीत में धूजते है 
उसके तलुवे
मुझे लगता है मेरे भीतर
बाँस का बन जल रहा है

सबसे पहले धरती है पीतल
भरा हुआ लोटा सम्मुख, फिर पत्तल पर 
परसती हैं भात धुन्धुवाता
सरसों-हल्दी-तेल-नौन से भरा

'यही खिला सकती हूँ
मैं जन्म की दरिद्र, अभागिन हूँ 
खा कर कृतार्थ करें
इससे अधिक तो मेरे पास केवल यह
देह है 
मैल है धूल है, शेष कुछ नहीं'

संकोच से मेरी रीढ़ बाँकी होती 
जाती है ज्यों धनुष 
वह करती रहती है प्रतीक्षा 
मेरे आचमन करने की
कि माँग सके जूठन

और मेरी भूख है कि शांत ही नहीं होती
रात का दिन हो जाता है
अन्न का हो जाता है ब्रह्म

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जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ "मोमिन"-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो…

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आप सफ़र में हो लंबे सफ़र में और आपके साथ कोई महाज्ञानी फंस जाए जो अनथक बोलता रहें, उसके पास हर जगह की तथ्यात्मक जानकारी हो, फिल्मों की बकवास कथाएं हो, यात्राओं के उबाऊ विवरण हो, अपने घर परिवार, गोलू मोलू और किसी दोस्त के साथ बिताए पलों की विशुद्ध मूर्खतापूर्ण स्मृतियां हो, लम्वे चौड़े कामों की महानता के किस्से हो जिसमें वह हर बार सही और श्रेष्ठ रहा हो, ज्ञान की दूकान हो खाने से लेकर गंगोत्री और जमनोत्री तक की जड़ी बुटियों और वियतनाम से लेकर दूर दराज के हेण्ड पम्प मैकेनिक की कुंडली हो और जन आन्दोलनों से लेकर ठेठ अकादमिक बहस के गंवई अनुभव हो बावजूद इसके कि दस ठो जगह से हकाले जाने की असलियत सब जानते है फिर भी आपके साथ और सब पर भी पूरी यात्रा में चढ़ बैठे और पेलता रहें तो आपकी इस लोक की ही यात्रा ही नहीं परलोक की यात्रा की भी बुकिंग कंफर्म हो जाती है।
तंग आ गया हूँ कहानियां और बकवास सुनते सुनते, हो सकता हो वह मुझे आपको या हम सबको भी यूँही दिल मसोजकर कोस रहा हो पर शायद उसके पास यह अभिव्यक्ति करने के मौके या भाषा की शक्ति ना हो। पर दीगर समाज में रहना है तो इन्हें झेलना ही होगा पर अब तय किया है कि सबसे भली चुप और एक किताब साथ रखने से ये पुराण बांचने वालों से मुक्ति मिलेगी।
खग ही जाने खग की भाषा !
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अलोक यानी इस लोक के नहीं रहें अब हम, लिहाजा हरियाली अब नसीब में ना होगी और ग़र कभी फिर यह अवसर मिला तो शायद समेटने लायक ना रह पाएं इस या उस तरह से, इसलिए किसी दूर कोने में खड़े होकर हाथो की उँगलियों में नर्मदा के पानी का अर्ध्य देकर मुआफी .... अफसोस रहेगा और इस बात को दर्ज किया जाता देखकर संताप से भर उठूंगा कि जरूरत में अपने ही धोखा दे जाते है.
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फेसबुक को जो लोग गम्भीर नही मानते, जरा एक बार किसी मूर्धन्य के लिए, समर्थन या विरोध में प्रशंसा, समालोचना या व्योम में नारा उछालकर देखिये फिर देखिये तीर कैसे कहाँ और किस हद तक लगता है। धमकी से लेकर तमाम तरह के हथियार शुरू कर देंगे ये लोग।
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ताश के पत्तों की मानिंद है ज़िन्दगी फराज

जिस किसी ने भी खेला, तकसीम मार दिया मुझे .

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जीवनयात्रा, तनाव, संताप, खुशी और दुखों के बीच पानी का वेग, नर्मदा, इंसान का अदम्य साहस कि नदी के ऊपर से झुला बनाकर पार कर जाना........यह सब सभ्यता का ही तो विकास है परन्तु यह विकास मानव की सुविधाओं को बढाने के लिए हुआ पर जीवन के स्तर को बदलने के लिए अभी सैकंडो युग लगेंगे शायद..........
फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है और तमाम विघ्न संतोषी ताकतों के बाद भी सभ्यता में ऐसे परिवर्तन जरुर आयेंगे जो छोटे से जीवन को शान्ति और सुकून के सिर्फ दो पल दें सकें - मौत को एकदम करीब पाकर हम कह सकें कि जो जिया वो बहुत था और अब चिर शान्ति मिलें तो चैन पाऊं, यह सब तभी होगा जब हम कुछ पल अपने लिए चुरा कर एक असली जिन्दगी जी सकें पानी और प्रकृति के सानिध्य में.
होगा सब होगा, होना ही होगा क्योकि मौत का दिन मुकरर्र है और लाजिम है कि हम भी देखेंगे........
यूँ तो नर्मदा से मेरा नाता है गहरा और वात्सल्य वाला पर जब भी किसी तट से गुजरता हूँ तो इसका पानी जो सौम्य हो या चिंघाड़ता मुझे खींच ही लेता है पिछले दिनों भेडाघाट से गुजरते हुए फिर नर्मदा की बेचैनियाँ और खामोशियाँ सुनते हुए............
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शाम तो ढल ही जाती है बस रात शुरू होती नहीं वो जो एक शुभ्र सुबह ला सकें
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हाजी अली की दरगाह पर महिलाओं के जाने पर जिन कठमुल्लों को दिक्कत है वे बीमार है और यदि ज्यादा बीमार है तो किसी इस्लाम पसंद देश चले जाएं ।
सारे धर्म स्थल सबके लिए खुले हो या फिर बन्द कर दो और वहां अस्पताल खोल दो या सब तोड़कर गरीबों के लिए प्रधानमंत्री योजना में मकान बनवा दो।
कोर्ट के निर्णय सबको मानना होंगे कोई भी हो। जिसे भी देश में शेष रहना है उसे कोर्ट और न्याय मानना होगा अन्यथा रास्ता खुला है बाहर का। मुल्लाओं को अब कुरआन और मनगढ़ंत आयतों से बाहर आना ही होगा।
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पिछले दिनों में हुई घटनाओं के लिए सरकार नही जनता जिसमे आप, तुम, वह, और मैं शामिल हूँ क्योंकि वोट हमने दिया है और हम चुप बैठ गए।
सवाल उठाइये, अपने पार्षद, पंच, सरपंच, विधायक, महापौर के पास जाईये उसे एक बार प्यार से बुलाकर सम्मान कर दीजिए, कुछ मूर्खतापूर्ण कार्यक्रम कर लीजिए और फिर उसे सार्वजनिक रूप से गलियाइये, सबसे खरी खरी सुनवाईये। फिर उसे सब लोग उसे वाट्स एप से लेकर फेसबुक पर घिसिये और इतने आवेदन दीजिये कि यदि मरने लगे तो कफ़न के साथ लकड़ियों कण्डों की जरूरत ना पड़े।
अपने पत्रकारों पर नजर रखें यदि आपकी खबरें ना आये तो पूरा मोहल्ला और कॉलोनी में उस अखबार का बहिष्कार कर दें और सुबह जाकर हाकर से छिनकर जला दें।
प्रशासन से जुड़े लोगों को भी गुलाब या बेशर्म के फूल दें और उसके बाद दफ्तर के बाहर सब लोग मिलकर अच्छे से पूजा करें ताकि वे सही समय पर सही न्याय संगत काम करें।
वकीलों डाक्टर और तमाम सेवा प्रदाताओं से भी बातचीत को रिकार्ड कर लें और मुहल्ले के मंदिर मस्जिदों से बजने वाले भोंपुओं पर सबको सुनाये ताकि इनकी असली औकात सामने आये।
जो भी करें मिलकर करें और जो साथ आने में आना कानी करें उसके घर के सामने कचरा फेंके और सामजिक बहिष्कार करें।
अगर आप बोलेंगे नही तो आपकी लाश को जलाने को कोई नही मिलेगा, आप वैसे भी जिंदा नहीं है एक लाश बनकर रह गये है, सबूत दीजिये जिन्दा होने के। याद है ना Uday भाई की कविता की अंतिम पंक्ति
कुछ नही सोचने और 
कुछ नही बोलने से 
आदमी मर जाता है

जस्टिस ठाकुर, प्रमुख न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट, ने भी आज कह दिया है कि हम पर भरोसा ना करें हम भी कुछ नही कर सकते। पिछले दिनों प्रशांत भूषण ने भी कान्हा में यही कहा था कि कोर्ट अब जनहित की बात नही सुनता, ना ही फैसले देता है। इसलिये बेख़ौफ़ होकर क़ानून हाथ में लीजिये और तत्काल अपना न्याय खुद कीजिये
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हम सब पहाड़, धरती और आसमान है
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तुम्हारी आँखों में हरियाली देखना चाहता हूँ, ये हरापन समेट रहा हूँ ....
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NH 12 , पर स्थित गाँव खलोड़ी में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले 6-7 वर्षों से कोई स्टाफ नही है, एक चपरासी अशोक दास के भरोसे यह केंद्र चल रहा है और हम कितने चिंतित है स्वास्थ्य को लेकर ? शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को और कुपोषण लेकर अक्सर तनाव में रहते है। यह केंद्र मण्डला जिले में है मवई ब्लॉक में। गौंड बैगा आदिवासी बहुल गाँव का विकास कैसे हुआ होगा यह सोचने वाली बात है जबकि यह गाँव समेकित कार्य योजना में स्वीकृत है। यह केंद्र 34 गाँवों को कव्हर करता है।
गांव में 3 टी बी के मरीज है जो भगवान के भरोसे है, लेबर रूम की स्थिति भी भयावह है चार प्रकार के डस्ट बीन वही है और छह ट्रे की व्यवस्था छिन्न भिन्न है। अगर आदिवासियों के लिए यह आपका सुशासन और प्राथमिकता है तो देश के हर हिस्से से दानी माझी अपनी पत्नी उमंग की लाश लेकर निकलेगा, क्यों ना इन सबको दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट भेज दिया जाए क्योंकि नालायक नेता और अधिकारी तो कुछ करने से रहें।
कल मैंने लिखा था कि बिछिया और मवई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी एक - एक डॉक्टर के भरोसे चल रहा है।
मामाजी कहाँ है आपका सुशासन और विकास ?
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मीडिया में चोरी बहुत सामान्य है।पिछले दिनों एक नामी गिरामी तथाकथित लेखक जो बौद्धिक आतंकवाद का पर्याय बन रहा था और यहां जबरन ज्ञान पेल रहा था , की लेखनी को विकी पीडिया और गूगल से मारा हुआ पाया और मैंने लिख दिया तो कल मुझे ब्लॉक करके भाग गया।
मजेदार यह है कि यह चोरी वह एक लिंक पर भी पेलता है
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एन एच 12 
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एन एच 12 पर ट्रक दौड़ रहे है
रायपुर से जबलपुर की तरफ
लदा है लोहा इतना कि दब गए है ट्रक
परेशान है चालक, क्लीनर और बारीक
दिल्ली मुम्बई और बड़े शहरों में जाएगा
लोहा देश की ताकत है, विकास का पैमाना
लोहा जमीन से निकालकर बनाया जाता है
चार दिन में इतना लोहा ढोये जाते देख लिया 
कि
मुझे नफरत हो गयी है लोहे से 
मुझे इस लोहे में छत्तीसगढ़ के पहाड़ी कोरबा या 
विलुप्त होते उजाड़ दिए गए आदिवासियों के आंसू 
जवान होती आदिवासी लड़कियों का खून नजर आता है
धान के कटोरे के खेतों से जवान लड़कों के खात्मे का, 
जंगल को बेचने और पर्दे के पीछे के चट्टानी सरकारी 
नजरिये, निर्णय और पुलिस का दमन याद आता है
सोना सोड़ी के अभियान पर बन्दूक चलाता प्रशासन 
नजर आता है जो नक्सल के नाम पर लोहा बनाता है 
जिंदल, अम्बानी और अडानी की बू इस लोहे से आती है मुझे
ये ट्रकों पर दौड़ता लोहा मुझे अपनी छाती पर रखा
विकास का बोझ लगता है जिसने 
मेरी साँसे, संस्कृति और परम्परा छिनकर 
सदा भटकने के लिये एक इंसानी जंगल में छोड़ दिया है।

-संदीप नाईक

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नर्मदा किनारे की बेचैनियां बरकरार है बुरी तरह से, बहता जल भी जब कालिमा लिए हो और अपना ही अक्स नदी के पानी में नजर ना आये तो समझ लीजिए मुआमला गड़बड़ है।
ये सिर्फ नदी नही है मेरे लिए , एक उथल पुथल है, झंझावात है जीवन का और अनहद की तरह बजता हुआ नाद है जो मुझे बेचैन करता है, आल्हादित करता है, शोक से भर देता था, संताप से भरा हुआ जब नर्मदा के किसी पुल से गुजरता हूँ या दूर किसी किनारे पर एकजीव होने की कोशिश में अपने अंदर से उठते आवेग और नदी के उद्दाम वेग से जूझता हूँ तो मुझे मंडलेश्वर में जन्मी माँ के कहें और सुनाये नर्मदा के आख्यान याद आते है, अमरकंटक के छोटे से गोमुख से निकली वेगवती याद आती है, नेमावर तट पर मुकुल शिवपुत्र के राग और कबीर याद आते है, जबलपुर के भेड़ाघाट पर उफनती चिंघाड़ सुनाई देती है , महेश्वर में अहिल्या देवी के बनाये घाटों से क्रुद्ध और टनकार बजाती नर्मदा याद आती है, होशंगाबाद के सेठानी घाट पर पूजा पाठ और पाखण्ड का बोझ ढोकर रेतघाट से मुर्दो के पाप बहाकर ले जाती नर्मदा याद आती है। खेड़ीघाट, बड़वाह में पहले पिता, फिर माँ और अभी छोटे भाई की अस्थियां खमाकर आया था, मृत्यु को देखते - भुगतते हुए जीवन से दो चार होना आपने नही देखा हो शायद, पर मैंने जाना है। आज फिर मण्डला में साथ साथ गुजरती नदी में सुन रहा हूँ पुकार और चीख, वात्सल्य और क्रंदन !!!
अब ये बेचैनी खत्म करना ही होगी, ये सब नही चलेगा अब
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जन्माष्टमी की शुभकामनाएं। 

कृष्ण के समान पक्षपाती बनें, युद्ध करवाएं, गीता सा ज्ञान पेलते रहें, भोग विलास में लिप्त रहें और राधा, रुक्मणि, मीरा से लेकर 16000 सूक्तियों तक भी संलग्न रहें पर सबमे रहकर भी तटस्थ रहें जो एक साधारण कर्मवीर पुरुष, माखनचोर कृष्ण को श्रीकृष्ण बनाकर कालजयी कर देता है।

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आशुतोष गोवारिकर को कोसने का कारण जे एन यू में ना पढ़ पाने का फ्रस्ट्रेशन भी है और किसी छोटे मोटे कस्बे में नकल कर घटिया किस्म का काम करते हुए बौद्धिक आतंकवाद फैलाने में हुई बाधा भी है।
शाबाश आशुतोष !!!
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सफर है जिल्लत, जलालत तो होगी ही
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हिंदी में कुछ बेरोजगार पी एच डी होल्डर स्वयम्भू कवि उर्फ़ आलोचक नौकरी ना मिल पाने के कारण कुछ गरिष्ठ कवियों और तथाकथित जुगाडू लोगों की कठपुतली बनकर अपना भविष्य तो बर्बाद कर ही रहे है बल्कि जिस कविता और पक्षधरता की बात प्रतिबद्धता से करने के मुगालते में सबको गाली देकर अपने कुसंस्कार यहां दर्शा रहे है वह चिंतनीय है, इस तरह वे अपना और कविता एवं आलोचना का भी नुकसान कर रहे है।
मजेदार यह है कि छोटे कस्बों और सरकारी महाविद्यालयों में रट्टा मारकर संविदा कर्मचारी से स्थायी व्याख्याता बने ये लोग, रिश्वत और चापलूसी से एक गाँव में बरसों से टिके रहने वाले और प्रोफेसर कहलाने की इच्छा रखने वाले इन्हें शह दे रहे है क्योकि अपनी ओछी बुद्धि से किसी विवि के विभाग या बड़े महानगर में नौकरी पा नही सकें तो इन युवाओं के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहे है।
ये तथाकथित प्रोफेसर ना बनें निराश्रित, दया के पात्र जीव ना अपने विषय अनुशासन के रहें, ना दीगर भाषाओं के , ना हिंदी के - सिर्फ दलित और पराये होकर रह गए हर जगह से , इसलिए अब परजीवी की तरह से गुजर - बसर कर बुढापा सुधार रहे है - लौंडों लपाड़ों पर हाथ फेरकर !!!
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सूरज निकला फिर सुबह हुई
शाम ढली, अन्धेरा हुआ , इस तरह से
नए नवेले कमरे में रात हुई

चींटियां आई, फिर छिपकली

चूहे आये और इस तरह से
नए नवेले कमरे में संसार आया

भरी धूप में पतरे तपे
हवाओं के साथ धूल आई, इस तरह से 
नए नवेले कमरे में पसीना निकला

पहली बरसात में छत टपकी
दीवारों में सीलन आई, इस तरह से
नए नवेले कमरे में दुःख आया

अब इंतज़ार है ठंड का
कांपने और गर्माहट का, इस तरह से 
नए नवेले कमरे में जीवन का

- संदीप नाईक 
17 अगस्त 16

एक बरसाती शाम को गर्मी महसूस करते हुए नए नवेले कमरे में 
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1 comment:

Kavita Rawat said...

...बघिया उधेड़ कर रख दी....
जबरदस्त..