Tuesday, August 2, 2016

शेखर सेन बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - देवास में हुए शेखर सेन के कार्यक्रम की आलोचना पर अंध भक्तों की प्रतिक्रिया पर जवाब


शेखर सेन बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - देवास में हुए शेखर सेन के कार्यक्रम की आलोचना पर अंध भक्तों की  प्रतिक्रिया  पर जवाब 
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भांड जब आत्म मुग्ध होकर किसी प्रतिष्ठित मंच पर चढ़ता है तो उसके मुंह खोलते ही सारी गन्द बाहर आ जाती है ।

देवास के संगीत समारोह में एक नजारा लाइव चल रहा है ।

अब समझ में भी आ रहा है कि क्यों ये भांड लोग संगीत कला अकादमी से लेकर फिल्म संस्थानों में काबिज है, राम भजन के साथ भद्दे चुटकुले सुनाने वाले और बेहद गलीज तरीके से आत्ममुग्ध ये लोग पता नहीं क्या समझने लगे है. 

आज जो देवास के एक मंच से देश की संगीत कला अकादमी के अध्यक्ष को देखा सुना उससे अंदाज लगाया जा सकता है कि ये लोग किस तरह से घटिया लोगों को संस्थाओं में काबिज करके संस्कृति को क्या स्वरुप देना चाहते है. मेरे लिए मेरी व्यक्तिगत राय में यह सबसे घटिया कार्यक्रम था उस मंच पर जहां भीमसेन जोशी से लेकर बिस्मिल्लाह खान साहब या तीजन बाई जैसी कलाकार ने प्रस्तुतियां दी हो.


यह मेरी व्यक्तिगत राय है, आपकी राय अलग हो सकती है। पोस्ट की समझ को समझकर ही टिप्पणी करें अपने विवेक से अन्यथा दूसरों के विचार अपने काँधे पर लादकर कृपया मोहरा ना बनें और ना ही अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करें। किसी भी व्यक्ति या कार्यक्रम के बारे में निजी राय रखना मेरा अपना मत है और आपका सहमत होना आवश्यक नही। जिस अंदाज में भांड चाटुकारों को पदमश्री बंटे है उसके लिए भारत सरकार की आलोचना कर चुका हूँ और बड़े संस्थानों में अयोग्य लोगों को बिठाना यदि आपको नही चुभता तो मै सिर्फ आपको मुआफ़ ही कर सकता हूँ। आपकी छोटी दृष्टि के लिए मैं जिम्मेदार नही ।


फेसबुक  पोस्ट  31 जुलाई  16

सुनो, बेहूदा लोगों। तुम बेहूदा हो, कोई शक नहीं, दुनिया भी बेहूदा है और बेहूदगी के इस शिखर काल में बेहूदगी ही गुणधर्म है। बेहूदा लोग ही बेहूदाओं को आगे बढा रहे हैं। यही मापदंड है। लेकिन चूंकि मैं दुर्भाग्‍य से बेहूदा नहीं हूं, इसलिए आप को पूरा अधिकार है मुझे परेशान करने का। आप कर सकते हैं, करते रहेंगे। काश मैं भी आपकी तरह बेहूदा होता। चूंकि नहीं हूं, इसलिए इंजॉय योर बेहूदगी।

लेकिन अपने मूल्‍यों पर कायम रहना ठीक है।

किसी भी कला को पसंद करने या ना करने के अपने पैमाने होते है, चाहे बात संगीत की हो, कविता की या कहानी की. देवास में शेखर सेन का एक कार्यक्रम हुआ था, 31 जुलाई को तो मुझे पसंद नहीं आया क्योकि उन्होंने जो भजन, या कुछ रचनाएँ सुनाई वो मुझे पसंद नहीं आई इसलिए मैंने थोड़ा तल्ख़ लिखा और यह भी लिखा कि राम भजन गाने से लोग संगीत कला अकादमी में अध्यक्ष बन जाते है और विभिन्न अलंकरण भी प्राप्त कर लेते है, रजत शर्मा से लेकर अनुपम खैर के उदाहारण सामने है. मुझे शेखर सेन का गायकी वाला पक्ष समझ नहीं आया, हो सकता है वे महान हो, नाटक बेहतर करते हो, समझ निश्चित ही मुझसे उम्दा होगी, क्योकि पदमश्री प्राप्त है और उनका अपना एक श्रोता वर्ग है. पर यदि मुझे किसी की कहानी या कविता पसंद नहींआती तो हम समालोचना करते ही है पर जवाब में कभी किसी साहित्यकार ने खुद या किसी का कान्धा इस्तेमाल करके बिना हड्डी की जुबान वाला कुत्ता जैसे शब्दों से जवाब नहीं दिया, लोकतांत्रिक तरीकों से अपना विरोध जताया है. इस समय में किसी को भांड कहना कोई गाली नहीं है. यदि इतिहास की समझ इतनी कच्ची है तो मुझसे बहस मत कीजिये और जाकर पहले समझ बढाईये अपनी.

अफसोस हुआ कि बेहद संस्कारित माने जाने वाले तथाकथित लोगों ने शर्मनाक ढंग से टिप्पणी की वो भी असंयत भाषा में. दूसरा श्रोताओं को एक प्रतिष्ठित मंच से जब एक बेहद भद्दा या चलताऊ किस्म का चुटकुला यदि कोई पदमश्री कलाकार सुनाएँ जो महिलाओ के लिए अपमानजनक हो तो क्या हम इसके लिए गए थे, यह चुटकुला था 'पत्नी को पति कभी घूमाता नहीं और एक दिन वादे के अनुसार श्मशान घाट ले आता है और पत्नी के पूछने पर कहता है, पगली यहाँ आने के लिए लोग मरते है". यह चुटकुला बिलकुल भी अश्लील नहीं है पर कहाँ और किस श्रोता वर्ग को और किस प्रसंग के प्रत्यार्थ सुनाया जा रहा है यह मेरे लिए कम से कम विचारणीय है. लोग कपिल शर्मा के शो में भी आख़िरी तक बैठे रहते है इसका यह मतलब नहीं कि वह श्रेष्ठ शो है. देवास के इसी मंच पर उस्ताद से लेकर मूर्धन्य गायकों ने प्रस्तुतियां दी हैऔर इस सारे संदर्भ में मुझे लगा कि टिप्पणी करनी चाहिए. मुझे यह भी लगा कि हमारे शहर की कई भजन मंडलियाँ रसखान से लेकर मीरा, दादू, कबीर और ज्ञानदेव, तुकाराम तक के भजन सुनाते है फिर ये सज्जन जोआये थे इनका क्या?
दरअसल में हमने इस समय में सहनशकित के सारे पैमाने खो दिए है और बेहद आक्रामक होकर हम संस्कार, सभ्यता भूलकर जोश में या किसीअपढ़ के बहकावे में आकर टिप्पणी कर देते है पर जब तर्क की बात की जाती है तो भाग खड़े होते है. यह स्वाभाविक भी है क्योकि किसी और की भावना हम गाली - गलौज में निकाल लेते है और जब खुद को जवाब देने की बनती नहीं तो चुप्पी साध लेते है.
मुझे अपनी टिप्पणी का कोई अफसोस नहीं, ना मै डिलीट करूंगा, संगीत कला अकादमी के पदेन अध्यक्ष होने के नाते मै शेखर सेन का सम्मान करता हूँ पर उस दिन उनकी प्रस्तुती मुझे अच्छी नहीं लगी यह बात कहने के लिए स्वतन्त्र हूँ और जिसे आपत्ति है वे मेरी वाल ना पढ़े और ज्यादा दिक्कत है तो रुखसत ले लें पर मेरी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बोलने और ओछे शब्द कहने का अधिकार किसी को नहीं है. और ध्यान रहें मुझे आपसे रोटी बेटी का सम्बन्ध नहीं निभाना है और ना मै आपकी दी हुई रोटी खाकर ज़िंदा हूँ और नाही मुझे आपसे या किसी से किसी प्रमाणपत्र की दरकार है या पुरस्कार की जिसे चाहिए वो लोग लगे है जुगाड़ और सेटिंग में ना मुझे कलाओं के धंधे चलाना है. बदतमीजी मुझे आपसे ज्यादा और कारगर तरीके से आती है.

घटिया किस्म के  कमेंट्स  आने  के बाद  फेसबुक टिप्पणी  2 अगस्त 16

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