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Meeting with Sanjay Kirloskar and Memories of Radio 13 Feb 2020


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व्यक्ति जितना बड़ा होगा उतना ही सहज, विनम्र और शालीन होगा - संजय किर्लोस्कर

लक्ष्मणराव किर्लोस्कर जी की जीवनी का हिंदी अनुवाद और सम्पादन किया था, गत 6 जनवरी को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इस किताब का लोकार्पण दिल्ली में किया था - यह कार्यक्रम 10 जनवरी को पूर्व निर्धारित था, पर किसी कारणवश पीएमओ ने इसे पहले करने का अनुरोध किया और मैं जा नही पाया - अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों की वजह से
आज किर्लोस्कर समूह के प्रमुख श्री संजय किर्लोस्कर, अपनी पत्नी प्रतिमा, बेटे आलोक और पुत्री रमा किर्लोस्कर के साथ मिलने का मौका मिला, संजय जी ने मुझे आमन्त्रित किया था, उनके संग पुस्तक के साथ - साथ अन्य विषयों पर लम्बी बात की, संजय जी बहुत ही सहज व्यक्तित्व है और लगा ही नही कि एक बड़े उद्योग घराने के मालिक से बात कर रहा हूँ
उन्होंने CSR पर बात की और उनकी पत्नी ने भी किशोरियों, महिलाओं के साथ आजीविका के क्षेत्र में काम करने में रुचि दर्शाई , साथ ही शिक्षा में क्या किया जा सकता है इस पर बात की
संजय जी ने अनुवादित पुस्तक को पढ़ते हुए मोदी जी की तस्वीर भेंट की साथ ही अपने संग और काम करने के लिए निमंत्रित किया, यह दुर्लभ अवसर था अपने काम की स्वीकृति और प्रशंसा किसे अच्छी नही लगती
बहरहाल कुछ तस्वीरें आज के दिन की ताकि सनद रहे
***
उफ़्फ़ लाईट गई
मोमबत्ती लगा दें - माँ ने कहा
कहाँ है मोमबत्ती - पूछा मैंने
बीच के कमरे में होगी गेहूं की कोठी पर
भोजन छोड़ उठा रसोई से , बीच के कमरे में आया, रेल के डिब्बे नुमा मकान होते थे, मोमबत्ती ढूँढकर जलाई, खिड़की में नीली प्लास्टिक की बॉडी वाला रेडियो रखा था उस पर धर दी और पुनः खाना खाने रसोई में आ गया
थोड़ी देर बाद धुआं उठा, मोमबत्ती पिघल गई थी, रेडियो में आग लग गई थी, पिताजी ने दो लगाए थे कसके कान के नीचे कि "बेवकूफ आठवी में आ गया और इतनी अक्ल नही - प्लास्टिक पर रख दी मोमबत्ती"- मिलिंद , उदय और संजय मुंगी का मकान था बजरंग पूरे में - किराए का , उस घर के ना भूलने का एक कारण यह भी है - अक्ल तो आज तक नही आई, माँ - पिताजी दोनो गुजर गए- समझाते समझाते पर अपन ठेठ गंवार ही है अभी भी
मिन्नतों से सुधारने के लिए डाला इंदौर एक परिचित के यहाँ - आज तक नही आया 1977 के बाद से, रज्जब अली खां मार्ग पर स्थित माँ साब के घर में खरीदा था पिताजी ने हम भाइयों के लिए क्योंकि पिताजी बाहर थे और माँ भौंरासा जाती थी, हम दिन भर गाने सुनते और रात पौने नौ बजे समाचार - सुधीर को याद हो शायद
जब टेप आया तो टेप रिकॉर्डर में रेडियो था क्या कहते थे "टू इन वन" फिर कालांतर में भी मोबाईल में रेडियो बजाया, पर वो मरफी का नीले प्लास्टिक बॉडी वाला रेडियो कभी नही लौटा और अब जो सारेगामा आया है चमकीला और महंगा वह इतना आकर्षक नही कि रेडियो को रिप्लेस कर दें
#रेडियो की याद

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