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Posts of I week of Feb 2018



सकल योग के हम अनाथ

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बात करने से बिगड़ती है बात

चुप रहने से संदेह पुख्ता होते है


इशारों से मजबूत होती है भंगिमा
पोजिशन लेने से बिगड़ते है अक्स
तटस्थ होने से भंग होती है स्थिति
जैसे पानी को ढाल देते है बर्तन में

समय असल में कुछ भी ना करने का है
एक चुप्पी भी आपकी मौत का कारण है

इस सबके बावजूद भयानक शोर में
एक आदमी ईंट गारा उठा रहा है
एक स्त्री आती है बुहार जाती है सड़क
एक सद्यप्रसूता दूध पिला देती है शिशु को
एक पिता टूटी चप्पल पहने निकलता है
बहनें दो रोटी ढाँककर रखती है भाई के लिये

लम्बी गाड़ी चलाते हुए ड्राईवर निस्पृह होता है 
उसके भरोसे सो जाते है हजारों यात्री नींद में
समय बख्शता नही है किसी को अपने समय में

एक शब्द कागज पर जन्मते समय शिद्दत से
रचता है भरापूरा प्रतिपक्ष व्यवस्था के ख़िलाफ़

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फिर प्रजा को समझ आया कि उन्होंने क्या ग़लती की। राजा को ईश्वर का दूत मानकर वे अपना भला करने वाला समझ रहें थे वह तो हाट बाज़ार में आने वाला फरेबी व्यापारी निकला जो उनकी फसल सस्ते में खरीदकर शहर में बड़े दल्लों को बेच देता है।
प्रजा ने समझ लिया था और दस बीस गांवों के बीच लगने वाले बाज़ार के लोगों ने सलाह मशविरा कर एक ओर से इस फरेबी और लूटखोर को हकालना शुरू कर दिया था। दुकानदार परेशान है, हाट फीका है, लोग संगठित हो रहें है और फरेबी अभी भी बीच बाज़ार में जमूरों के साथ लच्छेदार भाषा मे नई दुनिया के सपने बेचने में मशगूल हैं।
- नये जमाने मे प्रेमचंद होते तो
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एक कृतघ्न राष्ट्र का घोष
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ठीक ग्यारह बजे सायरन बजता 
सारा राष्ट्र कातर भाव से खड़ा होता

श्रद्धांजलि देता बापू को 
हत्यारे को याद कर अहिंसा की बात दोहराता

स्कूल से लौटती माँ शाम को पर्स में से 
नमकीन और पेड़ा निकालकर देती 
हम जब उछल कर खुशी से खाते तो 
दुख से भर जाती माँ और कहती 
मेरा जन्म दिन सारा राष्ट्र मनाता है
पर दुख में और हम समझ नही पाते

मरने तक ग्यारह बजे का सायरन 
हर तीस जनवरी को सुनती रही
हिंसा, अहिंसा के किस्से सुनाती रही
आज होती तो और दुखी होती 
हत्यारों का यशगान सुन 
भीग जाती आँखे उसकी शायद

अच्छा हुआ माँ गुजर गई 
सन दो हजार आठ में लम्बी बीमारी से
सायरन अब भी बजता है हर साल
हिंसा भी गूँजती है हर ओर भौंडी आवाज में
हत्यारे मुस्कुराते है मुस्तैदी से पूरी
न्याय भी कत्ल कर दिया गया है अभी
राष्ट्र अब कृतज्ञ नही है बापू के लिए

माँ और बापू दोनो नही है अब 
बापू गुजरे और माँ जन्मी सन अड़तालीस में
देश भी अड़तालीस में ही मर गया 
जो बचा है अब मुर्दा देश है जो 
हर साल सिर्फ तीस जनवरी को 
ग्यारह बजे सायरन सुनकर कोसता है
और फिर काम पर लग जाता है

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