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Khari Khari, Drisht Kavi and Man Ko Chithti - Posts from 4 to 8 Jan 2026

 माननीय एक नाम हुआ करता था प्रदेश में भजन गायक होने के साथ साथ दबंग मंत्री और इंदौर के मील क्षेत्र में हर घर में घुसपैठ थी, लोकप्रियता बढ़ने के साथ दबंगई और गुंडागर्दी बढ़ती गई और माननीय के समर्थकों के साथ बेटे ने जिस तरह से इंदौर जैसे शांत शहर में हरकतें करना शुरू किया उससे दिनों दिन लोकप्रियता कम होती गई, इंदौर में ये और इनके एक छर्रे विधायक के कारण जमीन लेना मुश्किल हो गया, एक प्लॉट की चार रजिस्ट्री है, रुपया देने के बाद भी कालोनाइजर कब्जा नहीं देता क्योंकि खौफ इतना है कि क्या कहें

भगीरथ पूरे में पानी कांड के कारण सोलह लोगों की मृत्यु और फिर अनुराग द्वारी को घंटा कहकर मखौल उड़ाने के बाद आज पूरे प्रदेश में कांग्रेस ने जो प्रदर्शन किया - उसने माननीय की इज्जत खराब ही नहीं की, बल्कि एक नकारात्मक छबि भी बना दी है और सारे पाप उजागर कर दिए, प्रदेश ही नहीं - राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बदजुबान और खराब नेता की छबि में बदल दिया इनको
यह घातक राजनीति भी है, सिंहस्थ से पहले ठिकाने लगा दिया है सरकार बहादुर ने ताकि मुख्यमंत्री बनने का सपना अधूरा ही रह जाएं, मप्र में शिवराज सरकार ने संगठन में ठेला था, संगठन ने बंगाल भेजा तो वहां से ममता बैनर्जी के द्वारा हार का सेहरा बांधकर आए, विधानसभा का चुनाव जीता तो लगा कि वरिष्ठ होने से मुख्यमंत्री बना देंगे पर अतीत पीछा नहीं छोड़ता और कर्म आड़े आ ही जाते है, एक अदना सा मंत्री बनाकर रखा था जूनियर के सामने और रही सही कसर ताजे पानी कांड ने कर दी, कायदे से तो सांसद बनाना था, पर भाजपा में मंथरा, शकुनि और कंस कम थोड़े ही है, दिल्ली लोकसभा जाते तो वहां भी नटखटपन छोड़ते थोड़े ही, और शाह है तो इनकी क्या जरूरत, भाजपा ने इस बहाने पूरी राजनीति खत्म कर दी माननीय की, इंदौर के ताजा भागीरथ पूरे के कुरुक्षेत्र के महाभारत में इन्हें अभिमन्यु की तरह घेरकर खत्म किया जा रहा है और ये बेबस होकर सब देख रहें है, मप्र में भी यादवराज सब पर हावी है, निगम का कमिश्नर यादव ही था जो इनके संग खेला कर गया
कैरियर खत्म हो गया, अब 2028 में टिकिट तो मिलने से रहा, बुढ़ापा भी बदनामी के गलियारों में गुजरेगा और लानत मज़म्मत होगी वो अलग, कुल मिलाकर यह सब बढ़िया है, बंद गली के आखिरी मकान से रह गए है माननीय
देवास कांग्रेस ने आज इस मुद्दे के बहाने अपने सभी नए-पुराने लोगों को इकठ्ठा कर विधायक के घर के सामने घंटे बजाएं, अब यहां से भी भाजपा का सफाया होना चाहिए या कम से कम महल का आतंक खत्म होकर सामन्तवाद का खात्मा होना चाहिए, बहुत हो गया चालीस वर्षों से एक ही घर का कुशासन और बेहद लचीला और कमजोर नेतृत्व ने शहर का सत्यानाश कर रखा है, भाजपा गांधी परिवार को कोसती है पर इनके घर में परिवारवाद का ठेका चल रहा है वह नहीं दिखता किसी को, देवास में एक भी तंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा, कम से कम ढंग का दमदार व्यक्ति आए - भले भाजपा से आए, पर नशा, शराब और बाकी अनैतिक कामों में संलग्न नेतृत्व को अब व्यक्ति बदलना चाहिए वरना जनता अब छोड़ेगी नहीं, इंदौर के भजन गायक के बाद सभी पॉप गायकों और रैपर्स की बारी आएगी यह समझ लो
मप्र में ग्वालियर, देवास, गुना, शिवपुरी, इंदौर, धार, राजगढ़, रीवा आदि कई ऐसे जिले हैं जो राजघरानों के अधीन रहें है, यहां की जनता के लिए देश और प्रदेश अभी भी राजदरबार से चलता है और प्रिवीपर्स का शासन है इसलिए ये जिले सामंतवाद की चपेट में है, सिंधिया, पवार, होलकर, सिंह आदि सब इसी राजघराने के वंशज है और इनमें सामंतवाद कूट कूटकर भरा है और यह गुरूर अस्सी साल की आजादी के बाद भी नहीं टूट रहा तो तंत्र की दिक्कत है और संविधान की भी जो लोगों को गरिमामयी नागरिक बनाने के बजाय कायर और बुझदिल बना गया और लोग डरते है यह जानते हुए कि उनके पास एक वोट की ताकत है जो संसार बदल सकता है
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टाईम पास मूंगफली की तरह है वे, कभी-कभी पुराने किस्से सुनने या पुरानी चर्चित बहसों की भसड़ सुनने साल में एक बार जाया जा सकता है, किसी घटिया कार्यक्रम में द्वीप प्रज्वलन कराने, किसी अचर्चित कवि की 21 किताबों का एकसाथ केशलोचन समारोह में इन ना बिकने वाली किताबों की समीक्षा करने, कोई ढंग का व्यक्ति ना मिलने पर अध्यक्षता करने, घर-द्वार में ब्याह ठहराते समय रिश्ते जोड़ते समय और परिवारों में दोनों तरफ के गड़े मुर्दे उखाड़ने, नई पीढ़ी को लगातार कोसने, शिक्षा व्यवस्था और महंगाई को कोसने और वाट्सअप विवि के ऑडियो सुनकर या परमपिता के वीडियो देखकर धर्म-संस्कृति से लेकर इतिहास तक ज्ञान देने वाले ही बचे है अब वे, हाल ही में 77 वाँ जन्मदिवस मनाया उन्होंने
पर एक बात है कविता लिखने का हौंसला बरकरार है और मरने से पहले साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ पर नजर लगातार बनी हुई है
हर चीज को छाती से चिपकाकर बैठे है - किताब हो या फटा पायजामा, या घर में पड़ा जंग खाता लोहे का टूटा पलंग, पुराना गुलबंद या कि कोई इलाहाबाद या काशी-मुंबई में हुए किसी साहित्य गोष्ठी की याद, पर बंदा कुछ छोड़ने को तैयार नहीं, समय आ गया है कि इनकी अध्यक्षता बंद की जाए और ग्यारह से इक्कीस रूपये के पुरस्कार देने की परम्परा भी उखाड़ फेंक दी जाएं
हिंदी का कवि लोक तीन लोकों से भारी है
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"इस अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 44 में वर्णित समान आचार संहिता यानी समान सिविल कोड, CrPC 125 के पहलुओं को समझा है और यह फैसला देती है कि हर तलाकशुदा औरत को मेंटेनेंस का हक़ मिलना चाहिए , इस्लाम की सबसे बड़ी किताब कुरान कहती है कि इंसाफ और मुहाफ़िज़त हर तलाश शुदा औरत का हक़ है, मुस्लिम पर्सनल लॉ और सेक्शन 125 में कोई कंफ्लिक्ट नहीं है, इसलिए शाजिया बानो का मेंटेनेंस का दावा मंजूर किया जाता है" - सन 1988 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बनी फिल्म "हक़" को जरूर देखा जाना चाहिए खासकरके कानून के छात्रों को, महिलाओं को, एनजीओ के लोगों को और युवा पीढ़ी के साथ हर उस व्यक्ति को जो समाज को लेकर चिंतित है या कुछ बदलाव चाहता है
सुपर्ण वर्मा के निर्देशन में इमरान हाशमी, यामी गौतम धर, वर्तिका सिंह का अदभुत अभिनय है और कही भी कोई कमेंट करने की गुंजाइश नहीं है, फिल्म जैसे बांधती है उससे लगता नहीं कि दो घंटे और ग्यारह मिनट निकल गए मालूम ही नहीं पड़ा
आज अदालत में देखता हूँ कि तलाक के मामले बहुतायत में बढ़ें है, अदालत के मेंटेनेंस के आदेश के बावजूद मर्द चालाकियों से मासिक रूप से दिए जाने वाले खर्च से बचना चाहता है, वकील उन्हें रास्ते दिखाकर गुमराह करते है, मुश्किल से एक-डेढ़ साल देकर वह फारिग होना चाहता है और मजबूर और कमजोर औरतों के लिए फिर से अदालतों में चक्कर लगाने की पीड़ा शुरू हो जाती है, आज जरूरत है शिक्षा और आजीविका में महिलाओं को वाजिब या बराबरी का हिस्सा देने की - ताकि वे स्वयं सक्षम हो सकें और अपनी लड़ाई लड़ सकें
एक बेहतरीन फिल्म बहुत दिनों बाद देखकर कोहरे में लिपटी दोपहर और ढलती शाम मुकम्मल हुई है, मजा आ गया और बहुत कुछ सीखा भी मैने
नेटफ्लिक्स
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कभी-कभी मुहब्बत काफी नहीं होती, हमें अपनी इज्जत भी प्यारी होती है और इस डर में डरते रहना कि इज्जत का क्या होगा, मुहब्बत पीछे छूट जाती है, डर का साम्राज्य बना रहता है और हम जीवन जीने के बजाय सारा समय डर के आगोश में रहकर मुहब्बत की सोहबत से दूर हो जाते है और यही दूरी अक्सर कटुता, वैमनस्य, पीड़ा, अवसाद और तिरस्कार पैदा करती है - हर किसी के प्रति, और इससे बचने का एक ही तरीका है - वह है खुलकर जीना और डर से बचे रहना, कोई भी डर इंसान के वजूद से बड़ा नहीं है, कोई मनुष्य या व्यवस्था किसी इंसान को डराने का दुस्साहस करें तो उससे बड़ा नीच कोई हो नहीं सकता

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