Sunday, April 30, 2017

मै इस काया में कुछ इस तरह

मैं इस काया में कुछ इस तरह 

मेरे भीतर बहते खून का अंश नदियों से आता है 
इसलिये वह निस्तेज बहता रहता है।

पहाड़ों से मैंने सख्ती ली है जो मेरी हड्डियों में कड़कड़ाती है 
इसलिए जल्दी टूटता नही मैं !

मेरी मज्जाओं में कोमल पत्तियाँ खिलती है, मेरी नसों में ये झूमती पत्तियाँ नृत्य करती है 
और इस तरह मरुथल में भी जीवन आगे बढ़ता है।

मेरी घ्राणइंद्रियों में मौलश्री और मोगरे की महक है, रातरानी और मधुमती को गुनता हुआ 
जीवन को रसों से सरोबार कर रहा हूँ !

मेरी आँखों से गिरते आंसू तपती धूप में भभकते आसमान से बिखरती वर्षा की बूंदें है 
जो असमय आकर सब कुछ शांत कर जाती है।

मैं सुनता हूँ घास के तिनकों की आहट जो आपस मे बतियाते हुए कहते है कि इस आपाधापी में 
अपने अंदर के सुरों को ध्यान लगाकर सुनते रहना, जो तुम्हारे अंदर अनहद बजता है उसे मत छोड़ना !

मेरे पांवों में सृष्टि का घूमता पहिया है जो सारे संसार को नाप लेना चाहता है 
और गति को उलटना भी !!!

मेरे हाथ मेरी सीमाओं को तय करते है जो दूर क्षितिज तक जा सकते है 
और अनंतिम दिशाओं तक पसर सकते है !

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