Skip to main content

A Few Posts in April 2017

प्रोफेसर यशपाल ने 1991 में साक्षरता आंदोलन के समय कहा था कि स्कूल , कॉलेज और विश्व विद्यालय एक साल के लिए बन्द कर दो और देश को साक्षर करो।
मैं आज आव्हान करता हूँ कि सच मे दो साल के लिए सब बन्द कर दो और जागरूकता पैदा करो, जूझने दो युवाओं को, किशोरों को देखने दो देश और समस्याएं, जाने दो खेतों और कारखानों में । प्रशासनिक कर्मचारियों, मास्टरों और ब्यूरोक्रेट्स को खेतों में भेजो हम्माली करने दो ससुरों को, गाय भैंस बकरी चराने दो, जंगल मे लगे पौधों में पानी डालने की ड्यूटी लगाओ तब समझ आएगा कि कागज, आधार कार्ड, राशन कार्ड और नियम कायदे क्या होते है। गोबर उठवाओ और कंडे थापने दो तब भूलेंगे ऑफिसर्स क्लब की रंगीनियाँ। डाक्टर, वकील और एनजीओ वालों को अंडमान की सेल्युलर जेल में डाल दो और गड्ढे खुदवाओ इनसे।
मीडिया को तब तक तुम्हारी मालिश, भड़ैती, और निज कक्षों में रखों ताकि तुम्हारे अहम और दर्प को सिसकार मिलती रहें, मीडिया मर्सिया गाकर पूरा खुला और घोषित भाट चारण बनकर नंगा हो जाये और इतना सक्षम कि ये युवा दो साल बाद लौटें तो इनकी मार खाने लायक बन सकें ।
फिर ये युवा तय कर लेंगे कि उन्हें क्या करना है और इन दो सालों में उन्हें कोई आर्थिक मदद ना करें, खाने पीने की व्यवस्था खुद ही मेहनत करके करने दो- देखें वे क्या करते है !!!
फिर तय करेंगे देश , समाज, परिवार और अपने जीवन की प्राथमिकता कि बीफ, गाय, भैस, कुत्ता, बिल्ली, सूअर, दादरी, मंदिर -मस्ज़िद, संघ, वामी, कांग्रेसी, बसपाई, सपाई, सैफई, तृणमूल, कश्मीर, नक्सलवाद, 370, सेटेलाइट , पाकिस्तान, सेना, पुलिस, किसान, खेती , अम्बेडकर, नेहरू, गांधी, गुरुजी, चेग्वेरा, जे एन यू, आरक्षण, 377, Right to Choice, LGBT, या कुछ और उन्हें सोचने देखने और तय करने दो कि वे अपने जीवन का क्या और कैसा अचार डालना चाहते है, चूं चूं का मुरब्बा तो सबने खिला दिया और भ्रष्ट कर दिया दिमाग़ को।
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा युवा देश छोड़कर भागेंगे ना - कहां जाएंगे सबसे तो आपने रिश्ते खत्म कर दिए है !!! यहां आप है वहां ट्रम्प, एक बेहतर दुनिया का ख्वाब तो खत्म हो ही चुका है, अब मरने तक तो चैन से जी लेने दो कम्बख्तों कसम खुदा की, अगला जन्म हुआ तो ईश्वर से कहूंगा कि भारत मे ना पटकें!!!
60 साल कांग्रेस ने और गत 3 साल में कार्पोरेट्स की मिलीभगत से बनी सरकार ने देश को देश नही रहने दिया। जाकर सीखते क्यों नही निकारागुआ या अन्य छोटे देशों से कि देश, नागरिक, व्यवस्था और तंत्र क्या होता है। नही आता तो हट क्यों नही जाते, शिक्षा को बढ़ावा देने के बजाय बजट खत्म कर रहे हो, PhD खत्म कर रहे हो।
मुक्तिबोध ने शायद इसलिए ही लिखा होगा " अरे मर गया देश - जिंदा रह गए तुम" या "जो भी है उससे बेहतर चाहिए - इस संसार को एक मेहतर चाहिए" !!! उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्र - पाउलो फ्रेरे रचित किताब को कितनों ने पढ़ा है, ब्रह्मदेव शर्मा की किताब Web of Poverty पढ़ी ? नही तो जाइये कुछ पढ़कर आइए, गंवारों और उजबकों की तरह से यहां ज्ञान मत बाँटिये।
सच कह रहा हूँ और फिर 2019 के चुनाव में देखते है कि किसमे है दम !!!

**************
विश्व मे सबसे अधिक इस समय 55 % युवा वाला देश नपुंसक सा लगता है। क्या हो गया है इस देश को , यहां वहां घूमकर युवा अपनी ताकत जाया कर रहे है और यह नही सोच रहे है कि कल उनका क्या होगा। काल के गाल में ये सब समां जाएंगे पर इनका, इनके परिवार और बच्चों का क्या होगा। कुछ भी नही छोड़ेंगे ये लोग , देश भयानक स्थिति में है। आज किसान मल मूत्र पर है कल हम सब होंगे , यह मात्र एक हल्ला नही, राजनीति नही , विचारधारा या पक्षधरता नही बल्कि एक सच्चाई है। क्या एक इंसान को इस हद तक जाकर अपनी बात मनवाना पड़ेगी, क्या हम सब संवेदनशून्य हो गए है।
बुद्ध ने एक मृत्यु, एक विकलांग और एक जरावस्था देखी थी और व्यथित हो गए थे, नवजात राहुल और यशोधरा , राजपाट को छोड़ दिया और सबसे वैज्ञानिक धर्म की रचना की और संसार मे शांति का प्रचार किया।और हम रोज हिंसा, राज्य प्रायोजित अनाचार देख रहे है तो क्यों नही हम स्पंदित होते है। यह सम्पूर्ण मानवीय सरोकार और जिजीविषा के प्रश्न है। क्या हम मर गए है?
आज नही बोलें तो हम कब बोलेंगे ?

**********

जिस खेत से दहकान् को मयस्सर न हो रोटी,
उस खेत के हर ख़ोशये-गन्दुम को जला दो !

***********

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

Rest in Peace Dr BK Pasi, You will be Remembered Always

नमन डा बी के पासी सन 1991-92 का साल था , एम ए अंग्रेज़ी में करने के बाद कुछ और पढ़ा जाए इस बात की इच्छा थी लिहाजा सोचा कि पीएच डी करने में तो समय लगेगा क्यों ना एम फिल कर लिया जाए, इंदौर के देवी अहिल्या विवि में थोड़ा परिचय था, स्याग भाई ( डा रामनारायण स्याग ) ने ताजा ताजा शोध पूरा किया था और शिक्षा विभाग में अक्सर आना जाना होता था, देवास की मीना बुद्धिसागर उन दिनों वहा शोध के लिए पंजीकृत हुई ही थी, डा उमेश वशिष्ठ, डा सुशील त्यागी, डा छाया गोयल और डा देवराज गोयल से परिचय था ही, सो सोचा कि क्यों ना यहाँ कुछ पढाई की संभावनाएं टटोली जाएँ. सीधा जाकर डा बी के पासी से मिला तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा क्या करेगा अब पढ़कर और इतना अच्छा काम कर रहा है तो अब क्या करना है फिर मैंने जिद की तो उन्होंने कहा कि थोड़ा ठहर जा मै एक नया पाठ्यक्रम शुरू कर रहा हूँ भविष्य अध्ययन मान्यता के लिए प्रकरण यु जी सी गया है आते ही सूचना करूंगा. बात आई गयी हो गयी, एक दिन बैतूल में गया हुआ था एक शिक्षक प्रशिक्षण में था तो डा पासी का फोन घर पहुंचा और कहा कि तुरंत मिलने को बुलाया है. मै आते ही ...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...