Monday, April 24, 2017

A Few Posts in April 2017

प्रोफेसर यशपाल ने 1991 में साक्षरता आंदोलन के समय कहा था कि स्कूल , कॉलेज और विश्व विद्यालय एक साल के लिए बन्द कर दो और देश को साक्षर करो।
मैं आज आव्हान करता हूँ कि सच मे दो साल के लिए सब बन्द कर दो और जागरूकता पैदा करो, जूझने दो युवाओं को, किशोरों को देखने दो देश और समस्याएं, जाने दो खेतों और कारखानों में । प्रशासनिक कर्मचारियों, मास्टरों और ब्यूरोक्रेट्स को खेतों में भेजो हम्माली करने दो ससुरों को, गाय भैंस बकरी चराने दो, जंगल मे लगे पौधों में पानी डालने की ड्यूटी लगाओ तब समझ आएगा कि कागज, आधार कार्ड, राशन कार्ड और नियम कायदे क्या होते है। गोबर उठवाओ और कंडे थापने दो तब भूलेंगे ऑफिसर्स क्लब की रंगीनियाँ। डाक्टर, वकील और एनजीओ वालों को अंडमान की सेल्युलर जेल में डाल दो और गड्ढे खुदवाओ इनसे।
मीडिया को तब तक तुम्हारी मालिश, भड़ैती, और निज कक्षों में रखों ताकि तुम्हारे अहम और दर्प को सिसकार मिलती रहें, मीडिया मर्सिया गाकर पूरा खुला और घोषित भाट चारण बनकर नंगा हो जाये और इतना सक्षम कि ये युवा दो साल बाद लौटें तो इनकी मार खाने लायक बन सकें ।
फिर ये युवा तय कर लेंगे कि उन्हें क्या करना है और इन दो सालों में उन्हें कोई आर्थिक मदद ना करें, खाने पीने की व्यवस्था खुद ही मेहनत करके करने दो- देखें वे क्या करते है !!!
फिर तय करेंगे देश , समाज, परिवार और अपने जीवन की प्राथमिकता कि बीफ, गाय, भैस, कुत्ता, बिल्ली, सूअर, दादरी, मंदिर -मस्ज़िद, संघ, वामी, कांग्रेसी, बसपाई, सपाई, सैफई, तृणमूल, कश्मीर, नक्सलवाद, 370, सेटेलाइट , पाकिस्तान, सेना, पुलिस, किसान, खेती , अम्बेडकर, नेहरू, गांधी, गुरुजी, चेग्वेरा, जे एन यू, आरक्षण, 377, Right to Choice, LGBT, या कुछ और उन्हें सोचने देखने और तय करने दो कि वे अपने जीवन का क्या और कैसा अचार डालना चाहते है, चूं चूं का मुरब्बा तो सबने खिला दिया और भ्रष्ट कर दिया दिमाग़ को।
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा युवा देश छोड़कर भागेंगे ना - कहां जाएंगे सबसे तो आपने रिश्ते खत्म कर दिए है !!! यहां आप है वहां ट्रम्प, एक बेहतर दुनिया का ख्वाब तो खत्म हो ही चुका है, अब मरने तक तो चैन से जी लेने दो कम्बख्तों कसम खुदा की, अगला जन्म हुआ तो ईश्वर से कहूंगा कि भारत मे ना पटकें!!!
60 साल कांग्रेस ने और गत 3 साल में कार्पोरेट्स की मिलीभगत से बनी सरकार ने देश को देश नही रहने दिया। जाकर सीखते क्यों नही निकारागुआ या अन्य छोटे देशों से कि देश, नागरिक, व्यवस्था और तंत्र क्या होता है। नही आता तो हट क्यों नही जाते, शिक्षा को बढ़ावा देने के बजाय बजट खत्म कर रहे हो, PhD खत्म कर रहे हो।
मुक्तिबोध ने शायद इसलिए ही लिखा होगा " अरे मर गया देश - जिंदा रह गए तुम" या "जो भी है उससे बेहतर चाहिए - इस संसार को एक मेहतर चाहिए" !!! उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्र - पाउलो फ्रेरे रचित किताब को कितनों ने पढ़ा है, ब्रह्मदेव शर्मा की किताब Web of Poverty पढ़ी ? नही तो जाइये कुछ पढ़कर आइए, गंवारों और उजबकों की तरह से यहां ज्ञान मत बाँटिये।
सच कह रहा हूँ और फिर 2019 के चुनाव में देखते है कि किसमे है दम !!!

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विश्व मे सबसे अधिक इस समय 55 % युवा वाला देश नपुंसक सा लगता है। क्या हो गया है इस देश को , यहां वहां घूमकर युवा अपनी ताकत जाया कर रहे है और यह नही सोच रहे है कि कल उनका क्या होगा। काल के गाल में ये सब समां जाएंगे पर इनका, इनके परिवार और बच्चों का क्या होगा। कुछ भी नही छोड़ेंगे ये लोग , देश भयानक स्थिति में है। आज किसान मल मूत्र पर है कल हम सब होंगे , यह मात्र एक हल्ला नही, राजनीति नही , विचारधारा या पक्षधरता नही बल्कि एक सच्चाई है। क्या एक इंसान को इस हद तक जाकर अपनी बात मनवाना पड़ेगी, क्या हम सब संवेदनशून्य हो गए है।
बुद्ध ने एक मृत्यु, एक विकलांग और एक जरावस्था देखी थी और व्यथित हो गए थे, नवजात राहुल और यशोधरा , राजपाट को छोड़ दिया और सबसे वैज्ञानिक धर्म की रचना की और संसार मे शांति का प्रचार किया।और हम रोज हिंसा, राज्य प्रायोजित अनाचार देख रहे है तो क्यों नही हम स्पंदित होते है। यह सम्पूर्ण मानवीय सरोकार और जिजीविषा के प्रश्न है। क्या हम मर गए है?
आज नही बोलें तो हम कब बोलेंगे ?

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जिस खेत से दहकान् को मयस्सर न हो रोटी,
उस खेत के हर ख़ोशये-गन्दुम को जला दो !

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