Monday, April 24, 2017

रज्जब अली खां मार्ग से टेकड़ी के रास्ते तक - दस कविताएँ




रज्जब अली खां मार्ग से टेकड़ी के रास्ते तक 
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कहते है मालवे के पठार पर संगीत सर चढ़कर बोलता है
बड़े बड़े धुरंधर पैदा ही नही हुए वरन दूर दूर से आकर बस गए लोग
संगीत में शुभ अशुभ के महत्व के होते भी शरीर की खामियों के बाद 
चुनौती दी और गाड़ दिए झंडे ऐसे कि बनारस के घाट सूने हो गए 
चंडी, रंडी, भंगड़ी और गंगा के लिए जाने जाने वाले बनारस में भी 
ऐसा प्रताप नही बरसा जबकि छोड़कर नही गए बिस्मिल्लाह खां घाट छोड़कर कभी
छन्नूलाल गाते रहे जीवन भर और कबीर का नाम जुड़ा होने के बाद भी बनारस बना नही रहा
इलाहाबाद, पटना, मद्रास या बड़ौदा भी दे नही पाया संगीत को वो सब 
जो इस पठार ने अवध को पछाड़ते हुए दे दिया
रज्जब अली, उस्ताद अमीर खां, लता मंगेशकर, कुमार गन्धर्व या मुकुल शिवपुत्र 
दुनिया को घुंघरू में बांधकर पैरों में फंसाकर ढेरो रुपया कमाने वाले प्रिया प्रताप पंवार
कहते है शबे मालवे की फिजां में संगीत जहर की तरह भरा है
ये पागलपन ही यहां के लोगों को सुरों की गुलामी में जीने को अभिशप्त कर देता है
बुन्देलखण्ड से लेकर कानड़ी ब्राह्मण भी यहां आ जाते है 
बसकर यहां बुन देते है इतना कि किसी वसंत निरगुणे को 
यहां बैठकर लिखना पड़ता है
या कि किसी गोरी लिंडा हैज़ को अमेरिका से आकर दाल बाटी खाकर धूल में लौटते हुए 
कबीर को अनुदित कर वाचिक परंपरा को लिखना पड़ता है
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वृंदावन महाराज की गली में सुना था नाम रज्जब अली का
पानी की किल्लत से जूझते शहर में रोज सुबह देखता कि
चार फीट नीचे गड्ढे में उतरकर पानी भरने लोग भोर में उठते
कोसते रज्जब अली खां को कि किस जगह आ फंसे
नये पूरे से बड़ा बाजार के शुरू होने तक
पानी भरने का यह नया नजारा सन सत्तर में देखा
निमाड़ से मालवे में आये और यहां बसे 
छाछठ, रज्जब अली खां मार्ग, देवास जैसा पता था घर का
घर क्या रेल के डिब्बे नुमा तीन कमरे थे और एक बाड़ा
आधे हिन्दू , आधे मुसलमान और बाकी धंधेवाले थे
सबके घर का पता वही होता रज्जब अली खां मार्ग
साढ़े चार साल रहे इस मार्ग पर संगीत का स नही सुना
घिस गए मुहावरे और खत्म हो गयी रियासतें मराठों की
पठान कुंआ, पोस्तीपुरा, ओल्ड नेवरी रोड से लेकर
ठेठ सुल्तान मियां तांगेवाले के घर तक घूम लिया था
कही नही सुना कि रज्जब अली खां साब यहां गाते थे
बस मुहल्लों और सड़कों का नाम रखने से अगर 
रज्जब अली खां, बड़े गुलाम अली खां या अल्ला रख्खा
अमर हो जाते तो हम राग मल्हार सुनाकर बादलों को रिझाते
गड्ढों में उतरकर पानी भरने से अच्छा तो इन्हें सुनना था।
3
महेश टाकीज के पीछे भी बस्ती है पुरानी बसी हुई 
ध्वस्त राजे रजवाड़ों के किले यहां अब नजर नही आते 
चितपावन मराठी घरों के आगे अभी भी औरतें सुबह
रंगोली बनाती है रोज जो हवा के झोंको से उड़ जाती है
खंडित सबजेल के सामने जाफरी वकील के घर से
मुसलमानों की बस्ती चालू होती है जो खारी बावड़ी होते
सीधे श्मशान पर खत्म होती है माली मोहल्ले से होकर
जब भी लाश गुजरती है सब एक ओर हो जाते है सम्मान में
इन्ही कच्चे टपरो के बीच बना था महाराष्ट्र समाज
एक ओर स्कूल और एक पुराने हाल में मूर्तियों के बीच
पहली बार यमन के सुरों का आस्वाद लिया था एक शाम
इधर तुमने आलाप लिया और मै बाहर आ गया हताश
एक ही पंक्ति को कितनी देर तुम गाते रहे अलग अलग
मूढ़ और रंजन की आस में गर्दन हिलाते रहें लोग
नाम तो नही याद है अब पर क्या बात, क्या बात करते
लोगों के चेहरे याद है जो अब बूढ़े हो गए और खत्म भी
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किसकी बात करूँ शनि मंदिर में बैठे लोगों की
शिवराम मुंगी की जो रोज बिना नागा पूजा करने जाता
जे जे रेडियो वाले की जिसकी तीन पुश्तें माइक लगाती रही
रघुनाथ तापकीर की जो बरसों तक गणेश उत्सव मनाते रहें
शिव छत्रपति गणेश मण्डल में नामी गिरामी लोग आकर
गाना - बजाना कर गए और हर बार घर ठहरे तुम्हारे
शोभा गुर्टू की वो हरी साड़ी ऐसे मन में बस गई थी कि 
पहली कमाई से माँ के लिए वही लाया था ठीक वैसी
बिस्मिल्लाह खां से लेकर ये जो अभी अनाथ कर गई रागों को
किशोरी अमोनकर भी गा गई थी इस मल्हार स्मृति के मंच पर
सारंगी, तबला या कोई वाद्य हो तो बताओ जो ना सुना हो
तुमने सबको बुलाया और सबको सुनाया 
बात यहां तक ही नही थी, एक तहजीब भी पैदा की 
सुनने वालों में वरना मेरे जैसा आदमी जो तुम्हारे आलाप
पर बाहर आ गया था उस सत्तर के दशक में 
आज कैसे चार घण्टे सुन लेता है मालकौंस से लेकर ललित
कैसे समझ लेता है सितार और सारंगी में फर्क
मधुप मुदगल का बैंड और बस्तर के वाद्य यंत्रो को
पचा पाता है और कही एकांत में वसंत राग गुनगुनाता है
यह सांगीतिक तमीज और कबीर के जीवन दर्शन को 
हजारी प्रसाद की किताब से ज्यादा तुमने सिखाया
अब शायद यह श्रोता पैदा करने का हूनर भूल गए लोग
जैसे नईम ने कविता के कवि पैदा किये इस प्रदेश मे।
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शहरों और गांवों में लोग आते जाते रहते है
हर आदमी जब आता या कही जाता तो कुछ नया
देखने , परखने की चाह रखता है दिल दिमाग़ से
इस कस्बे में भी औचक सा आता ढूंढ़ता रहता कि 
कोई तो सूत्र मिल जाएं घर मे घुसकर तुमसे मिलने का
इस कस्बे के लोगों को ही नही, आसपास के कस्बों शहरों को
बंधुआ बना दिया था तुमने सुरों का, हर कोई मुंह उठाये
चला आता फोकट के संगीत समारोह सुनने इस कस्बे में
एक चाहत होती कि घर मे घुसकर वो जगह भी देख लें और उस झूले को भी 
जिस पर बैठकर गांधी मल्हार गूंजा था दिल मे
रेडियो वाले नरेंद्र पंडित और उनका नाम उठाये भी चले आते रिकॉर्डिंग वाले जब भी कोई आता शहर में 
किसी भी कार्यक्रम की नईदुनिया में समीक्षा लिखने भी अरविंद अग्निहोत्री आता इंदौर से और मैं खिन्न हो जाता
कस्बे के पत्रकार सिर्फ जानकारी भी ही दे पाते क्योकि ना राग की समझ थी ना ताल की
तब कोई चंद्रप्रकाश शर्मा नईदुनिया में था नही जिसे शब्दों की बाजीगरी दिखाने का बिरला मौका मिलता
दूर दराज के अखबार में छपी खबर भी पढ़ नही पाते लोग
अबके जैसे कि कही किसी का कुछ छपा कि चेंप दिया
हां पर यह जरूर सब कहते थे कि तुम्हारी खबरें जोरदार होती है
दिल्ली, पूना और बम्बई के पत्रकार भी आते है और ले जाते है फोटो खींचकर
तुमने धाक जमा रखी थी, फिर कस्बे में बिके डायनोरा और वेस्टन के श्वेत श्याम टीवी में भी दिखने लगे तुम सन 82 के बाद
इधर सुर बिगड़ता और छोटे भाई को छत पर ठेलता कि 
जा हिला और घूमा पच्छिम में एंटीना 
इस तरह से सुर बिखरते गए हर जगह
फिर खत्म हो गए बड़े टीवी और घुस गई एक रंगीन दुनिया घरों में
रंगोली और चित्रहार में खोते गए दरबारी कान्हड़ा, बागे श्री और झपताल या कि रुद्र वीणा 
अब नही दिखते तुम जैसे लोग सिवाय देर रात के उबाऊ वीणा वादन और दक्षिणी शास्त्रीय संगीत के अलावा
कस्बे से शहर में बदलते जा रहे देवास में मुम्बईया प्रमिला दातार के सड़क छाप ऑर्केस्ट्रा मशहूर हो रहे थे
उसकी लड़की मादक ही नही वरन गाती भी खूब थी कि पंख होते तो उड़ आती रे !
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सफेद रंग की एक अम्बेसेडर गाड़ी थी और एक ताँगा
जिसमे घूमते रहते थे शहरभर में सारा समय, ग़र यहां हुए तो
सुना कि एक कपड़े की बनी रंग बिरंगी की पोटली रहती थी 
जरूरत का सामान खरीदने के लिए उसमे पड़े होते रुपये
और जब भी सामान लेते तो आगे बढ़ा देते दुकानदार को
कि हाथ नही लगाने का संकल्प किया था - जानते थे ना 
गुना और बुना भी था माया महाठगिनी, फिर कैसे यश कमा लिया
इसी मालवा के शहर में आ बसे यक्ष्मा का राजरोग लेकर
छोटे से घर से इस देववास के पहाड़ की तलहटी में बस गए एक घर के साथ
रोज सुनते मेहनतकश बलाई चमारो को और सागर महल की छत पर गुनते हर शाम
टूट गया फास्टर का महल पिछले बरस जब बाजार ने जमीन का भाव तय किया
हिल ऑफ देवी और पैसेज टू इंडिया भी खत्म हो गया ऐसे 
सुर की साधना ने एक फेफड़े को ताकत दी और इंदौर के 
राहुल, बाबा और गुरुजी ने प्यार कि फिर सितार गूंजने लगा
रचा तो बहुत तुमने पर उन दलितों की बेसुरी औघड़ आवाज को असँख्य
सन्नाटों में भेदकर फिर से यश की सीढ़ियां चढ़ते गए इतने कि
टेकड़ी से अभी तक सुबह 'सुनता है गुरु ज्ञानी' सुनाई ना दें यह शहर जागता ही नही
साल में दो बार संगीत साधक मिल बैठकर कल्याण या पूर्वा धनश्री ना गा लें 
खाना नही पचता इस शहर का, ये दीगर बात है कि वो हाल जहां की दीवारें मंज गई थी रागिनियों से
अब राजनीति के गलियारों की कालिख से मलिन हो गया है
अब नजर नही आते तांगे शहर में , ना अम्बेसेडर कार कही
नजरों से ओझल तो अब राहुल, बाबा और गुरुजी भी हो गए इधर तुम्हारे बाद
पर एक संगीत का दिया मल्हार की धूनी से टेकड़ी के रास्ते से होता हुआ
जलता है शहर के कई कोनों में और कुछ लोग बुझते है इसकी लौ में आरोह अवरोह की भांति
पर अब कोई नही समझना चाहता कि उड़ जायेगा हंस अकेला
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वटवृक्ष के नीचे नही उगती घास यह कहा जाता है
पर दुनियाभर में प्रताप था घराना तो नही बनाया पर
मुम्बई से लेकर ग्वालियर और दिल्ली से लेकर बनारस
बचा नही सुरों की राग माला से
बहती रही प्रेम की नदियां, गूंजते रहें स्वर और ताल वृन्द
यह एक वटवृक्ष ही था जो हवाई जड़ों को बढ़ाता रहा 
कि धरती में बना रहें संयम आसमान में बना रहे कौतुक
समुद्र का खारापन खत्म ना हो
एक परपंरा को तोड़कर मथा और नया बुना हर बार 
गुणी निर्गुणी और सूफ़ी को भी कसा कि सुर बने रहे 
ये कैसा वटवृक्ष था जो कइयों को अमरबेल बना गया
निर्गुणी एकांत का स्थायी भाव है
एक सुर निकला और भटक गया संसार , सध नही रहा
विलीन होने के बाद एक सरिता निकली अक्षत यात्रा की
हर बार सांगीतिक अनुष्ठान के बाद देखते रहें इस घर को
अभी भी सुरों का चैतन्य स्थान है वो घर
गाहे बगाहे चले आते है लोग खोजने तुम्हे कि अभी वही हो
गुणाकर मूळे, जयंत नार्लीकर, थानवी या अशोक वाजपेयी
सुनाई देता है अंदर से गरजता विराट राग जुगन जुगन के जोगी
वो पेड़ और वो मन्द सप्तक का झुला गवाह है कि तुम अभी हो वहां निस्तेज बस नही है तो 
हिरणा जो समझ बुझ चर सकें इस अद्वैत चराचर को
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सच्ची कहता हूँ आँखन देखी इस शहर की
इत्ते भुक्कड़ कि खा जाएं तो भी कम पड़े एक क्विंटल पोया रतन का,
साठ सत्तर किलो जिलेबी सुबू सुबू
शहर था कि राक्षस, परेशान हलवाई
बापड़े रात से छिलने लगते आलू
बीनती रहती औरतें दाल समोसे कचौड़ी वास्ते
नोट छापने का कारखाना क्या डला बदल गए लोग

कभी रज्जब अली खां आ जाते तांगे में
कभी घुंघरू बजाते प्रिया प्रताप पवार पैदल ही
कभी नरेंद्र पंडित चले आये जग में दही लेके जलेबी वास्ते
कभी प्रभु जोशी चले आते चतरू मामा की सेंव लेके
गुलजार निकलते तो पहुंच जाते प्रभु से मिलने
और प्रकाशकान्त और जीवन काका के संग
प्रभु बालगढ़ की पहाड़ी पर झिकते कि
अमेरिका ने वियतनाम पर क्यों डालें बम
और गुलज़ार के नरम हाथों को सेंव बताते

अफजल की कूची रंग भरती मीठे तालाब से
और मधुकर शिंदे राजबाड़े पर पन्द्रह रुपये में
महाडिक के घर बैठकर चित्रकला सीखा देते
उधर देवास रोता कि फास्टर यहां से चला गया
सात उपन्यास लिखकर पर नए फर्जी लोग भाषा
और ककहरा सीखने के बजाय लगे है जुगाड़ में
रोज पी पाकर अपने ही गुरु को छील देता प्रमोद
एक अदद पउवा लेकर लिख देते लोग गज़लें

इस सबके बीच आये जाने कौन दिशा से
एक चुप्पी के बीच से यही से यही का बुनकर
रच दिया ऐसा ताना बाना कि शर्मा गया कबीर
और नईम कहते रहें कि गाता तो ठीक है पर
उच्चारण दोष ऐसा कि सुनता है में "सु" सधता ही नही
आदमी ठीक था, मीठी वाणी ऐसी फूटी चुप्पी के बाद
कि संसार घुल गया कड़वे बोल में, किसको नही गाया
तुकाराम या मछेन्दर नाथ, मीरा ,रसखान या तुलसी
पर कबीर को फिर से खड़ा किया यूं कि कईयों की
रोजी का जुगाड़ कर गया जाते जाते इत्ता कि बिकने लगा कबीर

जब था तो पेड़ था बरगद का, उगी ना कोई घास
जड़ों को भी थाम रखा था कि बढ़ ना जाये अनियंत्रित
झर गया पतझड़ में तो कोंपलों ने तोड़ दी सीमाएं
ज्यों बढ़ी और निखरी ऐसी कि फिर ना द्रुत ना विलम्बित
बस तान खिंचके ऐसी साधी कि झमकृत हो गए सुर
ये आंखों देखी थी कि सब भूल गए लोग इस शहर के
अब कोई नही कहता रतन का पोहा या चतरू मामा की
कोई नही याद करता भोजराज पवार को या ताँगा, सिर्फ

गूंजते है बोल कि साँवरे अई जाजो, म्हारी प्रीत निभाजो जी ।

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जन्मा, पला और बढ़ा तो रागिनियों और बंदिशों में
सजा तो किसी राजस पुरुष की तरह से हर महफ़िल में
पाया तो हर स्वप्न साकार, लिपटा के राग विहाग
ऐसा गाया कि छोड़ दिया सुरों की अनंतिम माला को
छाप छोड़ता रहा धाक बनाकर, गूँथ दिया रागों को वेणी में
घर के अंदर - बाहर की दुनिया हमेशा अलग निराली होती है
सधे सुर भी बदमिजाजी पर उतर आते है अक्सर जीवन मे
ये किसी तानपुरे के तार झटके से टूटने की अकुलाहट थी
किसी मन्द सप्तक में काली चार से आगे जाकर गाने का दुस्साहस था
तम्बूरे के साथ निर्लिप्त होते साजों का अवसाद ही था शायद
एक दिन निकल गया वाग्देवी से रूठकर बियाबान में
वह ठगुआ नगरिया ढूंढ़ रहा था जहां उसे खमाज का अप्रतिम खजाना मिलें
संसार की रीत ऐसी कि धरा पर जगह ना दी राजस राजमणि को
बहते हुए पानी मे ठौर ठिकाना बनाया और साधना करता रहा रेवा में कहता था जमुना किनारे मोरा गांव
दुर्दैव और दुखद स्वप्न जवानी को लील ही जाते है
प्रेम में पगा और पारंगत भी इससे बच नही पाता अक्सर
फिर ये भला क्यों बचता इस हताहत करने वाले कोलाहल से
बस सुखद ये था कि सुर की साधना छोड़ी नही थी
संगीत और सुर की शुचिता पर बोलते हुए वो किसी
अलौकिक लोक का लगता - मानो कह रहा हो ये नगरिया लूटल का समय नही
भटकता रहा - यहां , वहां और गाता रहा बावरे सा पर समझा ना कोई
प्रेम विरह की आग में जठराग्नि को तज दिया कई बार
पर फिर लौट आया संसार मे सुरों के, लम्बी तान खींचकर हर बार
गाता अभी भी है , कहते है कई बार नद और नाद के बीच
ब्रह्मा आ जाते है और फिर वागीश्वरी को तय करना मुश्किल हो जाता है श्रेष्ठता को
पर अबोध नही था, जानता बुझता सब था इसलिए छोड़ गया यही सब कुछ
जीवन मे पा लेना ही सब कुछ नही होता, कुछ लोग छोड़कर भी पाते है 
एक बार कहा था शिवना नदी के घाट पर मुझसे
संगीत, सुर और जीवन सभी से सध जाए यह सम्भव भी नही

बस लोक में श्रुति बनकर रहना भी कई बार पहाड़ को चुनौती देने सा होता है
पर इस अंधियारे में सुरों का एकछत्र सुकुमार अब इस देस मालवे में अंतिम दीपक है जलता हुआ।
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समाहार
चढ़ने में हांफती है सांसे और उतरने में बिगड़ता है संतुलन
रास्ता निर्जन नही रहा, शोर से सरोबार हो गया है
बदल गई है टेकड़ी और आ गया है बाज़ार पूरा का पूरा
नीचे आओ तो सुनाई देते है कर्कश स्वर कबीर आश्रम में
एक और आश्रम है जो दुनिया मे प्रखर होकर बिखरा
फिर बैंक और आश्रम के बीच एक निर्वात है जहां स्मृतियाँ है अब
कोलाहल है, शोर है और गड़गड़ाहट है पर संगीत नही
टेकड़ी से सुनाई देती थी ऊंची तान, तबले पेटी के साथ
सुरों का आलम्बन और खींच वह सुप्त है
चढ़ने वाले हांफते है यहां आते आते और
लौटते में लुढ़क जाते है अतृप्त प्यास के साथ
कौंधती है यादें झूले की, घोड़े की टाप और हंसी
इसी सड़क पर बढ़ गई है भीड़ जहाँ से निकली तीन यात्राएं जो सुरों को अनाथ कर गई
बहुत छाँव थी कभी, थकान से लाचार सारे मुसाफिर ठौर पा जाते थे
धूप ने भी बदला है रूप, टेकड़ी पर चढ़ना मुश्किल है अब
हवा पानी और मालवे के मिट्टी की तासीर बदल गई है
कबीर आश्रम पर रोज अनुयायी जुटते है - गुनते नही गाते है बस
आश्रम में दिखती नही भीड़, गुरु पौर्णिमा पर शर्माते आते है भक्त
मैंने छोड़ दी है उम्मीद कि यह शहर संगीत की गरिमा रखेगा
रेवा के तट से भी सुनाई नही पड़ते सुर, धुँआ भर गया मानो पसलियों में राग की
सूख गई है क्षिप्रा, बहता नही पानी तो आंखों में क्या आये
छोटे इठलाते कुँए, बावड़ी और तालाब तंग हो गए है
पानी की झिर ही नही बची, सूख गए सोते सारे तो कहां से डूबोगे सुर में आप गले गले तक
खत्म हो गए सब किस्से कहानियां और हो भी जाना चाहिए थे
किस्सों की उम्र ज्यादा नही होती हैं बाद में भले उन्हें परोसा जाएं
नित नए नवेले मौकों के लिए बचाकर भी रखना है इन्हें ताकि बच सकें
रज्जब अली खां से लेकर पेटी बजाने वाले हीर पाठक तक की कहानियां
कैलाश सोनी के फोटो और जीवन काका के किस्से,
गली मोहल्ले में संगीत विशारद की डिग्रियां बेचते लोगों के धंधे
रंग बिरंगे परिधानों में गुम हो रही सुरों की ठसक ग्लोबल बाजार में
उम्मीदें कैसे खत्म करती है शहर को और विरासत को- समझना चाहिए
आइए इस शहर कभी कि एक अलख जगाने में क्या करना होता है
गूंजायमान होने दीजिये मल्हार धूनी पर फिर कोई कबीर कैफे
बहकने दीजिये रागिनियों को बागे बहार में इस तरह कि सुर ना बनें गुलाम किसी चमन के!!!
- इति

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