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मुंतजिर चंद घडीयां राह तकती हैं सहर होने की

अब तो इस लिबास को उतर दो कहीं रूह अपना लिबास न उतर दे

आओ अपनी हर साँस पर तुम्हारा नाम 'वफ़ा' लिख दूँ

क्या पता कौन सी बेवफा हो.??

Comments

news said…
वा दादा आपकी तो हर भाषा पर गहरी पकड़ है मजा आ गया पढकर

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आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

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