धन, वैभव, यश और संतान जैसे सुख एक साथ कभी नहीं मिलते और यदि आपको मिल रहा है यह सब, तो आप संसार के इतिहास में बहुत ही बिरले व्यक्ति है और इसे सदा अपने पास बनाएं रखिए - ऐसे सद्प्रयास हमेंशा करिए - ताकि जीवन के उत्तरार्द्ध में आप अपना अंतिम समय सुकून से बीता सकें और खुशी से विदा ले सकें
[ अनुभव जन्य बातें ही लिखूंगा जो देख रहा हूँ, इधर पिछले कुछ समय से लोगों को बहुत नजदीक से देख समझ रहा हूँ और परख भी रहा हूँ और यह लग रहा है कि हम सब बहुत शुष्क जीवन जीते हुए अपने - आपको धोखे में रखकर जी रहे हैं ]
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हमारी हिंदी का युवा पढ़ लिख गया - एम ए, पीएचडी और पोस्ट डॉक्टरेट भी या सिर्फ बीए करके बैठ गया, इस समय वह अपनी पोस्ट्स पर इतनी दुरूह भाषा इस्तेमाल करके अपनी कुंठाए, बेरोजगारी, प्रेम, कविता, कहानी, आलोचना या एक ऐसी फेंटेसी के बारे में लिख कर अपना जीवन बर्बाद कर रहा कि देखा नहीं जाता
उसकी दो पोस्ट्स पढ़ लो - निर्मल वर्मा , अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर या रांगेय राघव से कम नहीं दिखती - मतलब ऐसे शब्द ढूंढकर मेहनत करके पचास बार लिखता है और फिर पोस्ट करता है कि मुझे लगता है इन सब ठुल्लों को फेसबुक या इंस्टाग्राम पोस्ट पर ही बुकर, ज्ञानपीठ या देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार दे दूं
ये सारे के सारे कुत्सित प्रयास एक गुदा/गूदा, स्तन प्रेमी अश्लील संपादक को रिझाने के लिए है - जो हर साल नीलामी करवाकर श्रेष्ठ कवि की बोली लगवाता है या उत्तेजक पंक्तियों के पोस्टर चैंपता है, युवाओं के लिए यह खोखला आदर्श है, हिंदी में स्त्रैण कवि बहुतायत में है दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, भोपाल, इंदौर या बनारस - प्रयागराज में - जिनकी अदाओं पर बच्चे मोहित हो जाते है पर इनके पास ढाई लाख की हरामखोरी वाली कालेज की मास्टरी है जहां करना कुछ नहीं सिवाय अपनी निकम्मी औलादों को सेट करने के या विदेश भेजने के
इससे अच्छा है कि कुछ सीख लो यारा - बर्तन, झाड़ू पोछा, पंचर जोड़ना, मेकेनिक का काम, रंगाई - पुताई, सोयाबीन काटना, आलू उखाड़ना, खेतों की रखवाली - ये हिंदी का संसार भद्दा और खूनी संसार है, यहां के शुक्ला, जोशी, तिवारी, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, षष्ठम वेदी, शर्मा, वर्मा, पांडे, और्य, मौर्य, श्रीवास्तव, सिन्हा तुम्हे खा जायेंगे पर रोटी का एक कौर नहीं डालेंगे - ये सब इतने घाघ है कि इन्हें असुंदर बूढ़ी तितलियों से फुर्सत नहीं तो तुम कहाँ की घास हो बै, कब तक गांजा फूंककर अंधेरे कमरों में मकड़ी के जाले देखते हुए कविता, ग़ज़ल लिखते रहोगे
कुछ सीख लो तो जीवन चला लोगे - कुछ नहीं धरा है, महानगरों में आए हो तो पढ़ लो, जवानी के मजे लेकर गांव - घर लौट जाओ, ये ब्लॉगिंग, पोस्टर बनाना, कविताएं पढ़कर लल्लो - चप्पो करने से कुछ ना होगा बबुआ
और जिस माशूका को इम्प्रेस करने को यह सब लिखते हो न दुरूह और जटिल, हर दो लाइन में किसी अंग्रेज कवि का नाम या अंग्रेजी कविता की पंक्ति टीप कर लिखते हो ना - ताकि लड़की पट जाए, वह तुम्हारे बस की नहीं बाबू, वह वैश्विक सुकन्या अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर आई है और अपने लिए ऐसा लौंडा ढूंढ रही जो ब्याह के बाद उसे अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी या कनाडा ले जाए वीजा बनाकर
जानम समझा करो
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