स्मित मच्छार के साहस को सलाम पर जिस तरह से उसे मीडिया द्वारा महिमा मंडित किया जा रहा है उससे लगता है कि वह भारत रत्न लेकर ही रहेगा और आगामी चुनावों में भाजपा से उम्मीदवार भी हो सकता है
बाकी सब छोड़ भी दें तो उसने अपना काम किया है जो उसका कर्तव्य था, ईमानदारी से किया इसकी शाबाशी है, पर मोदी ने उससे जो बात की और उसने भी किस मजबूरी में स्क्रिप्टेड बातें बोली वह आश्चर्यजनक नहीं लगती - थोड़ा गंभीरता से सोचिए
अजीब हालत है, हर बात को हम धर्म और सनातन से जोड़ रहे है और सेना से लेकर इसरो के वैज्ञानिक भी 2014 के बाद सीख गए है कि कितना चालाक होना है और Survive करना है इस तंत्र में
अपनी किसी कहानी में लिखा था कभी कि "चिड़िया बहुत भोली और फोकस्ड होती है पर उतना चालाक होना ही पड़ता है जितना ज़िन्दा रहने के लिए जरूरी है"
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कितने अभागे है वे पुल
जो सिर्फ गलियारे है
जिनके नीचे से गुजरती नहीं
कोई नदी
• वीरेन डंगवाल
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