ये जो तुम ढोंगी किस्म के आत्म मुग्ध और अपने ही संसार में जीने वाले साहित्यकार बनकर अपनी किताबों की तारीफ, समीक्षाएं और अखबार पत्रिकाओं की कतरनें यहां चैंप देते हो ना, वह कुल मिलाकर दस लोग नहीं पढ़ते - तुम्हारी कहानी, कविता, उपन्यास, कथेतर, ट्रेवलॉग, ब्लॉग, अनुवाद या समीक्षा कोई नहीं पढ़ता, किसी सुतिये से लिखवा लो या रूपया देकर छपवा लो
हर माध्यम की मजबूरी है कि उसे अपना पेट भरना है और यह समझना हो तो किसी अखबार के ब्यूरो के पास जाकर शाम बैठो - उसके हार्ट अटैक गिनो कि रोज - रोज चार पन्नें भरने में उसको कितना श्रम बेशर्मी से करना पड़ता है, भाड़ में गई भाषा, तहज़ीब, संस्कृति, विचारधारा और साहित्यिक समझ, इसलिए वो जो मिल जाए उसे छाप देते है बस क्वालिटी उन्नीस - बीस हो सकती है, वैसे यह सर्व विदित ही है कि हर साहित्यिक कचरे का अपना स्वांत - सुखाय होता है और हम इक उम्र से वाकिफ़ है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा
बाज़ आ जाओ यारों, हिम्मत है तो महंगाई, हिंसा, युद्ध और बदलते समाज पर लिखकर बताओ और साहित्य का जो मूल काम है - "प्रतिपक्ष रचना" वह करके बताओ, मर्दानगी यही है, नौकरी बचाना नहीं, परिवार की रोजी रोटी की चिंता, इज्जत, और सबकी गुड बुक में बने रहकर घंटा नहीं उखाड़ सकते तो काहे के साहित्यिक हो तुम, यह नहीं कर सकते तो लगे रहो, पोस्टर बनाओ कविताओं के और जेल से लेकर बैंक तक में बाबूगिरी करके भ्रष्टाचार करते रहो, और कहते रहो - "ओ मेरे आदर्शवादी मन......" ,, लिखो कि एक अपील लिखता हूँ, खिड़की - दरवाजों की क्रूरता पर लिखकर अब हजार वर्ष पुरानी फिल्म पर लिखो - जिस पर कोई कमेंट नहीं करता, क्योंकि आज हक़ीकत लिखने में जेल का डर सताता है तुम्हें, ऐसी बकलोली बहुत देख ली, अब तुम अपने खानदान, पड़ोसी और कुत्ते - बिल्लियों के साथ करते रहो अपने कचरे का प्रसार, खूब जाओ उत्सवों में, गुड़गांव में बैठकर दारू पिए, इंग्लैंड घूमे कबूतरी और बात शोषित आदिवासी किशोरियों की करें, मोटी फेलोशिप का जुगाड़ और सेटिंग करें, दुनियाभर में जींस टॉप पहनकर घूमें और कविता के मंच पर आदिवासी परिधान पहनकर इतराए, दो लाख की तनख्वाह के सुविधा वाली आरक्षित प्रोफ़ेसरी करें, हवाई जहाज के नीचे पांव ना रखें, बच्चों को पढ़ाने के बजाय सालभर गोष्ठी उत्सव और मेलों में अपना मैला थोपता रहें और बात दलित - वंचित की करें, तीस - चालीस करोड़ का टर्न ओवर हो अपनी दुकान या संस्थान का और गरीबों के "जनलेखक" का तमगा खुद गले में डालकर टॉमी बने फिरता रहें तमाम अंबानी, अदाणी या कार्पोरेट्स के गुलामों की तरह - समझ नहीं आता ससुरों कि इतना घटियापन कहां से लाती / लाते हो बै
कोई ना पढ़ रहा तुम्हें, तीन - चार लाइक और दो कमेंट्स से ज्यादा नहीं मिल रहें - तुम्हारे कूड़े को आजकल, जो झुंड बूढ़ी तितलियों के उमड़ते थे वो भी मर - खप गई अब
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मोहन भागवत अमेरिका जाकर समझदार हो गए है या नाटक कर रहे है, कह नहीं सकते पर वहाँ कह रहे है कि "मुस्लिम के बिना देश की कल्पना बेकार है, हिंदुत्व की यह बात ही नहीं है, भारत देश मुस्लिमों के बिना अधूरा है"
ये मोदी या पूरे संघ परिवार की घटिया राजनीति है कि जब देश में रहो तो हर बात से लेकर नीति ऐसी बनाओ कि आम लोग मुस्लिमों के खिलाफ होते रहें, ये और मोदी के अंधभक्त जहर उगलते रहें, नफरत और घृणा फैलाते रहो, मुस्लिमों को हर लाभ और योजना से दूर रखो, उनके धर्म और निजी मामलों में दखल देते रहो और जब बाहर जाओ तो आलिशान मस्जिदों में जाओ, बिरयानी खाओ, महंगे गिफ्ट दो, शॉल गिफ्ट करो, हंसी मजाक करो, दुनिया के मुल्ला से लेकर बड़े नेताओं को गले लगाओ और मोदी तो चिपक ही जाते है बुरी तरह से
अब भागवत भी गीता ज्ञान बांट रहे है विदेश जाकर जब विरोध हर जगह हो रहा और चरम पर है और एकता - विविधता की बात कर भले आदमी बन रहे है, जबकि हक़ीकत यह है कि पिछले सौ वर्षों से हर शाखा, शिशु मंदिर और हर प्रकल्प में सिवाय नफ़रत फैलाने के कुछ नहीं किया, आज जो स्पष्ट एवं पारदर्शी ध्रुवीकरण है या हमारी गंगा - जमनी तहजीब का सत्यानाश किया है मूल रूप से इन्हीं लोगों की जिम्मेदारी है, आप योगी के या अमित शाह के पांच भाषण लगातार सुन लीजिए या किसी अंध भक्त की पोस्ट देख लीजिए - सिर्फ नफरत का कारोबार फैला रखा है
चलो कम से कम विदेशी नमक खाकर थोड़ी तो अक्ल आती है इन लोगों को, असलियत तो उगलते है, यहां तो वोट और सत्ता के लिए घटियापन दिखाना इनकी मजबूरी है
यही हाल और ट्रीटमेंट महात्मा गांधी के साथ करते है, इतना दोगलापन कहाँ से लाते हो बै , शर्म हया तो है नहीं - यह सबको मालूम है पर इतने दोगले होकर अपने आपका चेहरा कैसे देखते हो और भगवान की दुहाई देकर या राम मंदिर बनाकर राम का ही चंदा कैसे हजम कर जाते हो
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