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ढेरों क़िताबें मंगवाकर रखी है, सेट के सेट, कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास, पत्रिकाएँ - पर अफ़सोस अपनी ही दुनिया में इतना उलझ गया हूँ और कुछ आलस तारी हो जाता है, लम्बे सफ़र के बाद जब - जब लौटकर घर आता हूँ तो और इस सबमें बिल्कुल भी समय ही नही मिलता पढ़ने को और लिखना छूटने की पीड़ा से तो इतना त्रस्त हूँ कि फेसबुक पर भी आवक कम हो गई है
नेटफ्लिक्स, अमेज़ॉन, ज़ी - 5, डिस्कवरी से लेकर तमाम चैनल्स और ओटीटी की सदस्यता है, पर फिल्में, डॉक्युमेंट्रीज़ या संगीत के कार्यक्रम भी नही देख पा रहा हूँ , शरीर की बीमारियां, काम का तनाव, निश्चित अवधि में सब एक साथ समेट लेने के दुष्प्रयास और दो जून की रोटी... उम्र का लम्बा हिस्सा इस सबमें ही बीत गया - जो लिखा-पढ़ा था, अब वही ताक़त है बस, वही एक हिम्मत है कि शायद कभी कुछ फिर से लिख सकूँ, समालोचना या रंजकता की विरल या सघन दृष्टि से कुछ पढ़ पाऊँ, इस सबमें सबसे ज़्यादा दिक्कत यह हुई कि काम के लिए लिखने की एक कृत्रिम और सबको ख़ुश करने वाली भाषा ने मन - मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर लिया और वहाँ पचास निरीक्षक खड़े मिलें - ऐसे - ऐसे उजबक जो ना लेखन की पुख्ता समझ रखते थे, ना साहित्य की - पर उनकी समझ, उनकी परिपक्वता हर शब्द , वाक्य, पैरा और आख्यान या कहानी में बिकवाली का अनुमान खोजती थी - कि इसमें से क्या कितना बिकेगा, लोगों ने इस सबको यूज करके बेचा भी बहुत
पिछले 40 वर्षों में नागरिक सामाजिक संस्थाओं में रहकर फ़ंडर को खुश करने के लिये, समुदाय या कार्यकर्ताओं के लिये लिखते - लिखते अपनी भाषा खो दी है, 40 वर्षों के अनुभव में ऐसी स्त्रियाँ या पुरुष बॉस रहें जो हर अक्षर को सिर्फ़ बाजारूपन की विहंगम दृष्टि से ही देखते थे, मीडिया से आये ऐसे-ऐसे लोग मिलें - जिन्हें प्रेमचंद या निराला कौन थे नही मालूम पर वे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के मीडिया और प्रकाशन प्रभारी थे, कुछ ऐसे भी कुंठित जीवात्मा मिलें जिनका जीवन सेटिंग, फ़ंडर को खुश करते और अपने अंतरराष्ट्रीय माँ - बाप, आकाओं को खुश करते या चिरौरी करते निकल गया, आज दो - तीन दशकों बाद उन दस्तावेजों को देखता हूँ तो हँसी भी आती है और ग़म भी सालता है, ठीक इसके विपरीत मैं पलटकर देखता हूँ तो 1990 - 95 तक के पाँच साल अप्रतिम थे - जब लगभग 500 आलेख, 60 - 70 कहानियाँ, 150 के करीब पुस्तक समीक्षाएँ लिखी छपी, आकाशवाणी से प्रसारण हुआ और खूब यश कमाया, इधर कविताएँ लिखी और लगभग 178 के करीब प्रकाशित है स्तरीय पत्रिकाओं में - यही एक सुख है
बहुधा अपने-आप पर शर्म आती है, पर अब निश्चय कर रहा हूँ कि अपनी भाषा में, अपनी शैली और अपने तर्कों के आधार पर ही लिखूँगा और जो आसपास सहज और सरल उपलब्ध है वही पढूँगा - ना इसमें किसी मीडिया या मीडिया वालों की प्रतिछाया होगी, ना किसी नागरिक सामाजिक आंदोलन की झलक या किसी व्यक्तित्व का प्रभाव, अपनी मौलिकता अपने हाथ में है, अपने काम में और लेखन में किसी भी मीडिया वाले को शामिल ना करें यह लब्बो - लुबाब है
मुझे लगता है यह द्वन्द हम सबके सामने होता है पर सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों को कम से कम मीडियावालों, फ़ंडर, उजबक लोगों और समुदाय की परवाह किये बिना अपनी शर्तों और अपने अनुभवों पर केंद्रित होकर अपनी ज़मीन पर लिखना चाहिये
अब नियमित होना होगा - जो सब छूट रहा है, उसे समेटना होगा, एक ही जीवन है और समय बहुत कम है
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"वे दोनों प्रतिष्ठित थे और उनका नाम बड़े आदर से लिया जाता था देश - विदेश में, एक बार की बात है मैं उन्हें रोज शास्त्री भवन पर मेट्रो से उतरते देखता था 3 दिन लगातार, मंत्रालय में कोई बड़ा आयोजन था - आखिरी दिन उन्होंने फ्लाइट टिकिट का प्रिंट आउट पकड़ा दिया, जब पास करने की बारी आई तो मैंने क्लर्क से कहा कि इनसे बोर्डिंग पास माँगो, वे अड़ गए कि नही देंगे - और कुँवर जूं की धमकी देने लगे, मैंने प्रमुख सचिव से, जो मेरे बॉस थे, अपनी आपत्ति दर्ज करवाई तो बॉस ने कहा कर दो यार फ्लाइट का भुगतान - मैं भी जानता हूँ कि दिल्ली ही रहते है पर मंत्री के आदमी है, ख्यात है ... "
दिल्ली पुस्तक मेले में चुनाव वाले दिन छुट्टी घोषित हो गई थी, मैं गांधी शांति प्रतिष्ठान में रूक गया, मित्र मिलने आ - जा रहे है, एक वरिष्ठ प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आये थे जो अनुजवत है, किस्से कहानियाँ चल रही थी, जब अनुज ने यह किस्सा नामजद बताया तो होश उड़ गए क्योंकि ये मेरे एक ज़माने में रोल मॉडल थे पर जल्दी सम्हल गया क्योंकि मेरे सामने उन सब लोगों की फ़िल्म चलने लगी जिन्हें देखकर हम समाजसेवा में आये थे
नया था, बस पढ़ाई कर निकला था शिक्षा, नवाचार, नर्मदा, टिहरी, हरसूद से लेकर दीगर आंदोलन जोरो पर थे नामी लोग नौकरियां छोड़कर आंदोलन और मैदान में काम करने बदलाव करने आये थे, विदेशी पत्नियाँ, मोटे अनुदान, खादी, टायर की चप्पल, सिगरेट, शराब, विदेशी पढ़ाई, डॉक्टरेट की डिग्रीयाँ, तगड़े नेटवर्क, जेएनयू से लेकर अलीगढ़, मगध, जामिया, पंजाब विवि तक के लोग जो आकर सहजता से जमीन पर बैठ जाते, रूखी - सूखी खा लेते, सायकिल पर हमारे साथ घूमते और क्रांति की बातें करते, लाल गमछा कांधे पर डाल कर नुक्कड़ नाटक में शामिल रहते हमारे साथ, उदाहरण के लिए केजरीवाल और मनीष सिसोदिया पर्याप्त होंगे जिन्होंने सूचना के अधिकार पर काम किया, मनीष ने हिवरे बाज़ार जैसी अप्रतिम फ़िल्म बनाई पर आज क्या निकले, जिस अण्णा हजारे को लोग पूजते थे - आज उस पर थूकना भी नही चाहता कोई, नर्मदा आंदोलन में जुड़े मीडियाकर आज लाखों की गाड़ी में घूमते है राजधानी में महंगे फ्लैट्स है और एय्याशी में कोई कमी नही देखी मैंने इनकी पिछले 38 वर्षों में - बल्कि खानदान तर गया पूरा
बाद में पता चलता कि इनमें से कोई किसी राममूर्ति समिति में है, या शिक्षा नीति 1986 के ड्राफ्ट कमेटी में है या चरवाहा विद्यालय के पॉलिसी डॉक्युमेंट बनाने में शामिल है या नर्मदा आंदोलन के लीडिंग रोल में है या विदेश में न्यूयॉर्क टाइम्स में लगातार लिख रहे हैं या फिर कंप्यूटर पर इनका बहुत अच्छा ज्ञान है और यह हिंदी में कंप्यूटर पर नई किताबें बना रहे हैं और सरकार के सभी स्कूलों में उनकी किताबें लग गई है और सरकार ने बड़े पैमाने पर किताबें खरीदी हैं, कोई बच्चों की पत्रिका निकाल रहा है, कोई विज्ञान फीचर निकल रहा है, कोई अनुसंधान परिषद से है जो इतिहास या विज्ञान में बड़े ओहदों पर बैठा है और काम कर रहा है - कुल मिलाकर इन सब के खानदान ही उच्च नहीं थे - बल्कि कनेक्शन भी बहुत बड़े और ऊंचे थे, किसी भी कार्यक्रम में मानव संसाधन मंत्री को ले आना या किसी भी प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी के साथ भोपाल के सतपुड़ा भवन के सामने बैठकर ठेले पर चाय पीना और सिगरेट पीना बहुत सामान्य बात थी या गौतम नगर के लोक शिक्षण कार्यालय में या मुख्यमंत्री निवास में बैठकर बियर गटक जाना बहुत साधारण बात थी - हम इन्हें देखते और उन ब्यूरोक्रेट महिला - पुरुष अधिकारियों को जो इनका नाम लेकर बुलाती और सहजता से बात करती मानो कोई घर में बात कर रहा हो
बाद में धीरे - धीरे जाले साफ हुए तो समझ आया कि ये जो भी रोल मॉडल्स थे - सब पूँजीपती थे और बदलाव, आंदोलन, नवाचार, क्रांति, समता, समानता इनके लिए शगल था, शोक में डूबी जनता को इस्तेमाल कर अपने अहम को तुष्ट करने का शौक था, इनके अपने दफ्तरों में इनकी और सबसे कम वेतन पाने वाले कर्मचारी की तनख्वाह में आज लगभग 200 % का अंतर है तो ये क्या वंचित गरीब की बात करते है और Inclusiveness की बात करते है - लखनऊ, दिल्ली, भोपाल, पटना, अलीगढ़, चंडीगढ़, हैदराबाद, गुवाहाटी से लेकर इंदौर - उज्जैन तक मैंने इन रोल मॉडल्स को बहुत अच्छे से टटोला है और पाया कि नवाचार के नाम पर व्यभिचार और ईमानदारी के नाम पर संगठित भ्रष्टाचार करके ये लोग आज जमीन - जायदाद और अकूत संपत्ति के मालिक हैं, स्वयंभू खुदा बने ये लोग इतने बड़े पद पर बैठे हैं कि इस देश में जहां लोगों के पास रहने को घर नहीं - इनके पास न्यूनतम 2000 एकड़ जमीन है - जहां पर इन्होंने बड़े-बड़े मठ और गढ़ बना लिए हैं और यह सब हुआ है समाज कार्य के नाम पर, कम से कम डेढ़ सौं लड़कियों को तो मैं जानता हूँ जिन्हें इन्होंने बर्बाद किया और आज देशभर में ये लड़कियाँ जेंडर और एकल महिला, मुस्लिम महिला या महिला सशक्तिकरण का झण्डा लेकर घूम रही है क्योंकि और कोई विकल्प इनके पास नही है
मित्रों, मेरा बहुत स्पष्ट रूप से मानना है कि समाज कार्य करिए - बहुत अच्छे से करिए, परंतु इस काम में किसी को रोल मॉडल मत बनाइए - जो आदमी जितना काम कर रहा है, जितना प्रदर्शित कर रहा है, जितना प्रचार कर रहा है, और जितना सार्वजनिक साहित्यिक - सांस्कृतिक या राजनैतिक आयोजनों में खर्च करके परोपकारी बनने की कोशिश कर रहा है वह उतना ही भ्रष्ट और अनैतिक है
अपना रोल मॉडल खुद बनिए और जितना कर सकते हैं - करिए, याद रखिये समाज कार्य में ना बहुत ज्यादा पैसे की जरूरत है, ना बहुत ज्यादा संसाधनों की, ना बहुत ज्यादा प्रचार - प्रसार की और ना बहुत ज्यादा प्रकाशनों की और टेक्नोलॉजी की तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है - यदि आपको लगता है कि यह सब हासिल करके आप समाज सेवा कर पाएंगे तो आपको मुगालते हैं ; कोई भी आंदोलन या कोई भी बदलाव इन सबसे कभी भी नहीं होता इसलिए जो लोग इस तरह की बातें करके काम कर रहे हैं - उनके फाइव स्टार बिल्डिंग जाकर देख लीजिए, करोड़ों के बने हुए आलीशान मकान देख लीजिए या कभी उन्हें अपने घर या गांव में आमंत्रित करिए तो वह बहुत सहज रूप से कहेंगे - "समय नहीं है, और आपके यहां आने का फ्लाइट उपलब्ध नहीं है इसलिए नहीं आ पाऊंगा" और एक बात और कि जब आप ब्यूरोक्रेट के साथ मिलकर समाज सेवा का पूरा संजाल बनाते हैं तो आप उस खेल में शामिल हैं जो स्वैच्छिक कार्य को प्रभावित करता है एवं लोकतंत्र को कमजोर करता है और गरीब - वंचित व्यक्ति को किसी भी प्रकार के बदलाव से दूर रखता है ; ब्यूरोक्रेट की मदद जरूर लीजिए - नीति और योजनाओं के लिए, परंतु उन्हें अपने काम में शामिल मत कीजिए वरना आप एक दिन उनका कमीशन उन्हें पहले देंगे और काम को बहुत एडहॉक ढंग से करके सिर्फ रिपोर्ट बनाने में ही शामिल रहेंगे
और आखिर में सिर्फ इतना ही कि कोई भी व्यक्ति किसी का रोल मॉडल नहीं हो सकता, रोल मॉडल की कल्पना ही बेकार है - जो आप कर रहे हैं - वह अच्छा है, इस पर विश्वास रखिए और अपने नायक खुद बनिये
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एक ज़माना था जब ग़रीब, वंचित, पिछड़े लोग या महिला, विकलांग, बुजुर्ग और बच्चे निसहाय थे - चुप्पी का साम्राज्य था और दबंगई शिखर पर थी, पर आज ना कोई गरीब है ना असहाय या निहत्था या वंचित
लोग एकदम अवसरवादी हो गए है और वे पहचानते है कि आपकी और आपके तथाकथित समाज कार्य की औकात क्या है, वे आपके आगे बीपीएल कार्ड नही होने का रोना रोयेंगे, राशन वाले की शिकायत करेंगे, आंगनवाडी में या स्कूल में भोजन ना मिलने की शिकायत करेंगे, पर सड़क - बिजली - पानी के लिये नेता या पार्टी कार्यकर्ता से ही बात करेंगे, शिक्षा या स्वास्थ्य सुविधाओं के लिये उनके अपने माईबाप है, मुफ्त वाली चीजे या पेंशन की बात करना हो तो वे अधिकारियों से बात करेंगे - कहीं से लाभ मिलने की बात हो तो वे आपसे बात करेंगे परंतु उनके योगदान या श्रमदान की बात करना हो तो कन्नी काटकर कर निकल जाएंगे, आप सिर फोड़ लो पर वोट कहाँ जायेगा यह वो गरीब ही तय करता है, आपका सारा समाज कार्य भोंगली बनाकर वह आपको ही अर्पित कर देता है
लोग अब बहुत ज्यादा सयाने हो गए हैं और आप अभी भी पिछली सदी के समाज कार्य को लेकर गांव में जा रहे हैं, बैठके कर रहे हैं, और उन्हें अपनी नौकरी बचाने के लिए लुभा रहे हैं ताकि वे आपके काले - पीले कागज में आंकड़े बनकर, सुंदर ग्राफ बनकर या रंग-बिरंगे चित्र बनकर रिपोर्ट में उभर सके - आप मुगालते में है भाई साहब और बहन जी, इंटरनेट से सबको ग्लोबल देश का नागरिक बना दिया है
जिन स्वसहायता समूह या महिलाओं के समूह बनाकर आप जेंडर बराबरी की बात करने की सोच रही हैं उन महिलाओं के पास एक-एक ब्लॉक में 10 से 50 करोड़ रूपया है और ये सरकारी समूह है इनके माध्यम से ये महिलाएँ बचत भी कर रही है और कमा भी रही हैं - उन्हें ना आपके जल जीवन मिशन से लेना है, ना प्रधानमंत्री कुसुम योजना से और ना आपके चलताऊ किस्म के जेंडर वादी नारों से - इसलिए अपने मुग़ालते दूर कर लीजिए और लोगों और समुदाय की - खास करके गरीब लोगों की मदद करना बंद कर दीजिए - क्योंकि समाज में गरीब कोई आज की तारीख में है ही नहीं - जो है वह बहुत बड़ा पाखंडी और ढोंगी है और इसका सबूत आप देख सकते हैं कि कुंभ में ज्यादातर इसी तरह के लोग गाँठ से रुपया निकाल कर गए हैं, दान पुण्य कर रहें हैं और वहां पर मजे मार रहे हैं - बात समझ में आ रही है
AI या ChatGPT की मदद से लच्छेदार अँग्रेजी में लंबी-लंबी रिपोर्ट लिखकर या लिंकडीन पर फोटो पेल कर ना आपका भला होने वाला है ना समाज का और एआई की क्या औकात है यह कल अपने परम पूज्य ने दिखा दिया - उल्टे सीधे हाथ से उल्टा सीधा काम करके कभी समाज का भला नहीं होने वाला है, मज़ेदार यह है कि जिन्हें पिता और पीता का फ़र्क नही मालूम, अनुस्वार या दीर्घ नही मालूम वो दूरदराज़ के आदिवासी गाँव में फेलोशिप लेकर फर्जी रिपोर्ट बना रहा है LinkedIn पर छाप रहा है इस उम्मीद में कि बिल गेट्स मिरांडा या अज़ीम प्रेम की नज़र पड़ेगी तो अनुदान की बरसात होने लगेगी, और इसके लिये वह कार्पोरेट्स के सारे इशारों पर नाचने को तैयार है, इनमें ज़्यादातर वो लोग है जो सदियों से वंचित तबके से है और अचानक इन्हें ज्ञान - गणित समझ आया तो झांझ - मंजीरे और तबला - पेटी लेकर मैदान में कूद गए हैं और बड़े-बड़े उत्सव, आयोजन एवं प्रायोजित यात्राओं के लंबरदार हो गए हैं, रिटायर्ड होने के बाद भी इनकी रूपयों - पैसों की हवस नहीं छूटी है, रिश्ते - नाते और संबंधों के नेटवर्क के जरिए या व्यक्तिगत नेटवर्क का इस्तेमाल करके ये लोग अभी भी रुपए कमाना नहीं छोड़ रहे
समाज कार्य का इस्तेमाल करके लोगों ने अरबों रुपया बना लिया और अकूत संपत्ति इकठ्ठा कर ली, गरीब और वंचित समाज की लड़कियों से शादी - ब्याह करके उनकी जमीन हड़प ली और ज्ञान के चलते-फिरते विश्वविद्यालय बन गए हैं, अव्वल दर्जे के धूर्त सरकारी अधिकारियों की आंख में मिर्ची झोंक कर रुपया कमाने की होड लगी है - जो जितना इसमें निपुण है वह उतना ही बड़ा दुकानदार है और समाजसेवी है, लेनदेन करके अपना उल्लू सीधा करने का नोबल घोषित हो तो और जाले साफ़ हो, सारे आंदोलन ठप है और सारे क्रियाकर्म खत्म - जो है वह सिर्फ रुपया है और बाकी विकास गाथाएं हैं जो 170 जीएसएम के चिकने पन्नों पर छपकर आ रही हैं
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जब एक बीज रोपते है तो पौधा उगता है, उसे खाद, पानी, हवा से मिट्टी में सींचना पड़ता है - एक दिन वही बीज वटवृक्ष बन जाता है - देखकर ख़ुशी होती है, पर जब पेड़ इठलाने लगें, उसके नये पत्ते और शाखें दर्प में झूमते हुए जड़ों को दुलत्ती मारने के प्रयास में लिप्त हो जाये और पेड़ के स्वामित्व की भावना का ज्वर इनमें सर चढ़कर बोलने लगे तो जड़ों को भी एकबारगी विचार करना ही चाहिये कि क्यों ना इस पेड़ के अस्तित्व को खोखला कर दें या स्वतः नष्ट हो जाये
यह बात घर, परिवार, संस्थाओं, समाज और किसी भी व्यवस्था पर भी लागू होती है, नई उम्र के दस - बीस साल वाले कच्चे, अपरिपक्व, अहमक और बदमिजाज लोग इस तरह के काम में निपुण होते है - फलस्वरूप घर, परिवार, संस्था या समाज से जड़ रूपी लोग एक दिन हट जाते है और ये सब भरभराकर गिर जाते है इससे इन बदमिजाज लोगों का तो कोई नुकसान नही होता - ये तो कही भी सिर्फ रुपया कमाने के लिये काम कर रहें है - इन तथाकथित प्रोफेशनल्स के पास ना तो विचार है, ना समझ, ना प्रतिबद्धता और ना दृष्टि पर घर, परिवार, संस्था या समाज का बहुत नुकसान हो जाता है जो एक वृहद उद्देश्य या मिशन लेकर चल रहे होते हैं
ये प्रोफेशनल्स जो सिर्फ़ रूपयों की भाषा, इशारे और अर्थ समझते है, जोड़-तोड़ से क्षणिक काम निकलवाकर अपना उल्लू सीधा करना जानते है और बेहद बदजुबान बनकर मूल्यों और तमीज़ से छेड़छाड़ करते है - उन्हें मालूम भी नही होता कि एक वटवृक्ष बनने में क्या - क्या संसाधन और समय जाया हुआ है, कैसे साँझे सपनों की नींव पर त्याग, समर्पण और त्रासदियों के बीच यह एक पेड़ या घर - परिवार या संस्था - समाज उभरकर मजबूती से आज खड़ा हुआ है
मज़ेदार यह है कि नींव के पत्थर भी इस आधुनिकता की बाज़ारू दौड़ में ownership को बिसराकर एक खेल, पोस्ट ट्रुथ, बदलाव, रूपयों के खेल, बाज़ार, सन्दर्भ और किसी के इशारों पर नाचना शुरू कर देते है और सब भूल जाते है, उन अँधेरे रास्तों से मुंह मोड़ लेते है जिनपर एक दूसरे को सहारा देते हम उजालों के मुहानों पर पहुँचे थे और एक स्वप्न को हक़ीक़त में बदला था, इसमें सबका श्रम नही लगा था बल्कि सबका खून जला था
घर - परिवार, संस्थाओं और समाज के निर्णयों में नये लोगों पर छोड़े, भरोसा भी करें ताकि वो सीखें - समझें, निर्णयन में शामिल हो पर इनके भरोसे साख और मूल्यों को दाँव पर ना लगायें - ये काम, यश, कीर्ति, रुपया तो दे देंगे पर आने वाले समाज में आपकी एक भद्दी नजीर स्थापित कर देंगे और यह दाग फ़िर कभी नही धुलेगा
Manisha Sharma Telang जी और मैं लगभग 2002 से परिचित और मित्र हैं, मनीषा जी अनुभवी महिला है और समाज कार्य में दक्ष एवं परिपक्व है
हमने UNFPA, CEDPA and DFID funded projects में मप्र सरकार के साथ लम्बे समय काम किया है राज्य स्तर की कोर टीम में, काम के दौरान कभी खीज उठती तो मनीषा जी कह उठती थी कि एक किताब लिखूंगी कि "सोशल वर्क में क्या नही करना चाहिए", - 2016 के बाद बात आई गई होगी, पर मेरे दिमाग़ में वो बात घर कर गई थी, 38 वषों के अनुभव के बाद आज जब समाज कार्य की पढ़ाई, इंटर्नशिप, काम, संस्थाएँ, फंडिंग एजेंसी,युवा एवं ज्ञानी समाजसेवी, फ़र्जी कार्यकर्ता, धन लोलुप समाजसेवी, और अंत में काम का समाज में असर देखता हूँ - तो अजीब लगता है
एक सीरीज़ लिखना शुरू किया है #सामाजिक_कार्य के नाम से - इसका उद्देश्य किसी को कोसना नही, गालियाँ देना नही - बल्कि यह है कि समाज कार्य में क्या ना करें, क्या करना है - यह ज्ञान तो सब देते है, पर क्या न करें - यह बिरले ही बताते है क्योंकि छबि और नरेटिव की चिंता सबको रहती है, आपको यह निगेटिव या एनजीओ के ख़िलाफ़ लग सकता है प्रारम्भिक तौर पर, पर मेरा मानना है कि यह आने वाले समाज कार्य करने वालों को मदद करेगा दृष्टि विकसित करने में
कई मित्रों के फोन आ रहें हैं, व्यक्तिगत रूप से कमेंट करके कह रहे है कि क्या यह मेरे लिये लिखा है, असल में इसके टारगेट पर कोई नही है और सब लोग भी है और सबसे पहले इसमे मैं शामिल हूँ क्योंकि इस क्षेत्र में 38 वर्षों से हूँ तो जाहिर है मैं इसका हिस्सा हूँ, फ़िलवक्त कोई नही पर गम्भीरता से कहूँ तो यह उस व्यक्ति से सम्बंधित है जो चैरिटी से लेकर बदलाव में शामिल है और अपने - अपने कम्फर्ट ज़ोन बनाकर बैठा है
बहरहाल , यह सीरीज आपके नज़र है जिसको समझ ना आता हो सामाजिक कार्य - वो ज्ञान ना दें , खासकरके साहित्य, सँस्कृति और मीडिया के रिपोर्टर्स और डेस्क पर मात्रा सुधारने वाले मालिक के कालू - लालू और टॉमी
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