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कुछ घोड़े और कुछ खच्चर जो बनारस की ज़िंदा मछलियाँ खाते और मरी माँ से रूपया कमाते है


गधे को याद आ रहा था कि आखिर में घोड़ा निरुत्तर हो गया था जब गधा राजकाज छोड़ रहा था. घोड़े ने आख़िरी माह में सब छोड़ दिया था और अपना ध्यान कुछ लोमड़ियों और उल्लूओं पर लगाया था पर अंत में माया मिली ना राम के तर्ज पर घोड़ा हार गया. लोमड़ी ने भी अपना ध्यान गधे पर लगाया और दिल दे बैठी और घोड़ा मन मसोजकर रह गया. 



अब  वो जंगल की राजधानी में चला गया और वही से एक गैंडे को सांप और नेवलों के बीच भेज दिया. बस एक सियार नहीं निकाल पा रहा था जंगल से क्योकि यही वह हथियार था उसका जो जंगल के सारे लूले लंगडों और मक्कारों को गांजा भांग देकर हांकता था. सुना था जंगल में कोई मूर्खाधिपति अपनी माँ की याद में जानवरों के एन जी ओ को रूपया देने की महती कोशिश कर रहा था.


इन दिनों घोड़े को उस मालविका नामक नागिन की बहुत याद आती है जो एक और खच्चर से नैन मटक्का करती थी.



खच्चर  के पास यूँ तो पहले एक और टट्टू हुआ करता था जो उसे सबके बीच लोकप्रिय बनाता था उसे महान बनाने के लिए उस बेचारे ने क्या नहीं किया असम के बांसों भरे जंगल से निकलकर आया और एक खच्चर को लगभग जंगल में सबके बीच उंचा बनाया फिर गंगा घाट से एक सांप आया जो इस असमी टट्टू को पछाड़कर खच्चर का दाया बन बैठा और उसके लिए उसने गंगा से दो तीन मछलियों की जुगत की और इन मछलियों को चारा समझकर फेंका और टट्टू को जंगल से ही भगा दिया और एक मस्त मुखौटा पहनकर गंजडी सांप एकदम से घोड़ा बन गया. 



दुलत्ती  खा-खाकर सांप घोड़ा बना बैठा है और वह पुराना टट्टू आजकल देश की राजधानी में एक अमेरिकी संस्था से प्राप्त रूपयों की हवस वाली दूकान के मालिक के यहाँ नौकरी करता है जो पुरे देश को खरीदने का दिवास्वप्न देखता है और घटिया हरकतें करता है. 



खच्चर  को मालविका याद आती है और वह उसकी याद में आजकल देश भर प्रवचन देता है ताकि कही तो दिख जाए एक झलक उसकी.

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