Wednesday, March 31, 2010

इधर कुछ दिनों से तबियत कुछ ज्यादा ही ख़राब रहने लगी है यह शायद शक्कर का प्रपात है या रक्त चाप का असर कि सफर में अब वो रवानगी नहीं रही....
सब कुछ छुट गया है लिखना पढना तो ख़तम हो रहा है अब प्रकाशकांत से तो मिलने भी डर लगता है क्योकि देवास जाओ तो दन्त पड़ती ही है बहादुर तो चलो लिख लेता है कल ही फोन आया था कि कविता संग्रह की तैय्यारी है जैसे बीबी को डेलिवेरी होने वाली है......
मेरा क्यों छुट गया ये सब यह समझ से परे तो नहीं अलबत्ता यह सच है की मैंने दोनों बेटो को जब से समय देना शुरू किया है तब से मैं भावुक हो गया हूँ और फिर तो मेरा सारा समय सिर्फ और सिर्फ बेटो में ही जा रहा है। इस सारे चक्कर में मैंने अपनी तबियत इतनी ख़राब कर ली है की शराब और अपनी आदतें बस अब तो शायद मौत ही एक सहारा दिखता है.......
पर शराब तो अपूर्व ने छुड़ा दी थी जब से वो गया है तो पी नहीं पर आदतें ........ इनका क्या करू।???
ज़िन्दगी ने इतने गम दिए की सब मौसम नम दिए, ये गीत तो शायद अब किस्मत ही बन गया है..........
कितन लिखना छठा हूँ महेश्वर पर , रावलजी की स्मृति में होने वाले कार्यक्रम पर ए दीन होने वाली यात्राओ पर मिलने जुलने वाले लोगो पर कहा हो पता है ये सब???
अभी एक मित्र  आया था तो उसकी अजब प्रेम की गजब कहानी मालूम पड़ी तो सोचा की उस पर भी कलम की धार तेज करू कैसे लोग कितनी आसानी से सब कुबूल कर जाते है पचा जाते है....
इन दिनों मनीषा पाण्डेय की डायरी पढ़ रहा हूँ ब्लॉग पर तो लग रहा है कि आधी आबादी जो मुक्त हो गई है वो कितनी उछ्न्कल हो गई है ये ओरतो की दुनिया जो अपनी पेशाब से लेकर चूमने चामने को लेकर बेताब है और सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि मुक्तिवाद के नाम पर सबको बताना भी चाहती है।
खुदा खैर करे.......
मैं तो सिर्फ ये कह रहा हूँ कि मैं तो लिखना चाहता हूँ सब कुछ अपने मान का और वो सब जो सोचकर मैंने ये ब्लॉग शुरू किया था पर अब तय कर रहा हूँ कि रोज़ लिखूंगा भले ही कही नहीं पढ़ा जाये पर लिखना ज़रूरी है साथ ही अपनी सेहत सुधार कर लूँगा
फिर से ज़िन्दगी में एक नया जन्मदिन आ रहा है एक नया संकल्प लेने को......
देखो कैसा दिन आता है............





1 comment:

राजेश उत्‍साही said...

संदीप भाई भवानी भाई कविता की पैरोडी(क्षमा सहित) में यही कहूंगा,

कुछ लिख के मर,कुछ पढ़ कर मर
जिस जगह पर जन्‍मा तू

उससे आगे बढ़कर मर।
क्‍योंकि भैय्या मरना तो है ही एक दिन। आज पता चला कि प्रकाशकांत केवल हमें ही नहीं औरों को भी डांटते हैं। और केवल हम ही नहीं उनकी डांट से दूसरे भी बचने की कोशिश करते हैं। खैर..वैसे यह फैसला बुरा नहीं है कि अब तुम रोज लिखोगे। पढ़ें न पढ़ें हम तो लिखें बस । मेरा भी ऐसा ही कुछ फंडा है। और यार ये वर्ड वेरीफिकेशन हटाओ न।