धर लगभग सूखा है, गर्मी और उमस ने जीना बेहाल कर रखा है, सुबह से गर्मी और उमस अपना साम्राज्य पसार देते है, थोड़ा दिन निकलते ही धूप बिखर जाती है और शाम को धूल और धुएँ के बादल - ऐसे में जीवन की अनेक परतों के बीच उदासी की धमक भीतर धंस जाती है, रात करवटें बदलते हुए कब पूरी हो जाती है - ख्याल नहीं रहता अब ये अक्सर हो रहा है इसलिए सामान्य लगता है, कभी लगता था कि यह डिप्रेशन या एंग्जाइटी हो या अपने स्क्रीजोफेनिक होने का भय, पर फिर लगा कि आसपास का माहौल ही सबको अपने चपेट में ले रहा है और कोई इससे बचा नहीं है, भीतर धंसी उदासी की जड़े जब गहरी होते जा रही और इसके फ़ल रोजमर्रा पर असर डालने लगे है, तो लगता है कि यह सिर्फ मौसम, सूखा, अवाँगर्द जीवन या यायावरी के परिणाम नहीं - बल्कि अवचेतन के अपने जाये दुख है और वे दुखद स्वप्न है जो अजन्मे रहें और त्रिशंकु से लटके रहें कही व्योम में उदासियों के बीच एक - एक क्षण का हिसाब और गुजरते जा रहें समय के साथ आने वाले गंतव्य की व्याकुलता अब ज्यादा बेचैन कर रही है और इंतजार में आसमान को ताकना और फिर पुनि - पुनि अपने को हिम्मत के साथ समेटे मन की गठरी बांधकर तैयार कर...
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