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बीमारू राज्यों का नाम लेकर धंधा करने वाले

भारत में कितने भारतवंशी लोग है जो दुनिया में अपने हूनर का डंका पीट रहे है ये बेचारे अपने जिले, गाँव और देश के बच्चों, महिलाओं और युवाओं के स्वर्णिम भविष्य के लिए काम करने वाली एनजीओ को रूपया देते है लाखों-करोड़ों में इस नेक नियति के साथ की सच में ये एनजीओ काम करेंगे और देश के लोगों को प्रगति के पथ पर ले जायेंगे. परन्तु उन्हें क्या मालूम कि ये एनजीओ उनसे मोटी रकम ऐंठकर अपनी जिन्दगी सुधार लेते है, जि न लोगों को कोई काम धाम नहीं मिलता वे करोड़ों रूपयों की एकड़ों जमीन खरीद कर अपने बुढापे का इंतजाम कर लेते है, इन भ्रष्ट और मक्कार लोगों का काम सिर्फ इन भारतवंशियों का सिर्फ भावनात्मक शोषण होता है पर जमीन पर काम ना ये कर पाते है ना कुछ करना चाहते है.  सिर्फ रूपया लेकर ये दो कौड़ी के लोग हवाई यात्राओं और तीन स्टार होटलों में ऐयाशी करने में जुट जाते है, सिवाय बकवास और बिजिनेस के कुछ नहीं करते. सरकार को चाहिए कि इस तरह से स्रोतों से आने वाले धन पर प्रतिबन्ध लगाएं और इन तथाकथित रूप से काम करने वाले भ्रष्ट और मक्कार संगठनों पर रोक लगाए. मेरी जानकारी में ऐसे कई भारतवंशी है जो बेचारे करोड़ों रूपये...

ये है शशिकला और अन्य आदिवासी बहनें

जब अलीराजपुर के दूर-दराज के गाँव में गया था तो लगा था कि क्या मतलब है शिक्षा का- ना स्तर, ना गुणवत्ता और ना जाने क्यों ये पढ़ रहे है, ना नौकरी मिलेगी, ना मान सम्मान; परन्तु जब शशिकला से मिला तो सच  कहूं मेरे लिए जीवन के मायने ही बदल गए. विस्तार से लिखूंगा थोडा समय मिल जाए, फिलवक्त इतना ही कि शशिकला खुद बारहवीं पास है इनकी चार बेटियाँ है पति मजदूरी करते है जो अनियमित होती है. संस्था कल्याणी सामुदायिक विकास केंद्र, कठ्थीवाडा से प्रेरित होकर ये बहनें अपनी बच्चियों का जीवन सुधार रही है. इन्हें कल्याणी संस्था ने निशुल्क होस्टल उपलब्ध करवाए है, जहां बच्चियां पढाई के साथ जीवन कौशल शिक्षा और कई प्रकार के हूनर भी सीख रही है, पर स्कूल की फीस आदि तो देना ही पड़ता है. शशिकला की एक बेटी इस होस्टल में रहकर पढ़ रही है.  ये खुद एक प्राईवेट स्कूल में नौकरी करके दो हजार मासिक रूप से कमाती है और सबसे आश्चर्यजनक यह है कि अपनी चारों बेटियों की फीस में तेरह सौ रूपये हर माह खर्च कर देती है. जब इन्होने कहा तो मेरे पावों के नीचे से जमीन सरक गयी कैसे परिवार का गुजारा करती होंगी, दुनिया के इतने बिरले अन...

बचा लीजिये अपने देश के बच्चों को इन शिक्षा के नवाचारियों से

साथी लोग पूछ रहे है कि मै इतना अनुभवी, शिक्षित, और अंग्रेजी का जानकार होने के बाद भी और शिक्षा के काम का थोड़ा बहुत सामान्य अनुभवी होने के बार भी यूपी के लखनऊ में एक प्रोजेक्ट में "एडजस्ट" क्यों नहीं हो पाया और क्यों भला लौट आया??? जवाब बहुत साफ़ है कि मै निकम्मा और अयोग्य हूँ यह मैंने सीख लिया और फिर लगा कि व्यर्थ में अपने आपको खपाने से बेहतर है कि कही दूर चला जाए चापलूसों और मक्कारों की दुनिया से  मै तो बिगड़ा था ही, कम से कम अपनी रचनात्मकता तो ख़त्म नहीं होगी उस घुटन और अँधेरे में, शिक्षा के नाम पर व्यवसाय करने वाले, गरीब बच्चों की शिक्षा के नाम पर गांजा, शराब और रूपये की हवस में अपने जमीर को डूबो देने वाले तथाकथित भ्रष्ट शिक्षाविदों और प्राथमिक शाला के मास्टर से कंपनी के मालिक बन बैठे गंवार और उज्जड लोगों से मुक्ति तो मिलेगी, लूले- लंगड़े और तोतले और अपने ही बेटों की ह्त्या करने वाले समाजसेवी , अपनी बीबी को तलाक देकर देश भर में मूल्य शिक्षा की बात करने वाले, कंसल्टेंसी के नाम पर सालों से दूकान चलाने वाले देश की प्रखर मेधा शक्ति, सिगरेट और दारु में मस्त महिलायें, छदम मीडिया के...

महंगाई के समय में सस्ते इलाज के लिए इंजिनियर की दरकार

एक   बहुत पुराना और प्यारा सा दोस्त है देश के जाने माने शिशु रोग विशेषज्ञों में उसकी गिनती है जब हम लोग छोटे थे तकरीबन नवमी, दसवी में तब से वो डाक्टर बनने के सपने देखता. खूब जी तोड पढाई करके वो डाक्टर बना और पिछले बीस  बरसों से वो अपोलो, एस्कार्ट, फोर्टीज और मियो जैसे बड़े संस्थानों में काम कर रहा है. पिछले कई दिनों से वो कह रहा है कि यार संदीप मै जो कर रहा हूँ उसमे मजा नहीं है रूपया बहुत है पर जिन बच्चों का मै इलाज करता हूँ  वो सब विदेशी है और मुझे अपने इलाके के बच्चों का दर्द महसूस होता है. धार- झाबुआ-बड़वानी जैसे इलाके में बच्चे कुपोषण से मर जाते है शर्म आती है मुझे अपने पढाई और ज्ञान पर, कुल मिलाकर लब्बो लुबाब यह निकला कि हम दोनों मियाँ बीबी मिलकर एक ऐसे बच्चों का अस्पताल  खोलना चाहते है जहां विश्व स्तर की सुविधाएं हो, निशुक या  न्यूनतम शुल्क पर हो और पिछड़े इलाकों में लोग इसका इस्तेमाल करें- कोई बच्चा इलाज के अभाव में दम  ना तोड़े.  अब   सवाल कई है यह दोस्त कहता है कि आई सी यु की भीतर की मशीने महंगी है और जो कंपनिया इन्हें बेचने ...

सत्ताईस बरसों के काम के कुछ अनुभवों का निचोड़

भगवान   के लिए एक बार अपने जीवन में झांककर देखिये कभी तो आपको कोई बेहतरीन रचनात्मक सुझाव या विचार दिमाग में आया होगा.......बस उठाईये कलम और घिस डालिए चार-छः पन्ने और फिर इन्ही पन्नों को जीवन भर चलाते हुए अपने को इतना महान बना दीजिये कि बेचारे गरीब लोग आपको उत्कृष्ट बना दें, आपको महान व्यक्ति का दर्जा दे दें और फिर दुनिया भर के लोग आपको रूपया पैसा देने को तैयार हो जाए (भले ना दें पर आप कम से कम यह तो  हर बार कह ही सकते है कि इस बार मेरे पीछे कई लोग पड़े है कि फंड ले लो, फंड) और फिर उन्ही चन्द पन्नों को जोड़ जाडकर पोथे बनाते रहे और इस तरह ताजिंदगी आप बेहतरीन, नए विचारों वाले, खुले स्वतंत्र और बढ़िया व्याभिचारी-कम-नवाचारी शख्स तो इस भारत जैसे देश में बन ही सकते है क्योकि यहाँ सब चलता है धंधा है, गंदा है, और फिर आप तो आप है गधे के.............!!! दस्तावेज , रपट और लिखने पढ़ने के नाम पर आप बहुत सालों तक दुनिया को विशुद्ध रूप से बेवक़ूफ़ बना सकते है. मैंने अपने जीवन में कईयों को सारी उम्र एक ही तरीके से, एक ही विचार पर लिखते-पढ़ते और चुतिया बनाते हुए देखा है, इनकी झोली में दुनिया भर क...

देवास में 22/12/13 को संपन्न कबीर मिलन समारोह

बात  बहुत पुरानी तो नहीं पर पिछली सदी का अंतिम दशक था जब हम लोग एकलव्य संस्था के माध्यम से देवास जिले कुछ जन विज्ञान के काम कर रहे थे शिक्षा, साक्षरता, विज्ञान शिक्षण के नए नवाचारी प्रयोग, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी कुछ नया गढ़ने की कोशिशें जारी थी. एक दो बार हमने घूमते हुए पाया कि मालवा में गाँवों में कुछ लोग खासकरके दलित समुदाय के लोग कबीर को बहुत तल्लीनता से गाते है और रात भर बैठकर गात े ही नहीं बल्कि सुनते और गाये हुए भजनों पर चर्चा जिसे वे सत्संग कहते थे, करते है. यह थोड़ा मुश्किल और जटिल कार्य था हम जैसे युवा लोगों के लिए कि दिन भर की मेहनत और फिर इस तरह से गाना बगैर किसी आयोजन के और खर्चे के और वो भी बगैर चाय पानी के. थोड़ा थोड़ा जुड़ना शुरु किया, समझना शुरू किया, पता चला कि कमोबेश हर जगह हर गाँव में अपनी एक कबीर भजन मंडली होती है. बस फिर क्या था दोस्ती हुई और जल्दी ही यह समझ आ गया कि भजन गाने की यह परम्परा सिर्फ वाचिक परम्परा है.  स्व  नईम जी और दीगर लोगों से सीखा कि कबीर की वाचिक परम्परा मालवा और...