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Khari Khari, Man Ko Chithti and other Posts from 15 to 19 Oct 2026


नेशनल हेल्थ मिशन में अब तक अरबों खरबो रूपया खर्च हो चुका होगा पर हालात ज्यों के त्यों है
यह तस्वीर है ग्वालियर शीतला माता के दुर्गा पांडाल में हुए हादसे की और मरीज को जयारोग अस्पताल (A Multispeciality Hospital) में लाया गया है - जहाँ स्थानीय मंत्री, विधायक और नेतागण खड़े है
ज़रा गौर से देखिए स्ट्रेचर को, इतना जंग है कि मरीज इस पर लेटकर ही मर जायेगा - क्योंकि बच भी गया दुर्घटना से तो यहाँ सेप्टिक होने से उसको कौन बचाएगा, मतलब करोड़ो के बजट वाले अस्पताल में एक चादर की चिंदी नहीं - जो बिछाई जा सकें - धिक्कार है ऐसी व्यवस्था पर
कहां ना कि देश में हर जगह विदेशी हाथ है हर जगह, योजना और विकास में - सर्कस और जादू के शो चल रहे है - जनता को मनोरंजन में मजा आ रहा है, बस, कुछ मत बोलिये, ग्वालियर चम्बल का बड़ा जिला है, राजनीति में अग्रसर, संभागीय मुख्यालय, माननीय हाई कोर्ट की शक्तिशाली बेंच है और दिल्ली के करीब और सबसे ज्यादा महाराज है - जिनके चार सौ कमरों के बिजली का बिल मात्र पंद्रह सौ आता है, और ये श्रीमान जी शक्तिमान और जनहितैषी व्यक्तित्व के धनी है
बस सकारात्मक पक्ष यह है कि स्ट्रेचर है और नेतागण खड़े है वरना तो इस मरीज के घरवाले हाथ में चादर पर झुला झुला रहें होते और सलाइन की बोतल हाथ में लिए खड़े होते कही सड़क पर अपनी बारी का इंतजार करते
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देश को कमजोर कर रहे है राहुल गांधी "विदेशी हाथ" की सहायता से - भाजपा अध्यक्ष
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बिल्कुल सही, राहुल के पास सिर्फ हाथ है पर परम श्रद्धेय नरेन्द्र मोदी ने सन 2014 से लकदक कपड़ों और दस - दस लाख के सूट पहनकर, दुनिया के सबसे महंगे गजट के साथ और सबसे महंगे हवाई जहाजों में सशरीर विश्व के कोने - कोने के जाकर बोफोर्स, नोटबंदी, टैरिफ, तेल लेने के लिए अदाणी और अंबानी के साथ पूरी जान लगा दी और ये सिर्फ दो चार उदाहरण है, उत्तराखंड की सुरंग से मजदूर निकालने किसको बुलाया था - याद है या भूल गए - ये विदेशी हाथ ही थे बाबू मोशाय
और तुम्हारे बंदे का घूमने और कपड़े पहनने का शौक अभी भी पूरा नहीं हुआ, जब प्रचारक था और विशुद्ध बेरोजगार - तब भी व्हाइट हाउस के सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचवाई थी, अभी भी हर देश में जाकर कहता है कि यहां से उसका पुराना नाता है और वहां तथाकथित सर्वोच्च पुरस्कार ले आता है - यह कौनसा हाथ है भाई
भाई नवीन, जरा अपने लोगों को एक बार देख लेते, अभी एकदम ताजे - ताजे अध्यक्ष बनें हो, थोड़ा लिख - पढ़ लो, समझ बनाओ, और विदेशी हाथ का तो बोलो मत, तुम्हारे सीजेआई से लेकर केचुआ तक विदेशों में जा रहे है डिग्री बांटने से लेकर बैडमिंटन खेलने भी और आकर यहां जनता जनार्दन से स्वागत करवाते है फिर
नरेंद्र मोदी ने जिस अंदाज में जापान, फ्रांस, अमरीका, चीन से लेकर तमाम दुनियाभर के ऐरे - गैरे नेताओं को बनारस की गंगा में डूबकी लगाकर और उनका जुलूस निकालकर देश में सौदे किए है Investment के नाम पर, उससे रोजगार तो एक को भी नहीं मिला - बल्कि जो देश में लोहे - पीतल या मिट्टी की चिड़िया बची थी, वह भी उनको सौंप दी, फसलें बर्बाद कर दी, पहाड़ खोद दिया, जंगल उजाड़ दिए - और तो और भाजपा के शिवराज से लेकर योगी तक जितने नेता हाथ पसार कर आये दिन विदेश जाते है कि कुछ दे दो - उतना तो अफ्रीका के भुखमरी वाले देश भी नहीं जाते कही कटोरा उठाकर, और नवीन बाबू बिल गेट्स से हुई आई AI वाली बात भूल गए क्या, बिल गेट्स मिरांडा फाउंडेशन के डॉलर्स से आज तुम्हारे स्वास्थ्य विभाग का बजट चल रहा - "वरना शहर में गालिब की आबरू क्या है"
थोड़ा चरणामृत पियो, तुमने तो अठारह दिन का ब्रह्मचर्य व्रत नहीं रखा ना और एक बार सारे वीडियो तसल्ली से देखो, ये तुम्हारे ही कार्यकर्ता है - जो नौकरी और वोट का अधिकार मांग रहे है
लंबी दूरी तय करना हो तो सिर पर बोझ कम रखते है मालिक
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नेहा राठौर पर एबीपी जैसे दलाल ने जो आरोप लगाए है वह पत्रकारिता का सबसे घिघौना चेहरा है
कहना सिर्फ इतना है कि किसी का भी चरित्र हनन करना सबसे सरल और आसान तरीका है, और इसलिए मुझे अब इस तरह के ना आरोपों पर विश्वास है ना इन पर मगज पच्ची करता हूँ
अपना काम करो बस, मूर्ख है लोग - कुछ तो बोलेंगे ही, जब भी किसी व्यवस्था को चुनौती देते है तो आप उनके लिए Vulnerable हो जाते हो और वे इस तरह के आरोप लगाकर आपका सुकून छिन लेते है
नेहा, छोड़ना मत इन कमीनों को
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उत्सव, प्रकाश, रोशनी, आवाजों का शोर, चहूँ ओर गहमा गहमी, भीड़, दप-दप मुस्कुराते चेहरों की खुशी, आकाश में पटाखों का शोर और उजास, उल्लास और जोश का माहौल है हर तरफ, लोग चले आ रहें हैं खींचे हुए हर तरफ से, कही थकान या नैराश्य भाव नहीं और दुख की हल्की सी परछाई भी नज़र नहीं आती - इतनी भीड़ में किसी के चेहरे पर, कही कोई विवाद नहीं, धक्का लग रहा तो हँसकर टाल देते है, आगे बढ़ जाते है
पर इस भीड़ में ऐसा क्यों लगता है कि जितनी भीड़ है उतने ही आईने है, डबल मुखौटे है - जो सबने ओढ़ रखें हैं, आईने पकड़कर चलते हुए चींटियों की कतार की तरह ये लोग अन्दर से बहुत खोखले हो चुके है इसलिए अपनी मुस्कुराहटों का थेगला मुखौटों पर लादे हुए अथक चले जा रहे है, मैं सोचता हूँ कि वो क्या ताकत है जो इन्हें अन्दर से ऊर्जा देती है, बिखरी हुई इच्छा शक्ति और बेदर्दी से खत्म हो गई जीवन के सपनों की किरचियों पर पांव रखकर बेफिक्र होकर दौड़े जा रहे हैं
आत्मा पर रखा भारी बोझ, जीवन का सर्ग और इस उत्सव का उत्साह ही इन्हें जिंदा रख रहा है, वरना वो कहते है - "ग़मों से निजात पाए तो क्यों"
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तिरंगा किसी के बाप का नहीं
जिस संघ ने अपने कार्यालय पर कभी नहीं लगाया - वो संघी लोग आज तिरंगा की इज्जत की बात कर रहे है, मोदी योग दिवस पर तिरंगे से पसीना पोछ रहा था उस तिरंगे को बचाने की बात कर रहे है
असल में डर गए है जो एक छोटे से कनौट प्लेस पर तीस हजार जवान खड़े कर दिए, मोदी है कहां, क्यों नहीं बोल रहा , अब कहां गई मन की बात
संघी पुराना राग अलापने लगे जो अटल जी भी कहते थे "विदेशी हाथ", टुच्चे और कायर है ये, जबकि सबसे ज्यादा विदेशी फंड्स इस समय संघ और भाजपा समर्थित लोगों को मिल रहा है - कुछ है नहीं कहने को और तर्क की उम्मीद भी नहीं कर सकते इनसे
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अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया गया, इस देश में तिरंगा लहराना देशद्रोह है, "तख़्ता पलट की साजिश है" - राजनाथ जैसा कायर यह कह रहा है - जो रक्षा मंत्री है, कितना वीभत्स है यह सब देखना और सुनना, भाजपा की असलियत यही है - "हर घर तिरंगा अभियान" की यही हकीक़त है और ये सब नकली और कार्पोरेट्स के गुलाम है
कुछ नहीं, यह मामला अण्णा हजारे और केजरीवाल जैसे आंदोलन का है और अंत में कुछ निकलेगा नहीं, मोहन भागवत ने कहा था कि युवाओं से बात की जाना चाहिए, पर दो गुजराती संघ के सौ साल की मेहनत पर भी पानी फेर देंगे और इनका हिंदू राष्ट्र का सपना कभी पूरा नहीं होगा
इस सबमें एक बात बहुत साफ है कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह भयानक रूप से डर गए है, पूरी सरकार शंकास्पद है और चुनाव आयोग के साथ सुप्रीम कोर्ट भी इस पूरे फसाने में बुरी तरह से शामिल है और यह शर्मनाक है
समय है कि ज्ञानेश कुमार और सीजेआई के बारे में राष्ट्रपति कुछ स्वत: संज्ञान लेकर निर्णय लें, इतनी ढुलमुल राष्ट्रपति हमें नहीं चाहिए , दो तीन चोर और षडयंत्र में लगे लोगों की वजह से देश का नुकसान नहीं किया जा सकता
युवाओं की शक्ति और आम आदमी की परेशानियों को सरकार ने कम आंका और अब नतीजे भुगतने को तैयार रहें
कब तक चलेगा यह नाटक आखिर
[जिसकी थोड़ी बहुत भी समझ है वही यहाँ ज्ञान दें, वरना निकल लें]
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सीजेआई सूर्यकांत साहब की चिंता वाजिब है कि "यदि हर नागरिक पत्रकार बन गया तो देश में बड़ी समस्या हो जाएगी"
सहमत हूँ, गाँव - कस्बों लेकर देश भर में तमाम तरह के हॉकर्स, पंचर जोड़ने, खेती करने वाले, गैरेज मेकेनिक, रिटायर्ड खब्ती, स्थानीय स्तर पर बने एनजीओ के अनपढ़ और झोलाछाप कु-क्रांतिकारी, सब्जी-भाजी बेचने वालों से लेकर विशुद्ध दलाल, निजी विद्यालय और सरकारी स्कूल के संविदा शिक्षक, कम्पाउंडर, नगर पालिका के दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी और कमीशन खोर भी पत्रकार बन जाते है, तमाम तरह के बकलोल इस धंधे में है जो पत्रकारिता की आड़ में अपने काम धंधे चलाकर स्थापित हो जाते है और फिर ब्लैकमेल का अप्रतिम काम करते है, ये बेशर्म लोग जिन्हें सिवाय रूपए के किसी बात की समझ नहीं वे उगाही और आग उगलने के सिवाय कुछ नहीं करते
जब तमाम तरह के पदों और व्यवसायों के लिए न्यूनतम योग्यता और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं है, तो पत्रकार कौन है जो बगैर किसी पढ़ाई, अनुभव या मूल समझ के कैमरा उठाकर यहां - वहां घूमते रहते है , प्रिंट मीडिया की बात हो तो अलग (हालांकि वहां भी अक्ल का टोटा है), पर फिर भी लिखना पड़ता है पर ये चैनल उठाकर माइक खोसने वाले, मुंह में रजनीगंधा और जेब में पव्वा, हाथ में बीड़ी थामे दर्जनों लोग सड़कों पर घूम रहे है - इन पर तो सच में लगाम लगानी चाहिए

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