हर जगह लड़ाई और असहमति, हर जगह बगावत और दुर्व्यवहार, शब्दों में तीखापन और शाब्दिक हमले - शिक्षा, राजनीति, साहित्य और अर्थ शास्त्र से लेकर विज्ञान, कानून और सामाजिकता के छोटे मसले हो, वृहद मुद्दे, और बस यही सब करते हुए जीवन बीत गया, मित्रों में दुश्मन बनाये और दुश्मनों में ऐसे खूनी या क़ातिल - जो एक दिन बेहद अपने बनकर निजता में दाखिल होकर चरित्र के साथ भरे पूरे खिलखिलाते हुए जीवन का भी खात्मा कर बैठे, फिर भी सहजता से और स्नेह भाव से अपना बनाकर रखा कि लम्बे जीवन में सब चलता है, इसी समाज के बंधु - बांधव है तो किससे कैसा बैर रखना, सब अपने है कौन यहां पराया है
जीवन के चालीस साल जिन लोगों, समुदायों, संस्थाओं और कामों में दिल लगाकर काम किया, जहां तन - मन - धन से अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया - वहां भी आखिर कुछ नहीं मिला, खाली हाथ और उदास मन से भटकते हुए इस बियाबान में आया हूँ - चारो ओर सुवास है, फूल है, जंगल है, उद्दाम वेग से बहती बलवती नदी है, खुला आसमान है, पक्षियों का कलरव है, टिटहरी के कर्कश स्वर है, लटकती जड़ों के बरगद है और महुआ - ईमली और सप्तपर्णी की खुशबू चारो ओर है
इन्हीं के बीच जीवन है इन दिनों और मैं माही, कृष्णा, कावेरी से होते हुए इन दिनों गोदावरी के तट पर बसे जंगलों में हूँ - लौटूंगा कभी तो कही से तो नर्मदा के तीरे ही - क्योंकि मुक्ति वही होगी, क्षिप्रा से थोड़ी ही दूर नर्मदा के तट पर जीवन आकार लेता है और फलता - फूलता है, इसलिए इधर सब छोड़कर नदियों के साथ बहना सीख रहा हूँ
उम्मीदें अपने से भी नहीं और अपेक्षा किसी से नहीं, मुक्त होकर ही सब समझ आता है
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"चरित्र-हनन, निष्कासन और दुष्प्रचार के बल पर सही व्यक्ति के विरुद्ध एकजुटता"
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सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥
चापलूसी करने वाले लोग सर्वत्र सुलभ हैं, परिणाम में कल्याणकारी किंतु सुनने में अप्रिय सत्य कहने और सुनने वाले लोग अत्यंत दुर्लभ होते हैं
कुरु-सभा में जब विदुर ने राज्य के संरक्षण हेतु नीतिगत प्रस्ताव रखा उनका मंतव्य स्पष्ट था कि राष्ट्र का हित व्यक्तिगत लिप्साओं से ऊपर होना चाहिए, सत्ता-मद में चूर दुर्योधन और उसके चाटुकार गुट के पास इस नीति का कोई तार्किक प्रतिवाद नहीं था, अपनी वैचारिक संकीर्णता के कारण वे नीतिगत विमर्श में असमर्थ थे अतः उन्होंने विचार को त्यागकर सीधे विचारक पर आघात किया दुर्योधन ने विदुर को दासी-पुत्र कहकर अपमानित किया तथा अपने समूचे गिरोह को उनके विरुद्ध लामबंद कर दिया
जीवन और सामाजिक व्यवहार को थोड़ा निकट से देखने पर ऐसे प्रसंग अलग अलग रूपों में बार बार दिखाई देते हैं, असुरक्षित सत्ता तंत्र प्रायः अपनी बौद्धिक दरिद्रता को छिपाने के लिए विचार का उत्तर तर्क से नहीं बल्कि विचारक पर आक्रमण करके देता है जहाँ प्रतिवाद के लिए तर्क नहीं होते वहाँ चरित्र हनन, उपहास, बहिष्कार और दुष्प्रचार हथियार बन जाते हैं
दिशाहीन और विचारशून्य समूहों का अपना एक कुटिल शक्ति-समीकरण होता है, अपनी मौलिक सोच से विहीन यह भीड़ सत्ता और सुविधा के सम्मुख सदैव नतमस्तक रहती है इस जमावड़े के शीर्ष पर बैठा चालाक व्यक्ति बौद्धिक आडंबर से इस गिरोह के क्षुद्र स्वार्थों को तर्कसंगत सिद्ध करता है
असीम व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और बौद्धिक संकीर्णता के कारण ये लोग अकेले खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाते इसीलिए गिरोहबंदी करते हैं
इन छद्म-विद्वानों का सबसे बड़ा पतन यह है कि ये विचार और व्यक्ति का भेद समझने में पूर्णतः अक्षम हैं, जब भी कोई स्वतंत्र विचार इनकी स्थापित व्यवस्था को चुनौती देता है ये उस विचार को स्वीकार या अस्वीकार करके उस पर मंथन करने के बजाय विचारक को ही अपना शत्रु बना लेते हैं,
"चरित्र-हनन, निष्कासन और दुष्प्रचार के बल पर ये उस व्यक्ति के विरुद्ध एकजुट हो जाते हैं"
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दुःख सबको माँजता है
और चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने,
किंतु जिनको माँजता है
उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखें
• अज्ञेय
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आज विविध भारती का स्थापना दिवस है, 3 अक्टूबर 1957 को विविध भारती की स्थापना की गई थी
बचपन से विविध भारती, सुबह शुरू होने की धुन और तमाम बड़े और महान उद्घोषकों की आवाजें सुनकर ही हम सब बड़े हुए, भोपाल में जया आर्य जी से अच्छी दोस्ती थी, इंदौर में बोस दादा, देवास के स्व नरेन्द्र पंडित जी, प्रभु जोशी से लेकर मनीषा जैन, सोनाली बोस, सुमीत गौतम, राजेश भट, प्रवीण नागदिवे और पिछले सात - आठ वर्षों से युनूस खान और ममता सिंह को सुनते रहते है
युववाणी से लेकर हवामहल के कार्यक्रम और असंख्य गीतों से लगाव और फिल्मों के साथ बाकी दुनिया - जहान की जानकारी का एकमात्र स्रोत यही था, दर्जनों बार आकाशवाणी इंदौर, भोपाल, छतरपुर, रायपुर जाता रहा हूँ, वो दौर भी जीवन के अच्छे समय में से एक था
लंबी यात्राओं में, होटल में या घर में देर तक जो साथ होती है - वह है विविध भारती , मजेदार यह है कि आधुनिक समय की यूट्यूब के विजुअल्स वाले गीत उतने नहीं लुभाते या एफएम से लेकर तमाम निज चैनलों के बाद भी जो आत्मीयता और स्नेह की छाँह विविध भारती में मिलती है उसकी मिसाल देना मुश्किल है, सुनते हुए लगता है आप अपने किसी से सामने बैठकर बातें कर रहें है और संवाद दो तरफा है
बधाई और शुभकामनाएं पूरी टीम को, बाजारीकरण के दौर में यदि ये मौलिकता बनी हुई है - तो उसका श्रेय इन सबकी अथक मेहनत को जाता है
सौ - सौ सलाम इस अदभुत ऊर्जावान टीम को
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.....रमंते देवता तत्र
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ये है आजादी के अस्सी साल, महिला समानता, हिंसा, गरिमामयी नागरिकता , सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार, अनुच्छेद 12 -32 तक संविधान प्रदत्त मूल अधिकार, शांति से प्रदर्शन करने का अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार और सबसे बढ़कर संविधान
गलती सरकार की नहीं, क्योंकि सत्ता में तो नीच, अधर्मी और नालायक ही बैठे होते है - जो कुर्सी बचाने के लिए इससे भी आगे जा सकते है, गलती न्यायपालिका अर्थात सर्वोच्च अदालत की है जिसने ज्ञानेश कुमार जैसे महाभ्रष्ट, दलाल, चापलूस और सत्ता की कठपुतली बनकर नागरिकों का कत्लेआम करने वाले को हर बार बचाया और सीजेआई सूर्यकांत जनता का नौकर होकर भी जनता चुनने लगा - वो भी महाधूर्त और दो - तीन लोगों के लिए - जो देश को बर्बादी, कंगाली और मूल्यहीन समाज के चौराहे पर ले आएं है
यह हालत दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री की है - जो अभी कल तक संविधानिक पद पर थी, इतना पतन और अश्लीलता पुलिस की किसने की है - तो कहने की जरूरत नहीं है, पर आप चंदा चोरों को बचाइये, अंबानी - अदाणी के गुलामों को सिर पर बैठाइए, हिंदू - मुस्लिम कीजिए, फ्रिज खोलकर बीफ़ ढूँढिये, पेपर लीक पर चुप रहिए और रामनाम की धुन तब तक गाते रहिए - जब तक आपका रघुपति राघव राजाराम ना हो जाए
राजनीति और विचारधारा छोड़ भी दे तो गार्गी, अहिल्या, सीता, राधा, दुर्गा, कालिका, भवानी, यशोदा, लक्ष्मीबाई से लेकर इंदिरा गांधी, मदर टेरेसा, सुनीता विलियम्स, मेघा पाटकर या देश की लाखों महिलाएं जो पंचायत से लेकर विभिन्न पदों पर काम कर रही महिलाओं की मोदी - शाह की नजर में यह औकात है
लड़कियों और युवाओं लगाओ एक और नारा
"दो कचौरी - एक समोसा
मोदी - शाह का क्या भरोसा"
मुख्य मीडिया में यह सब नहीं है - क्योंकि ये सब भड़ैती और दलाली में व्यस्त है - सांसद, विधायक और पार्षदों की चापलूसी करके उनकी टट्टी - पेशाब आचमन की तरह पी रहें है - नीच और घटिया पत्रकार
डूब मरो सरकार
शर्म मगर हमको आती नहीं, बस एक बार आतिशी या नेहा की जगह अपनी माँ, बहन, पत्नी या किसी घर की महिला को रखकर कल्पना करें, यदि आपका जमीर मर गया है - तो आप भी मर ही जाएं - वहीं ठीक रहेगा
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देह के खत्म हो जाने पर छाँह देने से पेड़ भी छिटक जाते है, आकाश दूर हो जाता है, जल से बिछड़ना पड़ता है, मिट्टी अधीर हो जाती है अपने में समाने को और अंततः अग्नि में मिलना ही पड़ता है पंच तत्वों को, देह नश्वर है पर जीवन भोग अनीश्वर है - संताप, अवसाद, पीड़ा और दुखों के दानावल का अंत और सारी स्मृतियों का अंतिम पड़ाव यही है - इसी में सारा सत्व है और जीवन का निचोड़, शायद इसी क्षण को सुख कहते है - जो जीवन में जन्म और मृत्यु के बाद सिर्फ़ दो बार ही आता है, बाकी तो हमारे जन्म लेने के प्रायश्चित वाले कर्मों का लेखा-जोखा है सब
याद आती है पंक्तियाँ - "मन रे तू काहे ना धीर धरे"
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पता नहीं यह सौभाग्य है या कुछ और कि हमें मोहन दास करमचंद गांधी, जिन्हें हमने महात्मा बना दिया, को याद करना पड़ता है, मजबूरी कह लें या मजबूती पर गांधी भारत की फ़िज़ा का एक महत्वपूर्ण अवयव जरूर है
अहिंसा जैसे गांधी के सिद्धांत अब दुनिया के लिए अप्रासंगिक है और हम चहूँओर देख ही रहें है और हमने गांधी का देश होते हुए एवं आजादी के अस्सी साल बाद गांधी के किसी मूल्य को नहीं बख्शा - तो बाकी से क्या ही उम्मीद करें
सबसे ज्यादा जोर इस समय "गांधीवादियों द्वारा ही गांधीवादी संस्थाओं को नियंत्रित" करने की है, इनकी जमीन, जायदाद और व्यवहार पर कड़ी निगाह रखकर इन्हें संतुलित रखने की जरूरत है, वर्धा से लेकर उत्तराखंड हो, भोपाल से लेकर इंदौर हो या छोटे-मोटे, फर्जी बुद्धिजीवी लोग जो खादी के झब्बे पहनकर पूंजीवाद को कुचलकर ऐयाशी कर रहें है और गांधी को बेच चुके है
गांधी के नाम पर अफसोस यह है कि हम "हे राम" भी नहीं कह सकते - क्योंकि राम के घर भी चोरी है और व्यवसाय है, "वैष्णव जन" तो अब कोई क्या ही कहेगा, बस सच को सच की तरह स्वीकार कर लें - यही पर्याप्त है
आईए दो मिनट का मौन रखें - एक परम्परा और रूढ़ि की तरह
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घबराएं हादसों से क्या - हम जीने के सहारे निकलेंगे,
डूबेगा अगर ये सूरज तो चाँद सितारे निकलेंगे
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