1942 में धार, मप्र में जन्मे और धार, देवास में पढ़े लिखे पद्मश्री प्रताप पवार कत्थक शैली के गुरु है और एक बड़े कलाकार जो अब लन्दन में स्थाई रूप से बस गए है. भारत सरकार ने उन्हें त्रिनिनाद में कत्थक सिखाने के लिए भेजा था पर जब वे लन्दन पहुंचे तो वही के होकर रह गए पर अच्छी बात यह है कि वे भारतीय संस्कार और गुरु शिष्य परम्परा के वाहक है और लगभग 73 वर्ष की उम्र में भी काम करने का जज्बा देखते ही बनता है. पिछले 35 बरसों से वे साल में दो बार भारत आते है और प्रस्तुतियां देते है. कल इंदौर में सफल प्रस्तुति के बाद आज देवास में उन्होंने प्रस्तुति दी अपने चार शिष्यों के साथ जिनमे से दो विदेशी थी, साथ ही एक विदेशी शिष्या ध्वनी और लाईट का प्रबंधन देखने आई थी. देवास के मल्हार स्मृति मंदिर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सन 1952 में इस स्टेज से पहली बार नृत्य की सार्वजनिक प्रस्तुति दी थी और आज वे इतने सालों बाद यहाँ लौटे है. उन्होंने कहा कि जब वे यहाँ थे तो सोचा नहीं था कि जीवन में कुछ कर पायेंगे और उनमे आत्मविश्वास की बहुत कमी थी. बाबा साह...
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