N CArsan Noble Awardee , Khari Khari and LIC, Posts from 5 to 10 Oct 2026 Mostly Jantar mantar Posts
एक कायर और मणिशंकर क्या कर सकता है
फ्रांसिस बेकन के अनुसार, हिंसा प्रतिशोध की उपज है; यह व्यक्ति को कानून और विवेक से दूर ले जाती है, एवं चार्ल्स लैम्ब की मानवीय दृष्टि हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी संवेदना में है, क्रूरता में नहीं
हिंसा ताकत का नहीं, विवेक की पराजय का प्रमाण है; जहाँ तर्क और संवेदना हारते हैं, वहीं क्रूरता जीतने का भ्रम पालती है
कल वैसे सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या है, बचे खूचों का श्राद्ध हो जाएगा
ओम शांति
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गधे - घोड़े या मणिशंकर पदों पर आसीन हो तो काकरोच, मक्खी, श्वान, शूकर पार्टी बनाने में क्या संकोच, बदनामी से डर नहीं लगता साहब , सभ्य खाल ओढ़कर बैठे खून पिपासुओं से डरते है
कायर और क्या कर सकता है - मेट्रो बंद, रेल बंद, कर्फ्यू, गिरफ्तारी, वाटर कैनन, आंसू गैस....गोली, नरसंहार, इतना डरपोक और कायर प्रधान आज तक कोई नहीं था
इंदिरा जी ने इमरजेंसी लगाई पर बसें, ट्रेन बंद नहीं की, लोगों को बस से खींचकर नहीं निकाला बल्कि इन संघियों को मीसा के अंतर्गत जेल में बंद किया था
पटेल का अनुसरण करने वाला कल्लू मामा सिर्फ जस्टिस लोया, हीरेन पंड्या, माया कोडनानी को मरवा सकता है, गोधरा में ट्रेन को आग लगवा सकता है - पर देश के युवाओं को शांतिपूर्वक प्रदर्शन की इजाजत नहीं दे सकता - कमाल है ना
भुगतेगी जनता - जब अनपढ़ और एक चाय वाले को वेदों, पुराणों, ऋचाओं, रामायण - महाभारत, गीता जैसे महाग्रंथों एवं मनुस्मृति जैसे ग्रंथों के महान देश में ब्राह्मणों ने पढ़कर जग को ज्ञान दिया, "सा विद्या विमुक्तते" का सिद्धांत दिया, आंबेडकर - नेहरू और गांधी जैसे विद्वानों ने आजादी दिलाई लिख - पढ़कर, अब ऐसे मणिशंकर को आपने सत्ता सौंपी है और पहले उसे साक्षर करना भूल गए और तो जनता ही भुगत रही है नतीजे
बेसिर - पैर के पांच किलो भीख की राशन पर जिंदा अंधभक्त और ज्ञानेश से लेकर चापलूस, दलाल, सत्ता के लोभी और भ्रष्ट अधिकारी इसको पपोल रहें है और नतीजा सामने है - कायर देश भर की पुलिस बुलाकर दिल्ली को घेर रहा है, मुगलों से बड़ा आक्रांता बनकर उभरा है
[मानसिक स्वास्थ्य खराब है अपुन का, अभी एक ने तमगा फेंक कर मारा है - जो अंधभक्ति में इतना डूबा है कि अपनी शिक्षा, दीक्षा और पूर्व पद भी भूल गया]
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ये दस - दस को नरसंहार करेंगे, खून पीने की आदत है इन दोनों की, अनुरोध यह है कि सीजेआई सहित सभी ३८ जज अदालत में बैठे और फैसलें लें, समय आने पर राष्ट्रपति को सरकार भंग करने की सलाह दें और राष्ट्रपति शासन लगवायें
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भाजपा और इसके ज्ञानेशों, डोभालों और बाकी लालू, कालू, टॉमीज़ में एक बात तो है कि एकदम ढीठ और बेशर्म है
इतने जूते और गालियाँ खाने के बाद भी इस्तीफा नहीं दे रहे
सच में संस्कृति पुरुष है कमबख्त
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"2026 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार"
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एन कार्सन : प्राचीन यूनान से आधुनिक मनुष्य तक
एन कार्सन का जन्म 21 जून 1950 को टोरंटो, कनाडा में हुआ, वे केवल कवयित्री नहीं हैं—वे निबंधकार, अनुवादक, क्लासिक्स की विदुषी और अध्यापिका भी रही हैं, किशोरावस्था में उनके एक लैटिन शिक्षक ने उन्हें प्राचीन यूनानी भाषा पढ़ाई और यहीं से ग्रीक साहित्य, मिथकों और शास्त्रीय परंपरा के प्रति उनका गहरा आकर्षण शुरू हुआ उन्होंने टोरंटो विश्वविद्यालय से BA, MA और Classics में PhD की; बीच में उन्होंने दो बार पढ़ाई छोड़ी, फिर वापस लौटकर अपनी अकादमिक यात्रा पूरी की
कार्सन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे साहित्य की तय सीमाओं को स्वीकार नहीं करतीं - उनके यहां कविता, गद्य, निबंध, दर्शन, अनुवाद, मिथक, इतिहास और दृश्य कला एक-दूसरे में घुलते दिखाई देते हैं, इसलिए उन्हें किसी एक साहित्यिक खांचे में रखना कठिन है, वे प्राचीन यूनानी कवियों और मिथकों को संग्रहालय की पुरानी वस्तुओं की तरह नहीं देखतीं, बल्कि उनसे वर्तमान मनुष्य के सवाल पूछती हैं—प्रेम क्या है, इच्छा क्या है, विरह हमें कैसे बदलता है, स्मृति और मृत्यु का हमारे जीवन से क्या संबंध है और भाषा वास्तव में कितना कह सकती है
उनकी पहली महत्वपूर्ण पुस्तक Eros the Bittersweet (1986) है - इसमें वे प्राचीन यूनानी साहित्य के सहारे प्रेम और इच्छा की प्रकृति को समझती हैं, उनके लिए प्रेम केवल रोमांस नहीं, बल्कि दूरी, अभाव और चाहत के बीच पैदा होने वाली बेचैनी है
उनकी सबसे चर्चित रचनाओं में Autobiography of Red (1998) है। यह पारंपरिक उपन्यास नहीं, बल्कि कविता और कथा के बीच स्थित एक verse novel है, इसका आधार प्राचीन यूनानी मिथक में आने वाला Geryon है, लेकिन कार्सन उसे आधुनिक समय के एक संवेदनशील युवक के रूप में पुनर्सृजित करती हैं - यानी मिथक पुराना है, लेकिन उसके भीतर प्रेम, अकेलापन, इच्छा और टूटन बिल्कुल आधुनिक मनुष्य की है
The Beauty of the Husband (2001) विवाह, प्रेम और टूटते संबंधों पर एक असाधारण रचना है, जिसे उन्होंने “29 Tangos” के रूप में संरचित किया, इसमें निजी संबंध को किसी भावुक प्रेमकथा की तरह नहीं, बल्कि स्मृति, इच्छा, विश्वासघात और आत्म-पहचान की जटिल समस्या के रूप में देखा गया है, इस कृति को T. S. Eliot Prize मिला
उनकी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तकों में Glass, Irony, and God, Men in the Off Hours, Decreation, Nox, Red Doc> और Float शामिल हैं, Men in the Off Hours में कविता के साथ epitaphs, प्रेम-कविताएं, गद्य, चित्रकला और दूसरे रूपों का प्रयोग मिलता है, Decreation में उन्होंने Simone Weil की अवधारणा से प्रेरणा लेते हुए ‘स्व’ को मिटाने या उससे बाहर निकलने की दार्शनिक संभावना पर विचार किया
कार्सन की एक और महत्वपूर्ण पहचान अनुवादक की है, उन्होंने Sappho, Euripides, Sophocles और Aeschylus जैसे यूनानी लेखकों का अनुवाद किया, उनकी An Oresteia में Aeschylus की Agamemnon, Sophocles की Electra और Euripides की Orestes को एक साथ प्रस्तुत किया गया है, उनके अनुवाद पर बहस भी हुई, क्योंकि वे शास्त्रीय भाषा को हूबहू संरक्षित करने के बजाय उसे आधुनिक संवेदना और समकालीन भाषा के साथ संवाद कराती है
उनकी विचारधारा को किसी राजनीतिक ‘वाद’ में बांधना कठिन है, उनका मूल आग्रह भाषा, मनुष्य की आंतरिक स्वतंत्रता, प्रेम, इच्छा, शोक, स्मृति और आत्म की जटिलता पर है। वे यह मानकर नहीं चलतीं कि साहित्य को आसान उत्तर देने चाहिए, इसके विपरीत, उनकी रचनाएं पाठक को प्रश्नों के बीच छोड़ती हैं, उनके यहां प्राचीन मिथक वर्तमान मनुष्य का आईना बन जाता है
इसीलिए 2026 का नोबेल उनके लिए किसी एक पुस्तक का पुरस्कार नहीं है, यह उनकी पूरी साहित्यिक यात्रा—कविता, आलोचना, अनुवाद, मिथक और प्रयोगधर्मिता—का सम्मान है, स्वीडिश अकादमी ने ठीक इसी व्यापक रचनात्मकता को रेखांकित किया है
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अभी तो बहुत जरूरत थी, जीवन की कड़वी सच्चाइयों और बिगड़ते हालातों के अर्ध सत्य हमारे साथ है और कोई दमदार व्यक्ति चाहिए जो आकर कहें कि "सब बदल दो - तेरे हाथ नहीं है, पत्थर उठा और मार"
परिन्दा आखिर उड़ गया जेंटलमैन बनकर, आप विश्व फिल्म इतिहास में धरोहर बनकर गए है - यह आश्वस्ति है और जो मूल्य आपने बनाएं - वे बनें रहें, वही पर्याप्त होगा - आपको याद रखने को
सादर नमन नाना पाटेकर
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पाकिस्तान की वर्तमान अस्थिरता, दंगे, प्रदर्शन और बेकाबू होते हालातों के लिए पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और गृहमंत्री ही जिम्मेदार है, भारत की सीजेपी - कांग्रेसी राहुल और बाकी तो सब निमित्त मात्र है
इस अवसर पर पाक के राष्ट्रपति की भूमिका बेहद नकारात्मक और दुखद है, इससे तो राष्ट्रपति ना होना हजार गुना बेहतर है, अंबेडकर ने क्या सोचकर पाकिस्तान में "राष्ट्रपति" शब्द को सर्वोच्च माना या देश का प्रथम नागरिक कहा था
आज पाक देश जितना अस्थिर है, पूरी मशीनरी अपने मूल काम छोड़कर दूसरे दूसरे कामों में लगे है और विवि हो, दफ्तर, कामकाजी मजदूर वर्ग, या पुलिस और पैरा मिलिट्री बटालियन, साथ ही संविधानिक संस्थाओं में कार्य करने वाले ब्यूरोक्रेट्स और कर्मचारी साथ ही सांसद और अन्य जनप्रतिनिधि कितना खर्च हो रहा है और यह सब हमारी जेब से जा रहा है
पाक की इस मूर्ख सरकार को इतनी सी बात समझ नहीं आती, एक दो कौड़ी के भ्रष्ट, घटिया और मक्कार ब्यूरोक्रेट को वहां से हटाकर इमरान के घर का माली, बावर्ची, खानसामा, सफाई कर्मचारी या चौकीदार बनाने में क्या दिक्कत है - कम से कम देश का और हम सबका रूपया तो बचेगा
इमरान खान जैसे पाक के नीच प्रधान को आत्म मुग्ध होकर मन की बात करना हो, पाक के गृहमंत्री को देश के सभी न्यायाधीशों को लोया का भूत दिखाकर डराना हो, या दुनिया भर में भांड बनकर दिन में हजार जोड़ कपड़े बदलकर हवाई यात्राएं करके ऐयाशी करना हो उसे कहां यह सब समझ आयेगा
और पाकिस्तान की वैश्या बनी मीडिया का तो पूछो मत, जो सत्ता पक्ष की पार्टी से मुख्य चुनाव आयुक्त के बारे में पूछताछ कर रही है और सत्ता के दलाल और प्रवक्ता उस चुनाव आयुक्त का ऐसा बचाव कर रहे है जैसे कोई नया दुल्हा बीबी के विकलांग या विक्षिप्त भाई की पैरवी करता है और कुतर्क करके उसे सही साबित करता है, रेड लाइट इलाके की ये मीडिया उर्फ वेश्याएँ इतने नीचे गिर गई है कि आजकल इमरान और गृहमंत्री से डरकर उनके घर से निकले सेप्टिक टैंक का मलबा खाकर जिंदा है और बंसी बजा रही है
आखिरी साँसें गिन रही है पाकिस्तान में सरकार - बस नुक्ते का इंतजार करिए, दस अक्टूबर को खत्म कहानी, दिल थामकर बैठिये
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एक चोर भ्रष्ट और हरामी ब्यूरोक्रेट के भरोसे सन 2014 से छप्पन इंची सरकार चल रही है, बड़ा बाबू ज्ञानेश इतना बेशर्म है, कैसे घर जाकर बीबी - बच्चों से मुँह मिलाता होगा कमबख्त
अब तो ज्ञानेश कुमार को सजा ए मौत मुक़र्रर की जाना चाहिए
और मित्रों, मोदी शाह और संघ के महामानवों पर नजर रखिए - कही देश छोड़कर ना भाग जाएं
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सुन छोटे, साला अपना तो जहाज डूब रहा है, वो स्मित मच्छर का इमोशनल दांव भी फेल हो गया
एक काम कर, रोहिंग्या बचा है क्या कोई, लगा हेमंता को फोन पूछ, या पाकिस्तान में कुछ जुगाड़ कर, ये देशवासी बेवकूफ है ससुरे , मीडिया से बात कर
सबका ध्यान बंटा , नहीं तो तेरी.......
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हमारे हिंदी के टुच्चे साहित्यकार अपनी नौकरी बचा रहे है, घर में छुपकर कविता रच रहे है, कहानीकार गण देशभर में उत्सवों में घूम रहे है और बुढ़ी तितलियों को दिल फेंक कहानियां सुनाकर दिल जीतने की कोशिश कर रहे है
इनसे बड़ा नालायक और घटिया कोई होगा, आओ जुनैद को जिंदा करें - ताकि इन रिटायर्ड खब्ती और पेंशनभोगियों को पुरस्कार मिल सकें
साले सूअर कहते है - "साहित्य समाज का दर्पण है", "साहित्य का काम प्रतिपक्ष रचना है"
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ज्ञानेश ही भाजपा
और
भाजपा ही ज्ञानेश
देखिए सारे बकलोल आज बकर कर रहे है, कायर और डरपोक, कारपोरेट के गुलामों को डर है कि यदि सत्ता चली गई तो भ्रष्टाचार कैसे करेंगे चंदा चोरी कैसे करेंगे
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अमित शाह की पुलिस ने आज संविधान की हत्या की, राहुल को गिरफ्तार किया अभी, जबकि शांतिपूर्वक प्रदर्शन करना हमारा मौलिक अधिकार है इसके लिए ना सूचना देने की जरूरत है, न अनुमति की और ना कोई निर्धारित स्थान पर जाने की जरूरत है
अमित शाह और मोदी घबरा गए है अब और इनसे देश नहीं संभाला जा रहा, ध्यान रखिए ये देश छोड़कर ना भाग जाएं
माल्या से लेकर बाकी सारे चोरों को भगा दिया, चम्पत राय को बचा लिया
जोर से बोलो -
"दो कचौरी एक समोसा
मोदी शाह का क्या भरोसा"
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मीडिया का समानार्थी शब्द क्या है
मूर्ख - इसके अलावा कुछ और हो भी नहीं सकता
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मोदी अपना बहुमत खो चुका है
"ये पच्चीस साल सार्वजनिक जीवन के क्या होते है" - बकलोल भीड़ से अजीब किस्म के नारे लगवा रहा है, कितना कुंठित और हताश हो गया है
जबरन बोल रहा है और यह आयोजन मतलब साला दुनिया में कही नहीं हो वह करेगा, जो पुरस्कार किसी को इतिहास में नहीं मिला वह बटोर लाएगा, चाय बेचने से लेकर मगरमच्छ तक की कहानियां बेचकर मन नहीं भरा जो आज ये पच्चीस साल कहां से आ गया
बाय द वे , इसमें संघ में बिताएं वो 32 वर्ष भी शामिल है क्या या वहां जीवन निजी था सार्वजनिक नहीं
साला थोबडा देखकर और आवाज सुनकर ही अब उल्टी जैसा ही लगने लगता है, देश आदि बोलता है तो घिन आती है, निकल बै अब, बहुत हुआ
Too much irritating
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कुल मिलाकर (अ)ज्ञानेश कुमार है क्या, रट्टा मारकर बना ब्यूरोक्रेट ही ना, चापलूसी करके बना मुख्य चुनाव आयुक्त ही ना, अखिर अंग्रेजी में कहें तो गवर्नमेंट सर्वेंट जिसका हिंदी अर्थ है - "सरकारी नौकर", और केरल में क्या - क्या नहीं किया, इस भ्रष्ट चापलूस ने अब सब जग जाहिर है
और इसकी इतनी औकात की तीन सौ जन प्रतिनिधियों से, वो भी पार्षद, सरपंच या विधायक नहीं, सांसदों से मिलने से मना कर रहा है, इस बाबू के दफ्तर के बाहर सांसद और लोग आज सात घंटों से बाहर खड़े है, मोदी और शाह का गुलाम, निकाल कर बाहर लाओ और उससे बात करो
या तो यह डरपोक है या अपने मालिक से अपने गले का पट्टा छुड़वाने का इंतजार कर रहा है - कि वो छोड़े तो सू-सू करने बाहर निकले ; भारतीय ब्यूरोक्रेट्स, अपवाद छोड़ दे तो, गिरगिट के अलावा है क्या, देश की शिक्षा - स्वास्थ्य से लेकर सारी अव्यवस्थाओं के मुख्य जिम्मेदार ये ही लोग है, यदि ये लोग अपने पद की इज्जत और संविधानिक जिम्मेवारियों का निर्वाह निष्पक्ष और गैर राजनैतिक ढंग से कर लेते तो आज देश इस बरबादी के कगार पर नहीं होता, मप्र में ऐसे भ्रष्ट और चापलूस अधिकारियों को गत चालीस वर्षों से देख रहा हूँ - जो इसी में पूरा जीवन गंवा बैठे और धर्म-कर्म की और वेद - पुराणों पर लंबे प्रवचन और आख्यान देते फिरते है, लंबे-लंबे अपठनीय आलेख पेलते रहते है - पर मोदी शाह जैसे अनपढ़, गंवार और कार्पोरेट्स के गुलामों की बदमाशियां नहीं दिखाई देती, रिटायर होने के बाद ये लोग "हड़के कुतरे" (मराठी में पागल कुत्ते) हो गए है - ये लोग गोबर खाते है या गेहूं समझ नहीं आता, मप्र में ही अरविंद और टीनू जोशी के पास नौ सौ करोड़ रुपये मिलें थे, एक पूर्व मुख्य सचिव के पास करोड़ों के बंगले, जमीन और अरेरा कालोनी में दर्जनों हॉस्टल, स्कूल और अकूत संपत्ति मिली
(अ)ज्ञानेश हमारे अस्सी साल की ब्यूरोक्रेसी का सबसे घटिया नमूना है - यह अब भारत का बच्चा-बच्चा समझ गया है पर इस धूर्त को ना शर्म है - ना लज्जा, पता नहीं कैसे इतनी बदनामी के बाद जिंदा है, एकाध ज़मीर वाला शख्स होता तो इस्तीफा देता, या सड़क पर खड़ा होकर अंडे ही बेच लेता कमाई के लिए कमबख्त
अभी अंध भक्त यहाँ आयेंगे - ज्ञान बांटने की मोदी नहीं तो कौन, राहुल योग्य है या नहीं - यह अलग बात, पर मोदी - शाह या इनके आनुषंगिक संगठनों के कर्ता-धर्ताओं से लाख गुना बहादुर है और चंदा-चोर, देश बेचूँ कायरों को सत्ता से बेदखल करने का समय आ गया है, भाजपा के प्रवक्ता एक से बढ़कर एक विशुद्ध मूर्ख है, पगला गए है एकदम और अनाप शनाप बक रहें है - संबित हो, रविशंकर, सुधांशु त्रिवेदी हो या फैशन परस्त स्मृति या अन्य महिलाएं
अंत में इतना ही कि
"वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आए कुछ और निखर
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है"
•रामधारी सिंह दिनकर
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"बीमा आग्रह की नहीं, लूट-खसोट की वस्तु है"
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बहुत छोटी सी पॉलिसी थी, सन 1998 में एक साथी शिक्षक से करवाई थी जिसे असमय ही एक निजी विद्यालय से बीच सत्र में निकाल दिया था, उसने एजेंसी ली और हम सबसे अनुरोध किया कि छोटी ही सही पॉलिसी ले लें, ताकि उसका परिवार चल जाए तुरंत, नई नई शादी हुई थी उसकी, एक बेटी थी छोटी सी दो माह की, सो हम सबने पॉलिसी उससे ले ली
कम राशि थी, सालाना प्रीमियम भरना पड़ता था, बीस साल बाद परिपक्व होने जा रही है, जब पॉलिसी के दस्तावेज जमा किए तो पता चला कि जो सपने उस मक्कार और नीच ने दिखाये थे - वो रिस्क के थे, ना कि परिपक्वता होने पर राशि के
जब मैने उस बाबू को कागज दिए तो बोला कि आपको यह राशि मिलेगी, तो मैं हैरान था, वरिष्ठ अधिकारी से बात की तो उसने पूरी बेशर्मी से खीखीखी करते हुए बताया कि "यदि आप मर जाते तो यह बड़ी राशि आपके परिवार या वारिस को मिलती पर अभी तो इतनी ही मिलेंगी" मतलब कंपनी आपके मरने का इंतजार कर रही है
मित्रों, जो राशि मिलने वाली है - वह जमा राशि से भी लगभग आधी है, जो मैने बीस साल जमा की थी मेहनत के रूपयों से, मतलब ब्याज आदि तो भूलिये - पर मूल भी वापिस नहीं मिल रहा, यह तीसरी पॉलिसी है, पहली दो बड़ी राशि की पॉलिसी थी, और अब इतना निराश किया है ना इस सबने कि कह नहीं सकता, मतलब मान लीजिए आपको पांच लाख के सब्जबाग दिखाए थे तो डेढ़ लाख भी नहीं मिलें - जबकि करीब तीन लाख जमा किया है आपने - इससे ज्यादा फ्रॉड और कमीनापन कोई कर सकता है और यह भारतीय जीवन बीमा निगम सरकारी कंपनी थी - जिसकी वाट इस सरकार ने IDBI के साथ मिलकर लगा दी थी
सम्हलकर रहिये और इन नालायक एजेंट्स पर बिल्कुल भरोसा ना करें, ये सिर्फ सपने दिखाने में माहिर है, आप यदि बीमा भर रहे है तो रिस्क और परिपक्वता पर देय राशि का पता कर लें - अन्यथा आप अपने भविष्य का सोचकर प्रीमियम भरते हुए मर जायेंगे पर अंत में कुछ नहीं मिलेगा, सुझाव है कि रेकरिंग खाता खोले साल साल भर का और यह राशि परिपक्व होने कर एफडी कर दें कम से कम मूल तो सुरक्षित रहेगा आपका और थोड़ा बहुत ही सही, ब्याज मिल जायेगा आपको
ज्ञानी, एजेंट्स और बीमा क्षेत्र के कर्मचारी - अधिकारी फालतू की पूछताछ नहीं करें, आप तो क्या निर्मला ताई या उसका बाप भी कुछ नहीं कर सकता, सब बिका हुआ है, याद आता है वो स्लोगन - "ये गोरमेंट बिक गई है"
लानत है ऐसे हरामखोरों और एजेंट्स पर - डूब मरो - कही जाकर

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