नाना पाटेकर : गुस्से से सामाजिक चेतना तक — एक अभिनेता की विरासत संदीप नाईक नाना पाटेकर का जाना केवल एक अभिनेता का चले जाना नहीं है ; यह उस अभिनय परंपरा के एक बड़े अध्याय का अंत है , जिसमें अभिनेता पर्दे पर केवल पात्र नहीं निभाता , बल्कि अपने समय के समाज , उसकी बेचैनी , उसके आक्रोश और उसकी विडंबनाओं को अपने चेहरे , आवाज़ और देह के माध्यम से अभिव्यक्त करता है. 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में गोवा स्थित अपने आवास पर हृदयाघात से उनका निधन हुआ. अस्पताल में चिकित्सकों ने उन्हें बचाने का भरसक प्रयास किया , लेकिन वे नहीं बच सके. महाराष्ट्र सरकार ने उनके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान देने की घोषणा की. 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर आगे चलकर भारतीय सिनेमा में ‘नाना पाटेकर’ के नाम से पहचाने गए. उनका जन्म किसी फिल्मी खानदान में नहीं हुआ था. उनका बचपन आर्थिक कठिनाइयों से भरा था. लगभग तेरह वर्ष की उम्र में परिवार आर्थिक संकट में आया और छोटी उम्र में ही उन्हें काम करना पड़ा. वे स्कूल के बाद मुंबई में फिल्मी पोस्टर बनाने का काम करते थे और बहुत कम पारि...
बहुत फिट आदमी था, कभी उसे गुस्सा करते नहीं देखा, छह बच्चे थे - पांच लड़कियां और एक लड़का, चार लड़कियां नौकरी करती थी, एक की शादी हो गई थी, बेटा सबसे छोटा था जो तीसरी में पढ़ रहा था, सबसे बड़ी बेटी - जिसका ब्याह हो चुका था, उसमें और बेटे में अड़तीस साल का अंतर था, बच्चे की पढ़ाई का खर्च दामाद ही उठा रहा था बंदा फिट था, शहर के गांधी हाल से श्मशान घाट तक मिल जाता था मुस्काते हुए, कोई दुश्मन नहीं था - शहर, मीडिया, क्लबों, संस्थाओं या स्कूल या अस्पताल में - हैरानी होती थी कि पटवारी से लेकर विभागों के बड़े बाबू तक उसका रसूख जानते थे क्या काम करता था - किसी को भी नहीं मालूम, पर लीचड़ था और गधा हम्माली से लेकर बौद्धिक तक देने में माहिर था, कई एनजीओ की खाक छान चुका था, शहर का कोई स्कूल नहीं छोड़ा - जहाँ पढ़ाया ना हो और कोई संस्था नहीं जिसको ठगा ना हो आज फिर दिख गया तो बोला - अज्ञेय कहते है ना - "मै मरूँगा सुखी, मैंने जीवन की धज्जियां उड़ाई है" बस ही ही ही करके हँसता हुआ निकल गया, समझ यह आया कि जीवन को जितना हल्का लेंगे और कैजुअल उतने ही मजे से जीवन कटेगा #मन_को_चिठ्ठी *** राहुल और महा...