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Prof Purushottam Agrawal on Kabeer 30 Aug 2026

'जश्न-ए-रेख़्ता' के यूट्यूब चैनल पर हाल ही में जारी हुआ, कबीर के व्यक्तित्व, जीवन-दर्शन और कविता पर एकाग्र मशहूर आलोचक एवं लेखक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल {Purushottam Agrawal} का व्याख्यान बहुत प्रभावशाली, मार्मिक एवं मूल्यवान् है। इसलिए कि इसमें प्रचलित किंवदन्तियों से अलग हटकर वास्तविक इतिहास की रौशनी में, कबीर की कविता के गहन विश्लेषण के ज़रिए उनके जीवन पर विचार करते हुए सर्वथा नई अन्तर्दृष्टियाँ उपलब्ध कराई गई हैं; जिनसे गुज़रकर हमें सुखद अचरज होता है। कुछ प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं : कबीर का जन्म सन् 1398 में हुआ, इस पर विद्वानों में एक तरह की सर्वानुमति रही है; मगर उनका देहावसान कुछ के मुताबिक़ 1448, कुछ के अनुसार 1468, किन्तु बहुत सारी बहसों और शोध के आधार पर ज़्यादातर अध्येताओं की राय है कि 1518 में हुआ। इस हिसाब से वह तीन सदियों के गवाह रहे और कुल 120 वर्ष जिए। प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि 'यह बात थोड़ी अटपटी लगती है, लेकिन एक अपवाद के तौर पर तो ऐसा हो ही सकता है।' दूसरे, कबीर औपचारिक रूप से पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, इसके समर्थन में यह पंक्ति अक्सर उद्धृत की ...
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Khari Khari Mohan Bhagwat's visit to USA Posts of 30 and 31 Aug 2026

ये जो तुम ढोंगी किस्म के आत्म मुग्ध और अपने ही संसार में जीने वाले साहित्यकार बनकर अपनी किताबों की तारीफ, समीक्षाएं और अखबार पत्रिकाओं की कतरनें यहां चैंप देते हो ना, वह कुल मिलाकर दस लोग नहीं पढ़ते - तुम्हारी कहानी, कविता, उपन्यास, कथेतर, ट्रेवलॉग, ब्लॉग, अनुवाद या समीक्षा कोई नहीं पढ़ता, किसी सुतिये से लिखवा लो या रूपया देकर छपवा लो हर माध्यम की मजबूरी है कि उसे अपना पेट भरना है और यह समझना हो तो किसी अखबार के ब्यूरो के पास जाकर शाम बैठो - उसके हार्ट अटैक गिनो कि रोज - रोज चार पन्नें भरने में उसको कितना श्रम बेशर्मी से करना पड़ता है, भाड़ में गई भाषा, तहज़ीब, संस्कृति, विचारधारा और साहित्यिक समझ, इसलिए वो जो मिल जाए उसे छाप देते है बस क्वालिटी उन्नीस - बीस हो सकती है, वैसे यह सर्व विदित ही है कि हर साहित्यिक कचरे का अपना स्वांत - सुखाय होता है और हम इक उम्र से वाकिफ़ है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा बाज़ आ जाओ यारों, हिम्मत है तो महंगाई, हिंसा, युद्ध और बदलते समाज पर लिखकर बताओ और साहित्य का जो मूल काम है - "प्रतिपक्ष रचना" वह करके बताओ, मर्दानगी यही है, नौकरी बचाना नहीं, प...

Khari Khari, Drisht Kavi , Man Ko Chithti and other Posts from 24 to 29 Aug 2026

"मनुष्य बली नहीं, समय होत बलवान" [इस पोस्ट का उद्देश्य सहानुभूति अर्जित करना, या अपना कौशल एवं दक्षता दिखाना नहीं है, आप पढ़कर इसका मर्म पकड़ने की कोशिश करें ] ***** गत 17 जुलाई की बात है, मै जयपुर के लिए निकल रहा था और छत पर गमले में कुछ नींबू लगे थे, सोचा आने तक गिर जायेंगे और शायद खराब भी हो जायेंगे, इसलिए तोड़कर फ्रिज में रख देता हूँ, गलती से जल्दी में स्लीपर पांव में नहीं थी, तोड़ने में नींबू का एक छोटा सा काँटा बाये पैर की एड़ी में चुभ गया, मैंने तुरंत खींचकर निकाल दिया, थोड़ी देर दर्द होता रहा - पर लगा कि ठीक हो जायेगा उसके बाद मैं निकल गया यात्राओं पर, दो - चार दिन बाद एड़ी में दर्द शुरू हुआ और लगा कि एड़ी में कुछ चुभ रहा है, फिर याद आया कि यह तो वही काँटा है, उसके बाद असहनीय दर्द, चलने में दिक्कत, रात को नींद नहीं और एड़ी में लगातार जैसे शूल चुभ रहें हो, सारा ध्यान इस पर ही लगा रहता हर दम मित्रों, परिजनों और शुभ चिंतकों ने - जैसा कि होता है ज्ञानदान शुरू किया - "आंकड़े के दूध से लेकर नींबू बाँधना, गुड का चटखा, गुड - हल्दी गर्म करके बांधना,अजवाइन, अंबी हल्दी को चुन...

Khari Khari, Man Ko Chithti and other Posts from 9 to 24 Aug 2026

"पूस की रात" जैसी प्रसिद्ध कहानी प्रेमचंद ने सागर जिले के देवरी गांव में बैठकर पूस की रात को महसूस करते हुए लिखी थी, प्रेमचंद की बेटी और दामाद वहां रहते थे और सागर उनका आना - जाना लगा रहता था मुझे आज यह मालूम पड़ा - देवास में आयोजित परसाई जन्मशती के एक कार्यक्रम में, क्या आपको यह बात मालूम थी मेरी आधी अधूरी जानकारी यह भी है कि गुनाहो के देवता की नायिका सुधा भी शायद सागर विवि के अंग्रेजी विभाग में पढ़ाती थी, यह बात धर्मवीर भारती ने किसी से कही थी एक निजी बातचीत में, मित्र इसे दुरुस्त करें *** राहुल नहीं वो आंधी है देश का आधुनिक गांधी है ________ अभी एक वीडियो देखा जिसमें युवा कह रहे है कि मोदी राहुल से तीस मिनट डिबेट कर लें तो हम पुनः मोदी को वोट देंगे मोदी में एक वाक्य मन से बोलने की हिम्मत नहीं, मीडिया के गली मुहल्ले वाले टुच्चे पत्रकार से बात करने की हिम्मत नहीं, जिस मीडिया को पंद्रह वर्षों तक दूध पिलाया वह तो सांप ही निकली पर सोशल मीडिया को तमाम कोशिशों और कानूनी दांव पेंच में दबाने के बाद भी गालियां सुनना पड़ रही है यह कम है क्या, ना दलित साथ है - ना बामन, बनिये या ठाकुर ...