मजेदार दुनिया बना ली है ज्ञानियों, बुद्धिजीवियों और दुनिया के कर्ताधर्ताओं ने - इन मूर्खों को लगता है हम ही इस पूरी पृथ्वी का भार अपने काँधे पर सम्हालकर चल रहे है - इसलिए अमीबा से लेकर डायनोसोर जिंदा रहें और अब मनुष्य भी इन्हीं के रहमो - करम पर सांस ले रहा है मतलब एक ज्ञानी ने "सूचना के अधिकार" पर लम्बा - चौड़ा व्याख्यान दिया दो घंटे में, जिसमें दो बार ब्रेक लिया दस - दस मिनिट का कि बोलते - बोलते हांफनी चलने लगी थी, फिर प्रश्नोत्तर का सत्र या समय आया तो हम लोगों ने पूछा कि - "बॉस, हमारी ये व्यवहारिक दिक्कतें है - जिलों में या राजधानी के विभागों में" तो अगले को पसीना आ गया और जवाब दिया - "असल में मैंने आजतक सूचना के अधिकार का कभी जीवन में प्रयोग नहीं किया और ना ही कोई आवेदन ड्राफ्ट किया है" फिर क्या था, अपुन ने सारी श्रद्धा - भक्ति छोड़कर ताजी - ताजी हुई बरसात में कीचड़ से लथपथ और भीगा हुआ जूता उठा लिया और बोला "हरामखोर, निकल, साले PPT Reader ....कही के, अगली बार दिख ना जाना नहीं तो सारी की सारी 67 स्लाइड्स की पोंगली बना देंगे" ये तो हाल है इन मगर...
अपनी सारी स्मृतियां, उमस, लंबी दोपहरें, उदास शामें, ठंडी रातें और भुनसार में उगते सूरज को छोड़कर तुम चले जाओगे, हर बार एक पेंडोरा बॉक्स की तरह से तुम आते हो और अपने साथ चिलचिलाती धूप, शुष्कता, सड़कों का सूनापन, तप रहें एकल लंबे मौन में खड़े पेड़ों की रिक्तता, चातक और चकोर के मिलन के स्वप्न, जाते हुए रोहिणी नक्षत्रों की तपन, सूखती हुई नदियों का ठहराव, ढूह से बन गए रिक्त पहाड़, समुद्र किनारे आग बन गए रेत के स्वर्णिम कण, सूखे मैदान बन गए तालाब की मेढ़ से लेकर गहराते हुए सूखे कुएँ, पानी के अभाव में पपड़ी की तरह जमती जा रही जमीन, आस्मान में ताकती असंख्य आंखें, प्यास से झुलसते कंठ - जिनमें कितनी ही प्रार्थनाएं अवरुद्ध हो गई है, और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम की छूटी हुई वो जगह जिसे भरना मतलब अपने बेगुनाह होने के बावजूद भी सब कुछ चुपचाप सहना शामिल है, भी इसी सारे अफ़साने का हिस्सा है इस सबके बावजूद भी तुम्हारी विषाक्त उपस्थिति, स्मृति गंध, मिठास और फिर से जीवन के अगले बरस में सावन, वसंत, शिशिर और हेमंत के बाद बनी रहेगी - इसलिए कि तुम बौराएं हुई आम्र मंजरियों में फलों का गुलदस्ता ले आते हो - जामुन, लीच...