समय शेष नहीं है, जो भी जितना भी है इसमें एक हड़बड़ाहट है, एक जल्दी है, बहुत कुछ कर गुजरना है अभी - इसलिए, मैं किसी को अब जज नहीं करता - क्योंकि ना मेरे पास अब क्षमता बची है और ना ही कोई विशेष योग्यता है, मेरे भीतर इतनी कमियां है कि समझ नहीं आता कैसे ऊबरू इनसे, जब मैं इस पड़ाव पर पहुंचा हूँ तो यह सरल सी बात समझ आई है कि कमियों के अलावा हम किसी और चीज से बने ही नहीं है हम सबमें थोड़ी बहुत अच्छाईयां है - जो एक बेहतरीन आवरण की तरह से चेहरे को ढांककर जिंदगी भर का गुजारा चला देती है और हम ताउम्र इसी भ्रम में बने रहते है कि हम श्रेष्ठ है, बहरहाल, अब समय नहीं अपनी कमजोरियों से ही निजात पा लूं तो शेष सफ़र आसान हो सकें, किसी तरह के बोझ, पूर्वाग्रहों और धारणाओं के तले दबकर अपने को भारी नहीं करना चाहता इस समय जब वाचालता छोड़कर स्थितप्रज्ञ हो रहा हूँ, अपनी एषणाओं को छोड़कर अपरिग्रही बनने का अभ्यास कर रहा हूँ - बहुत कठिन है पर जी जान से लगा हूँ मुश्किल है पर कोशिश है कि सब समझ पाऊं आहिस्ता-आहिस्ता और इसे भावनात्मकता से भी आगे बढ़कर गुन पाऊं तो शायद कुछ ठौर मिलें, अपने आपको भी समझ पाऊं और जज करन...
अपने अनुभव से कह रहा कि निराश, असफल, फेल, नापास होना बिल्कुल बुरा नहीं है, सकारात्मकता अच्छी बात है, पर मनुष्य जीवन में हमेशा उत्साह में, सकारात्मक या आशावादी नहीं हुआ जा सकता, और यदि मैं यह करता हूँ , दिखता हूँ या व्यवहार में लाता हूँ तो यह मैं अपने आप से दोगलापन कर रहा हूँ, अपने आपको धोखा दे रहा हूँ और असहज हूँ, मन और चित्त शांत नहीं है, कोई हड़बड़ाहट और बेचैनी है जो मुझे खाये जा रही है, इस सबमें दूसरों को धोखा देता हूँ - वह बात तो बहुत देर से हो सकती है कि मेरे इस नकली मुखौटे ने कितनों का नुकसान कर दिया, जीवन भर ऐसे मुखौटो से ही धोखा खाते आया हूँ - फिर वह विचारधारा हो, व्यवहार हो, ईमानदारी हो, साहित्य हो, समाजसेवा हो, कानूनी दायरे और अदालतें हो, न्याय हो, नैतिकता या स्वाभिमान, सब भोंथरे और थोथे निकलें इसलिए कोशिश करता हूँ कि जैसा हूँ - वैसा ही रहूँ, जो भाव-भंगिमा भीतर से है वही बनी रहे, जो भाषा भीतर उपजती है वही व्यक्त करूँ - अब उसमें गाली आये या श्रृंगार , यही उम्मीद करता हूँ कि सकारात्मकता और प्रचंड आशा के बदले सहज, सरल जीवन बगैर दाँव-पेंच के बना रहें, जब जीवन भर कोई आवरण नहीं ओढ...