कांग्रेस का जब जब कुर्सी के पास जाने का समय आता है कोई ना कोई कांग्रेसी ही सत्यानाश कर देता है • दिग्विजय सिंह - सद्दाम हुसैन जी • मणिशंकर - नीच और अब • खड़गे - मोदी का बाप जायेगा क्या करें राहुल और प्रियंका , और भाजपा यह सब चुनाव में भुनाने के लिए विशेषज्ञ है ही, भुगतो अब ; वैसे लोकतंत्र में यह भाषा मोदी, अमित शाह से लेकर योगी, मनोज तिवारी, निशिकांत दुबे आदि लगातार बोल रहे है, पर कांग्रेस ने बोला तो गलत हो गया फेल प्रोडक्ट तो असल में नरेंद्र मोदी है, पर कल बोला राहुल को और यह बात किससे पूछनी चाहिए - यह लिखने की आवश्यकता नहीं है पूरे देश को पता है कि कौन फेल है और कब से है बहरहाल, भाषा की शुचिता अभी और गिरेगी चुनाव आने दीजिए जरा *** सिर्फ पंद्रह पैसे का था - ना डाटा चोरी का डर - ना गोपनीयता भंग होने का खौफ़ और बहुतायत में उपलब्ध और सहज - सरल मार्ग से पहुंच भी जाता था हर तरफ और हर जगह कितनी ही कहानियां, खून के आँसू लिखे गए इस पर और अनगिनत किस्से जो कभी पूरे हुए और कभी नहीं पर किसी ने साथ नहीं छोड़ा ना शिकायत की, आखिरी में एक बिंदु तक भर - भरकर लिखा गया इस पर, सब खत्म हो गया जीवन बदलता है,...
फिल्म उद्योग भारत में हमेशा निशाने पर रहा है और कारण बहुत साफ है कि अंधाधुंध रूपया और कमाई के साथ काले धंधों का जखीरा पर इस सबमें दुखद यह है कि हम जो मेहनतकश लोग है - उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा -जो टैक्स के रूप ने हम सरकार को देते है, वह इनकी सुरक्षा पर खर्च होता है इनके काले कारनामों से ये हमेशा ही खतरे में रहते हैं और हमें मूल सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है, अब "ज़ेड" श्रेणी की सुरक्षा कोई मजाक नहीं, पर इन्हें दी जा रही है, इनका समाज या देश के विकास में क्या योगदान है - सिवाय भाँडगिरी करने के या आम कैसे खाते है जैसे घटिया सवाल पूछने के अलावा यह सिर्फ फिल्मी उद्योग ही नहीं, बल्कि धार्मिक गुरुओं, रामदेव से लेकर उन तमाम नेताओं पर भी सवाल है - जो इस श्रेणी की सुरक्षा का लाभ ले रहे है - जैसे मप्र में नरोत्तम मिश्रा जो अभी विधायक, मंत्री तो दूर एक पार्षद या किसी पंचायत के पंच भी नहीं, पर ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा के साथ भोपाल में सरकारी बंगला धारण किए हुए है सलमान हो, अक्षत, अक्षय या अमिताभ या ये कल का टाईगर या टामी श्रॉफ - इनको क्या जरूरत है और क्यों इन पर इतना फोकस, क्या यह नेताओं क...