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Man Ko Chithti, Drisht Kavi and Khari Khari - Posts from 26 Feb to 8 March 2026

"अचानक मुझमें असंभव के लिए आकांक्षा जागी,  अपना यह संसार काफी असहनीय है, इसलिए मुझे चंद्रमा, या खुशी चाहिए—कुछ ऐसा, जो वस्तुतः पागलपन-सा जान पड़े, मैं असंभव का संधान कर रहा हूँ... देखो, तर्क कहाँ ले जाता है—शक्ति अपनी सर्वोच्च सीमा तक, इच्छाशक्ति अपने अंतर छोर तक! शक्ति तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक अपनी काली नियति के सामने आत्मसमर्पण न कर दिया जाये। नहीं, अब वापसी नहीं हो सकती, मुझे आगे बढ़ते ही जाना है..."  • कालीगुला "मुझे चांद चहिये" - सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास से __________ प्रिय हर्ष, तुम्हें लिखना वैसा ही है जैसे किसी बंद खिड़की से आकाश को पुकारना, तुम चले गए हो, पर तुम्हारी चुप्पी अब भी शब्दों से अधिक बोलती है, तुम्हारे भीतर जो प्रेम था, वह साधारण नहीं था—वह ज्वार की तरह उठता था, पूर्णिमा के चाँद की तरह फैलता था, और उसी चाँद की तरह शायद तुम्हें दूर, बहुत दूर ले भी गया वर्षा वशिष्ठ तुम्हारे लिए केवल एक स्त्री नहीं थी, वह तुम्हारा स्वप्न थी, तुम्हारी आकांक्षा, तुम्हारा आत्मविश्वास और तुम्हारी असुरक्षा—सब कुछ, तुमने प्रेम को पूजा की तरह जिया, और जब वह तुम्हारे...
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Khari Khari, Man Ko Chithti, Drisht Kavi and other Posts from 4 to 24 Feb 2026

  समय शेष नहीं है, जो भी जितना भी है इसमें एक हड़बड़ाहट है, एक जल्दी है, बहुत कुछ कर गुजरना है अभी - इसलिए, मैं किसी को अब जज नहीं करता - क्योंकि ना मेरे पास अब क्षमता बची है और ना ही कोई विशेष योग्यता है, मेरे भीतर इतनी कमियां है कि समझ नहीं आता कैसे ऊबरू इनसे, जब मैं इस पड़ाव पर पहुंचा हूँ तो यह सरल सी बात समझ आई है कि कमियों के अलावा हम किसी और चीज से बने ही नहीं है हम सबमें थोड़ी बहुत अच्छाईयां है - जो एक बेहतरीन आवरण की तरह से चेहरे को ढांककर जिंदगी भर का गुजारा चला देती है और हम ताउम्र इसी भ्रम में बने रहते है कि हम श्रेष्ठ है, बहरहाल, अब समय नहीं अपनी कमजोरियों से ही निजात पा लूं तो शेष सफ़र आसान हो सकें, किसी तरह के बोझ, पूर्वाग्रहों और धारणाओं के तले दबकर अपने को भारी नहीं करना चाहता इस समय जब वाचालता छोड़कर स्थितप्रज्ञ हो रहा हूँ, अपनी एषणाओं को छोड़कर अपरिग्रही बनने का अभ्यास कर रहा हूँ - बहुत कठिन है पर जी जान से लगा हूँ मुश्किल है पर कोशिश है कि सब समझ पाऊं आहिस्ता-आहिस्ता और इसे भावनात्मकता से भी आगे बढ़कर गुन पाऊं तो शायद कुछ ठौर मिलें, अपने आपको भी समझ पाऊं और जज करन...