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Book Review - "The Line That Holds by Arjun Prashanth" 21 Sept 2026

  "The Line That Holds by Arjun Prashanth" The Line That Holds is a literary crime novel that explores the uneasy relationship between truth, justice, institutional corruption, and personal morality. The protagonist, Arjun Vedanta Rao, grows up believing in the ideals represented by his late father, Vedanta Rao, an honest officer committed to integrity. Years later, Arjun stumbles upon missing records, altered reports, and suppressed evidence suggesting that his father's death was not merely a tragedy but part of a carefully concealed conspiracy. As he investigates, he discovers corruption embedded within institutions meant to uphold justice. Alongside Katyayani Iyer, whose own life has been devastated by the same silence, Arjun undertakes a dangerous journey to uncover the truth. The novel ultimately argues that justice often survives not through authority or legal machinery alone, but through individuals who possess the courage to stand against systemic wrongdoing. Its ...
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Khari Khari, Man Ko Chiththi and other Posts from 15 to 20 Sept 2026

बेहद गमगीन उदास शाम के बीच याद आए फ़ैज़ ___________ हज़ारों ना-मुक्कमल हसरतों के बोझ तले ये जो दिल धड़कता है कमाल करता है • फ़ैज़ *** संघर्ष नहीं जिनके जीवन में वे भी बड़े अभागे होंगे, या तो प्रण को तोड़ा होगा या रण से भागे होंगे *** दूर कही एक रात आहिस्ते से उतरती है और अपने आगोश में पूरे परिवेश को लेती है मैं खोजता हूँ तुम्हें धीरे से सरकती है रात चांद अपने उरूज पर है *** राहुल को अब किसी कॉमेडियन को मंच पर बुलाकर सस्ती कॉमेडी करवाने से बचना चाहिए, यह सिर्फ हंसी - ठिठोली के लिए ठीक है, पर पूरी बातचीत, संवाद और गंभीर मुद्दों पर बात होती है - वे वही रह जाते है और यह ठिठोली साथ चली जाती है, मीडिया भी यही प्रसारित करता है दूसरा, किसी भी व्यक्ति से बैर भाव रखना ठीक हो सकता है, पर लोकतंत्र में संविधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का सार्वजनिक रूप से इस तरह से मंच पर मजाक उड़ाना स्वस्थ परम्परा नहीं है कांग्रेस और उससे जुड़े लोगों को यदि इतनी समझ नहीं तो पहले अपने जाले साफ़ करें फिर वे गूँज या जयकारे आयोजित करें *** कलेजे पे साँप लोट रिये होंगे अस्सी पार मिल मज़दूर के बेटे के नाम पर राजनीति करने वाल...

Khari Khari and other Posts from 11 to 14 Sept 2026

जितना दिखावा, सहानुभूति, गरीब, दलित, वंचित, महिला, वृद्ध और अब नया शब्द LGBTQ+ के लिए आप लिखेंगे - पढ़ेंगे या ढोंग करके अपने ज्ञान और दर्शन का प्रचार - प्रसार करेंगे, उतना ही माल डॉलर और यूरो के मार्फत अपनी निज तिजोरी में आने की प्रबल संभावना है, बस अपने - आपको बेचने और मार्केटिंग करने का खबसूरत सा कौशल और निहायत ही 'प्यारी सी दक्षता' आनी चाहिए मैं ऐसे बहुत लोगों को जानता हूँ - जो दो - चार बरसों तक गरीब बच्चों को घर में रखकर पढ़ाते - लिखाते रहने का बढ़िया प्रदर्शन करते रहें और बमुश्किल तीन - चार साल बाद दर्जनों फेलोशिप, जमीन, भवन और रिसॉर्ट तक उनके खाते में आज है, और वे पूरे दम से हवाई सुख लेते हुए देश के हर कार्यक्रम से लेकर बदलाव के फर्जी झंडाबरदारों के साथ घूमते फिरते है - वे फिर गांधीवादी चोगा पहने लोग हो या फेब इंडिया के झब्बे पहने कामरेड हो या अंदर जॉकी और ऊपर से फटे कपड़े की नौटंकी करते टायर की चप्पल पहने प्रचंड आंदोलनजीवी हो मज़ेदार यह है कि समाज में यह सब स्वीकृत है और जानते - बुझते हुए भी कोई कुछ नहीं बोलता और इन नए उगे हुए फफूंदों और मशरूमों को झेलते है और ये छर्रे द...

Man Ko Chithti and Other Posts Arpit Jaj Dewas from 8 to 11 Sept 2026

इधर लगभग सूखा है, गर्मी और उमस ने जीना बेहाल कर रखा है, सुबह से गर्मी और उमस अपना साम्राज्य पसार देते है, थोड़ा दिन निकलते ही धूप बिखर जाती है और शाम को धूल और धुएँ के बादल - ऐसे में जीवन की अनेक परतों के बीच उदासी की धमक भीतर धंस जाती है, रात करवटें बदलते हुए कब पूरी हो जाती है - ख्याल नहीं रहता अब ये अक्सर हो रहा है इसलिए सामान्य लगता है, कभी लगता था कि यह डिप्रेशन या एंग्जाइटी हो या अपने स्क्रीजोफेनिक होने का भय, पर फिर लगा कि आसपास का माहौल ही सबको अपने चपेट में ले रहा है और कोई इससे बचा नहीं है, भीतर धंसी उदासी की जड़े जब गहरी होते जा रही और इसके फ़ल रोजमर्रा पर असर डालने लगे है, तो लगता है कि यह सिर्फ मौसम, सूखा, अवाँगर्द जीवन या यायावरी के परिणाम नहीं - बल्कि अवचेतन के अपने जाये दुख है और वे दुखद स्वप्न है जो अजन्मे रहें और त्रिशंकु से लटके रहें कही व्योम में उदासियों के बीच एक - एक क्षण का हिसाब और गुजरते जा रहें समय के साथ आने वाले गंतव्य की व्याकुलता अब ज्यादा बेचैन कर रही है और इंतजार में आसमान को ताकना और फिर पुनि - पुनि अपने को हिम्मत के साथ समेटे मन की गठरी बांधकर तैयार क...

Khari Khari, Man Ko Chithti and Sandip Ki Rasoi and other Posts from 1 to 8 Sept 2026

Central Government, enough is enough. Pack up your arrogance, your indifference and your utter failure of governance—and get out I have been unable to sleep, watching the visuals from the Delhi incident: the cries, the grief, the helplessness, and the young lives lost, Every frame is a reminder of the human cost of a system that seems to have forgotten compassion And while families are mourning and the country is struggling to process the tragedy, the Home Minister is busy inaugurating a party office What a shocking display of priorities, When citizens are grieving, a government should stand with them—not carry on with political celebrations as if nothing happened This is not leadership, It is political insensitivity at its most disturbing, Uff… How much more indifference can a democracy endure 4.4 am __________ केंद्र सरकार, अब बहुत हो चुका, अपने अहंकार और शासन की विफलता की जिम्मेदारी लीजिए—और सत्ता से बाहर जाइए दिल्ली की घटना के दृश्य देखकर रात भर नींद नहीं आई—चीखें, पीड़ा, बेबसी और...

Nasiruddin Shah An article in Pardep[ar on 8 Sept 2026

  नसीरुद्दीन शाह : जब अभिनेता पर्दे से उतरकर नागरिक बन जाता है Posted on September 6, 2026 एक अभिनेता , एक रंगकर्मी और असहमति की नैतिक आवाज़ ​भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार अपनी फ़िल्मों की संख्या से नहीं, बल्कि उन फ़िल्मों के भीतर उठाए गए सवालों की धार से पहचाने जाते हैं। नसीरुद्दीन शाह इसी दुर्लभ परंपरा के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने हिंदी सिनेमा में परंपरागत ‘नायक’ की घिसी-पिटी परिभाषा को सिरे से ख़ारिज किया। वे प्रेमी बने, मजदूर बने, शिक्षक, पुलिस अधिकारी, सनकी फ़ोटोग्राफ़र, कुंठित क्लर्क और सत्ता के दमनकारी चेहरे भी बने। लेकिन पर्दे पर व्यवस्था के विभिन्न रूपों को जीने वाले इस अभिनेता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वास्तविक जीवन में भी उन्होंने सत्ता, समाज और बहुसंख्यकवाद के सामने अपनी नागरिक आवाज़ को कभी गिरवी नहीं रखा। ​नसीरुद्दीन शाह को केवल ‘स्टार’ या ‘अभिनेता’ कहना उनके फलक को सीमित करना है। वे समानांतर सिनेमा (पैरेलल सिनेमा) और भारतीय आधुनिक रंगमंच के उस आंदोलन का केंद्र बिंदु हैं, जिसने कला को महज़ सस्ता मनोरंजन बनने से रोककर सामाजिक चेतना का औज़ार बनाया।   ​ राष्ट्रीय नाटय विद्...