हिंदी में कवियों का एक गैंग है - जो हर शहर और हर जगह पर सक्रिय रहता है, फिर वो पुरस्कार समारोह हो, दलित आयोजन हो, बुद्ध पूर्णिमा हो, दीवाली हो, होली या राम नवमी, और ये सब ससुरे इतने सुसंगठित है कि एक - दूसरे के बिना मंच पर इनकी ना कविता उतरती है - ना रात को दारू और ना अगले दिन की सुबह वाली इनमें सत्तर पार से लेकर गेहूँ की बाली या कच्चे चने के जैसे ताजे कमसिन और अमीबा जैसे परजीवी से लेकर लोमड़ी - सियार जैसे धूर्त एवं घाघ एक साथ मौजूद रहते है, और हिंदी का कमजोर अंग्रेजी वाला पीएचडी शोधार्थी ना हो तो चखने के समय ककड़ी कौन छिलेगा या गुरुजी के पोतडे और टट्टी पेशाब के लंगोट कौन धोएगा साले रोना रोयेंगे दलित, एलीट और सवर्ण का - पर यात्रा हवाई ही होना ही चाहिए, एयरपोर्ट पर अंग्रेजी पढ़ना ना आएं भले और इनकी महफिलें और साजो - सामान, लगेज ही देख लो, चमक - दमक देख लो, दूर दराज तक के कार्यक्रमों के स्थान देख लो - तो समझ आता है कि देश के किसी भी कोने में ये मुंह मारने को शुकर देव की तरह तैयार रहते है और मजेदार यह है कि संचालक एक ही रिपीट होता रहता है जो जुगाड़ से किसी सरकारी कालेज में माड़साब बन गया...
You have to choose your own battles, and the right place to conquer Be careful while choosing the both, because we have limited time and energy *** दिन उदासियां की स्मृतियों से गुजरता है और रातें भविष्य की कोख में जन्म लेने के स्वप्न देखते विदा हो रही है, तुमसे बात करने की सदिच्छा में भोर होती है और दिन चढ़ने तक स्मृति पटल से सब मिट जाता है, इन यात्राओं के साथ भौतिक यात्राओं पर भी प्रतिबंध लगा सकूं तो सुकून की छांह में यह अर्थहीनता कुछ कम हो, जीवन अनिश्चितताओं में इस उम्मीद पर हर पल बीतता है कि "यह भी गुजर जायेगा, सकारात्मक बने रहो" - पर ना ये सब गुजरता है और ना जीवन का अंत करीब नज़र आता है और इस सबके बीच व्योम में टंगी आत्मा का बोझ शरीर के मानस पर दिनों-दिन बढ़ते ही जा रहा है इधर कबीट (कैथा)की खुश्बू, जंगली इमली, महुआ, तेंदू की नर्म पत्तियाँ, जामुन के कच्चे फल, आम की कच्ची छोटी गुठलियां, खिरनी का पीलापन, इमली की खटास, करौंदे की खटास, चारोली यानी अचार की मिठास और कच्चा हरापन और देर रात तक ठंडी हवा में सुबह के शुक्र तारे के सपने बेचैन कर रहें है, लगता है अरुण दाते की आवाज में ...