स्मित मच्छार के साहस को सलाम पर जिस तरह से उसे मीडिया द्वारा महिमा मंडित किया जा रहा है उससे लगता है कि वह भारत रत्न लेकर ही रहेगा और आगामी चुनावों में भाजपा से उम्मीदवार भी हो सकता है बाकी सब छोड़ भी दें तो उसने अपना काम किया है जो उसका कर्तव्य था, ईमानदारी से किया इसकी शाबाशी है, पर मोदी ने उससे जो बात की और उसने भी किस मजबूरी में स्क्रिप्टेड बातें बोली वह आश्चर्यजनक नहीं लगती - थोड़ा गंभीरता से सोचिए अजीब हालत है, हर बात को हम धर्म और सनातन से जोड़ रहे है और सेना से लेकर इसरो के वैज्ञानिक भी 2014 के बाद सीख गए है कि कितना चालाक होना है और Survive करना है इस तंत्र में अपनी किसी कहानी में लिखा था कभी कि "चिड़िया बहुत भोली और फोकस्ड होती है पर उतना चालाक होना ही पड़ता है जितना ज़िन्दा रहने के लिए जरूरी है" #खरी_खरी *** कितने अभागे है वे पुल जो सिर्फ गलियारे है जिनके नीचे से गुजरती नहीं कोई नदी • वीरेन डंगवाल ***
हर जगह लड़ाई और असहमति, हर जगह बगावत और दुर्व्यवहार, शब्दों में तीखापन और शाब्दिक हमले - शिक्षा, राजनीति, साहित्य और अर्थ शास्त्र से लेकर विज्ञान, कानून और सामाजिकता के छोटे मसले हो, वृहद मुद्दे, और बस यही सब करते हुए जीवन बीत गया, मित्रों में दुश्मन बनाये और दुश्मनों में ऐसे खूनी या क़ातिल - जो एक दिन बेहद अपने बनकर निजता में दाखिल होकर चरित्र के साथ भरे पूरे खिलखिलाते हुए जीवन का भी खात्मा कर बैठे, फिर भी सहजता से और स्नेह भाव से अपना बनाकर रखा कि लम्बे जीवन में सब चलता है, इसी समाज के बंधु - बांधव है तो किससे कैसा बैर रखना, सब अपने है कौन यहां पराया है जीवन के चालीस साल जिन लोगों, समुदायों, संस्थाओं और कामों में दिल लगाकर काम किया, जहां तन - मन - धन से अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया - वहां भी आखिर कुछ नहीं मिला, खाली हाथ और उदास मन से भटकते हुए इस बियाबान में आया हूँ - चारो ओर सुवास है, फूल है, जंगल है, उद्दाम वेग से बहती बलवती नदी है, खुला आसमान है, पक्षियों का कलरव है, टिटहरी के कर्कश स्वर है, लटकती जड़ों के बरगद है और महुआ - ईमली और सप्तपर्णी की खुशबू चारो ओर है इन्हीं के बीच जीवन है...