फिल्म उद्योग भारत में हमेशा निशाने पर रहा है और कारण बहुत साफ है कि अंधाधुंध रूपया और कमाई के साथ काले धंधों का जखीरा पर इस सबमें दुखद यह है कि हम जो मेहनतकश लोग है - उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा -जो टैक्स के रूप ने हम सरकार को देते है, वह इनकी सुरक्षा पर खर्च होता है इनके काले कारनामों से ये हमेशा ही खतरे में रहते हैं और हमें मूल सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है, अब "ज़ेड" श्रेणी की सुरक्षा कोई मजाक नहीं, पर इन्हें दी जा रही है, इनका समाज या देश के विकास में क्या योगदान है - सिवाय भाँडगिरी करने के या आम कैसे खाते है जैसे घटिया सवाल पूछने के अलावा यह सिर्फ फिल्मी उद्योग ही नहीं, बल्कि धार्मिक गुरुओं, रामदेव से लेकर उन तमाम नेताओं पर भी सवाल है - जो इस श्रेणी की सुरक्षा का लाभ ले रहे है - जैसे मप्र में नरोत्तम मिश्रा जो अभी विधायक, मंत्री तो दूर एक पार्षद या किसी पंचायत के पंच भी नहीं, पर ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा के साथ भोपाल में सरकारी बंगला धारण किए हुए है सलमान हो, अक्षत, अक्षय या अमिताभ या ये कल का टाईगर या टामी श्रॉफ - इनको क्या जरूरत है और क्यों इन पर इतना फोकस, क्या यह नेताओं क...
नेशनल हेल्थ मिशन में अब तक अरबों खरबो रूपया खर्च हो चुका होगा पर हालात ज्यों के त्यों है यह तस्वीर है ग्वालियर शीतला माता के दुर्गा पांडाल में हुए हादसे की और मरीज को जयारोग अस्पताल (A Multispeciality Hospital) में लाया गया है - जहाँ स्थानीय मंत्री, विधायक और नेतागण खड़े है ज़रा गौर से देखिए स्ट्रेचर को, इतना जंग है कि मरीज इस पर लेटकर ही मर जायेगा - क्योंकि बच भी गया दुर्घटना से तो यहाँ सेप्टिक होने से उसको कौन बचाएगा, मतलब करोड़ो के बजट वाले अस्पताल में एक चादर की चिंदी नहीं - जो बिछाई जा सकें - धिक्कार है ऐसी व्यवस्था पर कहां ना कि देश में हर जगह विदेशी हाथ है हर जगह, योजना और विकास में - सर्कस और जादू के शो चल रहे है - जनता को मनोरंजन में मजा आ रहा है, बस, कुछ मत बोलिये, ग्वालियर चम्बल का बड़ा जिला है, राजनीति में अग्रसर, संभागीय मुख्यालय, माननीय हाई कोर्ट की शक्तिशाली बेंच है और दिल्ली के करीब और सबसे ज्यादा महाराज है - जिनके चार सौ कमरों के बिजली का बिल मात्र पंद्रह सौ आता है, और ये श्रीमान जी शक्तिमान और जनहितैषी व्यक्तित्व के धनी है बस सकारात्मक पक्ष यह है कि स्ट्रेचर है और नेता...