अपनी सारी स्मृतियां, उमस, लंबी दोपहरें, उदास शामें, ठंडी रातें और भुनसार में उगते सूरज को छोड़कर तुम चले जाओगे, हर बार एक पेंडोरा बॉक्स की तरह से तुम आते हो और अपने साथ चिलचिलाती धूप, शुष्कता, सड़कों का सूनापन, तप रहें एकल लंबे मौन में खड़े पेड़ों की रिक्तता, चातक और चकोर के मिलन के स्वप्न, जाते हुए रोहिणी नक्षत्रों की तपन, सूखती हुई नदियों का ठहराव, ढूह से बन गए रिक्त पहाड़, समुद्र किनारे आग बन गए रेत के स्वर्णिम कण, सूखे मैदान बन गए तालाब की मेढ़ से लेकर गहराते हुए सूखे कुएँ, पानी के अभाव में पपड़ी की तरह जमती जा रही जमीन, आस्मान में ताकती असंख्य आंखें, प्यास से झुलसते कंठ - जिनमें कितनी ही प्रार्थनाएं अवरुद्ध हो गई है, और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम की छूटी हुई वो जगह जिसे भरना मतलब अपने बेगुनाह होने के बावजूद भी सब कुछ चुपचाप सहना शामिल है, भी इसी सारे अफ़साने का हिस्सा है इस सबके बावजूद भी तुम्हारी विषाक्त उपस्थिति, स्मृति गंध, मिठास और फिर से जीवन के अगले बरस में सावन, वसंत, शिशिर और हेमंत के बाद बनी रहेगी - इसलिए कि तुम बौराएं हुई आम्र मंजरियों में फलों का गुलदस्ता ले आते हो - जामुन, लीच...
मेरे भीतर वो सब शेष है - जो मैं भूल जाना चाहता हूँ, मैं जो भी बाहर निकाल कर फेंकना चाहता हूँ मन मस्तिष्क से - वह गर्द की तरह ढूह के रूप में जमा हो रहा है, मैं अपने सबसे अच्छे पलों को यादों की शिधोरी बनाकर रखना चाहता हूँ और बाकी वह जो तकलीफदेह है - उसे त्यागना चाहता हूँ, पर हो उल्टा रहा है, जो बीत गया है उस पर पर्दा डालने को हर सिद्ध पुरुष कहता है, आँखें भी सामने है - यदि हर पिछला अतीत सच में स्मरण में रखकर काम आता जीवन के पथ पर तो कम से कम एक आँख तो गर्दन के पीछे होती ही होती, इस समझ के बाद भी हम अतीत को याद रखने में ही सबसे ज्यादा ऊर्जा खत्म कर रहें है - इतने कि लगभग एक नास्टेल्जिया हर वक्त हम पर हावी रहता है और उम्र गुज़र जाती है रेशा - रेशा जो बीत गया है - अभी वही मुझमे सबसे ज्यादा बाकी है और मैं इसे छोड़ना चाहता हूँ, इसी पसोपेश में जीवन गुजर रहा है, वह सब भूलना चाहता हूँ जो चेहरे, मोहरे, दाग, व्यवहार, भाषा और चरित्र से सामने आता है और मैं हर बार अचकचा जाता हूँ, इसका कोई तो इलाज होगा यह खोजते हुए इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि मिलते समय सामने वाले को नकारने से शुरू करूँ और पूछूँ कि - ...