इक्कीसवीं सदी का एक बंटे चार सिक्कों की खनक कम हो रही है, सूरज की किरणों की चमक कम हो रही है, चट्टानों के दाग़ भी फ़ीके पड़ते नज़र आ रहे है, नदियों में उद्दाम वेग से बहता पानी रूक गया है, जंगलों की पगडंडी खो गई है - किसी सूने रास्ते पर, पहाड़ों के पीछे से झांकता सूरज उदास है कि सांझ की शफक पर अंधेरों के साये है बेतरतीब से और मद्धम सी लौ के साथ टिमटिमाते तारों में सुकून दिखता नहीं सदी के एक चौथाई समय का बोझ उठाए घड़ी की सुईयां बेचैन है, वे थक गई है पेंडुलम की निर्बाध गति से और अब बहुत शिद्दत से किसी कंजी लगी पुरानी दीवार से वाबस्ता होकर थम जाना चाहती है, पेंडुलम छुप जाना चाहता है उन कवेलुओं के बीच - जहां से बरसात में नेह की बूंदें टप-टप टपकती है और पूरे कच्चे घर को सौंधी खुशबू से भर देती है कितना मुश्किल है दो सदियों के बीच रहना - एक जिसके छठे दशक के अंत तक आते-आते जन्में, मुक्ति के स्वप्न देखते और आज़ादी की हवा में सांस लेकर विचरते लोग-जिनके पास उनींदें से चमकीले स्वप्न थे, मेहनतकश हाथ, कुछ भले से उजियारे और होठों पर उमंगों के गीत- जिनसे वे प्रतिफल या अनुतोष नहीं, बल्कि...
हिंदी साहित्य की आत्म मुग्ध पगली आलोचक आजकल बहुत चहक रही है और उस मूर्ख को लगता है कि हिंदी के युवा लेखक उसकी मेधा और सुंदरता पर मोहित है। अरे पगली, नादां घसियारी हिंदी में दो रुपए कौड़ी के दाम से हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा घटिया किस्म की पत्रिकाएं निकाल रहा है। दो रुपए के अख़बारों की गिनती नहीं है। इतना छपा हुआ कचरा है कि सात आठ रुपए में रद्दी भी नहीं पड़ती । ये सब कागज कारे करने को तेरी उजबक किस्म की बकवास छापकर पाठक नाम कुंठित और अपराध बोध से ग्रस्त चूहों से रुपया ऐंठते है और दिमाग और विचारधारा को गिरवी रखकर सरकारी विज्ञापन जुगाड़ते है। अब सोच पगली, तेरे लंबे बकवास भरे आलेख, टटपुंजिया लेखकों की लुगदी की तरह लिखी उबाऊ और चालीस पेज से लेकर दस हजार शब्दों की आलोचना पढ़ता कौन है , तेरे स्त्री विमर्श, नैन मटक्की यात्राओं और बकवास और सड़क छाप प्रवचन नुमा बीज वक्तव्य सुनता कौन है। ये पी एच डी कर रहे युवा मित्र बड़ी आस से दूर दराज के गांवों से बाप महतारी का पसीना बहाकर विश्व विद्यालयों में आए है, अपने गुरुओं के तलुएं चाटकर और मेहनत करके एमए, एमफिल कर रहे है, हाड़तोड़ मेहनत से ...