हाल ही में श्री गणेशोत्सव समाप्त हुए, पवित्र त्यौहार था पर जाते जाते गणेश जी कह गए कि -"मैं तो ध्वनि प्रदूषण से बहुत घबरा गया पर आने वाले दिनों में माँ दुर्गा को तकलीफ न हो ऐसा प्रबंध करना, डीजे की वजह से आपके मप्र में एक बिटिया की मृत्यु हो गई, यह कितना दुखद है" कुछ बातें अभी ख्याल में आई तो विचार के लिए लिख रहा हूँ, उद्देश्य यह है कि हम ठंडे दिमाग से विचार करें कि इस व्यस्ततम जिंदगी में त्योहार और उत्सव इसलिए मनाते है कि हम सभी तनाव छोड़कर थोड़े समय के लिए खुश हो सकें, सबसे मिल सकें और जीवन जीने के लिए ऊर्जा प्राप्त कर सकें परंतु हो क्या रहा है, इस प्रदूषण में सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि साल भर के वो सब इवेंट्स भी शामिल हैं जिनसे हम मानसिक संतुलन खोते जा रहे है कोतवाली में फोन करो तो कहते है - "भगवान का भजन सुन लो साहब, थोड़े दिन की बात है" और फिर वे आयोजन समिति को बता देते है या मंदिर प्रबंधन को कि फलाने ने शिकायत की है आपकी, जबकि यह जानकारी गुप्त रखने का प्रावधान है, इसके बाद उसी पुलिस के जवान के साथ सारे भक्तजन आपके घर आ जाते है धमकाने और मां - बहन करने और आपको ठीक ...
"संस्कृति पुरुष के पुरुष के परिचय में कुछ विनम्र कविताएं - विनय सौरभ की कविताएं" - Post of 27 Sept 2026
बात सन 1998 की है जब हमारे Vinay Saurabh की पहली पुस्तिका "बनारसी दास गुप्त भोजपुरी सम्मान योजना" के तहत छपी थी, जबकि पुरस्कार 2023 में मिला, कविता पुस्तिका का नाम था - "विनय सौरभ की कविताएं" , और यह पुस्तिका उसके भैया "संदीप नाईक" को समर्पित थी हालांकि, ये कविताएं पहल के 1996 वाले अंक - 54 में छप चुकी थी, पर पुस्तिका में छपने पर काफी चर्चा में आई मैं विनय को दो साल से कह रहा कि कविताएं भिजवा दें, पर हो नहीं पा रहा था, आज किसी पटना के मित्र ने अपनी टिप्पणी के साथ लगाई है - तो बरबस ही ध्यान गया, विनय ने उस समय छह पुस्तिकाएं भेजी थी, सब बंट गई थी, अब शायद एकाध कही हो मेरे खजाने में, पर उसे ढूंढने में सदियाँ लग जाएंगी ये कविताएं नहीं - बल्कि एक दस्तावेज है - समय का, कविता की यात्रा और विकास का, संस्कृति - सनातन और आयोजन के बरक्स कविता की राजनीति, छपास और आत्ममुग्धता में मुब्तिला कवियों की मानसिकता का द्योतक है, ये कविताएं हिंदी की कविताई राजनीति और पूरे तत्कालीन परिदृश्य पर भी नज़र डालती है, साथ ही एक युवा कवि जो उस समय के "अ- ग्लोबल हुए फ़ोन, मोबाइल औ...