अक्सर हम सबको लगता है कि हमें लोग भूल रहे है, महत्व नहीं दे रहे हैं, उपेक्षा कर रहें है, तिरस्कार कर रहें है और अपने जीवन से निकाल रहें हैं - यह बहुत अच्छी बात है, करने दीजिए यह सब उन्हें - जिन्हें यह सब करके सुख मिलता है, क्योंकि वे आपके साथ तब तक थे - जब तक आप उनके लिए काम के थे, उनके हर तरह के जायज़ - नाजायज़ काम में शरीक थे या मदद कर रहें थे, परन्तु जैसे ही आपसे उनका स्वार्थ पूरा हो जाता है - वे दूर छिटकने लगते हैं, आपकी उपेक्षा करके ही वे अपने सारे पाप और धत् कर्मों से दूर रहकर एक साफ छबि बनाने का प्रयास करते है या ईमानदार और नैतिक होना दिखाते हैं सबसे अच्छी बात तो यह होगी कि आप एकदम निपट अकेले रह जाएं और सब आपसे दूर हो जाएं, बस आप अपने उद्देश्य, कर्म और नीयत साफ रखें, सबके लिए अच्छा सोचते रहें और हर उस बात पर ध्यान देना बंद करें - जो आपको हैदस में डालती है, संत्रास में रखती है, याद रखिये हर प्रश्न का जवाब देना कतई जरूरी नहीं यह एकदम बंद करें, हर मुद्दें पर विचारना और बोलना बंद करें - क्योंकि लोग है और उनकी जुबानें हम पकड़ नहीं सकते - ना हमें यह करने की आवश्यकता है और ना ही हमारी क...
"अंधेरे से उजाले की तलाश : डॉ. सुनील चतुर्वेदी का उपन्यास ‘टनल’ " हिंदी साहित्य में ऐसे रचनाकार कम हैं जो अपने व्यावसायिक अनुभवों को केवल जानकारी के स्तर पर नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन और सामाजिक यथार्थ के रूप में साहित्य में रूपांतरित कर सकें. डॉ. सुनील चतुर्वेदी ऐसे ही विरल लेखकों में हैं. भूविज्ञान जैसे तकनीकी विषय में सागर विश्वविद्यालय से पीएच.डी. प्राप्त करने वाले डॉ. चतुर्वेदी ने अपने पेशेगत अनुभवों को समाज और मनुष्य के गहरे अंतर्द्वंद्व से जोड़कर देखने की दृष्टि विकसित की है. व्यंग्य लेखन से अपनी साहित्यिक यात्रा आरंभ करने वाले इस लेखक ने समकालीन समाज, प्रशासन और व्यवस्था पर तीखी टिप्पणियाँ की हैं. उनके पूर्व प्रकाशित उपन्यास—‘महामाया’, ‘कालीचाट’, ‘लपका’ और ‘गाफिल’—पहले ही उन्हें हिंदी कथा-साहित्य में एक विशिष्ट पहचान दिला चुके हैं. वर्तमान में मध्यप्रदेश राज्य जल बोर्ड के सदस्य के रूप में जल संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में सक्रिय डॉ. चतुर्वेदी का नवीन उपन्यास ‘टनल’ उनके अनुभव, संवेदना और चिंतन का परिपक्व प्रतिफल है. ‘टनल’ केवल एक सुरंग की कहानी नहीं है. यह मनुष्य, सम...