बहुत लंबी थी जुलाई, शुक्र है खत्म हुई आज **** चाँद किस खिडकी में रहता था - दीवार की या आसमान की ________________ बचपन सावन और हरेपन से भरा था. बरसात शुरू होते ही सब हरा हो जाता था – पहले मन, फिर तन और अंत में सारी प्रकृति. बचपन में हरा, नीला या लाल समझ नही आता था. आज जब उम्र के छठे दशक में हूँ तो समझ आ रहा है कि हरापन क्या होता है. माँ थी तो बरसात थी. पिता की और माँ की नौकरी में सब ओर हरा -ही - हरा था. नब्बे - ढाई सौ के वेतनमान में दोनों की तनख्वाह से घर चलता और बहुत मजे से चलता था. आज हम लोग पांच अंकों में कमा रहें है तो अकाल है. अकाल - अक्ल का भी और खुशियों का भी. अकाल - सुखों का और दृष्टि का भी. अकाल - जीवन में हरियाली का भी और हरेपन का भी. कारण एक नहीं, अनेक है. और सबसे बड़ा कारण हरेपन की अपेक्षा का भी है. उस मिट्टी के सौंधेपन का भी जिसके होने से हरापन होता है. बरसात में त्यौहार आते. त्यौहार आते तो रंग - बिरंगी भाजियां आती, हरी और बेहद ताज़ी. ढेरों उपवास करती थी माँ, जो दादी और नानी ने उस पर थोप दिए थे. बड़ी बहु होने के नाते करने ही पड़ते. बडो का जीवन समर्पण, संघर्ष और मूक रहकर ही निक...
इक्कीसवीं सदी का एक बंटे चार सिक्कों की खनक कम हो रही है, सूरज की किरणों की चमक कम हो रही है, चट्टानों के दाग़ भी फ़ीके पड़ते नज़र आ रहे है, नदियों में उद्दाम वेग से बहता पानी रूक गया है, जंगलों की पगडंडी खो गई है - किसी सूने रास्ते पर, पहाड़ों के पीछे से झांकता सूरज उदास है कि सांझ की शफक पर अंधेरों के साये है बेतरतीब से और मद्धम सी लौ के साथ टिमटिमाते तारों में सुकून दिखता नहीं सदी के एक चौथाई समय का बोझ उठाए घड़ी की सुईयां बेचैन है, वे थक गई है पेंडुलम की निर्बाध गति से और अब बहुत शिद्दत से किसी कंजी लगी पुरानी दीवार से वाबस्ता होकर थम जाना चाहती है, पेंडुलम छुप जाना चाहता है उन कवेलुओं के बीच - जहां से बरसात में नेह की बूंदें टप-टप टपकती है और पूरे कच्चे घर को सौंधी खुशबू से भर देती है कितना मुश्किल है दो सदियों के बीच रहना - एक जिसके छठे दशक के अंत तक आते-आते जन्में, मुक्ति के स्वप्न देखते और आज़ादी की हवा में सांस लेकर विचरते लोग-जिनके पास उनींदें से चमकीले स्वप्न थे, मेहनतकश हाथ, कुछ भले से उजियारे और होठों पर उमंगों के गीत- जिनसे वे प्रतिफल या अनुतोष नहीं, बल्कि...