अपने अनुभव से कह रहा कि निराश, असफल, फेल, नापास होना बिल्कुल बुरा नहीं है, सकारात्मकता अच्छी बात है, पर मनुष्य जीवन में हमेशा उत्साह में, सकारात्मक या आशावादी नहीं हुआ जा सकता, और यदि मैं यह करता हूँ , दिखता हूँ या व्यवहार में लाता हूँ तो यह मैं अपने आप से दोगलापन कर रहा हूँ, अपने आपको धोखा दे रहा हूँ और असहज हूँ, मन और चित्त शांत नहीं है, कोई हड़बड़ाहट और बेचैनी है जो मुझे खाये जा रही है, इस सबमें दूसरों को धोखा देता हूँ - वह बात तो बहुत देर से हो सकती है कि मेरे इस नकली मुखौटे ने कितनों का नुकसान कर दिया, जीवन भर ऐसे मुखौटो से ही धोखा खाते आया हूँ - फिर वह विचारधारा हो, व्यवहार हो, ईमानदारी हो, साहित्य हो, समाजसेवा हो, कानूनी दायरे और अदालतें हो, न्याय हो, नैतिकता या स्वाभिमान, सब भोंथरे और थोथे निकलें इसलिए कोशिश करता हूँ कि जैसा हूँ - वैसा ही रहूँ, जो भाव-भंगिमा भीतर से है वही बनी रहे, जो भाषा भीतर उपजती है वही व्यक्त करूँ - अब उसमें गाली आये या श्रृंगार , यही उम्मीद करता हूँ कि सकारात्मकता और प्रचंड आशा के बदले सहज, सरल जीवन बगैर दाँव-पेंच के बना रहें, जब जीवन भर कोई आवरण नहीं ओढ...
"कल से निराश दिख रहे, क्या हुआ" - अभी लाइवा मिल गया, दूध लेने जा रहा था "आपने समाचार नहीं सुना, मेरा नाम नहीं था किसी भी लिस्ट में, पद्मश्री से पद्मभूषण तक की" - आवाज जैसे किसी गुफा से आ रही थी "पर तुमने तो राखी, दिवाली, होली, ईद, क्रिसमस, गुरू पर्व, कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, से लेकर सबके जन्मदिन पर बधाई वाले पोस्टर लगाए थे अपनी कविताओं की दो सौ बारह किताबों के मुख पृष्ठों के साथ" फिर भी कुछ ना मिला - "और तो और कलेक्टर, पटवारी और सफाई कर्मचारी तक के फोटो पर हैप्पी जन्मदिन लिखा था, किसी ने अनुशंसा नहीं की" "क्या ही कहूँ, अब विश्वास उठ गया है साला लेखन से और इस देश से, अब मैं जा रहा किसी द्वीप पर रहने - वही मरूंगा सुखी" - लाइवा बोला "सुनो, अब जा ही रहे तो मेरे लिए दो लीटर दूध, एक किलो पनीर देते जाना, आज छुट्टी है तो मस्त मटर पनीर बनेगा आज तुम्हारे इस गम में और मैं तुम्हे मुहल्ले का बल्लम भूषण घोषित करता हूँ" - लाइवा को जाते देख रहा था #दृष्ट_कवि *** संविधान भर बना रहें और लोग वास्तविक अर्थ में समता, भ्रातृत्व और स्वतंत्रता का ...