जितना दिखावा, सहानुभूति, गरीब, दलित, वंचित, महिला, वृद्ध और अब नया शब्द LGBTQ+ के लिए आप लिखेंगे - पढ़ेंगे या ढोंग करके अपने ज्ञान और दर्शन का प्रचार - प्रसार करेंगे, उतना ही माल डॉलर और यूरो के मार्फत अपनी निज तिजोरी में आने की प्रबल संभावना है, बस अपने - आपको बेचने और मार्केटिंग करने का खबसूरत सा कौशल और निहायत ही 'प्यारी सी दक्षता' आनी चाहिए मैं ऐसे बहुत लोगों को जानता हूँ - जो दो - चार बरसों तक गरीब बच्चों को घर में रखकर पढ़ाते - लिखाते रहने का बढ़िया प्रदर्शन करते रहें और बमुश्किल तीन - चार साल बाद दर्जनों फेलोशिप, जमीन, भवन और रिसॉर्ट तक उनके खाते में आज है, और वे पूरे दम से हवाई सुख लेते हुए देश के हर कार्यक्रम से लेकर बदलाव के फर्जी झंडाबरदारों के साथ घूमते फिरते है - वे फिर गांधीवादी चोगा पहने लोग हो या फेब इंडिया के झब्बे पहने कामरेड हो या अंदर जॉकी और ऊपर से फटे कपड़े की नौटंकी करते टायर की चप्पल पहने प्रचंड आंदोलनजीवी हो मज़ेदार यह है कि समाज में यह सब स्वीकृत है और जानते - बुझते हुए भी कोई कुछ नहीं बोलता और इन नए उगे हुए फफूंदों और मशरूमों को झेलते है और ये छर्रे द...
इधर लगभग सूखा है, गर्मी और उमस ने जीना बेहाल कर रखा है, सुबह से गर्मी और उमस अपना साम्राज्य पसार देते है, थोड़ा दिन निकलते ही धूप बिखर जाती है और शाम को धूल और धुएँ के बादल - ऐसे में जीवन की अनेक परतों के बीच उदासी की धमक भीतर धंस जाती है, रात करवटें बदलते हुए कब पूरी हो जाती है - ख्याल नहीं रहता अब ये अक्सर हो रहा है इसलिए सामान्य लगता है, कभी लगता था कि यह डिप्रेशन या एंग्जाइटी हो या अपने स्क्रीजोफेनिक होने का भय, पर फिर लगा कि आसपास का माहौल ही सबको अपने चपेट में ले रहा है और कोई इससे बचा नहीं है, भीतर धंसी उदासी की जड़े जब गहरी होते जा रही और इसके फ़ल रोजमर्रा पर असर डालने लगे है, तो लगता है कि यह सिर्फ मौसम, सूखा, अवाँगर्द जीवन या यायावरी के परिणाम नहीं - बल्कि अवचेतन के अपने जाये दुख है और वे दुखद स्वप्न है जो अजन्मे रहें और त्रिशंकु से लटके रहें कही व्योम में उदासियों के बीच एक - एक क्षण का हिसाब और गुजरते जा रहें समय के साथ आने वाले गंतव्य की व्याकुलता अब ज्यादा बेचैन कर रही है और इंतजार में आसमान को ताकना और फिर पुनि - पुनि अपने को हिम्मत के साथ समेटे मन की गठरी बांधकर तैयार क...