हर धर्म का अर्थ है मौन हो जाना, सुकून, शांति, दूसरों के जीवन में खलल ना डालना, अपने भीतर की ओर यात्रा करना, सद्कर्म करना और नेकी की राह पर चलना , पर हो क्या रहा है - मै, आप और हम सब जानते है, देख रहे है - पर कर कुछ नहीं रहें पहले होगी सुबह की आरती, फिर दिन भर कर्कश आवाज में भागवत और उसके बाद शाम होते होते दो घंटे की बेसुरों की आवाज में आरती, उसके बाद युवाओं के धींगा मस्ती वाले गाने और आखिर में पंडित पागल हो जाता है और भारत माता से लेकर जय सियाराम के नारे लगाते हुए उन्मत्त हो जाता है ऐसे ही सुबह से दिन में पांच बार नमाज़, गुरबाणी और बाकी प्रकार के रस रिवाज, शादी के जुलूस, मैयत, गंगा पूजन, मिलादुन्नबी के जुलूस, या सड़कों पर अवांगार्द भीड़ जो झंडे उठाये ट्रैफिक जाम करते चलती रहती है बारहों मास आसपास रहने वाले मतलब मर जाए मंदिर मस्जिद के, हमारे बचपन में इतना भौंडापन और धर्म के नाम पर हिंसक व्यवहार नहीं था, गणेशोत्सव से लेकर तमाम त्योहार मनाये जाते थे, ईद हो, मुहर्रम, क्रिसमस हो या कोई गुरू पर्व इस सबमें सारे बेरोजगार से लेकर कॉलोनी या मल्टी के रिटायर्ड अंकल और मुंह में गुटखा फंसाए धार्मिक...
AIBE-21 की परीक्षा और हमारी कानूनी शिक्षा ______ AIBE (ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन) की परीक्षा प्रत्येक वर्ष बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित की जाती है, जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशन में संपन्न होती है, इस परीक्षा में देशभर के लाखों विधि स्नातक भाग लेते हैं और सफल होने पर उन्हें अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस करने का प्रमाणपत्र प्राप्त होता है यह परीक्षा वर्ष 2010 से आयोजित की जा रही है, ताकि देश में गुणवत्तापूर्ण विधिक सेवाएँ प्रदान करने वाले योग्य अधिवक्ता न्यायालयों तक पहुँच सकें, आज स्थिति यह है कि अनेक लोगों को कानून की बुनियादी समझ तो दूर, ठीक से हिंदी या अंग्रेज़ी पढ़ना-लिखना भी नहीं आता, वे केवल नकल अथवा औपचारिक डिग्री के सहारे आगे बढ़े हैं, इसलिए यह आवश्यक था कि विधि के क्षेत्र में योग्य, अध्ययनशील और सक्षम लोग आएँ आज एक और चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, कुछ लोग केवल लॉ की डिग्री लेकर समाज में रौब जमाने, लोगों को डराने-धमकाने अथवा विभिन्न प्रकार के निजी लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से अधिवक्ता बनना चाहते हैं, ऐसे लोगों के लिए कानून एक पेशा नहीं, बल्कि अपने ...