आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा था, चलो देर आए दुरुस्त आए, असल में दुनिया के सारे ट्रंप बेहद लीचड़, कमजोर, और धूर्त है - जिनमें दो कौड़ी की अक्ल नहीं है, वे सिर्फ बकलोल है और शेखीबाज है जो लोग अपने लोगों और अपने देश को साथ नहीं रख सकते, या अपने लोगों के विकास की बात नहीं कर सकते - वे इसके अलावा कुछ और नहीं कर सकते, विशुद्ध रूप से ये सब कायर और डरपोक है और अमेरिकी ट्रंप ने यह कल रात सिद्ध कर दिया और यह भी कि वो पूरा मानसिक रोगी है - बोले तो गंभीर mental, neurotic, depression and anxiety का शिकार है हमारी मीडिया और मीडिया के दलालों को अब मसाला मिलना बंद होगा, पर कोई ना - अब चुनावों की घटिया रिपोर्टिंग चालू होगी - ताकि इन असुरों के नाखून पैने होते रहें और ये बर्बादी के कगार पर हम सबको ले जाएं #खरी_खरी *** अदनान कफील की यह कविता इन दिनों सोशल मीडिया पर घूम रही है, बगैर किसी पूर्वाग्रह के एक पाठकीय टिप्पणी कर रहा हूँ, इस कविता को कई बार पढ़ा और आज जब इसे दोबारा पढ़ा तो भयानक बारीकी से बुनी हुई लगी ईश्वर अगर तू है तो (संशय) और खुदा के होने पर यकीन है थोड़ी ज्यादा बारीकी से बुनी है, यह इसलिए ...
_____ एक दरख़्त की छाया में नहीं, विशाल बरगद की छाया में नहीं, पहाड़ की तलाई में नहीं, नदी के किनारे नहीं, समुद्र की रेत के किनारे नहीं, किसी जंगली झुरमुट में नहीं, किसी सूनसान पगडंडी पर नहीं, किसी शीतल चांदनी में नहीं, रात के गहन स्तब्ध सन्नाटे में नहीं - अभी तक की पूरी जिंदगी एक नन्हीं सी पत्ती की छाया में गुजारकर आया हूँ - इसलिए बहुत अच्छे से जीवन के मायने, अर्थ, उद्देश्य, फलसफे, लोग, मित्र, दुश्मन और जीवन के अन्तिम प्रारब्ध से वाकिफ़ हूँ बस, एक नया दशक शुरू होने को है - हालांकि छह दशकों की परिलब्धियां इठलाती तो है, इस लंबी अथक यात्रा की पोटली में उपलब्धियों से ज़ियादा असफलताएं है जिन्हें बहुत संजोकर रखा है किसी धड़कन की तरह, बस इसी तरह से शेष समय निकल जाए इस शुष्क और बेजान होती कोपल के बीच उगी पत्ती की छाया में तो धन्य समझूं अपने को I quote John Burroughs - "One resolution I have made, and try always to keep, is this - "to rise above little things" #मन_को_चिठ्ठी *** "मुंबईया फिल्म उद्योग के भांड और वैश्विक कलाकार" _______ हमारे यहां कंगना रनौत जैसी गंवार और...