You have to choose your own battles, and the right place to conquer Be careful while choosing the both, because we have limited time and energy *** दिन उदासियां की स्मृतियों से गुजरता है और रातें भविष्य की कोख में जन्म लेने के स्वप्न देखते विदा हो रही है, तुमसे बात करने की सदिच्छा में भोर होती है और दिन चढ़ने तक स्मृति पटल से सब मिट जाता है, इन यात्राओं के साथ भौतिक यात्राओं पर भी प्रतिबंध लगा सकूं तो सुकून की छांह में यह अर्थहीनता कुछ कम हो, जीवन अनिश्चितताओं में इस उम्मीद पर हर पल बीतता है कि "यह भी गुजर जायेगा, सकारात्मक बने रहो" - पर ना ये सब गुजरता है और ना जीवन का अंत करीब नज़र आता है और इस सबके बीच व्योम में टंगी आत्मा का बोझ शरीर के मानस पर दिनों-दिन बढ़ते ही जा रहा है इधर कबीट (कैथा)की खुश्बू, जंगली इमली, महुआ, तेंदू की नर्म पत्तियाँ, जामुन के कच्चे फल, आम की कच्ची छोटी गुठलियां, खिरनी का पीलापन, इमली की खटास, करौंदे की खटास, चारोली यानी अचार की मिठास और कच्चा हरापन और देर रात तक ठंडी हवा में सुबह के शुक्र तारे के सपने बेचैन कर रहें है, लगता है अरुण दाते की आवाज में ...
आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा था, चलो देर आए दुरुस्त आए, असल में दुनिया के सारे ट्रंप बेहद लीचड़, कमजोर, और धूर्त है - जिनमें दो कौड़ी की अक्ल नहीं है, वे सिर्फ बकलोल है और शेखीबाज है जो लोग अपने लोगों और अपने देश को साथ नहीं रख सकते, या अपने लोगों के विकास की बात नहीं कर सकते - वे इसके अलावा कुछ और नहीं कर सकते, विशुद्ध रूप से ये सब कायर और डरपोक है और अमेरिकी ट्रंप ने यह कल रात सिद्ध कर दिया और यह भी कि वो पूरा मानसिक रोगी है - बोले तो गंभीर mental, neurotic, depression and anxiety का शिकार है हमारी मीडिया और मीडिया के दलालों को अब मसाला मिलना बंद होगा, पर कोई ना - अब चुनावों की घटिया रिपोर्टिंग चालू होगी - ताकि इन असुरों के नाखून पैने होते रहें और ये बर्बादी के कगार पर हम सबको ले जाएं #खरी_खरी *** अदनान कफील की यह कविता इन दिनों सोशल मीडिया पर घूम रही है, बगैर किसी पूर्वाग्रह के एक पाठकीय टिप्पणी कर रहा हूँ, इस कविता को कई बार पढ़ा और आज जब इसे दोबारा पढ़ा तो भयानक बारीकी से बुनी हुई लगी ईश्वर अगर तू है तो (संशय) और खुदा के होने पर यकीन है थोड़ी ज्यादा बारीकी से बुनी है, यह इसलिए ...