"अचानक मुझमें असंभव के लिए आकांक्षा जागी, अपना यह संसार काफी असहनीय है, इसलिए मुझे चंद्रमा, या खुशी चाहिए—कुछ ऐसा, जो वस्तुतः पागलपन-सा जान पड़े, मैं असंभव का संधान कर रहा हूँ... देखो, तर्क कहाँ ले जाता है—शक्ति अपनी सर्वोच्च सीमा तक, इच्छाशक्ति अपने अंतर छोर तक! शक्ति तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक अपनी काली नियति के सामने आत्मसमर्पण न कर दिया जाये। नहीं, अब वापसी नहीं हो सकती, मुझे आगे बढ़ते ही जाना है..."
• कालीगुला
"मुझे चांद चहिये" - सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास से
__________
प्रिय हर्ष,
तुम्हें लिखना वैसा ही है जैसे किसी बंद खिड़की से आकाश को पुकारना, तुम चले गए हो, पर तुम्हारी चुप्पी अब भी शब्दों से अधिक बोलती है, तुम्हारे भीतर जो प्रेम था, वह साधारण नहीं था—वह ज्वार की तरह उठता था, पूर्णिमा के चाँद की तरह फैलता था, और उसी चाँद की तरह शायद तुम्हें दूर, बहुत दूर ले भी गया
वर्षा वशिष्ठ तुम्हारे लिए केवल एक स्त्री नहीं थी, वह तुम्हारा स्वप्न थी, तुम्हारी आकांक्षा, तुम्हारा आत्मविश्वास और तुम्हारी असुरक्षा—सब कुछ, तुमने प्रेम को पूजा की तरह जिया, और जब वह तुम्हारे हाथों में पूर्ण रूप से नहीं आ सका, तो तुम्हारे भीतर का संतुलन टूट गया, तुम्हारी संवेदनशीलता इतनी गहरी थी कि अस्वीकार का हल्का-सा स्पर्श भी तुम्हारे लिए वज्रपात बन गया
मैं तुम्हारी वेदना को नकार नहीं सकता, तुम्हारे मन का अकेलापन, तुम्हारी असफलताओं की टीस, और अपने ही भीतर उपजी हीनता की छाया—इन सबने मिलकर तुम्हें भीतर से थका दिया था, तुम शायद स्वयं से भी लड़ते-लड़ते चूर हो चुके थे, इसलिए अंत में आत्महत्या करने का निर्णय किया जिसे दुर्खीम ने बहुत गहराई से समझाया है
एक बात कहूँ हर्ष, तुम्हारा जाना किसी विजय की कथा नहीं, एक करुण अध्याय है, तुम्हारा निर्णय तुम्हारी पीड़ा की तीव्रता को दिखाता है, पर यह भी सच है कि वह पीड़ा अंतिम सत्य नहीं थी, समय, संवाद और आत्मस्वीकार शायद तुम्हें एक नया आकाश दे सकते थे, तुम्हारी कहानी यह नहीं सिखाती कि टूट जाना समाधान है; वह यह सिखाती है कि मनुष्य का हृदय कितना नाजुक और कितना गहरा होता है
तुम्हारे भीतर जो कलाकार था, जो स्वप्नद्रष्टा था, जो प्रेम को चरम तक जीना चाहता था—वह आज भी पाठकों की स्मृति में जीवित है, मेरे में तुम ज़िन्दा हो हर्ष, तुम्हारी त्रासदी हमें झकझोरती है, पर तुम्हारा प्रेम हमें संवेदनशील भी बनाता है
काश तुमने अपने भीतर की उस रोशनी को पहचान लिया होता, जो अँधेरे से बड़ी थी, काश तुमने एक बार अपने ही कंधे पर सिर रखकर स्वयं को सांत्वना दी होती
तुम्हें स्मरण करते हुए मन में करुणा है, अपनापन है, और एक गहरी सीख भी—प्रेम महान है, पर जीवन उससे भी महान है, तुम जहाँ भी हो, शांति में रहो,
तुम्हारी कहानी हमें यह याद दिलाती रहे कि टूटे हुए दिलों को सहारा चाहिए, अंत नहीं
र्षा तुम्हारी अंतिम यात्रा में भीड़ के साथ चलते हुए बुदबुदाती है और कहती है - "पीछे छुटे हुए लोग वन्दनीय है, जो मौत और सारी करुणा, दुख भूलकर जीवन में लौट आते है और संघर्षों के पथ पर चलने लगते है"
पता नहीं तुम सही थे या गलत थे हर्ष, या उपन्यासकार ने तुम्हारा चरित्र यूँ क्यों बुना कि तुम्हारा अंत या हश्र एक आत्महत्या के रूप में ही सामने आया और इसलिए कालीगुला का वाक्य मुझे चांद चाहिए अमर हो गया
स्नेह सहित
[ "मुझे चांद चाहिए" - सुरेंद्र वर्मा कृत उपन्यास के नायक को अपनी ओर से एक ख़त कि हर्ष का निर्णय सही था, भले ही वह शुरुवाती तौर पर गलत लगे, शायद चालीसवीं बार इसे पढ़ रहा हूँ ]
***
ये जो शहर, गांव और अलाने-फलाने के लड़के-लड़की प्रशासनिक अधिकारी बन गए और इस जाति, उस जाति, गौत्र, वर्ग के है आदि आदि विशेषण लगाने से क्या होता है, अधिकांश वर्षों से दिल्ली में लड़े है और गांव देहात में किसी की मैय्यत में भी नहीं आए कांधा देने, हो सकता है बाप को भी पड़ोसी ने ही मुखाग्नि दी हो, अधिकारी बनने के बाद ये सब बिल्ली के &₹# हो जाते है - जो परिवार के लिए कुछ नहीं करते, वो गांव - शहर या दोस्त - रिश्तेदारों के लिए क्या ही करेंगे
अपवाद छोड़ दें तो ये निहायत ही दो कौड़ी के इन्सान निकलते है - लबासना में जाकर और अपने हाथ से भात खाने लायक या पानी पीने लायक नहीं रहते, चालीस सालों का अनुभव है कि किसी सरकारी दफ्तर के भृत्य या बाबू से आप आकाशगंगा अपने नाम करा सकते हो, पर सुबह यदि इनके चेहरे देख लो तो सुबह की चाय नसीब ना हो, मेरे दो-तीन अनुभव छोड़ दो तो बाकी तो बेहद ही लचर, अवसरवादी, पाखंडी, ढोंगी और भयानक नीच किस्म के भ्रष्ट अधिकारी निकले - जो दोस्त होने का दावा करते थे या छात्र थे, अब उनसे बात करने में या कहने में भी कि "मेरे परिचित है", ग्लानि या अपराध बोध होता है और यह महिला - पुरुष दोनों के लिए लागू है, बल्कि महिलाएं और भी घाघ और घटिया होती है
और जे अलित-दलित या मीणा, हुजूर-कुजूर की बात कर आप गौरव कर पूरी धरती को सिर उठा रहें है, वे थोड़े दिन बाप माँ को भी सर्वेंट क्वार्टर में रखकर सिन्हा, भार्गव, शर्मा, सिंह, राठौड़, ठाकुर, चौहान या सक्सेना या पांडे या कुमार या रंजन हो जायेंगे और फिर खबरदार दफ्तर में भी किसी को जाति मालूम पड़ी तो इतना त्रस्त कर देंगे कि सीधे आत्महत्या के सिवा चारा ही नहीं रहेगा तृतीय श्रेणी के बाबू के पास
इसलिए ज्यादा उचकिए मत - "जे बिश्बासन लोग नहीं, जे समाज सुधारण लोग नहीं"
***
एक मित्र ने अभी कहा कि आज अक्ल दाढ़ निकलवाई डॉक्टर के कहने पर, तकलीफ हो रही है तो मैंने जवाब दिया - "इस मामले मैं बहुत सुखी हूँ, न अक्ल दाढ़ आई, ना आने-जाने या निकालने का दर्द है, पूरा जीवन यूंही बगैर अक़्ल के निकल गया"
सच कहूँ तो अपनी मूर्खता में ही मैं बहुत खुश हूँ, इस अप्रैल में साठ का हो जाऊंगा, जीवन और सब सुख-दुख के पल निकल ही गए रोते-झीकते हुए, हालांकि एक लंबा समय अपनी शर्तों, अपने सिद्धांतों, और उसूलों पर, किसी से कोई अपेक्षा ना करते हुए, बगैर कोई स्थाई नौकरी और सुरक्षा के, सारी उम्र बेहद कम तनख्वाह, गुजारे लायक न्यूनतम सुविधाओं और नगण्य परिलब्धियों और किन्हीं संसाधनों के बिना अकेले निकालना मुश्किल था, पर बहुत मजा आया, जीवन में खूब बदनामी झेली, ताने, निंदा, जूते, गाली, ठोकरें, धोखे, बदहाली, जिल्लत, प्यार और बहुत कम सम्मान मिला, ज्यादा खोया और थोड़ा सा पाया जीवन में
अब पलटकर देखता हूँ तो लगता है, एक सामान्य जीवन ऐसा ही होता है, ना किसी से अपेक्षा रखी कोई, ना नोबल की आस और ना किसी से चरित्र प्रमाण पत्र लिखवाया, जो मिला - उसको अपनी गठरी में बांधकर चलता चला आया और छह दशक समाप्त हो रहे तो कोई रंजो गम नहीं, एक औसत बुद्धि वाला व्यक्तित्व जिसे भली भांति ज्ञात था कि ना अपुन न्यूटन है ना आइंस्टीन, बस कुल मिलाकर संतुष्ट हूँ, इस मोड़ पर रूपया नहीं पर संतोष है, आगे का नहीं पता, पर अब अकेले रहने, चलने और अपने एकांत में जीने की हिम्मत बढ़ गई है
मैं पगडंडियों से चलकर आया हूँ तो सड़कों की हिम्मत नहीं कि पाँवों पर छाले कर दें, और हो भी जायेंगे तो इतने काँटे है पगों में कि छालों के लिए जगह नहीं है
***
राजस्थान के अनुज अग्निहोत्री ने यूपीएससी की परीक्षा में टॉप किया
अब मै दो घंटे से फर्जी दलितों के लीडर्स को खोज रहा था कि "यूपीएससी में पहले नम्बर पर दलित आरक्षण क्यों नहीं" की माँग कब करेंगे
या पहले नम्बर पर आदिवासी क्यों नहीं है
***
हम सब अच्छे है, मैने देखा है कि कोई भी रंजिश लेकर पैदा नहीं होता, जितने नेक और भरोसेमंद अपराध जगत के लोग है, उतने हम सब नहीं है - यह भी समय, परिस्थिति, व्यवहार और क्षुद्र स्वार्थ के चलते गलत जिसे अपराध कह सकते है - भूलवश हो जाता है और उसी को हम भुगतते हुए अपराध की दुनिया में पहुंच जाते है
अपने अंतिम समय जितने निश्चल, भोले और तटस्थ हम हो जाते है और सबको माफ करके निष्काम और पवित्र भाव से अंतिम सफर पर चल देते है और वहीं भाव यदि जीवन में सही समय पर जागृत हो जाए तो मनुष्य जीवन कितना निर्मल और सात्विक हो जायेगा
इन दिनों यही सब सीखने की ओर अग्रसर हूँ, देखो सच में कितना संधान कर पाता हूँ, समय बहुत कम है, पर अपने तई मेरा यह इमानदाराना प्रयास है और इसमें कोई कोताही नहीं बरत रहा, आगे इतिहास तय करेगा कि सच क्या था
***
सभी दुख, करुणा, त्रासदियां, अवसाद और संत्रास समय के साथ और उम्र ढलने के साथ क्षीण होते जाते है और एक दिन सब खत्म भी जाते है, हमें बस संयम रखना होता है, लम्बा इंतज़ार करना होता है और यह देखना होता है कि इस तटस्थ होते जीवन के लिए हम कितने तैयार है, बहुत आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं हम - पर, अफ़सोस जब यह दिन आता है तो समझ आता है कि जीवन दुखों के दानावल में ही सुरक्षित था, धधकते लाक्षागृह, कुटिलताओं और संघर्षों में ही सुख था, तटस्थ होकर हम निरपेक्ष तो गए पर जीवन का असली सत्व खत्म हो गया, इसलिए मुझे लगता है कि दुख और संघर्ष ही असली जीवन है, किसी भी प्रकार के प्रतिफल असहज कर देते है हमें और ये सारे संघर्ष और संत्रास नहीं, रोजाना के मोर्चों पर वेदना, पीड़ा और करूणा नहीं तो हमारे होने का कोई अर्थ भी नहीं
***
नीतीश सच में बोझ है धरती का, ईरान, इजरायल या अमेरिका भेज दो कमबख्त को, मतलब हद यह है कि यह लोकतंत्र का सत्यानाश करके अब राज्यसभा में जा रहा, क्या लालच दिया है मोती ने इसे, अपना ध्यान नहीं रख पा रहा तो कोई मंत्रालय क्या ही सम्हालेगा - ये शिवराज से लेकर आदि की (दु)र्गती नहीं देख रहा
और अपना कल्लू मामा, क्या ही कहना, दुनिया युद्ध के मुहाने पर बैठी है, हर आदमी सांस रोककर खड़ा है और इसे खेला सूझ रहा है, कमाल की अक्ल है, डायन भूत भी शोक मनाते है, पर इसकी सत्ता की हवस खत्म हो नहीं हो रही, कल घमासान होगा और यह तो चुनाव के बाद जिस दिन इस नीतीश ने शपथ ली थी मैंने कहा ही था, मप्र में उमा, बाबूलाल गौर के साथ कल्लू मामा यह खेला कर चुका है
धिक्कार है इन सब पर, बिहारियों बहुत भेजा फ्राय करके तुम चिचा को लाए थे, वो टाँग ऊपर करके विसर्जन कर गया तुम्हारी सीएम की सीट पर , अब खाओ चंपारण मटन और मालदा आम
उधर महाराष्ट्र से शरद पवार को अभी भी राज्यसभा में जाना है 85 का अभी है, छह साल और सदन में रहना है और 91 की उम्र तक सुख भोगना है, ये महाकुटिल आत्मा है, जिससे बोलने की चलने की बनती नहीं, दाँत है नहीं अर देश के निर्णय लेंगे , वैसे ही नीतीश का दिमाग भी नहीं काम नहीं करता, याद नहीं रहता कुछ पर चिपके रहना है सत्ता से
शर्म नहीं आती इन लोगों को - करना धरना कुछ नहीं, देश की हालत खराब कर रखी है, अस्सी करोड़ दस साल से पांच किलो राशन की भीख पर जिंदा है, बेरोजगारी चरम पर है और साले बुड्ढे कब्र में लटके हुए सत्ता का मद चाटने में लगे है, इन सबको एक ड्रोन में बांधकर ईरान - इजरायल या अमेरिका भेज दो या यूक्रेन - रूस के बीच फेंक दो, बोझ कही के, कब तक इन सत्तर पार लोगों को झेलते रहेंगे, 65-70 पार लोगों को घर बैठाओ या सामाजिक बहिष्कार करो, मैं भी अगले वर्ष 60 का होने वाला हूँ , 60 या 60 पार वाले लोगों को भगाओ हर जगह से, युवाओं को यह काम मशाल जलाने की तरह करना होगा, उद्योग, राजनीति, शिक्षा, स्वास्थ्य, कोर्ट कचहरी से लेकर संसद के सदन और एनजीओ से लेकर दुकान-मकान या बाकी जगहों पर इनकी तानाशाही नहीं चलेगी अब, नौकरियां है नहीं, नई भर्ती कर नहीं रहे, बाकी कुछ हो नहीं रहा और इन बुड्ढों की साली सत्ता की हवस खत्म नहीं हो रही, उधर मोदी हो या संघ प्रमुख या खड़से - ये भी पचहत्तर पार हो गए पर कुर्सी नहीं छूट रही, भुगतो देशवासियों, आज और थोड़ी भांग पी लेते या डूबकर मर जाते कीचड़ में
***
श्रापित मार्च और युद्ध
________
सोचना होगा कि क्या अभी भी गांधी, मार्टिन लूथर किंग, मंडेला या बुद्ध सामयिक है, दुकान चलाने वालों की बात छोड़ दें, गांधी के नाम पर ही अपने देश में हजारों एकड़ जमीन चंद बुड्ढे और लोलुप लोग इस्तेमाल कर दोगुने दामों पर खादी बेच रहे है
पर दुनिया आज जहां आकर टिक गई है और सारी हलचल बंदूक, टैंक, ड्रोन और परमाणु हथियारों के रास्ते तेल और संसाधनों पर आ गई है - उस संदर्भ में शांति, विश्व बंधुत्व, नेकी, ईमानदारी या कुछ और जीवन मूल्य पर बात करना भी उचित है
दूसरा, जो मैं कह रहा कि संसार के सारे बूढे जो सत्तर - पिचहतर पार आयु वर्ग के है लगभग हिंसक, पागल और मानसिक रोगी है - ट्रंप से लेकर पुतिन और खोमेनी से लेकर मोदी तक - जिन्हें ना मानवता की चिंता है और ना ही अपने घर परिवार की
विश्वास ना हो तो अपने आसपास के अंकल लोगों को देख लें, जो दिनभर वाट्सअप पर आते हुए हर वीडियो को तल्लीनता से देखते है, फॉरवर्ड करते है और भयानक हिंसक हो जाते है, कल के कार्यक्रम में मेरे पास कुछ ऐसे ही नगीने बैठे थे - जो रील देख रहे थे और आपस में मूर्खतापूर्ण बातें कर रहें थे कि इसको खत्म कर दो, उसको निपटा दो और खेतों में आग लगा दो - ताकि अबकी बार गेहूं नहीं होगा तो "ये लोग" भूखे मर जायेंगे, इन कमीनों को यह समझ नहीं आ रहा कि इनके घर के लोगों का क्या होगा
इसलिए मेरा अब मानना है कि इन सनकी बूढों से मोबाइल छीन लिया जाए या इनका नेट पैक बंद करवा दिया जाए - ताकि ये हिंसा इनके साथ ही खत्म हो जाए, ये लोग ही एक बड़ा कारण है कि ट्रंप से लेकर मोदी और पुतिन या खोमेनी इतने बर्बर और हिंसक हो गए कि हिंसा लोकतंत्र और राजनीति का दूसरा नाम हो गया
दुनिया की स्थिति जो है वह बेचैन करने वाली है और बेहतर है कि अभी भी जो कुछ बचा है उसे सम्हाल लें वरना कुछ भी नहीं बचेगा
***
#संसार के बहाने हिंदी का कुंठित परिदृश्य
__________
"संसार" नामक विश्व कविता के कार्यक्रम को लेकर आग लगी है हिंदी के कुंठित संसार में, मतलब लोग कवियों के नाम, उनका काम और योगदान पर बात करने के बजाय, बुलाए गए श्रोताओं को दिए जा रहे बीस हजार की बहस पर अटके है, डूब के क्यों नहीं मर जाते, रज़ा या अशोक वाजपेई के भरोसे पैदा हुए थे क्या और क्यों इस बहस में पड़े है कि किसे बुलाया - किसे नहीं, इस बहस का क्या मतलब है, रज़ा एक निजी संस्थान है और जो वो कर रहें है - साहित्य की बेहतरी के लिए कर रहें है, शायद समय , महंगाई और आवश्यकता के आधार पर सोचा-समझा, सुचिंतित निर्णय है - जिसका स्वागत किया जाना चाहिए
जिन लोगों ने शोध के लिए अवैतनिक अवकाश लिया या Sabbaticles पर है, वे ससुर बेरोजगार कैसे हो गए, धन जमाकर रखा है ताकि दो तीन साल अय्याशी से लिख-पढ़ लिख सकें, जब सुनने का कीड़ा है और कविता तुम्हारी जीवन दृष्टि है तो जाओ ना दिल्ली जेब से रूपया खर्च करके, जाओ - रहो दिल्ली, खर्च करो, खाओ-पियो, इंडिया हेबिटेट की चाय भी मत पियो, राजपत्रित अधिकारी है वर्ग दो के, पक्के सरकारी कर्मचारी है, अच्छा खासा कमा रहे है, फिर रोएंगे कि मैं दलित, मै पीड़ित, मैं वंचित, मै सताई हुई औरत , मैं पुरुष प्रधान समाज की मारी दर-दर गिरती पड़ती औरत, हाय रे दलित, वंचित और घसियारों - तुमको रज़ा में भी आना है, विश्व रंग में भी जाना है, स्पंदन में भी जाना है और संघ की शतक फिल्म भी मुफ्त में देखनी है, किताब भी फ्री में चाहिए और पत्रिका भी, अबै कही खड़े होकर और आईने के सामने नंगे होकर अपनी रीढ़ की हड्डी तो देख लो पलटकर बाबू, बराबरी कर रहे कल्पित जी की, तो वे तुम्हारी तरह कंगाल और बुद्धिहीन नहीं है, उनके रज़ा से वैचारिक मतभेद है, मनभेद ना हो शायद
अब बात खर्च और हितग्राहियों की - तो सुनो, जिनको भी खर्च दिया जा रहा है - वह अपर्याप्त है दिल्ली के मान से तीन दिन का, पर फिर भी यदि बीजधन मिल रहा तो बाकी सब व्यवस्था हो सकती है, आखिर जेब से भी कुछ तो खर्च होना ही चाहिए, क्या रज़ा के भरोसे पैदा हो गए लोग और अब कफ़न भी वाजपेई जी देंगे क्या
जो लोग युवाओं आदि को प्रमोट करने की बात कर रहे वे बेहद ही कमजोर, अपरिक्व, कायर और मूर्ख है, यह बात ही बेमानी है, युवा को कोई लेनदेन नहीं, उसे मौका चाहिए - खाने पीने का, अपनी छमिया के साथ रात बीताने के लिए होटल का और थर्ड एसी से लेकर हवाई यात्रा के किराए का, वह उजबक तो आपके घर आकर गोबर भी लिप देगा यदि आप यह सब देंगे तो, देख नहीं रहे यहां क्या हालत है
हिंदी के युवा कमबख्त हर जगह आलूओं की तरह मौजूद है - इलाहाबाद, मेरठ, अलीगढ़ से लेकर चंडीगढ़ तक, रजनीगंधा से लेकर कामसूत्र के विज्ञापन तक वाले कार्यक्रमों में, और कवयित्रियां - अपने आराध्य या पतियों के गुण गाते नहीं थक रही, इन्हें क्या मतलब है विश्व कविता से, फैशन परेड में जाना है बस लाली पोतकर, हमारे यहां इंदौर - देवास - उज्जैन में चौसठ और पैतालीस वर्ष के शिशु और अबोध और चार नाती - पोतों के दादा-दादी युवा है, एक- दो कवि जो रिटायरमेंट के बाद मुक्ति की नुक्ति और नुक्ते का भोजन करवाने बैठे है आतुरता से - वे भी युवा है, भोपाल में एक हकला कवि - जो दारू पीकर भी मंच पर कविता नहीं पढ़ सकता, बड़े कवियों के घर के कुत्ते घुमाता है, बड़े लोगों की सब्जी भाजी लाते-लाते चापलूसी से तीन- चार कविता संग्रह छपवा लिए - उसे भी युवा कहलाना है सत्तर का डोकरा - ये सब युवा है और इनके नाम के आगे युवा ना लिखो तो ये मरने - मारने कर उतारू हो जाते है या चरित्र हनन पर उतर आते है
और सबसे महत्वपूर्ण ये बहस हो क्यों रही है, मेरे घर शादी ब्याह है, मै जिसको चाहूं बुलाऊं, बैलगाड़ी भेजूँ, ओला भेजूं या पवन हंस का चॉपर, आपको बीच में उचकने का हक किसने दिया
कविता, कवि पर बात नहीं पर और सब मुद्दों पर निंदा चुगली करने को तैयार है और नहीं जा रहे तो यहां क्यों खुद को नोबल पुरस्कार देकर सम्मानित कर रहें हो, सबको बताकर, चिंघाड़ कर कितने आत्ममुग्ध हो गए हो, किसी ने लिखा कि मैं इन रूपयों से किसी की मदद करूंगा तो गुरू अपने रूपयों से करो ना, रज़ा का रूपया लेकर पराई शादी में दुल्हा क्यों बन रहे
भाईयों और बहनों, इतना कुंठित मत हो जाओ कि कविता ही रूठ जाए तुमसे और समझ का नाड़ा खुलकर लटकता हुआ सबको दिखने लगे, जरा पेटी टाईट करो और कुछ दूसरा काम करो, नहीं तो चुल्लू भर पानी तो तमाम ज्ञानपीठ वाले मिलकर भेज ही देंगे तुम्हारे घर - ताकि डूबकर अगले जन्म में किसी अफ्रीका, ग्रीस, स्कॉटलैंड या इथोपिया में जन्म ले सको
***
डूब मरने का दिन
_______
आज केजरीवाल और मनीष छूटे है, यकीन मानिए धीरे-धीरे इस भ्रष्ट और नापाक सरकार के सारे काले कारनामे सामने आयेंगे और जनता इन्हें एक दिन दौड़ा - दौड़ाकर निपटाएगी, राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक के सारे काम दो कौड़ी के नहीं है, सन 2014 से देश बर्बाद कर यहां की गंगा-जमनी तहजीब का सत्यानाश कर दिया मोदी सरकार ने, इस देश के हर हिस्से पर नकारात्मक प्रभाव डाला है और आम आदमी को बुरी तरह से तोड़ा है
सरकारी एजेंसियों के दुरूपयोग और कुशासन, तानाशाही और मनमानी ने संविधान प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों तक का हनन कर डाला है और देश को बड़े कर्ज में डालकर अम्बानी - अदाणी को बेइंतहा फायदा पहुंचाया है, लोकसभा हो या ग्रामसभा किसी के लिए ना बोलने की जगह छोड़ी - ना मौका दिया पर अब जनता जागरूक हो रही है
आप कहेंगे कि फिर चुनाव क्यों जीत रहे तो SIR के माध्यम से चुनाव आयोग जैसे दलाल और ईवीएम का भी खेल सामने आ रहा है, बिहार से लेकर महाराष्ट्र और अब बंगाल में जीतने के लिए की जा रही तिकड़म और साजिशें भी सामने आ रही है, धीरज धरिए सब साफ होगा और यही अंध भक्त जो मूर्ख बने है , इन्हें सामने लाएंगे, मणिपुर से लेकर सीमावर्ती राज्यों में तनाव, चीन से लेकर पाकिस्तान और अमेरिका, एक जगह बताईए जहां ये लोग कुछ कर पाएं हो , बेहद निकम्मे और नागवार है
धर्म के नाम पर योगी बनाम अविमुक्तेश्वर कोर्ट तक पहुंच ही गए है, हिंदू और सनातन का नुकसान जितना भाजपा ने किया है - वह संघ को समझ नहीं आ रहा - जो कट्टर ब्राह्मणों का संगठन है, आश्चर्य है पर वो भी क्या करेंगे, मोहन भागवत को भी सौ साल तक पद छोड़ना नहीं है, अपरिग्रह, घर - परिवार और मोहमाया छोड़ने की बात लेकर संघ में आए थे, पर अब चिपक गए है कुर्सी से, संस्कृति बोलकर सत्ता और लाभ की माया में जकड़ गए है सारे संघी
कायदे से तो रेखा गुप्ता और अमित शाह को इस्तीफ़ा देकर कही जंगल निकल जाना चाहिए - अपना मुंह लेकर, पर बेशर्म है और इस्तीफ़ा संस्कृति नही है इनके यहां - अपना मुंह गोरा करने की
सब बदलेगा, बस देखते रहिए, जनता जनार्दन जिंदाबाद
***
हम ऐसे समय में दुर्भाग्य से जीवित है - जब समाचार का अर्थ युद्ध, अपराध और हथियार है, संबंध का मतलब कुटिलता, स्वार्थ और शोषण है, राजनीति का अर्थ तानाशाही और अमानवीय होना, धर्म का मतलब हत्या, नरसंहार और लूट है, संन्यास का अर्थ धन उगाना, व्याभिचार और हवस, साहित्य का अर्थ आत्म मुग्धता और बेशर्मी, किसी भी पुरस्कार का अर्थ उच्च स्तर का जुगाड़, शिक्षा का अर्थ अपराधी,लोलुप और षडयंत्रकारी बनाना, और अंत में इंसान का अर्थ सिर्फ देखना और चुपचाप सहना है
और इस सबके बाद भी यदि कोई सेमल एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर तमाम प्रदूषण और गर्द के बाद भी अपनी ऐंठन में खड़ा है गर्व से तो यह कम आश्चर्य नहीं
***
"क्यों बै ये क्या पोस्टर भेजा तूने" - मैने लाईवा को फोन लगाया अभी
"उस्ताद, मैं कवि गोष्ठी में जा रिया हूँ जाँ पे भोत बड़े - बड़े लोग, बल्लम पेलवान साहित्यकार भी आ रिए हेंगे" लाईवा बोला
"तो ये इत्ते सारे एक साथ , इन ढाई तीन सौ ससुरों और सुसरियों को सुनेगा कौन" मै जिज्ञासु था, मतलब कमाल यह था कि कमल के फूल में हर पंखुड़ी पर सौ के करीब फोटो चैंप रखे थे आयोजक ने और सबके दांत मोतियों से चमक रहे थे, आयोजन था या किसी मंत्री के बेटे की अवाँगर्द बारात, मंचीय दहाड़ से लेकर घिघियाने वाले रसीले रंगीन कवि और जोर जबरदस्ती से रूपया देकर कहानी उपन्यास लिखवा लेने वाले मठाधीश भी मौजूद थे फोटू में
"वो ई तो राज हेगा, ईस्थानीय जनता सुनने नई आई तो जे सब सुनकर ताली तो बजा लेंगे" लाईवा हंस रहा था कमबख्त
***
यह मार्च की आहट है - मार्च यानी फागुन यानी पलाश की आग से खेलने का रंगीन मौसम, यह उन घरों की ओर रूख करने का मौसम है जहां पिछले बारह माह में मौत ने दरवाजा खटखटाया था और सारा साल बेरंग सा गुजर गया, उन पर रंग डालकर अपने जीवन रंगों से अपने मनमिलें लोगों को पुनः रंगीन कर देने का रस्मि महीना है, यह उन जंगल के उलझे रास्तों से गुजर जाने का मौसम है - जहां की पगडंडियों में सूरज का उजाला अब झीना - झीना सा पड़ने लगा है, घास सूख रही है, नाजुक सी दुर्वा में कड़वाहट आ गई है, आम के पेड़ों पर अलसाये से बौर है, कोयल समझ नहीं पा रही कि आम पर जा बैठूं या जामुन पर या नीम की कोमल पत्तियों पर जहां से बेहद कोमल और नई पत्तियों को चैत में तोड़कर किसी चमचमाते कांसे के लोटे पर आम के पत्तों के संग खरबूज की महकती फांकों के साथ पूजा जायेगा, खाया जायेगा और नए वर्ष की शुभकामनाओं से धरती का आंगन महक उठेगा, नीलगिरी के पंक्तिबद्ध पेड़ों पर से सुवास सूंघने और हाथ कर सूखी पत्तियों को रगड़कर महसूस करने का मौसम है, यह उन उदास रास्तों पर चलने का मौसम है जहां अभी-अभी सप्तपर्णी ने अपनी बास बिखेरी थी, रात से डरने का नहीं बल्कि आँख में आँख डालकर पूरी रात बतियाने का मार्च है
यह मार्च की आहट ही है कि इधर धूप आहिस्ते से तीखी हो चली है, जिस धूप के लिए टूटे खपरैल वाले मकान में मुंडेर की ओट से आंगन के भीतर तक पसर जाने का बेसब्री से इंतजार रहता था, अब उसका इंतजार नहीं बल्कि हल्की सी कुनमुनि हवा के थपेड़ो के आगे गुदड़ी से मुँह ढांककर और थोड़ी देर तो सुस्ता लेने को जी करता है, शरीर की ऐंठन बढ़ती जा रही है और मार्च एकदम सामने आ गया है, दोपहर को हल्का सा खा लो तो नींद का झोंका कितना भी रोको आ ही जाता है और मन पर आलस हावी होने लगता है, हर तरफ धूल का साम्राज्य बढ़ते जा रहा है और बवंडर हर कही यूँही नजर आ जाते है जैसे जीवन में कष्ट के थेगले और इन्हें जितना हटाओ ये उतनी ही मजबूती से जमते जाते है
गर्मियों की धूप में जंगल जल रहा होता है और मार्च से पलाश के रंग अपने पूरे सुर्ख लाल के साथ पूरी दोपहर आग लगाये रहते है, खिले हुए ताल में कमल कम हो गये है, सिंघाड़े गायब और झीलों का पानी आँख के पानी की तरह सूख गया है, जमीन शुष्क हो रही है, उलीचना कम अब - क्योंकि जब भी उलीचते है - आँसू हो या पानी भीतर सब रीत ही जाता है
यह मार्च है और फिर चैत, जो मेरे जन्म का माह है , टी एस इलियट ने अपनी कविता "द वेस्ट लैंड" की पहली ही पंक्ति में लिखा था अप्रैल सबसे क्रूर माह है [April is the Cruelest Month] संसार के कैलेंडर का सबसे क्रूर माह - जिसमें सब अजीब लोग हुए है, जीवन की आपाधापी से लेकर यांत्रिक होते जा रहे जीवन - जिसमें प्रेम, सेक्स, दया, भावना, करूणा, धर्म और संस्कृति की लंबी बात वो करता है और अंत में कविता के समापन में वो कहता है "द, द और द यानी दत्ता, दम्यता और दयाधम" - अर्थात Give, Control and Sympathize
आईये मार्च के स्वागत में जलने को तैयार हो जाये
Comments