देवास में एक घटिया स्कूल है और फर्जी आईआईटी कोचिंग के नाम पर फीस बटोरने वाला प्रॉक्सी स्कूल है - जिससे रोज वाट्सअप पर संदेश आते रहते है, एक घटिया लड़का जो खुद वर्षों तक बी ई पास नहीं कर सका वो जनता को बेवकूफ बनाकर धंधा कर रहा है जिसके अश्लील वीडियो चर्चित हुए थे देशभर में
इन कमीनों को पचास बार बोला कि "मेरे निजी नम्बर पर संदेश भेजकर नम्बर का इस्तेमाल ना करें, यह मेरी निजता में दखल है" - पर सुनते नहीं, आज आखिर सीधे बात की उस दो कौड़ी के बीई फेल के किसी बाबू से और बोला कि "यदि अब मैसेज आया तो थाने में रिपोर्ट करूंगा कि मेरी निजता में दखल हो रहा है, और संविधान के अनुच्छेद 21 का वायलेशन हो रहा है"
आए दिन ये कंपनी वाले और विभिन्न संस्थाओं के लोग, जूते-चप्पल से लेकर कपड़े बेचने वाले, लोन देने वाले मैसेज और फोन करते रहते है, सुप्रीम कोर्ट को इन नालायकों के खिलाफ कार्यवाही करना चाहिए़
जब इसे कोई जानता नहीं था तब तत्कालीन नवभारत ने इससे अकूत चंदा लेकर विज्ञापन छापे थे , फिर भास्कर और नईदुनिया ने यह परम्परा निभाई, बाद में अब कुछ स्थानीय टटपूँजिया पत्रकार, लोकल चैनल के दलालों ने और विशुद्ध दलाली में संलग्न पत्रकार इनसे पेज-पेज भर के विज्ञापन लेते है और बच्चों के फोटो छापकर रूपया कमाते है और ये नालायक लोग सबको हैरास करते है, एक याचिका लगाने की सोच रहा हूँ कि इन्हें नम्बर किसने बेचे है
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कुछ यूं हो गई है पुराने चेहरे की तस्वीर कि
अपना ही अक्स अपने को नजर नहीं आता
• संदीप नाईक
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युवा साथी रवि आर्य ने यह खूबसूरत गद्य लिखा है जो गैरसैंण चमोली में रहते है, उन्होंने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है; मुझे लगा कि दिल छू लिया इस गद्य ने, बहुत अपनी सी कहानी लगी, थोड़े से रद्दोबदल और माजरत के साथ लिख रहा हूँ
"मैं जीवन की दौड़ में पीछे नहीं छूटा हूँ, बस अब मैं दौड़ना नहीं चाहता - दुनिया योजनाएँ बना रही है, रिश्ते बुन रही है, और मैं बस किनारे बैठा हूँ थका हुआ, यह थकान शरीर की नहीं, उन उम्मीदों की है - जिन्हें मैंने बहुत ईमानदारी से जिया और टूटते देखा
कभी-कभी सोचता हूँ, अगर कोई अब मुझसे प्रेम करने आए, तो क्या होगा? उसे मेरे भीतर वह पुरानी गर्माहट या गहराई नहीं मिलेगी, बल्कि एक शांत और ठंडी जगह मिलेगी, उसे दुख होगा, इसलिए मेरा दूर रहना कोई नफरत नहीं, बल्कि मेरी ईमानदारी है
मैं अब वह व्यक्ति नहीं रहा - जो किसी की आवाज़ में अपना संसार ढूँढता था या रातों को जागकर किसी का इंतज़ार करता था, मैं अब बस एक साधारण, थोड़ा खाली और बेमन इंसान हूँ, मुझे इस खालीपन से कोई शिकायत नहीं, यही मेरी अप्रतिम और चिरस्थाई शांति है
लोग कहते हैं प्रेम न होना दुखद है, पर प्रेम का अति में होना और फिर किश्तों में टूटना - उससे कहीं ज्यादा थका देता है
अगर मैं आपको नीरस या निर्जीव लगूँ , तो मुझे गलत न समझना, बस यह जान लेना कि मैं कभी इतना भरा हुआ था कि अब पूरी तरह खाली हो चुका हूँ, खाली बर्तन आवाज़ तो करते हैं, पर उनमें देने के लिए कुछ नहीं होता, उम्र के इस पड़ाव पर हम सब खाली और उथले हो जाते हैं और बेहद क्रूर भी
बेहतर है मुझे दूर से ही समझा जाए, क्योंकि पास आने पर आपको वही सन्नाटा और एकांत मिलेगा - जिसे मैं बरसों से ओढ़े हुए हूँ, एक थका हुआ आदमी… जो प्रेम करता है तो शिद्दत से करता है इबादत की तरह करता है.....पर शायद अब नहीं होगा कभी"
[ चित्र - मुम्बई में कही किसी दिलकश जगह पर ]
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गैस, पेट्रोल और महंगाई से ध्यान भटकाने के लिए भाजपा द्वारा मधु किश्वर को प्लॉट किया गया है, अगर इस दोगली महिला की बातों में जरा भी सच्चाई होती या गंभीरता होती तो कोई न कोई अंधभक्त, भाजपा या सरकार पुलिस रिपोर्ट कर मानहानि का मुकदमा ठोक देते और खुद संविधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ़ बोलने के लिए जो विशेषाधिकार चाहिए - वह मधु में नहीं और यदि इतना ही सच है तो विपक्ष ने क्यों नहीं लपका इस मुद्दे को
बाकी जनता को तो दिमाग़ है नहीं, दिन में मोबाइल की बत्ती जलाकर हवाई अड्डे का उदघाटन कर देती है महामानव के साथ, और पांच हजार में सिलेंडर लेने को तैयार है, गंवारू लोगों की भीड़ है और तीन महाज्ञानी देश हांक रहे है, कसम से दुनिया में कही नहीं होता होगा ऐसा
सोशल मीडिया पर बैठे ज्ञानियों से बचकर रहिए, ये भी सब किसी सड़कछाप नेता, विधायक, सांसद या प्रदेश स्तर के नेता के भौंपू है - जो सूट बूट पहनकर और वैभव - विलास में जीते हुए कभी दलित, कभी ओबीसी, कभी आदिवासी, कभी ब्यूरोक्रेट या कभी मीडिया के दलाल बनकर जबरन के इन्फ्लुएंसर बनते है
और आखिर मधु किश्वर को अब जानता ही कौन है, एक जमाने में संपादक बनकर बहुत जेंडर - जेंडर खेल लिया और अब जब कोई पूछ नहीं रहा तो रायता फैलाने आ गई, बुढ़ापे में पहचान का संकट, इन सत्तर पार नौटंकीबाज घटिया लोगों से सावधान, बहुत घाघ है ये सब
खैर
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बड़े दिनों बाद ट्रेन का सफर किया था, बल्कि सफर ही किया था, इधर गर्मी बहुत बढ़ गई है पर अजमेर ठंडा था, मौसम खुश्क था और जिस जगह रूका था वो सुंदर जगह थी, विनम्र लोग, भागती हुई सड़क, पास ही अनासागर झील, सुबह उठते ही सैर को जाते लोग और हर शाम को रंग-बिरंगी रोशनी में नहाए हुए झील के किनारे, चाट, फल, ज्यूस से लेकर गुब्बारे वालों की भीड़
शहर कितना रंगीन होता है, दौड़ता है तो महसूस होता हैं और ठहरता है तो लगता है नसों में जमा खून ठहर गया हो और शरीर मृत हो गए हो - जो दौड़ रहे थे, मै रात को डेढ़ - दो बजे निकलता और चाय की दुकान पर जाकर बैठता, देखता सुनता, हर जगह की वही दास्तां है - थके-हारे लोग, सुस्ताते लोग, बड़ी दुकान के नीचे खाना पकाते लोग, ई रिक्शा को चार्ज करते और उसी में सोते हुए मरियल से लोग, धंधा करके ऊब चुकी अधेड़ महिलाएं, ग्राहक खोज रही लड़कियां, बेखौफ होकर सड़कों पर किसी टूटे हुए बल्ले से क्रिकेट खेलते बच्चे - रोशनी का अंधेराबंद चेहरा कितना भयावह होता है, इन्हीं में पलकर अपराध जवान होते है, फिर किसी वकील या जज की रोटी बनते है, और यह अंधेरों की गाढ़ी कमाई पुलिस से होते हुए न्याय की देहरी पहुंचती है जो आखिर में जेल की कोठरियों में जमा हो जाती है, जीवन का गणित भी कितना सरल है
ख़्वाजा साहब की दरगाह पर ईद की तीसरे दिन भीड़ का अंदाज लगा पाना मुश्किल था, ऑटो वाले ने दूर उतार दिया था, भीड़ में एक-दूसरे का हाथ पककर धक्का खाते हुए दरवाजे पर पहुंचे तो खाविंदो की भीड़ ने घेर लिया, एक युवा - जिसे मौलाना कह रहे थे, थोड़ा दमखम वाला था, ने हाथ पकड़कर खींच लिया और एक हार-फूल की दुकान पर खड़ा कर दिया और एक हरी चादर, फूलों की झालर और चंद सामान टोकरी में सजाकर दे दिया, कहा कि "चप्पल जूते हम सम्हाल लेंगे आप दर्शन कर आईए, किस्मत अच्छी है आपकी", रूपयों की बात ही नहीं आप आए है तो देकर ही जायेंगे, ऐसा नापाक काम भला कोई करता है क्या, शब्दों में शहद था पर हमारे साथ एक युवा को पीछे लगा दिया था जिसने चार जगह हमसे हीबा करवा दिया, मुख्य दरगाह में ले तो गया पर तब तक दो - ढाई हजार के नीचे उतर चुका था मैं, क्या मंदिर - क्या मस्जिद, सब जगह ईश्वर - अल्लाह के दूत है, इनका बस चले तो ये हाथों-हाथ आपको स्वर्ग या जन्नत में प्लॉट दिलाकर रजिस्ट्री कर दें और शिफ्ट कर दें
खैर, ख्वाजा साहब के घर में था तो कोई शंका नहीं करना चाहिए दिल दिमाग पाक साफ रखना चाहिए़, किसी जादू की तरह सब घटित होता गया, भीड़ की एक बात अच्छी लगती है कि वो आपको मंजिल पर पहुंचा ही देती है
#अजमेर_नोट्स - 1
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अमेरिका में इज़रायली और यहूदी लॉबी बहुत महीन, सघन और कारगर तरीक़े से काम करती है. समूचा हॉलीवुड, यहूदियों का बनाया हुआ है. पैरामाउंट पिक्चर्स, वॉर्नर्स ब्रदर्स, MGM, 20th सेंचुरी फ़ॉक्स, यूनिवर्सल पिक्चर्स इन सबकी स्थापना यहूदियों ने की. अमेरिका समेत पूरी दुनिया पर अब भी इन स्टूडियो का दबदबा है.
OTT में सबसे बड़े नाम नेटफ़्लिक्स का को-फ़ाउंडर और पहला CEO मार्क रैंडॉल्फ़ यहूदी हैं. अमेज़ॉन के मौजूदा CEO ऐंडी जेसी यहूदी हैं. डिज़्नी में 1984 से 2026 तक के सभी CEO यहूदी रहे हैं.
न्यूज़ मीडिया का भी यही हाल है. जो यहूदी नहीं हैं, वे रूपर्ट मर्डोक जैसे धुर इज़रायल समर्थक हैं. मर्डोक वहां पर फ़ॉक्स न्यूज़, वॉल स्ट्रीट जर्नल, न्यूयॉर्क पोस्ट, वग़ैरह के मालिक हैं. बाक़ी, सीधे यहूदी की ओनरशिप वाले दर्जन भर मीडिया ग्रुप हैं. बड़े से लेकर मझोले और छोटे स्तर तक.
यहूदियों ने हिटलर वाली जर्मनी में अंतहीन यातनाएं झेली हैं, लेकिन आप पाएंगे कि उन यातनाओं को फ़िल्मों में, सीरीज़ में, मीडिया में व्यापक जगह मिली. हिटलर पर दर्जनों फ़िल्में, डॉक्यूमेंट्री, और सीरीज़ बनी हैं. इनमें से कई तो क्लासिक हैं.
यहूदियों के दर्द से पूरी दुनिया वाकिफ़ हैं. गंभीर किताबों से लेकर गंभीर फ़िल्मों तक, पॉपुलर रिपोर्ट से लेकर पॉपुलर फ़िल्मों तक की पूरी रेंज है. कौन होगा जिसे नहीं पता होगा कि यहूदी सताई हुई क़ौम है!
इन स्टूडियो के मालिकों, अधिकारियों ने ख़ुद पर ज़ुल्म ढाने वालों को दुनिया के सामने ज़लील करके रख दिया.
लेकिन क्या आपने कभी देखा है कि इन स्टूडियो या OTT प्लैटफ़ॉर्म ने लीबिया, सीरिया, इराक़, लेबनान, यमन या फ़िलिस्तीन के सताए हुए लोगों पर कोई फ़िल्म बनाई है? क्या कभी देखा है कि फ़िलिस्तीन के क़त्लेआम को फ़िल्मों में दिखाया गया हो? वहां की ‘नस्लीय सफ़ाई’ को फ़िल्मों में जगह मिली हो?
नहीं, क्योंकि इसमें इज़रायल विलेन है. अमेरिका विलेन हैं. यहूदी विलेन है. अलबत्ता हाल की फ़िल्मों और सीरीज़ में मोसाद को मानवीय तरीक़े से पेश करने की कोशिश की गई है. Fauda जैसी सीरीज़ में IDF (इज़रायली डिफ़ेंस फ़ोर्स) और मोसाद को ग्लोरिफ़ाई किया गया है.
क्या आपने कोई अमेरिकी फ़िल्म या सीरीज़ देखी है जिसमें दुष्ट हिटलर को ग्लोरिफ़ाई किया गया हो?
इज़रायली ‘हसबारा’ के ज़रिए दुनिया भर के फ़िल्म निर्माताओं को यह सुविधा दी जाती है कि वह इज़रायल में भारी टैक्स डिसकाउंट के साथ शूटिंग करें और इज़रायली नैरेटिव को दुनिया के सामने रखें. सात-आठ साल से हिंदी फ़िल्म उद्योग के साथ भी इज़रायल का यह सिलसिला शुरू हुआ है.
दर्जनों हीरो-हीरोइन-निर्देशक इज़रायल जा चुके हैं. हर साल इज़रायल के साथ किसी न किसी के को-प्रोडक्शन का क़रार हो रहा है. मरहूम सुशांत सिंह राजपूत की फ़िल्म ड्राइव की ज़्यादातर शूटिंग तेल अवीव में हुई थी. वह संभवत: पहली ऐसी फ़िल्म थी जिसका बड़ा हिस्सा इज़रायल में शूट हुआ.
2018 में नेतन्याहू ने अमिताभ बच्चन समेत बॉलीवुड के कई कलाकारों से मुलाक़ात की.
ये सब बहुत सोच-समझकर किया जा रहा है. एक rogue state को मानवीय बनाने दिखाने के लिए.
इससे पहले कि कोई यह सवाल करे कि जर्मनी में यहूदियों का सताया जाना इतिहास का मामला है और उस पर व्यापक सहमति बनी हुई है, इसलिए उस विषय पर फ़िल्म बनाने में कॉन्फ़्लिक्ट पैदा नहीं होता, लेकिन समसामयिक विषयों पर किसी देश को विलेन दिखाना चुनौती भरा काम है, उनके लिए दो बातें.
पहली, हिटलर के ज़िंदा रहते हुए अमेरिका के इन्हीं स्टूडियो ने तमाम फ़िल्में बनाईं.
यह साहसिक काम चार्ली चैपलिन जैसे ग़ैर-यहूदियों ने भी किया. उनकी द ग्रेट डिक्टेटर को कौन भूल सकता है!
दूसरी, समसामयिक मुद्दों पर फ़िल्में तो बन ही रही हैं, लेकिन इनमें पश्चिम एशिया के हर मुल्क को आतंकवादियों के अड्डे के तौर पर दिखाया जाता है, सिवाय इज़रायल के. फ़िल्मों में अगर सीरिया, इराक़, लेबनान, अफ़ग़ानिस्तान, फ़िलिस्तीन या किसी भी दूसरे मुल्क का ज़िक्र आ जाए, तो पहले समझ में आ जाता है कि यहां विलेन होगा.
राजनीति की बात इसमें नहीं की गई है, लेकिन अमेरिकी राजनीति को भी इज़रायली लॉबी कंट्रोल करती है. उस पर फिर कभी.
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अंधभक्तों की हालत दिमागी रूप से भयानक अस्थिर है, मोदी सरकार जब हर मोर्चे पर फैल हो गई है तो वामपंथियों और कांग्रेसियों को दोषी ठहराकर देशप्रेम का हवाला दे रहे है - "देश सर्वोपरि" यह भाजपा या संघ को समझ नहीं आता क्या
मूर्खता की हद यह है कि रो भी नहीं पा रहे है - क्योंकि सन चौदह से विधायक और सांसद या स्थानीय पार्षदों या नेताओं की दलाली करके घर चला रहे थे, पर अब जब खेल खत्म होते दिख रहा तो औकात समझ आ गई - सरकार से लेकर विधायक और सांसद की, अब थाली पीट रहे है, मजेदार यह कि जिन्होंने गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय या अपने घर का इतिहास नहीं पढ़ा - वो वामपंथ और कांग्रेस को गलिया रहें हैं - क्योंकि ना मार्क्स मालूम है, ना लेनिन या आजादी के आंदोलन की कहानी - बस दलाली कैसे करें - इनसे पूछ लो
अच्छा मजा आ रहा है जब भक्तों के पप्पा पसीना पोछकर संसद में कोरोना याद दिलाकर अपना डर सार्वजनिक कर रहे है
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ये हिजरतों का ज़माना भी क्या ज़माना है
उन्हीं से दूर हैं जिन के लिए कमाना है
ख़ुशी ये है कि मिरे घर से फ़ोन आया है
सितम ये है कि मुझे ख़ैरियत बताना है
हमें ये बात बहुत देर में समझ आई
वहीं तो जाल बिछा है जहाँ भी दाना है
हमें जला नहीं सकती है धूप हिजरत की
हमारे सर पे ज़रूरत का शामियाना है
नमाज़ ईद की पढ़ कर मैं ढूँढता ही रहा
कहीं दिखे कोई अपना गले लगाना है
वहीं वहीं लिए फिरती है गर्दिश-ए-दौराँ
जहाँ जहाँ भी लिखा मेरा आब-ओ-दाना है
• सैयद सरोश आसिफ़
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आज लगभग बीस दिन हो रहे, बहुत ही बेचैनी थी, सीने में दर्द, आंखों में जलन, बोलने में हिचकिचाहट और ठीक से चलने की भी नहीं बन रही थी, अपचन और कब्ज़ की शिकायत बनी थी, नींद नहीं आ रही थी, डॉक्टर्स की टीम को भी समझ नहीं आ रहा था, सारी जाँचें करवा ली थी
बस अचानक ईरान - तेहरान - इज़राइल और अमेरिका में छिड़े घातक युद्ध, एलपीजी गैस की कमी और पेट्रोल के संभावित बढ़ने वाले भाव पर एक स्थापित कवि की ठीक सत्रह कविताएं पढ़ ली, तब जाकर तबीयत ठीक हुई है, अब कल से निकलूंगा बाहर और दौरों पर
साला मन ही नहीं लग रहा था इतने दिन, उम्मीद है दलित - अलित - आदिवासी के फर्जी ऐयाश नेता - प्रगतिशील - जनवादी - जसम और बाकी मुहल्ले के छुटभैये और विवि में शिष्य वृत्ति पर पलने वाले युवा कवि और ज्यादा रोना-धोना करके महिलाओं को रिझाने वाले और बीवियों को कठपुतली की तरह सामने रखकर गोली चलाने वाले कवि अब व्यवस्थित लिखेंगे - ताकि कोई बीमार ना पड़े, अल्लाह कसम, अपनी वीरभोग्या भूमि कैसे कवियों से खाली हो गई - यह सोचते हुए मैं तो इस सदमे से ही मर जाता - कसम से
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मार्च है कि खत्म नहीं हो रहा, थक गया हो जैसे और ऊंघते, सुस्ताते हुए रेंग रहा है, अभी भी पूरे दो दिन बाकी है मार्च के,
गत 59 वर्षों में एक भी मार्च ऐसा नहीं देखा जिसमें होली, परीक्षाएं, विश्व युद्ध, पेट्रोल - गैस की किल्लत, मिसाईल - ड्रोन - बमों की वर्षा, क्रिकेट का विश्व कप मुकाबला, ईद, गुड़ी पड़वा, ठंडी, भयानक गर्मी और बरसात, कद्दावर नेताओं की मौत, अमेरिका को हारते, भारतीय रूपयों को डॉलर के मुकाबले सबसे निम्न स्तर पर देख लिया, भारतीय प्रधानमंत्री को मजबूर और बेबस होने के साथ बुरी तरह से लड़खड़ाते और टूटते हुए संसद में मन मोहन से ज्यादा मौन और खौफ़जदा देख लिया, महामहिम राष्ट्रपति को बंगाल से लौटते हुए देख लिया और तिस पर आईपीएल अभी बाकी है
अफसोस यह है कि अभी सिर्फ और सिर्फ आज 19 तारीख है और मार्च खत्म होने में 12 दिन की सदियाँ बाकी है
दुआ करिए कि सब ठीक हो
आमीन
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